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Magazine - Year 1980 - Version 2

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लो! अब पदार्थ ही मर गया।

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मनुष्य ने जबसे सोचना, समझना आरम्भ किया तथी से उसने अपने आसपास की चीजों को कौतूहल की दृष्टि से देखना और उनका रहस्य उघाड़ने का प्रयास शुरु किया। कौतूहल ओर रहस्य जानने की उत्कट लालसा तथा प्रयत्नों से ही ज्ञान विज्ञान का इतना विपुल और विस्तृत विकास सम्भव हुआ। कभी लगता है कि मनुष्य ने अमुक रहस्य या गुत्थी सुलझा ली लेकिन दूसरे ही क्षण पता चलता है कि सचाई कुछ और है तथा रहस्य अभी ज्यों का त्यों बना हुआ है। यही नहीं उसने रहस्य को जानने केलिए जो प्रयास किये, उन प्रयासों से जो तथ्य सामने आये उनमें और भी कई रहस्यपूर्ण गुत्थियाँ सामने आ गई। कुल मिलाकर यह कि दो हजार साल के ज्ञात-अज्ञात वैज्ञानिक अनुसंधानों, उनकी ऐतिहासिक उपलब्धियों और प्राप्त ज्ञान भण्डार के उपरान्त भी मनुष्य किसी क्षेत्र में यह दावा नहीं कर सकता कि उस क्षेत्र में उसने पूरी जानकारी प्राप्त कर ली है।

ज्ञान के विकास और रहस्यों को सुलझाने के इस दौर में कई बार ऐसा लगा कि अब सब कुछ जान लिया गया है और कुछ भी जानने को बाकी नहीं बचा है। उदाहरण के लिए डारबिन ने जब विकासवाद के सिद्धान्तों को खोज निकाला और उसकी पुष्टि में अनेकों प्रामण खोज लिय गये तो समझा जाने लगा कि पृथ्वी पर जीवन का विकास कैसे सम्भव हुआ, यह पूरी तरह जान लिया गया है। लेकिन आगे चलकर यह पता चला कि यह खोज तो बहुत ही आधी अधूरी है। इसके न केवल अपवाद मिले वरन् ऐसे तथ्य भी मिले जिनसे विकासवाद के सिद्धान्त ही संशयास्पद बन गये। जाँन डारबिन ने परमाणु सिद्वान्त की व्याख्या की तो लगने लगा, पदार्थ की छोटी-से-छोटी इकाई के सम्बन्ध में जान लिया गया। लेकिन जल्दी ही यह धारणा निताँत भ्रम सिद्ध हो गई और परमाणु के सम्बन्ध में नये-नये तथ्य प्रकाश में आये। डौल्टन का परमाणु सिद्धान्त धराशायी हो गया और जहाँ यह मान लिया गया था कि परमाणु के सम्बन्ध में अब कुछ भी जानने को बाकी नहीं बचा है, वचहीं अब यह माना जा रहा हैं। कि परमाणु के सम्बन्ध में एक प्रतिशत भी पूरी जानकारी प्राप्त नहीं हुई हैं।

पिछले बीस-तीस वर्षों में इतनी अधिक वैज्ञानिक जानकारियाँ एकत्रित की गई है, जितनी अब तक कभी भी नहीं हुई। इन अनुसंधानों और जानकारियों के आधार पर गत दो तीन दर्शकों को वैज्ञानिक प्रगति का युग कहा जा सकता है। लेकिन आर्श्चय की बात यह है कि इन दो-तीन दशकों में विज्ञान अपने आपको जितना अपूर्ण और अधूरा अनुभव करने लगा है उतना पहले कभी नहीं था। वैज्ञानिकों की वर्तमान पीढ़ी निस्संकोच भाव से यह कह रही है कि हमने अब तक जितने रहस्य सुलझाये हैं, रहस्यों को सुलझाने की इस प्रक्रिया में उससे कहीं अधिक रहस्य पैदा हो गए हैं और कह नहीं सकते कि प्रकृति के ये रहस्य कभी सुलझ भी सकेंगे अथवा नहीं। रहस्यों के उलझते जाने की इस प्रक्रिया का मूल कारण चेतना के नियमों से अनभिज्ञता है। या यों कह सकते हैं कि चेतना के सम्बन्ध में कुछ भी नहीं कहा जा सकता कि वह कब किस तरह का व्यवहार करेगी? इसलिए किसी व्यक्ति या चेतन प्राणी के सम्बन्ध में निश्चित रुप से कुछ नहीं कहा जा सकता।

