तुलसी का उपयोग कीजिए
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अपने आध्यात्मिक एवं भौतिक गुणों के कारण हमारे यहाँ तुलसी के पौधे को बहुत महत्वपूर्ण स्थान दिया गया है। इसे धार्मिक आस्थाओं से जोड़ कर भारतीय जीवन-पद्धति का अभिन्न अंग माना गया है। घर में तुलसी का पौधा लगाना, उसकी पूजा करना, नित्य मन्दिर में चरणामृत के साथ दोनों समय भोजन के साथ भगवान के प्रसाद के रूप में तुलसी पत्र लेना, हमारे दैनिक जीवन में तुलसी के उपयोग और उसके महत्व का परिचायक है। इतना ही नहीं एक ग्रामीण से लेकर शहर का शिक्षित व्यक्ति भी अनेक बीमारियों में तुलसी को याद करता है।
शास्त्रकार ने कहा है कि—
तुलसी काननं चैव गृहेयस्याव तिष्ठते।
तद्गृहे तीर्थं भूतंहि न यान्ति यम किंकराः॥
“जिस घर में तुलसी का वन है वह घर तीर्थ के समान पवित्र है। उस घर में यमदूत नहीं आते।’ यहाँ यमदूतों का अर्थ, जहरीले कीड़े सर्प बिच्छू आदि, रोग कीटाणु बीमारियों से है।
इसी तरह अन्यत्र कहा है—
तुलसी विपिनस्यापि समन्तात्पावनं स्थलम्।
कोशमात्रं भवत्येव गंगे यस्येव पायसः॥
“तुलसी वृक्ष के चारों ओर एक कोश अर्थात् दो मील तक की भूमि गंगाजल के समान पवित्र होती है।” स्मरण रहे रोग कीटाणु नाश की गंगाजल में अपूर्व शक्ति है। उसमें कोई कीटाणु जीवित नहीं रह सकता और इसीलिए गंगाजल कभी सड़ता नहीं।
एक धर्म ग्रन्थ में लिखा है—
तुलसी गंधमादाय यत्र गच्छति मारुतः।
दशो दिशाः पुनव्याशु भूत ग्रामान् चतुविंधान॥
“तुलसी की गन्धयुक्त हवा जहाँ भी जाती है वहाँ की दशों दिशायें शीघ्र ही पवित्र हो जाती हैं और आकाश, पृथ्वी, वायु, जल आदि चारों तत्व उससे शुद्ध हो जाते हैं।”
हमारे यहाँ ही नहीं विदेशों में भी इसे पवित्र और लाभदायक माना है। यह कथा प्रसिद्ध है कि ईसा के वध स्थान पर तुलसी के पौधे उत्पन्न हुए थे। ग्रीस में आधुनिक युग में भी एक विशेष दिन तुलसी का उत्सव मनाया जाता है जिसे “सैन्ट बैसिश डे” कहते हैं। इस दिन वहाँ की स्त्रियाँ तुलसी की शाखायें अपने गृह द्वार पर लाकर टाँगती हैं। उनका विश्वास होता है कि इससे उनकी मुसीबतें कष्ट दूर होंगे।
हमारे यहाँ तो तुलसी के साथ एक बहुत बड़ा धार्मिक क्रियाकाण्ड, तरह-तरह से उसकी पूजा-प्रदक्षिणा, तुलसी-दल सेवन का विधान है। ये सब परम्परायें, मान्यतायें किसी अन्ध-विश्वास पर आधारित हों ऐसी बात नहीं है। अब वैज्ञानिक अनुसंधान और रासायनिक विश्लेषणों के आधार पर यह सिद्ध हो गया है कि तुलसी में कीटाणु नाशक तत्व प्रचुर मात्रा में हैं, जिससे रोग निवारण में यह काफी लाभप्रद सिद्ध होता है। तुलसी के पत्तों में एक प्रकार का कीटाणु-नाशक द्रव्य होता है जो हवा के संयोग से इधर-उधर उड़ता है। तुलसी का स्पर्श करने वाली वायु जहाँ भी जाती है वहीं अपना रोग-नाशक एवं शोधक प्रभाव डालती है। मनुष्य शरीर में श्वांस के द्वारा और स्पर्श से यह अनुकूल परिणाम पैदा करती है। शरीर से रोगों का निवारण होता है और स्फूर्ति, प्रफुल्लता पैदा होती है। तुलसी शरीर की टूट-फूट से होने वाले विषैले कोषों को शुद्ध करती है और शरीर से दूषित तत्वों को नष्ट करती है।
