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Magazine - Year 1964 - Version 2

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सुसंगठित ज्ञान यज्ञ

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आत्म-शोधन के लिए दस प्रश्नों को रोज अपने आपसे पूछना और जो त्रुटियाँ परिलक्षित हों उन्हें क्रमशः किन्तु पूर्ण श्रद्धा और दृढ़ता के साथ सुधारने के लिये नित्य नियमित रूप से प्रयत्न करते रहना यह आध्यात्मिक उद्देश्यों की प्राप्ति का प्रथम साधन है। अखण्ड-ज्योति परिवार के युग-निर्माण योजना के प्रत्येक सदस्य को अनिवार्य रूप से इसे आरम्भ कर देना है। दूसरा कार्यक्रम जो इतना ही महत्वपूर्ण है वह यह है कि सत्प्रवृत्तियों को केवल अपने तक ही सीमित करके सन्तोष न कर लिया जाय वरन् उन्हें व्यापक बनाने के लिये, अपने समीपवर्ती क्षेत्र में प्रतिष्ठित करने के लिये सामर्थ्य भर प्रयत्न किया जाय। यह एक सुनिश्चित तथ्य है कि एक व्यक्ति कितना ही भला, कितना ही सज्जन, कितना ही आध्यात्मवादी क्यों न हो, यदि वह चारों ओर बुरे व्यक्तियों और बुरे वातावरण से घिरा होगा, तो अपनी शक्ति एवं सज्जनता को स्थिर न रख सकेगा जिसके स्त्री, पुत्र, भाई, बहिन, चाचा, ताई, भतीजे, दुष्ट प्रकृति के हों निरन्तर कलह और दुष्टता का वातावरण बनाए रहते हों तो वहाँ अपने आत्मिक प्रयोगों को पूरा कर सकना भी असम्भव नहीं तो कठिन अवश्य हो जायगा। इसी प्रकार जिस नगर या समाज में दुर्बुद्धि समाई हुई हो उसमें रहते हुए कोई व्यक्ति अपनी सुख-शान्ति के साथ निर्वाह नहीं कर सकता । इस दुनिया को छोड़कर कहीं अन्यत्र भाग जाना सम्भव नहीं। वन, पर्वतों को जाएं तो भी वहाँ का समीपवर्ती वातावरण सुधारना ही पड़ता है। यह सुधार कार्य हमें अपने निकटवर्ती क्षेत्र में आरम्भ कर देना चाहिये।

पुण्य परमार्थ की दृष्टि से भी सबसे बड़ा शुभ कार्य दूसरों को सन्मार्ग पर चलने की प्रेरणा देना ही माना गया हैं। इसी को ब्रह्म-कर्म कहते है। साधु ब्राह्मण इसी प्रक्रिया में संलग्न रहने के कारण पूज्य माने जाते थे। इस परमार्थ को हमें भी अपने जीवन में अपनाना ही पड़ेगा। स्वार्थ से परमार्थ की ओर बढ़ने का सर्वश्रेष्ठ साधन यही हो सकता है कि हम अपने सम्बन्धित व्यक्तियों को उत्कृष्ट जीवन जीने की प्रेरणा देने का भी कार्य अपने दैनिक जीवन में होने वाले अनेक कार्यों में से एक महत्वपूर्ण आवश्यकता के रूप में करना आरम्भ कर दें।

