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Magazine - Year 1964 - Version 2

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सफलता आत्म विश्वासी को मिलती है।

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संसार में कोई मनुष्य तब तक सफलता प्राप्त नहीं कर सकता। जब तक कि उसके मन में यह दृढ़-विश्वास न हो कि मैं जिस काम को करना चाहता हूँ उस में अवश्य सफल बनूँगा।

वह मनुष्य कैसे विद्या प्राप्त कर सकता है, जिसके मन में निराशा का भाव छाया हुआ है। जो कहा करता है कि “हाय! मैं चाहता हूँ कि खूब लिख-पढ़कर विद्वान् बनूँ पर क्या करूं मैं निःसहाय हूँ। मुझे किसी तरह की सुविधा नहीं है। न मेरे पास पैसे हैं और न मेरा कोई सहायक ही है। ऐसी प्रतिकूल परिस्थिति के कारण मैं लाचार हो गया हूँ। इसी से विद्या प्राप्ति के द्वार मेरे लिए बन्द हो गये हैं?”

वह नवयुवक कैसे धनवान हो सकता है जिसके विश्वास नहीं है कि मैं अपने पुरुषार्थ से धन पैदा कर सकता हूँ। जो ऐसा मानता है कि कुछ इने-गिने मनुष्यों के भाग्य में ही धन बदा है। अधिकतर आदमी गरीब ही होते हैं और मैं उनमें से एक हूँ।

हम व्यापार में प्रवेश की इच्छा करने वाले उस व्यक्ति से सफलता की किस प्रकार आशा रख सकते हैं, जिसका आरम्भ में ऐसा संदिग्ध मन होता है कि मैं व्यापार में सफलता प्राप्त कर सकूँगा या नहीं? कभी किसी मनुष्य को तब तक उसके कार्य में सफलता प्राप्त नहीं हो सकती, जब तक कि सफलता पर उसका दृढ़ विश्वास न हो। मनुष्य उसी काम को ठीक कर सकता है—उसी में सफलता प्राप्त कर सकता है, जिसकी सिद्धि में उसका हार्दिक विश्वास हो।

हम ऐसे बहुत से नवयुवकों को जानते हैं जिन्होंने अपने व्यवसाय को निश्चित करने में इतने उत्साह और दृढ़ निश्चय से काम लिया कि कोई उन्हें अपने उद्देश्य से हटा न सका और अन्ततः उन्होंने अपने व्यवसाय में आशातीत सफलता प्राप्त की। क्योंकि उन्होंने पूर्ण विश्वास के साथ इस बात को स्वीकार कर लिया था कि हमारा उद्देश्य हमसे अलग नहीं। वह हमारे व्यक्तित्व का एक अभिन्न अंग है। यदि हम अविचल साहस द्वारा सम्पादित किए हुए उन बड़े-बड़े कार्यों का और उनके कर्ताओं का विश्लेषण करें, तो उनमें दृढ़ आत्म-विश्वास ही सबसे प्रधान गुण मिलेगा। वह मनुष्य अवश्य ही सफलता प्राप्त करेगा, आगे बढ़ेगा, ऊँचा उठेगा, उन्नति पथ पर अग्रसर होगा, जिसको अपनी कार्य-सम्पादन शक्ति पर दृढ़-विश्वास हो। इस तरह के विश्वास का इष्ट मानसिक परिणाम केवल उन्हीं लोगों पर नहीं होता जो ऐसा विश्वास रखते हैं, बल्कि उन लोगों पर भी होता है जो उनके निकट संपर्क में आते हैं।

जितना हम अपनी योग्यता और कार्यक्षमता पर विश्वास करेंगे, उतना ही हमारा जीवन सफल होगा और जितना हम अपनी योग्यता पर अविश्वास करेंगे उतने ही हम विजय से—सफलता से दूर रहेंगे। चाहे हमारा पथ कितना ही कंटकाकीर्ण, संकटपूर्ण एवं अंधकारमय क्यों न हो, हमें चाहिये कि हम कभी अपने आत्म-विश्वास को तिलाँजलि न दें। हमारे कार्य की नींव हमारे आत्मविश्वास पर जमी हुई है। ‘हम अमुक कार्य अवश्य कर सकते हैं’ इस विचार में बड़ी अद्भुत शक्ति भरी हुई है। संसार में जो मनुष्य बड़े-बड़े काम करते हैं उन सब में ऊँचे दर्जे का आत्म-विश्वास होता है, अपनी शक्ति पर, अपनी योग्यता पर अपने कार्य पर।

