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Magazine - Year 1980 - Version 2

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अक्लमन्दी नहीं बुद्धिमत्ता अपनाये।

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मस्तिष्कीय तीक्ष्णता और बुद्धिमत्ता में भौतिक अन्तर है। मस्तिष्क रासायनिक पदार्थों की संरचना है। उसकी ललक अपने सजातीय पदार्थो का अधिकाधिक उपभोग करने की आतुरता के साथ जुडी रहती है। अस्तु मन इतना ही चाहता और सोचता है कि रुचिकर लगने वाले पदार्थों और प्रयि लगने वाले व्यक्तियों की अनुकूलता एवं बहुलता बनी रहे। चिन्तन और कर्म को इसी प्रयोजन में लगाये रहना ही ‘अक्लमन्दी’ की सीमा है। चतुरता यही सिखाती है। वह अपने खेत्र में जब उच्छृंखल होने लगती है तो कृपणता, धूर्तता और दृष्टता के रुप में बढ़ती और ऐसे अनाचारी कृत्य करती है, जिससे कर्त्ता को पतन, तिरस्कार, प्रतिशोध एवं प्रताड़ना का भाजन बनना पड़ता है। उपलब्धियों की मात्रा तो चतुरता के सहारे बढ़ जाती है, पर वह विग्रह और संकट ही खडे़ करती है।

वृद्धि मानवी काया में आत्मा का प्रतिनिधित्व करती है। उसकी विशेषता है तथ्य खोजने और परिणाम सोच करने की क्षमता। विवेकशाीलता और दूरदर्शिता इन्हीं सत्यप्रत्तियों का नाम है। भविष्य को ध्यान में रखते हुए वर्तमान का निर्धारण करने की क्षमता के रहते मन को अचिन्त्यचिन्तन तथा शरीर को अनय आचरण करने की छूट नहीं मिल सकती। बुद्धिमान भविष्य का निर्माण करते है और उसके लिए मन की ललक लिप्सा पर नियन्त्रण कर सकने में समर्थ भी रहते है और सफल भी होते है।

अक्लमन्दी की दुनिया में कमी नहीं। स्वार्थियों और धर्तों का समुदाय सर्वत्र भरा पड़ा है। ऐसा परामर्श और सहयोग देने वालों की कमी नहीं। पशु प्रवृत्तियों का परिपोषण करने वाला और पतन के गत में धकेलने वाला वातावरण सर्वत्र विद्यमान है। इसका घेरा ही भव-बन्धन है। इस नाश पाश से छुड़ा सकने की क्षमता मात्र बु़िद्धमत्ता में ही है। बुद्धिमता अर्थात विवेकशीलता, दूरदर्शिता। इसी की उपासना में मनुष्य का लोक-परलोक बनता है।

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