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Magazine - Year 1964 - Version 2

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सभ्य समाज की अभिनव रचना

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एक हजार वर्ष की लंबी गुलामी ने हमें कितने ही दोष दुर्गुण और कुसंस्कार दिये हैं। वे व्यक्तिगत और सामाजिक जीवन में आज भी लज्जाजनक स्थिति में मौजूद हैं। राजनैतिक स्वाधीनता की एक बड़ी लड़ाई जीत लेने के बाद अब हमारा कर्तव्य यही होना चाहिए कि नैतिक और सामाजिक कुसंस्कारों की दासता से भी मुक्ति पाने का प्रयत्न किया जाय। स्वतंत्रता संग्राम की ही तरह विचार-क्रान्ति के लिये भी हमें एक विचार अभियान आरम्भ करना पड़ेगा। तीनों शिविरों में आये हुए विचारशील कर्मठ सदस्यों ने यह आवश्यकता अनुभव की ओर निश्चय किया कि युग-निर्माण योजना के द्वितीय वर्ष में सामाजिक कुसंस्कारों के विरुद्ध ठोस कदम उठाए जाने चाहिएं। जिन कुरीतियों की ओर अगले वर्ष विशेष रूप से ध्यान दिया जाना है वे यह हैं—

नशेबाजी की बढ़ती हुई बुराई हमारे स्वास्थ्य, धन और चरित्र को बुरी तरह नष्ट कर रही है। शराब, गाँजा, भाँग, अफीम और विशेषतया तमाखू की खपत दिन-दिन बढ़ते जाना अपना एक खेदजनक दुर्भाग्य है। इनके विरुद्ध ऐसा वातावरण बनाना है जिससे हर व्यक्ति इन दुर्व्यसनों से होने वाली हानियों से परिचित हो सकें और इनका सेवन भी एक पाप या अपराध के रूप में देखा, समझा जाने लगे। स्वागत-सत्कार में इन नशीली चीजों ने जो सम्मानजनक स्थान प्राप्त कर लिया है उन्हें इस स्थान से पदच्युत किया जाय। माँसाहार, पशुओं के साथ निर्दयता बरतने या अधिक काम लेने से रोका जाय।

अश्लील, अनैतिक साहित्य एवं चित्रों का बहिष्कार किया जाए। कुरुचिपूर्ण पत्रिकाएं, गन्दे गीत, अश्लील पुस्तकें, तस्वीरें, गाली देना, फिल्में, अवाँछनीय नृत्य आदि घृणित समझा जाय और लोग उनसे बिच्छू की तरह बचना सीखें। शारीरिक और मानसिक दुराचार को घटाया जाय। समय-समय पर इन बुरी वस्तुओं की होली जलाई जाय। इन बुराइयों के प्रति सामाजिक घृणा उत्पन्न की जाय। विलासिता, फिजूलखर्ची, सिनेमाबाजी, शृंगार, सजधज का बचकानापन निरुत्साहित किया जाय। बढ़ती हुई गुण्डागर्दी, धोखेबाजी तथा बेईमानी, स्वार्थपरता एवं निष्ठुरता रोकी जाय।

बाल-विवाह और अनमेल विवाह बन्द कराये जाएं। छोटे बच्चों के विवाह से उत्पन्न होने वाली हानियों का परिचय सर्वसाधारण , को विशेषतया पिछड़े वर्ग की ग्रामीण जनता को कराया जाए। जहाँ आवश्यकता हो बाल-विवाह निरोधक कानून की भी सहायता ली जाय। वृद्ध व्यक्ति अल्पायु कन्या से विवाह कर रहे हों तो उन्हें भी रोका जाय।

मृत्यु-भोज के नाम पर भारी प्रीति-भोज करने की रूढ़ि को हटाया जाय। यह धन लोकोपयोगी सार्वजनिक कार्यों में लगाने की विचारशीलता उत्पन्न की जाय। भूतकालीन हानिकारक मान्यता का उन्मूलन किया जाय।