भीड़ या व्यक्तियों और वस्तुओं के समुदाय के बारे में तो फिर भी अनुमान लगाये जा सकते हैं और वे अनुमान करीब-करीब सही होते हैं। लेकिन व्यक्ति विशेष अथवा वस्तु विशेष के सम्बन्ध में अनुमान लगाना तो दूर रहा कल्पना तक नहीं की जा सकती। उदाहरण के लिए बम्बई, कलकत्ता, दिल्ली, मद्रास जैसे शहरों में प्रतिदिन दस-पाँच दुर्घटनाएँ होती है। 20-25 व्यक्ति इन दुर्घटनाओं में मर भी जाते हैं। इस आधार पर कहा जा सकता है कि एक वर्ष में तीन-चार हजार दुर्घटनाएँ होगी और पाँच-सात हजार व्यक्ति मरेगे। इस तरह के आँकडे इकठ्ठे किये भी जाते हैं उनकी घोषणा भी की जाती है कि इस वर्ष इतनी दुर्घटनाएँ घटने की सम्भावना है। ये आँकडे़ करीब-करीब सही होते हैं। लेकिन व्यक्ति विशेष या वाहन विशेष के सम्बन्ध में विचार किया जाय कि वह किसी दुर्घटना का शिकार होगा अथवा नहीं, तो इस सम्बन्ध में कुछ भी नहीं कहा जा सकता। यह भी नहीं कहा जा सकता कि इन दुर्घटनाओं में से कौन-सी दुर्घटना किस व्यक्ति के साथ या किस वाहन की घटेगी।

विज्ञान जब तक अपना शोध अनुसंधान पदार्थ को जड़ मानकर करता रहा, तब तक वह दावे के साथ कहता रहा कि सचाई यह है। लेकिन पदार्थ का विश्लेषण करते-करते वैज्ञानिक अब वहाँ तक पहुँच गये हैं कि पदार्थ का अस्तित्व ही समाप्त हो गया है। अब पदार्थ बचा ही नहीं है। पदार्थ की परिभाषा यही की जाती है कि वह जड़ होता है, उसका आकार होता, बजन होता है निश्चित स्वरुप होता है। लेकिन पदार्थ का सूक्ष्मतम विश्लेषण करने के बाद यह परिभाषा ध्वस्त हो गई है। उदाहरण के लिए पदार्थ के सम्बन्ध् में निश्चित धारणा थी कि अमुक परिस्थितियों का पदार्थ पर अमुक तरह का प्रभाव पडे़गा और उस पर अमुक तरह की प्रतिक्रिया होगी। लेकिन अब इस सम्बन्ध में नये तथ्य सामने आये हैं और कहा जा रहा है कि सब कुछ अनिश्चित है।