दुनिया में जितने बड़े-बड़े आविष्कार हुए हैं—नई—नई बातें निकली हैं—अद्भुत कार्य हो रहे हैं—सब दृढ़-विश्वास लगन और अदम्य क्रियाशीलता के परिणाम हैं। क्या आप जानते हैं कि इन आविष्कारों के प्रणेताओं को कैसी-कैसी कठिनाइयों का सामना करना पड़ा? क्या आपको मालूम है कि कई वर्षों तक उन्हें सफलता का कोई चिह्न ही न दीख पड़ा, बहुत वर्ष उनके अंधकारमय गुजरे पर उन्होंने अपने उद्दिष्ट को नहीं छोड़ा, आत्म-विश्वास से मुँह नहीं मोड़ा। अन्ततः उन्हें प्रकाश मिला वे सफल हुए। यदि वे अपना आत्म-विश्वास गँवा बैठते तो वे कभी सफलता प्राप्त न कर सकते। वे अपने महान अद्भुत आविष्कारों से संसार को आश्चर्यचकित न कर पाते।

हर काम तभी सफल होता है जब कि उसमें दृढ़ विश्वास का बल रहता है। दृढ़ आत्म-विश्वास ही हमें उस मार्ग को बताता है जो हमें अपने निर्दिष्ट स्थान पर पहुँचा देता है। आत्म-विश्वास ही कार्य का बल है। उसके द्वारा हम में शक्ति का ऐसा स्रोत फूट पड़ता है, जो कठिन से कठिन कार्य को भी आसानी से पूरा कर देता है।

आत्म-विश्वास में वह ताकत है, जो हजार विपत्तियों का सामना कर उन पर पूरी-पूरी विजय प्राप्त कर सकती है। यही मनुष्य का सच्चा मित्र और उसकी सबसे अच्छी पूँजी है। हमने देखा है कि साधनहीन पर या आत्म-विश्वासी मनुष्यों ने दुनिया में गजब के काम किए हैं। जब कि बहुत से साधन सम्पन्न व्यक्ति विश्वासहीनता के कारण बुरी तरह से असफल हुए हैं। यदि हम में यह दृढ़-विश्वास है कि हम बड़े-बड़े कार्य कर सकते हैं दुनिया में उलट-फेर कर सकते हैं, यदि हम में यह विश्वास है कि हम में एक महान दैवी तत्व मौजूद है—हममें पूर्णता भरी हुई है—अटूट शक्ति भंडार हम में भरा हुआ है—तो हम निःसंदेह दुनिया में बड़े-बड़े काम कर सकते हैं।

मनुष्य राजकुमार है अर्थात् राजराजेश्वर ईश्वर का पुत्र है, जब कि वह उसकी दैवी सम्पत्ति का उत्तराधिकारी है तो क्यों न उसे अपनी अटूट शक्ति पर दृढ़-विश्वास हो? बात यह है कि हमें अपनी शक्ति का ज्ञान नहीं है, जिससे हम उसका ठीक-ठीक विकास नहीं कर पाते।

हम देखते हैं कि समाज में बहुत से व्यक्ति अवनत, हीन दशा में पड़े रहते हैं। समाज में सम्मान प्राप्त नहीं कर पाते। इसका कारण यही है कि वे अपने आपको हीन समझते हैं। उन्हें उन सद्गुणों की, उस शक्ति की पहिचान नहीं होती, जो उनकी आत्मा में स्थित है। यदि आप भारत की नीच जातियों, आदिवासियों पर दृष्टि डालेंगे तो आपको मालूम होगा कि शताब्दियों से नीच वातावरण में पलने के कारण वे इस बात को साफ भूले हुए हैं कि हम भी मनुष्य हैं—हम में भी वे दिव्य गुण मौजूद हैं, जो अन्य मनुष्यों में हैं। हम में भी वह शक्ति है जो अपना मानवोचित विकास करते हुए दुनिया में बड़े-बड़े काम कर सकती है। हम भी मनुष्य होने के नाते वे ही अधिकार रखते हैं, जो अन्य मनुष्य भोग रहे हैं और आत्म-सम्मान के हम भी वैसे ही पात्र हैं, जैसे अन्य मनुष्य।

जैसे हम अपने आपको मानेंगे, वैसा ही आदर्श हमारी आत्मा का बनेगा। हो नहीं सकता कि जैसा हम अपने आपको मानते हैं, उससे हम बढ़कर बन सकें। अल्प बुद्धि वाला आत्म-विश्वासी उस बल बुद्धि सम्पन्न व्यक्ति से अधिक कार्य कर सकता है, जिसे अपनी आत्मा में विश्वास नहीं है।

आप अपना एक उन्नतिशील एवं उच्च आदर्श निर्धारित कीजिए, और उस आदर्श को सिद्ध करने के लिए जी-जान से जुट जाइये। अवश्य आपको सफलता प्राप्त होगी। संसार में ऐसी कोई भी वस्तु नहीं है, जो मनुष्य को ऊँचा उठावे, जो मनुष्यों की हीन प्रकृति से रक्षा करे जैसा कि दृढ़ आत्म-विश्वास है। अधिक क्या कहें इसी दिव्य शक्ति के द्वारा मनुष्य परमात्मा के ऐक्य का सुखानुभव तक करने लगता है। आत्म-विश्वास हमारी दूसरी शक्तियों को भी प्रोत्साहन देता रहता है। आत्म-विश्वास की जितनी अधिक मात्रा हममें होगी। उतना ही हमारा संबंध अनन्त जीवन और अनन्त शक्ति से गहरा होता जायगा।