भिक्षा व्यवसाय को निरुत्साहित किया जाय। समर्थ व्यक्ति आलस और कुसंस्कारों से ग्रस्त होकर भिक्षा माँगने और इसके लिए कई प्रकार के झूठे बहाने बनाते हैं। साधु का वेष बनाते हैं। अपने को असमर्थ या विपत्तिग्रस्त कहकर लोगों को ठगते हैं। इस ठगी के कारण भिक्षा के वास्तविक अधिकारियों का भी मार्ग अवरुद्ध होता है। बिना विचारे कुपात्रों को भी दान देकर उनके पतन में सहायक बनने की कमजोरी को दूर किया जाय, साथ ही वास्तविक दयापात्रों की सुविधा के लिए उदारतापूर्वक देते भी रहा जाय। जो बिलकुल ही असमर्थ नहीं हैं उनके लिए काम मिलने की व्यवस्था बनाना दान का सबसे अच्छा तरीका हो सकता है। भिक्षुओं की बढ़ोतरी से अनैतिकता बढ़ने की जो कठिनाई उत्पन्न होती है उसकी उपेक्षा न की जाय।

स्त्री और पुरुषों के नागरिक अधिकारों की समानता स्वीकार की जाय। पुत्र या कन्या में भेद-भाव न किया जाय। स्त्री शिक्षा पर विशेष रूप से ध्यान दिया जाय और पर्दे की कुप्रथा को हानिकारक समझा जाय। पतिव्रत धर्म की तरह पत्नी-व्रत धर्म की भी जन मानस में प्रतिष्ठापना की जाए। पति के जो परम पवित्र कर्तव्य पत्नी के प्रति हैं उन्हें हर व्यक्ति समझे। माता, बहिन, पुत्री के प्रति भी अपने कर्तव्य की उपेक्षा न करे। नारी जाति के प्रति उचित सम्मान की भावना जन-मानस में पैदा हो ऐसा व्यापक प्रयत्न किया जाय।

वर्ण, जाति या उपजाति को व्यवसाय या परम्पराओं का आधार माना जा सकता है, पर किसी वंश में जन्म लेने मात्र से कोई ऊँच या नीच न समझा जाय। गुण, कर्म, स्वभाव की श्रेष्ठता निकृष्टता को बड़प्पन या छोटेपन का आधार माना जाय, वंश को नहीं। लोकमानस को ऐसी मान्यता बनाने के लिए प्रोत्साहित किया जाय। उपजातियों का भेद-भाव घटा कर चार बड़ी-बड़ी जातियाँ रहें, ऐसा प्रयत्न किया जाय।

पर्व और त्यौहार सुधरे रूप से मनाये जायें। प्रत्येक पर्व और त्यौहार में जो नैतिक एवं सामाजिक प्रेरणाएँ भरी पड़ी हैं उनका महत्व उन अवसरों पर समझा एवं समझाया जाय। होली पर रंग, कीचड़, धूलि आदि उड़ाना, गन्दे गाने गाना, दिवाली पर जुआ खेलना, दशहरा पर पशु-बलि करना जैसी बुराइयों को सुधारा जाय। पुँसवन, नामकरण, यज्ञोपवीत, मुण्डन, विवाह आदि संस्कारों को पूजा-पत्री तक सीमित न रहने देकर इन्हें परिवार प्रशिक्षण का एक शक्तिशाली माध्यम बनाया जाय। पर्व, त्यौहार एवं संस्कारों को ऐसी सुधरी पद्धति से मनाया जाय कि इनके द्वारा लोक मानस को प्रबुद्ध बनाने में सहायता मिले। जन्म दिन मनाने की प्रथा प्रचलित करने पर विशेष रूप से ध्यान दिया जाय ताकि इस दिन हर व्यक्ति को अपनी जीवन समस्या पर विचार करने का विशेष रूप से अवसर मिले।

