• News
  • Blogs
  • Gurukulam
English हिंदी
×

My Notes


  • TOC
    • प्रेम और परमेश्वर
    • सत्य के दर्शन
    • स्वामी रामतीर्थ
    • हम परमार्थ की भी साधना करें
    • संसार के कुशल समाचार
    • सफलता आत्म विश्वासी को मिलती है।
    • श्री अरविन्द घोष
    • भागीरथ और उनकी भागीरथी
    • स्वार्थपरता एक अनैतिक मूर्खता
    • सावधान—समर्थ गुरु रामदास
    • काम से जी न चुरावें
    • मनोविकारों का शरीर पर प्रभाव
    • सच्चे पादरी जार्जेज पियरे
    • Quotation
    • मित्रता क्यों और कैसे?
    • हिन्दू संस्कृति के सच्चे सेवक राजा राम मोहन राय
    • महादेव गोविन्द रानाडे
    • भ्रष्टाचार कैसे दूर किया जाय
    • बच्चे अपराधी क्यों बनते हैं?
    • जमीला, जमीला, जमीला,
    • धन का उपार्जन और सदुपयोग
    • तुलसी का उपयोग कीजिए
    • अब्राहम लिंकन
    • अपने दोषों को भी देखा कीजिए!
    • सच्ची इबादत
    • मधु संचय
    • विश्व व्यवस्था
    • तीन महत्वपूर्ण शिक्षण शिविर
    • आत्म निर्माण की जीवन साधना
    • सुसंगठित ज्ञान यज्ञ
    • स्वस्थ शरीर और स्वच्छ मन की पुण्य प्रक्रिया
    • सभ्य समाज की अभिनव रचना
    • जीवन-निर्माण का मासिक प्रशिक्षण
    • गीता-माध्यम से जन-जागरण की शिक्षा
    • “युग-निर्माण योजना” पाक्षिक
    • असफल आराधना
    • असफल आराधना (Kavita)
  • My Note
  • Books
    • SPIRITUALITY
    • Meditation
    • EMOTIONS
    • AMRITVANI
    • PERSONAL TRANSFORMATION
    • SOCIAL IMPROVEMENT
    • SELF HELP
    • INDIAN CULTURE
    • SCIENCE AND SPIRITUALITY
    • GAYATRI
    • LIFE MANAGEMENT
    • PERSONALITY REFINEMENT
    • UPASANA SADHANA
    • CONSTRUCTING ERA
    • STRESS MANAGEMENT
    • HEALTH AND FITNESS
    • FAMILY RELATIONSHIPS
    • TEEN AND STUDENTS
    • ART OF LIVING
    • INDIAN CULTURE PHILOSOPHY
    • THOUGHT REVOLUTION
    • TRANSFORMING ERA
    • PEACE AND HAPPINESS
    • INNER POTENTIALS
    • STUDENT LIFE
    • SCIENTIFIC SPIRITUALITY
    • HUMAN DIGNITY
    • WILL POWER MIND POWER
    • SCIENCE AND RELIGION
    • WOMEN EMPOWERMENT
  • Akhandjyoti
  • Login





Magazine - Year 1964 - Version 2

Media: TEXT
Language: HINDI
SCAN TEXT


आत्म निर्माण की जीवन साधना

Listen online

View page note

Please go to your device settings and ensure that the Text-to-Speech engine is configured properly. Download the language data for Hindi or any other languages you prefer for the best experience.
×