पिछले दिनों कण भौतिकी (पार्टिकल फिजिक्स) के क्षेत्र में हाइसन वर्ग के अनिश्चय सिद्धान्त की बड़ी चर्चा हुई। उनके अनुसार एक ही समय में एक साथ एक ही तरह के करण किस तरह का व्यवहार करेंगे। यह नहीं जाना जा सकता। कण विशेष की गति और परिस्थिति के सम्बन्ध में भी कुछ कह पाना सम्भव नहीं है। केवल अनुमान ही लगाया जा सकता है और अनुमान कोई सही निकले यह कोई जरुरी नहीं है। अनेक प्रयोग किए गये कि किन परिस्थितियों में कौन-से कण किस तरह का व्यवहार करते हैं? एक ही परिस्थिति में एक ही प्रक्रिया से एक ही तरह के कणों का हजारों बार अध्ययन किया गया। लेकिन यह जान कर हैरानी हुई कि प्रत्येक बार हर कण का व्यवहार अनुमान से भिन्न था। यही नहीं पिछली प्रतिक्रिया भी नहीं दोहराई गई। इस आधार पर घोषणा की गई कि पदार्थ की जैसी परिभाषा की जाती रही है वैसा कोई पदार्थ इस जगत में है ही नहीं। दूसरे शब्दों में यह घोषणा की गई कि पदार्थ मर गया है। पहले कभी नास्तिकतावादी विचारक नीत्से ने यह घोषणा की थी कि ईश्वर मर गया है लेकिन अब विज्ञान को यह घोषणा करनी पड रही है कि पदार्थ मर गया है। अब वैज्ञानिकों को यह कहना पड़ रहा है कि पदार्थ विज्ञान से बार भी एक अत्यन्त विशाल दुरुह और अज्ञात क्षेत्र रह जाता है जिसे खोजने के अभी तक कोई उपाय नहीं ढूँढे़ जा सकते हैं। लेकिन वह क्षेत्र विज्ञान की सभी ज्ञात धाराओं का मूल स्त्रोत और नियन्त्रण कर्त्ता है।

वैज्ञानिक मैकब्राइट का कथन है कि, विश्व के परोक्ष में किसी ऐसी सत्ता के होने की पूरी और निश्चित सम्भावना है जो ज्ञानयुक्त और इच्छायुक्त हो। उसी के कारण विश्व की गतिविधियाँ अनियन्त्रित और अनिश्चित रुप से चल रही है।” डाँ. मोर्डेल का कहना है कि अणु और पदार्थ के सूक्ष्मतम कणों के इस विचित्र व्यवहार से यही सिद्ध होता है कि कोई चेतन शक्ति है अवश्य, जिसके प्रभाव से ही अणु अथवा कणों का स्वभाव पकड़ में नहीं आता।

वह कौन-सी शक्ति हैं और किस प्रकार काम करती हैं ? उसके क्या नियम हैं ? कैसे वह पदार्थों को प्रभावित करती है? आदि प्रश्नों का उत्तर विज्ञान के पास अभी नहीं है। इस सर्न्दभ में विख्यात वैज्ञानिक इंगोल्ड का कथन है कि, “जो चेतना इस सृष्टि में काम कर रही हैं। उसका वास्तविक स्वरुप समझने पे अभी हम असमर्थ हैं। इस सम्बन्ध में हमारी वर्तमान मान्यताएँ, अधूरी , अप्रामाणिक और असंतोषजनक है।”

इस प्रकार की तमाम रहस्यपूर्ण वैज्ञानिक गुत्थियों का संकलन करते हुए प्रख्यात विज्ञान लेखक एफ.एल. वोश्के ने एक पुस्तक लिखी है-”द अनएक्सप्लेड”। इस पुस्तक में बोश्के ने जो प्रतिपादन किये हैं, उनसे यही निर्ष्कष निकलता है कि एक सच्चा वैज्ञानिक सब कुछ जान लेने का दावा कभी नहीं करता। बल्कि जैसे जैसे वह अपनी शोध साधना के क्षेत्र में गहरा उतरता जाता है उसे एक से एक रहस्मय गुत्थियों का पता लगता है और अनुभव होता है कि प्रत्यक्षतः जगत जैसा प्रतीत होता है, वैसा तो वास्तव में कुछ भी नहीं है बल्कि सब कुछ रहस्यपूर्ण है। यह बात और है कि भीड़ की सम्भावनाओं के समान पदार्थ के स्थूल नियमों का पता लगाकर विज्ञान उससे रुत्किचिंत लाभ उठाने की स्थिति में पहुँच गया है। परन्तु सचाई कुछ और ही है इन स्थूल नियमों से लाभ उठाने के कारण यह भ्रम हो सकता है कि विज्ञान ने शायद सत्य को जान लिया हो। पर वैसा है नहीं। मोटी बातें जो दिखाई देती है उनका थोड़ा-सा परिचय भी पर्याप्त लाभ दे सकता है लेकिन इसका अर्थ यह नहीं है कि उनकी वास्तविकता जान ली गई। सूर्य रोज उगता है, प्रकाश देता है, उस प्रकाश से सौर ऊर्जा के रुप में लाभ उठाया जा सकता है यह जान लेना ही पर्याप्त है। इसमें यह जानने से कोई अन्तर नहीं पड़ता कि सूर्य पृथ्वी का चक्कर लगा रहा है अथवा पृथ्वी सूर्य की परिक्रमा कर रही है।

