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Magazine - Year 1964 - Version 2

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सत्य के दर्शन

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एक अनादि शक्ति का, जिसे हम अपनी भाषा में ब्रह्म, सृष्टिकर्ता, परमात्मा आदि विविध नामों से जानते हैं प्रकाश, उसकी प्रेरणा ही जगत को सब ओर से प्रकाशित किए हुए है। उसी से इस जगत और यहाँ के पदार्थों को हमारे ज्ञानक्षेत्र, कार्यक्षेत्र, सौंदर्य को स्फुरण मिल रहा है। वही अपने समग्र रूप में सर्वत्र ही अवतीर्ण होता रहता सत्य रूप में प्रतिष्ठित है। जगत् और इसके प्रेरक तत्व को जब हम एक करके देखते हैं तभी हमारे ध्यान की प्रक्रिया पूर्ण होती है। हमारे ध्यान-मन्त्र में “ॐ भू र्भुवः स्वः” के उच्चारण से ही सृष्टि का बोध होने लगता है और अखिल ब्रह्माण्ड के बीच जब उन्हें ही अपनी चेतना को, सूर्य, पृथ्वी, चन्द्रमा तारागण आदि को प्रकाशित करते देखते हैं तभी हम सत्य का दर्शन करते हैं।

जगत और आध्यात्म का जहाँ परिपूर्ण सामंजस्य होता है वहीं सत्य की परिभाषा पूर्ण होती है। और यह सत्य जब हमारी जीवन यात्रा का आधार होता है तभी हम जगत और उसकी प्रेरक शक्ति का परिचय प्राप्त कर कृतार्थ होते हैं। इसीलिए सत्य ही जीवन का सहज दर्शन है। महात्मा गाँधी के शब्दों में “सत्य हमारे जीवन का नियम है।” महर्षि व्यास ने सत्य को ही सर्वोपरि धर्म बतलाया है। “सत्य तत्व को जानकर ही ऋषिगण देवयान मार्ग से परमात्मा तक पहुँचते हैं।” महात्मा गाँधी ने तो यहाँ तक कह दिया कि “सृष्टि में सत्य की ही एकमात्र सत्ता है। सत्य के ऊपर कोई ईश्वर नहीं सत्य स्वयं ही ईश्वर की अभिव्यक्ति है।”

सत्यदर्शी विश्वामित्र ने सत्य की महिमा का बखान करते हुये कहा है—

सत्येनार्कः प्रतपति सत्ये तिष्ठति में नी।

सत्यं चोक्तं परो धर्मः स्वर्गेः सत्ये प्रतिष्ठितः॥

“सत्य से ही सूर्य तप रहा है सत्य पर ही पृथ्वी टिकी हुई है। सत्य सबसे बड़ा धर्म है। सत्य पर ही स्वर्ग प्रतिष्ठित है।” एक अन्य शास्त्रकार ने भी इसी तथ्य को प्रतिपादित करते हुए कहा है—

सत्येनं धार्यते पृथ्वी सत्येन ताते रविः।

सत्ये न याति वाषुश्च सर्व सत्ये प्रतिष्ठितम्॥

सत्य से ही पृथ्वी स्थिर है सत्य से सूर्य तपता है, सत्य से ही वायु बहती है। सब सत्य में ही स्थिर है।

स्मरण रहे आध्यात्ममय जगत् ही सत्य का आधार है। पूर्व और पश्चिम जैसे एक ही अखण्ड क्षितिज में स्थित हैं ठीक इसी तरह जगत और आध्यात्म दृश्य और अदृश्य सत्ता एक ही सत्य के दो पहलू हैं। इनमें से एक का भी परिहार करने पर हम सत्य के समक्ष अपराधी होते हैं।

जब हम जगत की समस्त घटनाओं को केवल बाह्य घटनायें समझते हैं तो उनसे हमें कोई आनन्द नहीं मिलता। वे घटनायें और हमारा जीवन केवल एक रूखी मशीनी प्रक्रिया मात्र बनकर रह जाता है। जिस तरह पटरी पर रेल, सड़क पर मोटर, शिलाखण्डों पर नदी की धारा बहती है उसी तरह हमारे मन-पाषाण पर जगत की धारा बहती रहती है। चित्त पर उसका कोई प्रभाव नहीं होता। सब कुछ निर्जीव नीरस अरुचिकर व्यापार-सा लगता है। और तब हम कृत्रिम उपायों, व्यसनों द्वारा नाना वृथा कर्मों द्वारा आमोद प्राप्त करने का प्रयत्न करते हैं लेकिन फिर भी हमारी जीवन यात्रा एक बोझा-सी मालूम पड़ती है।

