भागीरथ और उनकी भागीरथी
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पौराणिक गाथा के अनुसार भागीरथ के पूर्वजों को शाप लगा था और वे जलकर भस्म हो गये थे। मरने के उपराँत भी उन्हें सद्गति नहीं मिली। वे नरकगामी हुए। उपाय यह बताया गया कि स्वर्ग से गंगा अवतरित होकर आवे और उस स्थान पर होती हुई बहे—जहाँ वे भस्म हुए थे—तो उन पितरों की सद्गति संभव हो।
राजकुमार भागीरथ राजघरानों में उत्पन्न हुए अन्य विलासी लड़कों की तरह न थे, जिन्हें सुरा-सुन्दरी की नारकीय अग्नि में अपने चढ़ते यौवन को जला डालने की उतावली रहती है। यों बड़े आदमियों के पीछे कुसंग भी दुर्भाग्य की तरह पीछे पड़ा रहता है पर मनस्वी भागीरथ का संस्कारवान मन भटका नहीं, विचारशीलता ने उसे जीवन समस्याओं को ध्यान में रखने की प्रेरणा दी।
पूर्वजों के प्रति अपने कर्तव्य की बात भागीरथ सोचा करते। शाप से पितरों के भस्म होने के कारण उनके कुल का गौरव घट गया था, वे चाहते थे कि ऐसा आदर्श पथ अपनाया जाय जिससे वह खोया हुआ सम्मान पुनः प्राप्त हो। दुष्कर्म स्वतः ही एक शाप है, जो उन्हें करता है वह भस्म हुए बिना नहीं रहता। फिर अपयश का नरक तो उन्हें मिलता ही है। पूर्वज इस प्रकार की भूल कर चुके थे,अब बिगड़ी बात बनानी हो तो आदर्श सत्कर्म करने का—श्रेष्ठता के पथ पर चलने का मार्ग ही शेष था। यदि दुष्कर्मों का फल नरक है तो सत्कर्म स्वर्ग भी तो दे सकते हैं। गंगा को पृथ्वी पर लाने का पुण्य उन्हें ही नहीं उनके पूर्वजों को भी सद्गति प्रदान कर सकता है, तो जीवन उसी कार्य में क्यों न लगा दिया जाय, भागीरथ निरन्तर यही सोचते रहते।
सोचना बहुत कुछ और करना कुछ नहीं यह दुर्बल मनोभूमि के पुरुषों का मार्ग है। मनस्वी लोगों को जो उचित और उपयुक्त प्रतीत होता है उस पर वह चलने के लिये कटिबद्ध भी होते हैं। साहस के सामने बेचारी कठिनाइयाँ कितनी देर ठहर पाती हैं, उन्हें रास्ता देना ही पड़ता है। भागीरथ ने गंगा को स्वर्ग से पृथ्वी पर लाने का अपना निश्चय जब परिजनों को सुनाया तो वे अवाक् रह गये। इतना बड़ा काम, इतना छोटा लड़का कर सकेगा, इस पर उन्हें विश्वास न होता था। आरम्भ में सभी ने एक स्वर से असहमति प्रकट की, और मार्ग की बाधाओं को बताते हुए निरुत्साहित किया, पर जैसा कि सदा से होता आया है वह यहाँ भी हुआ। दृढ़-निश्चय के आगे सब झुकते हैं और अन्ततः समर्थन भी मिलता है और सहयोग भी।
भागीरथ घर से चल पड़े और हिमालय पर जाकर तप करने लगे। हिमि के देवता—शंकर का हृदय पसीजा। उन्होंने अपने मस्तक में निवास करने वाली गंगा को मरुभूमि में प्रवाहित होने की व्यवस्था कर दी। आधुनिक बुद्धिवादी कहते हैं कि शिवलिंग पर्वत के गर्भ में अपरिमेय जप की यह अजस्र-धारा-गंगा छिपी पड़ी थी। तपस्वी भागीरथ ने एक तपस्वी इंजीनियर के रूप में उसे खोजा और उसे मरुभूमि में ले आने के लिये अवरोध-भागों को तोड़-फोड़ कर भगवती जाह्नवी को मैदान में उतारने की सफलता प्राप्त करली।
जो हो, भागीरथ अपने लक्ष्य में सफल हुए। यह तप उन्हें बहुत लंबे समय तक करना पड़ा और दुर्गम प्रदेश की कठिनाइयों ने उनके शरीर को जीर्ण-शीर्ण भी कर डाला, पर इससे क्या? मनुष्य शरीर की सार्थकता बहुत दिन जीने या ऐश आराम करने में नहीं, वरन् इस बात में है कि यज्ञ को उज्ज्वल बनाने वाला कोई सत् कार्य उससे बन पड़े। युवावस्था का महत्वपूर्ण भाग गंगावतरण के पराक्रम में लगाकर भागीरथ ने खोया कुछ नहीं, पाया बहुत कुछ। शाप पीड़ित पूर्वजों को सद्गति मिली, वे स्वयं यशस्वी हुए, और सबसे बड़ी बात यह हुई कि उनके सत्प्रयत्न द्वारा अवतरित गंगा द्वारा अब तक कोटि-कोटि प्राणियों ने अपनी क्षुधा तृष्णा और अशाँति मिटाते हुए समृद्धि और शाँति का आनन्द लाभ किया।
भागीरथ आज हम लोगों के बीच मौजूद नहीं है। काल की कराल गति ने उन्हें भी नियति अवधि से अधिक यहाँ नहीं रहने दिया। फिर भी वे अमर हैं। भगवती भागीरथी अपने कल-कल नाद में उस महातपस्वी के पुरुषार्थ का निरन्तर गुणगान करती रहती है। जीवन ऐसे ही लोगों का धन्य है, यों वासना और तृष्णा के कीचड़ में कुलबुलाते हुए कीड़ों की तरह जिन्दगी तो हम लोग भी किसी तरह पूरी कर ही लेते हैं।