मन्दिर मठों को धर्म प्रचार एवं जन-साधारण का केन्द्र बनाया जाय। देव-पूजा के साथ-साथ इनमें प्रौढ़ पाठशालाएं, रात्रि पाठशालाएं, प्रवचन, पर्व, त्यौहार एवं संस्कार मनाने की व्यवस्था, चिकित्सालय, पुस्तकालय, संगीत शिक्षा जैसे उपयोगी कार्यक्रमों का भी समुचित स्थान रहे। साधु-सन्त एवं पण्डित पुरोहित को दान दक्षिणा से गुजारा प्राप्त कर लेने के बाद उसका बदला समाज-सेवा के रूप में चुकाने के लिए प्रेरित किया जाय। कथा-वार्ताओं का उद्देश्य धर्म-भावनाओं का जागरण करना ही रहा करे।

आश्रम-धर्म में वानप्रस्थ अत्यन्त महत्वपूर्ण एवं तेजस्वी माना गया है। आज इस आश्रम का लोप हो चला है। प्रयत्न यह होना चाहिए कि जिनके बच्चे स्वावलंबी हो जाए वे अपना शेष जीवन समाज सेवा में लगाने की प्रतिज्ञा लेकर वानप्रस्थ ग्रहण करें। यह वानप्रस्थ ही नवयुग निर्माण के आधार स्तम्भ बन सकते हैं।

समाज सुधार के यह दस कार्यक्रम हमें तुरन्त ही हाथ में लेने चाहिए और प्रयत्न करना चाहिए कि प्रेम, उदारता, सद्भावना, नियम, सदाचार, सज्जनता एवं विवेकशीलता के आधार पर जन-मानस को सुसंस्कृत बनाया जाय।

इन कुरीतियों के अतिरिक्त वर्तमान हिन्दू समाज की सबसे बड़ी कुरीति विवाहों में होने वाला अपव्यय है। यह खर्च इतना बढ़ा-चढ़ा है कि प्रत्येक हिन्दू को अपनी कमाई का प्रायः एक तिहाई भाग विवाह शादी तथा उसके आगे-पीछे ‘अलन-चलन’ पूरे करते रहने में ही खर्च करना पड़ता है। यह पैसा न लड़की वालों के हाथ का रहता है और न लड़के वालों के हाथ का, वरन् यों ही निरर्थक अपव्यय और दिखावे में उसकी बर्बादी हो जाती है। इस खर्चें की पूर्ति के लिए, मध्यम वर्ग को बेईमानी और अनीति का मार्ग अपनाना पड़ता है क्योंकि ईमानदारी की कमाई से इस महंगाई के जमाने में गुजारा ही मुश्किल पड़ता है फिर आये दिन सुरसा के मुँह की तरह फटे हुए इस विवाह शादी के खर्चे की पूर्ति कैसे हो? इन कुरीतियों ने औसत हिन्दू को बेईमान बनने के लिए विवश किया है और जो वैसा नहीं कर पाते उन्हें आजीवन कष्ट भोगने एवं आत्महत्या तक करने को विवश होना पड़ता है। इस अत्यन्त भयानक बुराई से हमें अपने समाज को शीघ्र से शीघ्र मुक्त कराना चाहिए। कन्या को भार-रूप और पुत्र को लाभदायक माने जाने के अनुचित भेद भाव में भी यही कुरीति प्रधान कारण बनी हुई है। उसका उन्मूलन किये बिना हिन्दू समाज ‘सभ्य’ कहलाने का अधिकारी नहीं बन सकता। आदर्श विवाहों के लिए हमें प्रयत्नपूर्वक शुभारम्भ करना होगा। इसकी पृष्ठभूमि निम्न आधार पर बन सकती है।