अखण्ड-ज्योति के माध्यम से जीवन-निर्माण का, व्यावहारिक आध्यात्म का—जो व्यापक प्रशिक्षण हो रहा है उसकी देश विदेश के असंख्य विचारकों ने भूरि-भूरि प्रशंसा की है। यह सर्वथा सत्य है कि अखण्ड-ज्योति में प्रस्तुत विचार-धारा को अपना कर कोई भी व्यक्ति जीवन की समग्र प्रगति का द्वार प्रशस्त कर सकता है। हमें चाहिए कि अपनी अखण्ड-ज्योति को अपने घर के समस्त सदस्यों को पढ़ाने या सुनाने की व्यवस्था बना लें। परिवार के साथ ही हमें जीवन काटना है, यदि वे सुसंस्कृत नहीं बनते तो अपनी अवाँछनीय गतिविधियों के कारण स्वयं भी दुख पायेंगे और हमें भी उद्विग्न बनाये रहेंगे। इसलिये समय रहते उनके परिष्कार का उपाय किया जाय। इस प्रकार के उपायों में एक कारगर उपाय यह है कि उन्हें अखण्ड-ज्योति द्वारा प्रस्तुत विचारधारा को पढ़ने या सुनने में अभिरुचि उत्पन्न की जाय। अपने परिजनों के साथ इससे बड़ा उपकार दूसरा और कोई हो नहीं सकता कि वे सद्गुणी और सुसंस्कृत बनने की प्रेरणा प्राप्त करें । उनके भविष्य उज्ज्वल बनाने वाला यही श्रेष्ठ साधन है जो कोई अभिभावक आसानी से अपने परिवार के लिये प्रस्तुत कर सकता है।

अपने व्यक्तित्व एवं परिवार को सुसंस्कृत बनाने की तरह ही अपने रिश्तेदारों, मित्रों एवं परिचितों को भी यह लाभ दिया जाना चाहिये। जिनका भी हित साधन हमें अभीष्ट हो, उन्हें सद्ज्ञान की प्रेरणा से सुसंबद्ध कर देना चाहिए। किसी को धन दौलत या कीमती वस्तुओं का उपहार देने की अपेक्षा यह कहीं अधिक उत्तम है कि उन्हें आत्म-निर्माण के लिये प्रेरणा देने वाले साहित्य, संस्थान एवं वातावरण के साथ जोड़ दिया जाए। स्वयं का व्यक्तित्व यदि दूसरों को ऊँचा उठाने के उपयुक्त न हो, अपने को इतना प्राप्त न हो जो जहाँ यह सब मौजूद है उसके साथ सम्बद्ध करके भी दूसरों का भारी हितसाधन किया जा सकता है। अगले वर्ष यह कार्य अखण्ड-ज्योति के हर सदस्य को पूरा करना है। एक भी पाठक ऐसा न हो तो अकेला ही अपनी पत्रिका पढ़कर उसे कूड़े में पटक देता हो। हममें से हर एक को यह व्रत लेना है कि उसकी पत्रिका से लाभ उठाने वालों की—पढ़ने या सुनने वालों की संख्या कम से कम दस होगी। यह धर्मप्रचार-ज्ञानप्रसार, ब्रह्मदान जितना सरल है उतना ही महत्वपूर्ण भी है। हम तीस हजार अखण्ड-ज्योति के सदस्य इस प्रक्रिया को अपना कर कुछ ही महीनों में तीन लाख हो सकते हैं।

‘एक से दस’ की पद्धति अपना कर ही हम अपने संगठन एवं परिवार को व्यापक बना सकते हैं। लोक-निर्माण का, युग परिवर्तन का महान मिशन इसी प्रकार तो पूरा होगा। इसके लिए हर सदस्य को अपनी जिम्मेदारी पूरी करनी पड़ेगी जेष्ठ के शिविरों में आये हुए शिक्षार्थियों ने यह प्रतिज्ञा की है कि वे स्वयं तो अपना कर्तव्यपालन करेंगे ही, साथ ही परिवार के अन्य सदस्य जहाँ कहीं इस दिशा में शिथिलता दिखाते मिलेंगे, वहाँ बलपूर्वक उनसे आग्रह अनुरोध करके ‘एक से दस’ की प्रसार पद्धति को कार्यान्वित कराने में कुछ उठा न रखेंगे। तीस हजार को तीन लाख में इस वर्ष परिणित हो ही जाना चाहिये।

हममें से हर एक को ‘मिशनरी भावना’ के साथ काम करना होगा। धर्म प्रचार के पुण्य कार्य में किसी रूप से हाथ बंटाना ही होगा। स्वस्थ शरीर, स्वच्छ मन एवं सभ्य समाज के रचना अभियान में जो साथी हाथ पर हाथ धरे उदासीन बैठा रहेगा उसके लिये यही कहा जा सकता है कि अभागे ने युग की पुकार को अनसुनी करके एक महत्वपूर्ण अवसर पर ‘अनार्यजुष्ट, अस्वर्ग, अकीर्तिकर कश्मल’ अपनाकर—कृपणता दिखाकर—अपने साथ शोचनीय अन्याय कर डाला।

