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Magazine - Year 1964 - Version 2

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भ्रष्टाचार कैसे दूर किया जाय

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जैसा कि हम सभी जानते हैं कि भ्रष्टाचार और अपराध की प्रवृत्तियों ने हमारे समाज में व्यापक रूप से अपनी जड़ें फैला रखी हैं। विनोबा भावे के शब्दों में “भ्रष्टाचार तो शिष्टाचार हो गया है। जब सभी लोग ऐसा करने लगें तो यह भ्रष्टाचार नहीं शिष्टाचार हो जाता है। भ्रष्टाचार तभी तक है जब तक कुछ लोग उसे करें, लेकिन सब लोग उसे अपना लें तो वह शिष्टाचार हो जाता है।”

बात बिल्कुल ठीक है। भ्रष्टाचार ने व्यापक स्तर पर जन-जीवन को प्रभावित कर रखा है। नौकरशाही में, व्यापार में, समाज में, नेताओं में, राजनीति में, धर्म में यहाँ तक व्यक्तिगत, पारिवारिक जीवन में भी भ्रष्टाचार फैला हुआ है। अर्थात् विभिन्न क्षेत्रों में हमारा आचरण सचाई-ईमानदारी, कर्तव्यपरायणता, न्याय आदि में अनुकूल न होकर बेईमानी, झूठ, स्वार्थ और अन्याय से प्रेरित होता है। इसे दूर कैसे किया जाय, यह एक अहम् समस्या है। क्योंकि जब तक जन जीवन से भ्रष्टाचार दूर न होगा तब तक हमारा विकास न हो सकेगा, प्रगति और उन्नति की सभी योजनायें अधूरी और निकम्मी रह जायेंगी।

हममें से बहुत से लोगों का मत है कि भ्रष्टाचार दूर करने के लिए सरकार को कड़े कदम उठाने चाहिएं। प्रभावशाली कानून बना कर ऐसे लोगों को कड़ी सजायें देनी चाहिएं। यह आवश्यक भी है। सरकारी नियन्त्रण से लोगों में भ्रष्टाचार की प्रवृत्तियों को बहुत कुछ दबाया जा सकता है। डिक्टेटर प्रधान शासन पद्धति वाले देशों में ऐसा होता भी है और कुछ हद तक सफलता मिल जाती है, किन्तु इस बुराई को शासन पूर्णतया मिटा नहीं सकता। सर्वप्रथम तो सरकारी मशीनरी ही जब इससे प्रभावित हो तो कानून का कोई कारगर उपयोग नहीं हो पाता। इसके सिवा कानून बनने से पूर्व उससे बच निकलने के रास्ते ढूँढ़ लिये जाते हैं। हम देखते हैं कि कानून का सहारा लेकर दोषी व्यक्ति भी कई बार साफ बरी हो जाते हैं। दण्ड और सजा का भय भी लोगों को प्रभावित नहीं करता। आज कई अपराधों के लिए मृत्यु दण्ड निश्चित है फिर भी वे बढ़ते जा रहे हैं, घटते नहीं।

इस तरह का सरकारी प्रयत्न भ्रष्टाचार के निरोध का पूर्ण समाधान नहीं है। हाँ ये भी कुछ अंशों में इस समस्या के दूर करने में सहायक हो सकते हैं। वस्तुतः भ्रष्टाचार एक सामाजिक समस्या है। यह समाज के चरित्र और स्वभाव से संबंध रखती है। जब तक समाज का चरित्र उत्कृष्ट नहीं होगा स्वभाव उत्तम नहीं बनेगा, तब तक भ्रष्टाचार की जड़ नहीं मिट सकती। लोगों को चरित्र निर्माण की दिशा में प्रोत्साहन किया जाना चाहिए।