Add Note


First 28 30 Last
यह निर्विवाद है कि धर्म और सदाचार के आदर्शवादी सिद्धान्तों का प्रशिक्षण भाषणों और लेखों से पूरा नहीं हो सकता। यह दो माध्यम महत्वपूर्ण तो हैं पर इनका उपयोग इतना ही है कि वातावरण तैयार कर सकें। वास्तविक प्रभाव तो तभी पड़ता है जब अपना अनुकरणीय आदर्श उपस्थित करके किसी को प्रभावित किया जाय। चूँकि हमें नये समाज की, नये आदर्शों की, जन-मानस में प्रतिष्ठापना करनी है इसलिए यह अनिवार्य रूप से आवश्यक है कि अखण्ड-ज्योति परिवार के सदस्य दूसरों के सामने अपना अनुकरणीय आदर्श रखें। प्रचार का यही श्रेष्ठ तरीका है। इस पद्धति को अपनाये बिना जन-मानस को उत्कृष्टता की दिशा में प्रभावित एवं प्रेरित किया जाना सम्भव नहीं। इसलिए आगामी वर्ष का सबसे महत्वपूर्ण कार्य यह है कि परिवार का प्रत्येक सदस्य इस बात की चेष्टा करे कि उसके जीवन में आलस, प्रमाद, अव्यवस्था एवं अनैतिकता की जो दुर्बलताएं समाई हुई हों उनका गम्भीरतापूर्वक निरीक्षण करे और इस आत्म चिन्तन में जो-जो दोष दृष्टिगोचर हों उन्हें सुधारने के लिए एक क्रम-बद्ध योजना बनाकर आगे बढ़ चले।

आत्म-चिन्तन के लिए हममें से हर एक को अपने से निम्न प्रश्न पूछने चाहिए और उनके उत्तरों को नोट करना चाहिए।

समय जैसी बहुमूल्य जीवन निधि का हम ठीक प्रकार सदुपयोग करते हैं या नहीं? आलस्य और प्रमाद में उसकी बर्बादी तो नहीं होती?

जीवन लक्ष्य की प्राप्ति का हमें ध्यान है या नहीं? शरीर सज्जा में ही इस अमूल्य अवसर को नष्ट तो नहीं कर रहे? देश, धर्म, समाज और संस्कृति की सेवा के पुनीत कर्तव्य की उपेक्षा तो नहीं करते?

अपनी विचारधारा एवं गतिविधियों को हमने अन्धानुकरण के आधार पर बनाया है या विवेक दूर-दर्शिता एवं आदर्शवादिता के अनुसार उनका निर्धारण किया है।

मनोविकारों और कुसंस्कारों के शमन करने के लिए हम संघर्षशील रहते हैं या नहीं? छोटे-छोटे कारणों को लेकर हम अपनी मानसिक शान्ति से हाथ धो बैठने और प्रगति के सारे मार्ग अवरुद्ध करने की भूल तो नहीं करते?

कटु भाषण, छिद्रान्वेषण एवं अशुभ कल्पनाएं करते रहने की आदतें छोड़कर सदा सन्तुष्ट, प्रयत्नशील एवं हँसमुख रहने की आदत हम डाल रहे हैं या नहीं?

शरीर, वस्त्र, घर तथा वस्तुओं का स्वच्छ एवं सुव्यवस्थित रखने को अभ्यास आरम्भ किया या नहीं? श्रम से घृणा तो नहीं करते?

परिवार को सुसंस्कारी बनाने के लिए आवश्यक ध्यान एवं समय लगाते हैं या नहीं?

आहार सात्विकता प्रधान होता है न? चटोरपन की आदत छोड़ी जा रही है न? सप्ताह में एक समय उपवास, जल्दी सोना, जल्दी उठना—आवश्यक ब्रह्मचर्य का नियम पालते हैं न?

ईश्वर उपासना, आत्म-चिन्तन, स्वाध्याय को अपने नित्य-नियम मं स्थान दे रखा है न?

आमदनी से अधिक खर्च तो नहीं करते? कोई दुर्व्यसन तो नहीं? बचत करते हैं न?

उपरोक्त दस प्रश्न नित्य अपने आपसे पूछते रहने वाले को जो उत्तर आत्मा दे उन पर विचार करना चाहिए और जो त्रुटियाँ दृष्टिगोचर हों उन्हें सुधारने का नित्य ही प्रयत्न करना चाहिए।

आत्म सुधार के लिए क्रमिक परिष्कार की पद्धति को अपनाने से भी काम चल सकता है। अपने सारे दोष दूषणों को एक ही दिन में त्याग देने का उत्साह तो लोगों में आता है पर संकल्प-शक्ति के अभाव में बहुधा वह प्रतिज्ञा निभ नहीं पाती, थोड़े समय में वही पुराना कुसंस्कारी ढर्रा आरम्भ हो जाता है। प्रतिज्ञाएं करने और उन्हें न निभा सकने से अपना संकल्प बल घटता है और फिर छोटी-छोटी प्रतिज्ञाओं को निभाना भी कठिन हो जाता है। यह क्रम कई बार चलाने पर तो मनुष्य का आत्म विश्वास ही हिल उठता है और वह सोचता है कि हमारे कुसंस्कार इतने प्रबल हैं कि जीवनोत्कर्ष की दिशा में बदल सकना अपने लिए संभव ही न होगा। यह निराशाजनक स्थिति तभी आती है जब कोई व्यक्ति आवेश और उत्साह में अपने समस्त दोष दुर्गुणों को तुरन्त त्याग कर देने की प्रतिज्ञा करता है और मनोबल की न्यूनता के कारण चिर-संचित कुसंस्कारों से लड़ नहीं सकता।