जिस प्रकार घर में अच्छा फर्नीचर, जेवर, वस्त्र आदि की व्यवस्था प्रत्येक सद्गृहस्थ करता है उसी प्रकार प्रत्येक परिजन के पास एक युग-निर्माण पुस्तकालय होना चाहिये। जमीन जायदाद की तरह घर की यह भी एक दैवी सम्पदा होगी। जीवन-निर्माण के प्रत्येक पहलू पर आवश्यक ज्ञान एवं प्रेरणा देने वाली पुस्तकें इस पुस्तकालय में नियमित रूप से मँगाई जाती रहें। इस घरेलू पुस्तकालय का बजट पाँच रुपया मासिक तो रहना ही चाहिये। किसी अच्छे परिवार का पूरा खर्च चलने में कई सौ रुपया मासिक उठ जाता है। उसमें से किसी भी मद में कमी करके इतनी गुंजाइश निकाल लेनी चाहिये और इतने मूल्य की प्रेरणाप्रद पुस्तकें हर महीने नियमित रूप से बढ़ाते रहना चाहिए। पाँच रुपये में लगभग 500 पृष्ठ का सत् साहित्य उपलब्ध हो सकता है। अन्तःकरण की भूख बुझाने के लिए इतना साधन तो जुटाना ही चाहिये। सारे परिवार के लिए भोजन खर्च में यदि सौ-दो-सौ खर्च हो सकते हैं तो क्या उन सब की आत्मिक क्षुधा को बुझाने के लिये पाँच रुपया की रकम कोई बड़ी बात मानी जायगी। स्कूली शिक्षा पर हर परिवार में काफी खर्च पड़ता है। जीवन विद्या सीखने के लिये पूरा परिवार यदि इतनी छोटी रकम भी खर्च न कर सके तो उसकी दूरदर्शिता को संदिग्ध ही माना जायगा।

जहाँ एक व्यक्ति एक युग-निर्माण पुस्तकालय न चला सके वहाँ कई व्यक्ति मिलकर भी वैसी व्यवस्था कर सकते हैं। एक-एक रुपया मासिक के पाँच सदस्य मिलकर ही एक पुस्तकालय चला सकते हैं। पर इतना ही पर्याप्त न होगा कि पैसे का प्रबन्ध करके सत्साहित्य मँगाना प्रारम्भ कर दिया जाय। वरन् आवश्यकता इस बात की होगी कि इन वस्तुओं को पढ़ने के लिये अपने घर में ही नहीं वरन् बाहर भी अभिरुचि उत्पन्न की जाय। दुर्भाग्य से आज हमारे देश में 23 प्रतिशत लोग ही शिक्षित है, इन शिक्षितों में भी ज्ञानवर्धक साहित्य का स्वाध्याय कोई विरले ही करते हैं। जिन्हें पढ़ने लिखने का शौक है वे घटिया चीजें पढ़ते हैं। आवश्यकता इस बात की है कि हम आत्मोत्कर्ष के विषय में अभिरुचि जागृत करें और लोगों के पीछे पड़कर उनमें जीवन-निर्माण के—युग-निर्माण के संबंध में आवश्यक जानकारी, अभिरुचि एवं आकाँक्षा उत्पन्न की जाय। इसके लिए भावनाशील शिक्षितों के साथ संपर्क बनाने, उन्हें प्रोत्साहित करने, पुस्तकें पढ़ने देने और वापिस लेने के लिये घर-घर जाने का कार्यक्रम अपनाया जाय। यह धर्मफेरी देखने सुनने में कितनी ही छोटी प्रतीत क्यों न हो, इसका परिणाम अत्यन्त व्यापक हो सकता है। हम लोग लाखों सुशिक्षितों को युग-निर्माण के व्यापार स्तम्भ बनाने की शिक्षा देकर देश, धर्म, समाज एवं संस्कृति की भारी सेवा कर सकते हैं।