तुलसी में रोग-नाशक शक्ति प्रचुर मात्रा में होती है। चरक के अनुसार यह हिचकी, खाँसी, दमा, फेफड़ों की बीमारी तथा विष-निवारक होती है। भावमिश्र ने तुलसी को हृदय रोगों में लाभकारी, रक्त विकार को दूर करने वाली, अग्नि-दीपक, पाचन-क्रिया को स्वस्थ बनाने वाली बताया है। सुश्रुत ने भी इसे रोग-नाशक, तेज-वर्धक वात कफ-शोधक, छाती के रोगों में लाभदायक तथा आन्त्रक्रिया को स्वस्थ रखने वाली बताया है। पाश्चात्य चिकित्सा विज्ञान ने भी तुलसी को खाँसी ब्रौंकाइटिस, निमोनिया, फ्लू, क्षय आदि रोगों में लाभदायक बताया है।
इसमें कोई सन्देह नहीं कि संसार की सभी चिकित्सा पद्धतियों में तुलसी के महत्व को स्वीकार किया गया है। आयुर्वेदिक, ऐलोपैथिक, यूनानी, होमियोपैथिक वाले सभी अपने-अपने ढंग से रोग निवारण और स्वास्थ्य सुधार के लिए तुलसी का उपभोग करते हैं। वैज्ञानिकों द्वारा की गई खोजों के आधार पर पता चला है कि तुलसी से प्राप्त होने वाला द्रव्य क्षय रोग के कीटाणुओं का नाशक होता है।
अधिकाँश रोगों में तुलसी बहुत ही प्रभावशाली सिद्ध हुई है। दैनिक जीवन में सामान्य रूप से भी इसका सेवन करते रहना बहुत ही हितकर होता है। जुकाम, बुखार, मलेरिया, इन्फ्लुएंजा आदि में तुलसी का काड़ा बना कर देने से लाभ होता है। मलेरिया के लिये तो यह अमोघ औषधि है। जहाँ तुलसी होती है वहाँ मच्छर नहीं रहते हैं। एक प्रयोग के अनुसार तुलसी का घोल पिचकारी से छिड़कने पर या तो मच्छर भाग जाते हैं या मर जाते हैं। तुलसी को शरीर पर मल कर सोया जाय तो मच्छर नहीं काटते।
आमाशय और आँतों पर तुलसी का अनुकूल प्रभाव पड़ता है। इसके नियमित सेवन से पाचन संस्थान भली प्रकार काम करता है। मन्दाग्नि दूर होती है। पेट के कीड़े नष्ट हो जाते हैं। प्रातःकाल तुलसी के चार पाँच पत्ते चबा कर शीतल जल पीने से शरीर के कई दोष दूर होते हैं। बीज, तेज, मेधा, बल की वृद्धि होती है। आमाशय, जिगर, हृदय, छाती के रोगों में लाभ होता है। पुराण के अनुसार जो प्रातः मध्याह्न और संध्या तीनों समय तुलसी का सेवन करता है उसकी काया उसी तरह शुद्ध हो जाती है जैसे सैकड़ों चांद्रायण व्रतों से होती है। रक्त विकार फोड़े फुन्सियों चर्म रोगों में भी इसका लाभ दायक प्रभाव पड़ता है। इसके लिये तुलसी का सेवन और इसका लेप दोनों ही उपयोगी रहते हैं।
इस तरह तुलसी बीमारियों के निवारण के लिये अपने आप में एक परिपूर्ण औषधि है। प्रायः सभी रोगों में यह प्रभावकारी सिद्ध हुई है क्योंकि इसमें एक महत्वपूर्ण गुण है। शरीर से विषैले तत्वों का शमन करना और शरीर की कार्य प्रणाली को स्वस्थ, सशक्त बनाना। विभिन्न रोग शरीर में विजातीय पदार्थ इकट्ठे हो जाने, या रोग कीटाणुओं के बढ़ जाने अथवा शरीर के अक्षम हो जाने से ही पैदा होते हैं। तुलसी इन तीनों का निवारण करती है। यह शरीर को शुद्ध करती है, कीटाणुओं को नष्ट करती है और शरीर को शक्तिशाली समर्थ बनाती है।