जब हम केवल जगत को यहाँ की घटनाओं को, ही देखते हैं तो हमें जीवन में कोई रस नहीं मिलता न उत्साह स्फूर्तिमय प्रेरणा ही। कुछ समय तक तो ये हमारे मन, इन्द्रियों को लुभाये रहते हैं किन्तु शीघ्र ही इनसे विरक्ति होने लगती है और फिर अपने स्वभाव के अनुसार अन्य पदार्थों में जीवन-रस ढूंढ़ते हैं और एक समय वहाँ से भी हमें हटना पड़ता है। गरज यह है कि हम वस्तु से वस्तु, पदार्थ से पदार्थ, घटना से घटनाओं में चक्कर लगाते रहते हैं लेकिन इस सबसे हमारी चेतना को कहीं भी स्फुरणता प्राप्त नहीं होती।

हमारी पदार्थवादी जगत प्रधान दृष्टि के कारण सूर्य के उगने में, नदी के कल-कल बहने में, पक्षियों के गुंजन में वृक्षों के फलने फूलने में भी कोई विशेष प्रेरणा नहीं मिलती और हम यत्र-तत्र भटकते रहते हैं। प्रतिदिन कहीं कुछ सहारा पाने को जहाँ हमारी चेतना को स्फुरण मन को आनन्द की प्रेरणा प्राप्त हो सके। लेकिन असत्य की छाया में सुख शाँति कहाँ? उल्टे ये सब हमारे लिए दुःखप्रद, कष्टदायी, क्लेशपूर्ण ही सिद्ध होते हैं।

इसी तरह ही हमारा अभ्यास कुछ ऐसा हो गया है कि आध्यात्म को भी हम एकांगी दृष्टि से देखते हैं। जगत की सीढ़ियाँ जिन पर चढ़कर सत्य दर्शन की यात्रा पूरी करते हैं उनकी ओर हमारा ध्यान ही नहीं जाता। और जिस तरह बिना सीढ़ी के छत पर पहुँचना सम्भव नहीं होता ठीक उसी तरह जगत को भुलाकर हमारे सत्य-दर्शन के प्रयास व्यर्थ सिद्ध होते हैं। जगत के साथ रहने में ही आध्यात्म की भी सार्थकता है अन्यथा वह एक कपोलकल्पना, मूढ़ विश्वास मात्र बनकर रह जाता है।

इस तरह असत्य का आचरण जिसके अंतर्गत हम जगत और आध्यात्म को अलग-अलग करके देखते हैं हमारे पतन का हमारी असफलता का कारण बनता है। जगत को, वस्तु पदार्थ के सृष्टिकर्ता को जब हम भिन्न-भिन्न, खण्ड-खण्ड करके देखते है तो सत्य से दूर होते हैं।

सत्य की साधना के लिये, सत्य का दर्शन करने के लिए, हमें जगत और आध्यात्म को, सृष्टि और सृष्टिकर्ता को, वस्तु पदार्थ और इनको प्रकाशित करने वाली विश्व-चेतना को समग्र रूप से जानना, समझना और देखना पड़ेगा। एवं इसे ही अपने चिन्तन का आधार बनाना पड़ेगा।

जब हम इस सत्य को आत्मसात कर लेंगे तो हमारी चेतना परितृप्त हो जायगी क्योंकि “सत्य चिर-नवीन है, उसका रस अक्षय है”। जगत के बीच, वस्तु पदार्थ, समस्त घटनावली के मध्य जब हम सृष्टिकर्ता के अंतर्तम स्वरूप का दर्शन करने लगते हैं तभी हमारी दृष्टि सार्थक होती है। फिर हमारा जीवन और समस्त जगत ही आनन्द विस्मय, महत्व और सार्थकता से परिपूर्ण हो जाता है। तब हमें नदी के बहने में, पक्षियों के गुंजन में, वृक्ष लताओं के फूलने में, मेघों के गर्जन-तर्जन में, समुद्र की उत्ताल तरंगों में, आनन्द सरसता, सौंदर्य, ‘आह्लाद’ का मधुर संगीत सुनाई पड़ने लगता है।

जीवन के परम सत्य का दर्शन होने पर जब हम विश्व व्यापार, समस्त घटनापुज्ज के मध्य जो मूल शक्ति है उसका दर्शन करते हैं तो जगत आवरण न रहकर उसी सत्य की प्रकाश किरणों के रूप में जो प्रति मुहूर्त उनसे विकीर्ण होती रहती है जान पड़ता है। और तब यह बन्धन न रहकर हमारे आनन्द का साधन बन जाता है।

जगत और उसको प्रकाशित करने वाली सत्ता का समग्र दर्शन ही हमारे ध्यान चिन्तन का आधार होना चाहिये। घटना-पदार्थों के मध्य भी अनन्त सत्य का दर्शन हमारे जीवन का ध्येय, हमारी साधना का लक्ष्य हो।

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