(1) वर पक्ष दहेज न ले और कन्या पक्ष जेवर न मंगावें। किसी को कुछ देना हो तो वह विवाह के कुछ समय बाद ‘स्त्री धन’ के रूप में कन्या की सुरक्षित पूँजी के निमित्त दिया जाय, इसका दिखावा बिलकुल न हो। वर पक्ष अपनी नवागन्तुक वधू को और कन्या-पक्ष अपनी लड़की को विदाई के रूप में जो उपहार दें उसके लाभ इस नव-विवाहिता को ही मिलें। मिठाई, फल, वस्त्र या एक रुपया जैसी छोटी भेंट पाने के अधिकारी अन्य कुटुम्बी जन भी रह सकते हैं।

(2) अधिक संख्या में बरात ले जाना बन्द किया जाय। अत्यन्त निकटवर्ती कुटुम्बी या संबन्धियों में से जितने कम ले जाने से काम चल सकता हो, उतने ही लोग बरात में जाने चाहिएं। हर हालत में यह संख्या पचास से अधिक न हो। जिन लोगों का विवाह के अवसर पर सम्मान करना है उन्हें अपने घर पर बुला कर जलपान कराया जा सकता है। अच्छा हो यह कार्य वधू के घर आ जाने पर उसके हाथों सम्पन्न कराया जाय। वर वधू को आशीर्वाद देने के लिए एक छोटा उत्सव विवाह के बाद किया जा सकता है और उसमें मित्र लोग बुलाये जा सकते हैं। बारात में उन्हें समेट ले जाने से समय और धन की बर्बादी तथा परेशानी बढ़ने के अतिरिक्त और कोई लाभ नहीं।

(3) आतिशबाजी, फूल टट्टी, कागज के घोड़े, नाच तमाशे, तरह-तरह के बाजे, वर की सवारी की भारी सजावट जैसे मूर्खतापूर्ण आडम्बरों में पैसे का अपव्यय बिलकुल भी न किया जाए। काम न चले तो बारात आगमन की सूचना के लिये थोड़े बाजे लिये जा सकते हैं।

(4) विवाहों में महिलाएं अश्लील गीत न गायें। गन्दे मजाक न किये जाए। रंग या दूसरी चीजें डाल कर कपड़े खराब करने वाले मनोरंजन बिलकुल न किये जाएं। सारे उत्सव में प्रेम, सज्जनता ओर सहयोग का वातावरण बना रहे।

(5) वर व समधी लोग कन्या पक्ष से अमुक नेगजोग के बहाने कोई ऐसी माँग न करें कि हमें इतना पैसा या सामान दिया जाय। स्वागत या सम्मान की अपनी स्थिति या रुचि के अनुरूप व्यवस्था करना कन्या-पक्ष वालों का काम है। इसके लिए उसे किसी भी प्रकार से दबाया न जाए।

(6) विवाहों के अवसर पर बड़प्पन पाने के लिए दोनों पक्ष पैसे की बहुत बर्बादी करते हैं। इसे रोक कर पूर्ण सादगी के साथ छोटा-सा धार्मिक समारोह मनाने की तरह यह कार्य सम्पन्न किया जाय। बर्बादी के द्वारा बड़ाई पाने की अपेक्षा वह पैसा किन्हीं लोकोपयोगी सत्कर्मों के लिए खर्च किया जाय। बड़ाई पाने के लिए यह तरीका न अपनाया जाए।

(7) विवाहों में होने वाले अपव्यय की बुराई के विरुद्ध जन-मानस को पूरी तरह उभारा जाय। इसके लिए पर्चे, पोस्टर, चित्र, कार्टून एवं पुस्तिकाएं छापी जायें। विवाहों में यह साहित्य प्रसारित किया जाय। अपने लोग किसी भी शादी में जावें तो ऐसा साहित्य साथ लेकर जावें और उस आयोजन में सम्मिलित सभी लोगों को उन विचारों से परिचित करायें।

(8) विवाह योग्य लड़कों से, लड़कियों से तथा उनके अभिभावकों से ऐसे प्रतिज्ञा-पत्र भराये जावें जिनमें आदर्श विवाह करने की ही शपथ ली गई हो। यह प्रतिज्ञा आन्दोलन हर क्षेत्र में पूरे उत्साहपूर्वक चलाया जाय।