इसके लिए सर्वप्रथम समाज के अग्रगण्य नेता, बड़े आदमी, राज्याधिकारी, मन्त्री, धर्म गुरुओं को अपने आदर्श-चरित्र और सद्व्यवहार का उदाहरण जन-साधारण के समक्ष रखना चाहिए। किसी भी बात का समाज में प्रचार करने के लिए पहले उसे अपने जीवन में अपनाना आवश्यक है। समाज के अगुआ लोग जैसा आचरण करते हैं, उसका अनुकरण दूसरे लोग करते हैं। सामाजिक राजनैतिक, धार्मिक कार्यकर्ता और नेता लोग जब अपने प्रत्यक्ष आचरण और उदाहरण के द्वारा जनता को चरित्र निर्माण का मार्ग दिखायेंगे तो वह दिन दूर नहीं होगा जब भ्रष्टाचार, अपराध की प्रवृत्तियाँ हमारे समाज से दूर हट जायेंगी। महात्मा गाँधी ने कुछ समय पूर्व यही उदाहरण प्रस्तुत किया था। उन्होंने न तो कानून बनाने की माँग की, न दोषी को सजा देने की, न समाज के दोषों को गिनाया। उन्होंने जैसा समाज बनाना चाहा उसके अनुसार पहले स्वयं को बनाया। यही कारण था कि देखते-देखते लोगों में अपूर्व त्याग, सेवा, परमार्थ की भावना पैदा हो गई थी उस समय। गाँधीजी के नेतृत्व में असंख्यों भारतवासियों ने अपने हितों का त्याग करके जन-कल्याण के लिए अपना सहर्ष उत्सर्ग किया था। जब तक समाज के मूर्धन्य नेता इस आदर्श का अवलंबन नहीं करने लगे तब तक साधारण जनता कैसे इन आदर्शों को अपनायेगी। जब मंत्री, नेता, धर्मगुरु, समाज सेवक अपना स्वार्थ सिद्ध करने, अपनी कोठियाँ, मिलें बनाने में लगे रहेंगे, अपने लिए सम्पत्ति एकत्रित करने में जुटे रहेंगे तब तक जन-साधारण क्यों नहीं इसी मार्ग का अनुकरण करेगा? आज समाज से भ्रष्टाचार के दूर होने में यह एक बहुत बड़ी बाधा है।

विभिन्न समाज-सेवी, धार्मिक संस्थाओं के द्वारा समाज में ऐसा वातावरण बनाया जाय जिससे लोगों को बुराइयाँ छोड़ने की प्रेरणा मिले। लोगों से सामूहिक और व्यक्तिगत रूप से मिलावट न करेंगे, रिश्वत घूस न लेने, अपने कर्तव्य का सच्चाई के साथ पालन करने की प्रतिज्ञायें कराई जायें। इनसे भले ही पूरे-पूरे परिणाम न निकलें किन्तु भ्रष्टाचार का विरोधी वातावरण बनता है समाज में। इसके साथ-साथ सदाचारी और सज्जन व्यक्तियों को ढूँढ़-ढूँढ़ कर उनका सार्वजनिक अभिनन्दन किया जाय। उन्हें प्रोत्साहन दिया जाय। समाज में इस तरह के व्यवहार शुद्धि के व्यापक आन्दोलन चलाये जायें।

वस्तुतः भ्रष्टाचार करने वाले हम स्वयं ही तो हैं। हम ही रिश्वत लेते हैं, गवन करते हैं, पदार्थों में मिलावट करते हैं। भ्रष्टाचार हम और हमारे भाई बन्धुओं में ही तो फैला हुआ है। जब हम सामूहिक रूप से इस बुराई का त्याग करेंगे और अपने उत्कृष्ट आचरण का उदाहरण पेश करेंगे तो यह सम्भव नहीं कि भ्रष्टाचार का भूत हमारे समाज को नष्ट कर सके ।

बुराइयों का संबंध मनुष्य के प्रेरक भावों से होता है। अपने कार्य क्षेत्र में हमारे भाव अपने लाभ की प्रेरणा न देकर सामाजिक हित के प्रेरक हों। हम जो कुछ भी करें उसका जन-समाज पर क्या प्रभाव पड़ेगा यह भाव प्रमुख होना चाहिए। यदि हमारे किसी भी कार्य-व्यवहार से दूसरों को हानि उठानी पड़े, उनका शोषण हो, सामाजिक संपत्ति नष्ट हो तो ऐसे कार्य हमें नहीं करने चाहिए। अपना उचित पारिश्रमिक निकाल कर सार्वजनिक कार्यों को ईमानदारी के साथ पूरा किया जाय तो कोई सन्देह नहीं हमारी योजनायें सफल न हों। निर्मित भवन, बाँध आदि अल्प काल में ही नष्ट न हों। राष्ट्रीय सम्पत्ति से खिलवाड़ न हो।