प्रकृति की स्थल गतिविधियों का अनुकरण करते हुए ही अब तक दिखाई पड़ने वाली मशीनी सैद्धान्तिक पहलुओं पर अभी भी मतभेद हैं। “द अन ऐक्सप्लैड” के लेखक एफ.एल. वोश्के ने लिखा है कि विज्ञान के क्षेत्र में परस्पर विरोधी सिद्धान्तों का द्वन्द्व अनवरत चलता रहता है और सचाई क्या है, यह अभी भी अज्ञात है। उनके अनुसार चाहे दूरबीन से देखी जा रही आकाश गंगा हो, अथवा माइक्रारेस्कोप से देखे जाने वाले, अन्वेषित किये जाने वाले जीवाणु-परमाणु वैज्ञानिक किसी भी क्षेत्र में एक निर्ष्कष पर नहीं पहुँच सके है।

विज्ञान अपने शैशव से क्रमशः विकसित होता हुआ किशोरावस्था में प्रवेश कर रहा है। उसके अनुभव, निर्ष्कष और ज्ञान नित्य निरन्तर विकसित परिमार्जित होते जा रहे हैं। अभी उसे प्रौढ़, वृद्ध एवं परिपक्व होने में बहुत समय लगेगा। फिलहाल तो उसे अपनी पिछली गलतियाँ सुधारने से ही फुरसत नहीं है। अभी तक जिस बात का जोर-शोर से प्रतिपादन किया जाता है, जब उन्हीं के सम्बन्ध में मान्यताएँ बदलने की घोषणा करनी पड़ती है। जैसे-जैसे नये तथ्य सामने आते जायेगे, नये निर्ष्कष और नये सत्यों तक विज्ञान पहुँचता जायेगा वैसे-वैसे वर्तमान कई नयी मान्यतायें बदलेगी। और उन तथ्यों का समर्थन होता जायेगा, जिन्हें भारतीय ऋषि-मुनियों ने पहले ही जान लिया था। भारतीय मनीषियों ने हजारों वर्ष पूर्व चेतन की सर्वव्यापकता, ब्रह्म, की सत्यता को उद्घोषित किया था। सर्व खल्विद ब्रह्म, आत्मै वेद सर्व” “एको ब्रह्म द्वितीयोनास्ति” आदि घोषणाओं में इन्हीं सत्यों की घोषणा की गई है। कोई आर्श्चय नहीं कि कल को चलकर विज्ञान भी इन घोषणाओं का समर्थन करने लगे और इसकी पुष्टि के प्रमाण जुटाने लगे।

जो भी हो, इतना सही है कि प्रकृति और उसके अधिपति परमात्मा का पूर्ण ज्ञान प्राप्त करना हर किसी के लिये सम्भव नहीं है। दोनों ही रहस्यपूर्ण है दोनों का या कहे दोनों के समुच्चय एक ब्रह्म का क्षेत्र इतना व्यापक है कि उसे स्थूल और सीमित साधनों उपकरणों द्वारा नहीं जाना जा सकता। न ही मनुष्य की सीमित सामर्थ्य के यह बस में है कि वह वस्तुस्थिति को जान सके। अस्तु, यह करने में कोई संकोच नहीं होना चाहिए कि अपने आसपास का यह सारा जगत अनेक रहस्यों के आवरण में लिपटा हुआ है। उसे जानना पूरी तरह समझना शायद ही कभी सम्भव हो सके। पूर्ण ज्ञान की कुँजी बताते हुए ऋषि ने यही गया है, पूण् ज्ञान की कुँजी बताते हुए ऋषि ने यही गाया है अपने को जानो अपने को देखों।” अपने अस्तित्व में अवश्य ही विराट् परमात्मा की झाँकी देखी जा सकती है।

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