प्रस्तुत पुस्तकालय योजना के अंतर्गत यदि प्रत्येक ज्ञान केन्द्र से पच्ची-पच्चीस व्यक्तियों को लाभ उठाने का अवसर प्राप्त हो सके तो दसियों लाख राष्ट्र के होनहार लोगों को प्रशिक्षित करने की एक अत्यन्त व्यापक योजना बात की बात में खड़ी हो सकती है। दान की परम्परा भारतीय धर्म का प्रधान अंग रही है। हम किसी न किसी प्रकार दान-पुण्य करते ही रहते हैं। यह ज्ञानदान किसी भी धर्म-कृत्य से कम महत्वपूर्ण नहीं। फिर हम अखण्ड-ज्योति परिवार के सदस्य अपने युग-निर्माण संकल्प के अंतर्गत इस बात के लिये प्रतिज्ञाबद्ध भी हैं कि अपनी आजीविका का एक अंश युग-निर्माण कार्यों के लिये लगाते रहेंगे। योजना का प्रधान माध्यम विचार परिवर्तन ही होता है। इस प्रयोजन के लिए हमारी आजीविका का एक अंश लगना ही चाहिये। जीवन निर्माण की कला सिखाने वाले पुस्तकालयों की स्थापना को श्रेष्ठ पुण्य परमार्थ मानकर चलने से मानव अन्तःकरण के उत्कर्ष की समस्या सहज ही हल हो सकती है। प्रयत्न यह किया जा रहा है कि जीवन की प्रत्येक समस्या पर प्रकाश डालने वाला श्रेष्ठ साहित्य एक ही स्थान से उचित मूल्य पर मिलता रहे और उसे ढूँढ़ने या जहाँ तहाँ से मँगाने का झंझट पाठकों को उठाना न पड़े। इससे इन पुस्तकालयों के संचालन में सुविधा ही रहेगी।

सत्प्रवृत्तियों की ओर अभिमुख व्यक्तियों का संगठन आवश्यक है। संगठन ही इस युग की सबसे बड़ी शक्ति है। उसी के आधार पर नये समाज की अभिनव रचना का उद्देश्य पूर्ण हो सकेगा। अखण्ड-ज्योति परिवार को यदि ठीक ढंग से संगठित कर लिया जाय तो प्रबुद्ध वर्ग का यह विशाल जन-समुदाय राष्ट्र की एक महती रचनात्मक शक्ति बन सकता है। इस उद्देश्य की पूर्ति के लिये इस अखण्ड ज्योति सदस्यों के संगठन को एक शाखा और उसके प्रमुख कार्यकर्ता को शाखा संचालक माने जाने की पद्धति बना दी गई है। इस प्रक्रिया के अनुसार आधे से अधिक सदस्य संगठित हो चुके हैं। जो शेष हैं उन्हें अपना संगठन-प्रयोजन पूरा कर लेना चाहिये। दस-दस के विभागों में संगठित यह घटक क्रमशः एक विशाल संगठन में परिणित होंगे तो उनकी क्षेत्रीय, प्रान्तीय, अखिल भारतीय या सार्वभौम शक्तियाँ उन रचनात्मक कार्य-क्रमों को आसानी से पूर्ण कर सकेगी जो युग-परिवर्तन के लिये अनिवार्य रूप से आवश्यक हैं। हमें सुसंगठित होने की प्रक्रिया में पूरी तेजी लानी चाहिये यह परिवार के सभी लोगों ने एक मत से स्वीकार किया है। ज्येष्ठ मास में सम्पन्न हुए तीनों शिविरों के शिक्षार्थी इस ओर उत्साहपूर्वक काम करने का निश्चय करके ही विदा हुए हैं। जो नहीं आ सके उन्हें भी अपना संगठन कार्य इस वर्ष पूरा कर ही लेना है। अखंड ज्योति परिवार जब एक संगठित शक्ति के रूप में परिणित होगा तब उसकी अकूत सामर्थ्य देखते ही बन पड़ेगी।

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