(9) अलग-अलग जातियों के ऐसे संगठन हों जिनके पास उस समाज के सुधारवादी लोगों के तथा उनके परिवारों में विवाह योग्य बच्चों की सूचना संग्रहीत रहे। इन संगठनों के कार्यालयों से मिलने वाली सूचना के आधार पर आदर्श विवाह करने की सुविधा रहेगी।

(10) उपजातियों के बन्धन शिथिल किये जायें। ब्राह्मण, क्षत्रिय, वैश्य शूद्र जैसी बड़ी जातियों के अंतर्गत छोटी उपजातियों में परस्पर विवाह शादी होने लगे तो अच्छे जोड़े ढूँढ़ने में आने वाली कठिनाई आसानी से दूर हो सकती है।

(11) आदर्श विवाह यदि सामूहिक रूप से एक स्थान पर होने लगे तो उनका प्रभाव और भी अच्छा पड़े। ऐसे विवाह किसी सामूहिक पक्ष के रूप में हो सकते हैं। जिन्हें सुविधा हो वे बसन्त पंचमी एवं गायत्री जयन्ती के दिन ऐसे आदर्श-विवाह गायत्री तपोभूमि में भी कर सकते हैं। यहाँ इसके लिए समुचित व्यवस्था रहेगी।

(12) जो लोग आदर्श-विवाह करने का अनुकरणीय साहस करें उन्हें सामाजिक सम्मान प्रदान करने की समुचित व्यवस्था रहे। जहाँ ऐसे विवाह हों वहाँ एक ऐसा आयोजन किया जाय जिसमें वहाँ के विचारणीय संभ्रांत व्यक्ति एवं सार्वजनिक संस्थाओं के प्रतिनिधि अपनी शुभकामनाएं प्रसन्नता, सराहना एवं अभिनन्दन व्यक्त करने के लिए पुष्प मालाएं लेकर उपस्थित हों। ऐसे विवाहों के समाचार अखबारों में छपें। अपनी नई पत्रिका ‘युग-निर्माण योजना’ में ऐसे समाचार चित्रों सहित छपा करेंगे।

इसके अतिरिक्त भी जो उपाय संभव हो सकें उनसे विवाहों में होने वाला अपव्यय रोका जाय। पूर्ण सादगी के साथ एक छोटे धर्म-उत्सव की तरह विवाह आयोजन होना चाहिए। युग के अनुरूप सुधरी हुई विवाह पद्धतियाँ बनें जिनमें वर-वधू परिवारों के सदस्य तथा संबंधी लोग अपनी-अपनी स्थिति के अनुरूप शपथ लेकर विवाह का उद्देश्य सब प्रकार सफल बनाने की प्रतिज्ञा करें। वधू पतिव्रत धर्म की और वर पत्नीव्रत धर्म पालन करने की प्रतिज्ञा करे और दोनों आजीवन उन प्रतिज्ञाओं पर सुदृढ़ रहने की घोषणा करें तो भी विवाह सार्थक हो सकते हैं। विवाह पद्धतियों में शपथ लेने और प्रतिज्ञा करने का आयोजन ही प्रधान माना जाय।

परिवारों को मिलकर ही समाज बनता है। परिवार का आरम्भ विवाह द्वारा दाम्पत्ति जीवन की प्रक्रिया द्वारा आरंभ होता है। विवाहों की आदर्शवादिता ही समाज को आदर्श बना सकती है। इसलिए विवाहोत्सव के क्षेत्र में, सभी बुराइयों को हटाकर हमें सभ्य-समाज की रचना के लिये अग्रसर होना चाहिये। शिविर के शिक्षार्थियों ने यह कार्यक्रम भावनापूर्वक किया और अपने परिवारों में यही प्रथा प्रचलित करने का वचन दिया।

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