अविश्वास ही हमारी कार्य सम्पादन शक्ति को पंगु बनाने वाला है। कार्य आरम्भ करने के पहले मनुष्य को यह दृढ़-विश्वास होना ही चाहिए कि मैं इस कार्य को अवश्य कर सकूँगा। जहाँ तक संशय का लेश भी उसमें बना रहेगा। वहाँ तक वह अपने कार्य में पूरी सफलता न पा सकेगा। वह मनुष्य जिसका मन दृढ़ आत्म-विश्वास और तीव्र अभिलाषा से भरा हुआ है, तब तक चैन नहीं पा सकता, संतोष प्राप्त नहीं कर सकता जब तक कि वह अपने उद्दिष्ट को पूरा न कर ले। अवश्य ही ऐसा मनुष्य अद्भुत सफलता प्राप्त करेगा। चाहे कितनी ही कठिनाईयाँ उसके मार्ग में बाधक हों।

किसी महान कार्य के लिए एकाग्रता की बड़ी आवश्यकता होती है। जिस मनुष्य का मन चिंता, भय और शंकाओं में भटक रहा हो, वह कभी अपनी उन्नति नहीं कर सकता। शंका एवं संदेह हमारी मानसिक एकाग्रता में बाधक होते हैं। जब कि एकाग्रता ही हमारी कार्य-शक्ति का रहस्य है। एकाग्रता और आत्म-विश्वास ही कार्यशक्ति के आधार स्तम्भ हैं। इनके बिना किसी कार्य में सफलता की आशा करना दुराशा मात्र है।

हमारी मानसिक शक्तियाँ हमारे आत्म-विश्वास और साहस पर निर्भर करती हैं। वे हमारी दृढ़ इच्छा शक्ति के पूर्णतया अधीन हैं। अतएव यदि हमारी इच्छा शक्ति कमजोर होगी तो हमारी मानसिक शक्तियों का कार्य भी वैसा ही होगा। जहाँ हमारे आत्म-विश्वास और धैर्य में कमजोरी आई कि हमारी कार्य सम्पादन शक्ति में भी कमजोरी आ जायगी। मनुष्य के लिये इससे कोई और अच्छी बात नहीं है कि वह हमेशा यह मानता रहे कि मेरे लिए सब कुछ अच्छा होगा। जो कार्य मैं हाथ में लूँगा उसमें अवश्य ही मुझे सफलता मिलेगी।

दृढ़ आत्म-विश्वास ही वह चीज है जो हमें भीतर से प्रेरित करती है कि हम अपने आदर्श की ओर तेजी से कदम बढ़ावें। यही हमारी आत्मा का बल है। वही हमारी आध्यात्मिक शक्ति है, वही हमारे मार्ग का पथ प्रदर्शक है, वही हमारी विघ्न−बाधाओं पर जय प्राप्त कर हमारे पथ को साफ करता है।

दृढ़ विश्वास ही वह चीज है, जो हमें उस दिव्यता का दर्शन कराती है, जो हमारे भीतर भरी हुई है। दृढ़ विश्वास ही वह कड़ी है जो ईश्वर से हमारे ऐक्य संबंध कराती है। विश्वास ही वह पदार्थ है जो हमारे हृदय कपाटों को खोल देता है और विश्वास ही वह शक्ति है, जो हमें अनन्त से मिला देती है, जिससे अनन्त शक्ति अनन्त ज्ञान एवं अनन्त दर्शन का हमें अनुभव होने लगता है। विश्वास ही हमारी अन्तरात्मा की ध्वनि है। वह एक आध्यात्मिक कार्य शक्ति है। दृढ़ विश्वास एवं श्रद्धा हमारे चित्त को ऊँचा उठाते हैं और उस दिव्यता-सफलता के दर्शन कराते हैं, जिसके लिए हमारी अन्तरात्मा रात-दिन व्याकुल रहती है।

किसी महापुरुष ने कहा है कि “मानवीय कर्तव्य केवल इस बात में समा गया है कि पहले हम ये जान लें कि हम कौन हैं? किसलिए संसार में आये हैं और हमें क्या करना है और फिर निरन्तर उसी का विचार करते हुए अपने उद्दिष्ट मार्ग पर दृढ़-विश्वास के साथ निडर होकर बढ़ते रहें। उसकी सफलता निश्चित है। दृढ़ आत्मविश्वास ही सफलता की एकमात्र कुँजी है।’

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