विचारणीय बात है अपना घर बनाने, अपना लाभ सोचने, अपना पेट भरने की प्रवृत्ति से सामाजिक जीवन कमजोर होता है और जब समाज कमजोर, विश्रृंखल हो जाता है तो उसे कोई भी विरोधी शक्ति हड़प लेती है। समाज की अपनी स्वतन्त्र सत्ता नष्ट हो जाती है। ऐसी दशा में उन लोगों की भी खैर नहीं रहती, जिन्होंने अपने आपको बनाया है, अपना ही पेट भरा है। समाज के नष्ट होते ही उन्हें भी नष्ट हो जाना पड़ता है। उनकी संपत्ति छीन ली जाती है। काश! अपना लाभ न सोच कर समाज को शक्तिशाली बनाया जाय तो उसके साथ सभी की सुरक्षा और अधिकारों की रक्षा हो सकती है।

हममें व्यक्तिगत लाभ की बात न सोचकर समाज के हित-चिन्तन की प्रवृत्ति हो तो हमारे कार्यों में भ्रष्टाचार घुस नहीं सकता। हमारी आत्मा इस आत्मघाती बुराई के लिए आज्ञा नहीं दे सकती।

सरकारी क्षेत्रों को सहायता देकर हम कानून को भी अधिक प्रभावशाली बना सकते हैं। समाज के दूषित तत्वों को कमजोर बना सकते हैं। डाकू, चोर, गुण्डे, बदमाशों को हमारे समाज का एक अंग आश्रय देता है। दूसरों के साथ अत्याचार दुर्व्यवहार होने पर हम अपने घरों में दुबक जाते हैं। आवश्यकता पड़ने पर इन दूषित तत्वों के विरुद्ध गवाही नहीं देते, न कुछ बोलते हैं। दूसरी ओर बदमाशों की संगठित शक्ति हमको एक-एक करके नुकसान पहुँचाती रहती है। यदि हम एक दूसरे की मुसीबत में कूद पड़ें तो कोई कारण नहीं कि समाज के दूषित तत्वों की हरकतें बढ़ें। एक व्यक्ति पर बदमाशों का हमला होने पर पूरा पड़ौस, पूरा मुहल्ला, पूरा गाँव, कस्बा मिलकर प्रतिरोध करे तो बुराइयाँ नहीं पनपें। समाज की संगठित शक्ति ही बुराइयों को परास्त कर सकती है।

सामाजिक, राजनैतिक, धार्मिक किसी भी क्षेत्र में यदि भ्रष्ट व्यक्ति का सामूहिक प्रतिरोध किया जाय तो भ्रष्टाचार पनप नहीं सकता। अक्सर हम परस्पर शिकायत करते हैं—”भ्रष्टाचार बढ़ गया है” “अमुक दोषी है” लेकिन अपने कर्तव्य में धाँधली करने वाले अफसर के खिलाफ हममें से कितने लिखा−पढ़ी करते हैं? काम में ढीलढाल और लापरवाही बरतने वाले कर्मचारियों के खिलाफ हममें से कितने बोलते हैं। उल्टे रिश्वत देकर अपना काम निकाल लेना हम लोग अधिक पसन्द करते हैं। टैक्स देकर सरकार से हम यह नहीं पूछते कि उसका क्या उपयोग हो रहा है? या सार्वजनिक पैसे का दुरुपयोग क्यों किया जा रहा है? इस तरह अन्याय, अत्याचार, रिश्वत, भ्रष्टाचार आदि के विरुद्ध सामूहिक प्रयत्न किए जायें तो ये अधिक दिनों तक जीवित नहीं रह सकते। समाज में से ऐसे व्यक्तियों को आगे आना चाहिए जिनमें जन-सेवा की भावना हो। उन्हें संगठित होकर भ्रष्टाचार के विरुद्ध कदम उठाना चाहिए। जो लोग ऐसी बुराई करते हैं उनके विरोध में जुलूस, प्रचार, बहिष्कार, असहयोग, कानूनी कार्यवाही तथा आवश्यक हो तो सत्याग्रह तक किया जाय। उनकी अनीति से बचने के लिए जगत को जाग्रत और शिक्षित किया जाय। उसे अपने मौलिक अधिकारों की जानकारी दी जाय। हमारी सेवा के लिए नियुक्त हुआ व्यक्ति यदि अन्याय करता है, भ्रष्ट आचरण करता है तो यह हमारी ही कमजोरी है। क्योंकि हम अपने अधिकारों को नहीं समझते उन्हें नहीं जानते।

भ्रष्टाचार की समस्या हमारी एक बड़ी समस्या है। इसके कारण हमारी प्रगति का पहिया बहुत धीरे चल रहा है। इसे दूर करना आवश्यक है। इसे मिटाये बिना हमारी विकास की योजनाएं अधूरी पड़ी रहेंगी। समृद्धि और सफलता की आशा दुराशा मात्र सिद्ध होगी।

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