आत्म शोधन का कार्य एक प्रकार का देवासुर-संग्राम है। संस्कारों की आसुरी वृत्तियाँ अपना मोर्चा जमाये बैठी रहती हैं और वे सुसंस्कार धारण के प्रयत्नों को निष्फल बनाने के लिए अनेकों छल-दल करती रहती हैं। इसलिये क्रमशः आगे बढ़ने और मंथर किन्तु सुव्यवस्थित रीति से अपने दोष दुर्गुणों को परास्त करने का प्रयत्न करना चाहिए। सही तरीका यह है अपनी सभी बुराइयों एवं दुर्बलताओं को एक कागज पर नोट कर लेना चाहिए और प्रतिदिन प्रातःकाल उठकर उसी दिन का ऐसा कार्यक्रम बनाना चाहिए कि आज अपनी अमुक दुर्बलता को इतने अंशों में तो घटा ही देना है। उस दिन का जो कार्यक्रम बनाया जाय उसके सम्बन्ध में विचार कर लेना चाहिए कि इनमें कब, कहाँ, कितने, किन कुसंस्कारों के प्रबल होने की सम्भावनाओं के सामने आने पर हमें कम से कम कितनी आदर्शवादिता तो दिखानी ही चाहिए, यह निर्णय पहले ही कर लेना चाहिए और फिर सारे दिन प्रातःकाल की हुई प्रतिज्ञा के निबाहने का दृढ़तापूर्वक प्रयत्न करना चाहिए। इस प्रकार प्रतिदिन थोड़ी-थोड़ी सफलता भी आत्मसुधार की दिशा में प्राप्त होती चले तो अपना साहस बढ़ेगा और धीरे-धीरे सभी दुर्गुणों को छोड़ सकना सम्भव हो जाएगा।

आज इतनी मात्रा में ही भोजन करेंगे, इतनी दूर टहलने जायेंगे, इतना व्यायाम करेंगे, आज तो ब्रह्मचर्य रखेंगे ही, बीड़ी पीने आदि का कोई व्यसन हो तो रोज जितनी बीड़ी पीते थे उसमें एक कम कर ही देंगे, इतने समय तो भजन या स्वाध्याय करेंगे ही, सफर एवं व्यवस्था में आज इतनी देर का अमुक समय तो लगावेंगे ही, इस प्रकार की छोटी-छोटी प्रतिज्ञाएं नित्य लेनी चाहिए और उन्हें अत्यन्त कड़ाई के साथ उस दिन तो पालन कर ही लेना चाहिए। दूसरे दिन की स्थिति समझते हुए फिर दूसरे दिन की सुधरी दिनचर्या बनाई जाय। इसमें शारीरिक क्रियाओं का ही नहीं, मानसिक गतिविधियों का सुधार करने का भी ध्यान रखा गया हो। प्रतिदिन छोटी-छोटी सफलताएं प्राप्त करते चलने से अपना मनोबल निरन्तर बढ़ता है और फिर एक दिन साहस एवं संकल्प बल इतना प्रबल हो जाता है कि आत्म शोधन की किसी कठोर प्रतिज्ञा को कुछ दिन ही नहीं, वरन् आजीवन निबाहते रहना सरल हो जाता है।