शरीर शोधन के साथ-साथ तुलसी मानसिक शुद्धि के लिये भी काफी प्रभावशाली है। सर्वप्रथम शरीर की अशुद्धि ही मन की अशुद्धि का कारण होती है। तुलसी इसे दूर करती है और स्वस्थ शरीर में स्वस्थ मन काम करता है। तुलसी सूक्ष्म रूप से शान्ति, सात्विकता, निर्मलता, शीतलता के गुणों से युक्त होती है। आप कुछ समय के लिये तुलसी के उपवन में बैठ जाए आपको तत्काल ही शान्ति मिलेगी। इसीलिये आध्यात्मिक साधनाओं से तुलसी का अनन्य संबंध है। तुलसी के सेवन, उसकी सेवा पूजा, सान्निध्य रखने से सात्विकता की वृद्धि होती है और आत्मिक गुण बढ़ते हैं। जिस तरह शरीरगत दोषों को तुलसी दूर करती है उसी तरह मानसिक दोषों को भी दूर कर सद्गुणों का विकास करने में लाभप्रद होती है। अक्सर तुलसी की माला, कण्ठी आदि शरीर में धारण करने का विधान है हमारे यहाँ। यह इसी ठोस सिद्धान्त पर आधारित है। हमारे यहाँ ही नहीं विदेशों में भी इसका आध्यात्मिक कार्यों में उपयोग होता है। तुलसी की लकड़ी को किसी भी रूप में शरीर में धारण करने पर वह शाँतिदायक सिद्ध होती है। मन्दिरों में तुलसीदल युक्त चरणोदक दिया जाता है इससे क्रोध और अहंकार, उत्तेजनाएं शान्त होते हैं। नम्रता पैदा होती है। तुलसी का स्पर्श कर आने वाली वायु से पवित्र भावनायें जाग्रत होती हैं। सूक्ष्म प्रेरणाओं को ग्रहण करने की सामर्थ्य प्राप्त होती है।
हमारे यहाँ दैनिक जीवन में तुलसी का संपर्क बनाये रखने के लिये ही पूर्वज-मनीषियों ने इसे धार्मिक-मान्यता दी थी। घरों में तुलसी के विरवा लगाना, जल चढ़ाना, उनका पूजन करना, परिक्रमा करना आदि गृहस्थ के लिये आवश्यक धर्म कर्तव्य के रूप में माना गया है। इन सब के पीछे ऋषियों का वैज्ञानिक दृष्टिकोण और उनके जीवन का लंबा अनुभव ही था।
तुलसी के पौधों के पास सर्प भी नहीं आते, रोग कीटाणु वहाँ ठहर भी नहीं सकते। इसकी गन्ध से वे दूर रहते हैं या मर जाते हैं। अनेकों रोगों में यह रामबाण औषधि है। तुलसी वातावरण को शुद्ध बनाती है। आध्यात्मिक गुणों की वृद्धि और विकास के लिए तुलसी बहुत ही महत्वपूर्ण और उपयोगी है।
खेद है हम दिनों दिन इस लाभदायक पौधे को और इसके विज्ञान सम्मत गुणों को भूलते जा रहे हैं। थोड़ा बहुत उपयोग इसका धार्मिक क्षेत्र में रह गया है वह भी केवल पूजा, तुलसी विवाह, जल चढ़ा देने तक ही सीमित रह गया है। हमारे घरों में से इसका निवास उठता जा रहा है। सामान्य बीमारियों में भी हम इस गुणकारी औषधि को छोड़ कर डाक्टरों के पास दौड़े जाते हैं और अपना धन लुटाते हैं। यदि हम थोड़ा बहुत भी ध्यान घर में तुलसी के उपवन लगाने में लगावें और आवश्यकता पड़ने पर इसे ही दवा रूप में लें या दैनिक उपयोग करें तो हमारा शरीर और मन दोनों ही शुद्ध और पुष्ट हों। हमारे घर के आस-पास का वातावरण भी शुद्ध निर्मल और शान्तिदायक बने। तुलसी हमारे दैनिक जीवन में बहुत ही उपयोगी है। हमें इसके महत्व को समझ कर तुलसी का उत्पादन और उसका उपयोग बढ़ाने का प्रयत्न करना ही चाहिए।