दैनिक आत्म-चिन्तन एवं दिनचर्या निर्धारण के लिए एक समय निर्धारित किया जाय। दिनचर्या निर्धारण के लिए, प्रातः सोकर उठते ही जब तक शैय्या त्याग न किया जाय वह समय सर्वोत्तम है। आमतौर से नींद खुलने के कुछ देर बाद ही लोग शैय्या त्यागते हैं। कुछ समय तो ऐसे ही आलस में पड़े रहते हैं। यह समय दैनिक कार्यक्रम बनाने के लिए सर्वोत्तम है। इसी प्रकार आत्म चिन्तन के लिए रात को सोते समय का अवसर सर्वोत्तम है। शैय्या पर जाते ही तुरन्त किसी को नींद नहीं आ जाती, इसमें कुछ देर लगती है। इस अवसर को आत्म-चिन्तन में, अपने आपसे 10 प्रश्न पूछने और उनके उत्तर प्राप्त करने में लगाया जा सकता है। जिनके पास अन्य सुविधा के समय मौजूद हों वे इन कार्यों को सुविधा के अन्य समयों पर भी कर सकते हैं। पर उपरोक्त दो समय व्यस्त से व्यस्त सज्जनों के लिए भी सुविधाजनक रह सकते हैं और इन दोनों प्रक्रियाओं को अपना कर हम आसानी ये आत्मिक प्रगति के पथ पर बहुत आगे तक बढ़ सकते हैं।

ज्येष्ठ के शिविरों में आये हुए प्रायः प्रत्येक शिक्षार्थी ने जीवन साधना की इस पद्धति को दैनिक कार्यक्रम में सम्मिलित करने का संकल्प किया और विश्वासपूर्वक कहा कि वे इसे दृढ़तापूर्वक आजीवन निबाहते रहेंगे। शिविरों में जो परिजन परिस्थिति वश पधार नहीं सके उन्हें भी इस प्रेरणा को अपनाना चाहिए और इस शिक्षण में सम्मिलित होने का लाभ लेना चाहिए।

First 28 30 Last


Other Version of this book



Version 1
Type: SCAN
Language: HINDI
...

Version 2
Type: TEXT
Language: HINDI
...


Releted Books


Articles of Books

  • प्रेम और परमेश्वर
  • सत्य के दर्शन
  • स्वामी रामतीर्थ
  • हम परमार्थ की भी साधना करें
  • संसार के कुशल समाचार
  • सफलता आत्म विश्वासी को मिलती है।
  • श्री अरविन्द घोष
  • भागीरथ और उनकी भागीरथी
  • स्वार्थपरता एक अनैतिक मूर्खता
  • सावधान—समर्थ गुरु रामदास
  • काम से जी न चुरावें
  • मनोविकारों का शरीर पर प्रभाव
  • सच्चे पादरी जार्जेज पियरे
  • Quotation
  • मित्रता क्यों और कैसे?
  • हिन्दू संस्कृति के सच्चे सेवक राजा राम मोहन राय
  • महादेव गोविन्द रानाडे
  • भ्रष्टाचार कैसे दूर किया जाय
  • बच्चे अपराधी क्यों बनते हैं?
  • जमीला, जमीला, जमीला,
  • धन का उपार्जन और सदुपयोग
  • तुलसी का उपयोग कीजिए
  • अब्राहम लिंकन
  • अपने दोषों को भी देखा कीजिए!
  • सच्ची इबादत
  • मधु संचय
  • विश्व व्यवस्था
  • तीन महत्वपूर्ण शिक्षण शिविर
  • आत्म निर्माण की जीवन साधना
  • सुसंगठित ज्ञान यज्ञ
  • स्वस्थ शरीर और स्वच्छ मन की पुण्य प्रक्रिया
  • सभ्य समाज की अभिनव रचना
  • जीवन-निर्माण का मासिक प्रशिक्षण
  • गीता-माध्यम से जन-जागरण की शिक्षा
  • “युग-निर्माण योजना” पाक्षिक
  • असफल आराधना
  • असफल आराधना (Kavita)
About Shantikunj

Shantikunj has emerged over the years as a unique center and fountain-head of a global movement of Yug Nirman Yojna (Movement for the Reconstruction of the Era) for moral-spiritual regeneration in the light of hoary Indian heritage.

Navigation Links
  • Home
  • Literature
  • News and Activities
  • Quotes and Thoughts
  • Videos and more
  • Audio
  • Join Us
  • Contact
Write to us

Click below and write to us your commenct and input.

Go

Copyright © SRI VEDMATA GAYATRI TRUST (TMD). All rights reserved. | Design by IT Cell Shantikunj