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Magazine - Year 1980 - Version 2

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विचारों और भावनाओं की शक्ति सामर्थ्य

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सरोवर में तरगों की भाँति, सागर में लहरों की भाँति मन क्षेत्र में भी कितने ही उतार-चढ़ाव आते रहते हैं। कभी वह शान्त सरिता की भाँति शान्त, मन्द और शीतल वायु का र्स्पश करता हुआ बहता है। तो कभी उसमें समुद्री ज्वार और चक्रवात की तरह जोर के उफान आते रहते हैं। मन का यही स्वभाव हैं ओर इसी विशेषता के कारण उसे चेतना का अंग कहा गया है। जो सदा सर्वदा एस-सी स्थिति में ही पड़ा रहे उसे जड़ नहीं तो ओर क्या कहा जायगा। चेतन प्राणियों की चेतन सत्ता ही नहीं वस्तु, व्यक्ति ओर परिस्थिति की दशा भी एक जैसी नहीं रहती। प्रकृति जड़ वस्तुओं को भी नचाती रहती हैं। उनमें प्रकृति चक्र के अनुसार परिवर्तन होते रहते हैं। व्यक्तियों पर इन परिवर्तनों का प्रभाव होता है, वह प्रतिक्रिया व्यक्त करता है। यह व्यक्ति की अपनी मनोदशा, मानसिक बनावट पर निर्भर है कि वह इन परिवर्तनों का क्या प्रभाव ग्रहण करे आर क्या न करे ? घटनाक्रम पर किस द्रष्टि से सोचा जाय औश्र किस द्रष्टि से न सोचा जाए ? यह भी व्यक्ति की अपनी मानसिक बनावट पर निर्भर करता है।

जिन लोगों को सही द्रष्टि से सोचना नहीं आता वह सामान्य परिस्थितियों में भी उद्धिग्न ओर क्षुब्ध हो उठते हैं तथा जो सही ढंग से सोचना जानते हैं वे प्रतिकूल परिस्थितियों में भी वह समय हँसते-खेलते गुजार देते हैं। जिन्हें तैरना आता है वे विपरीत दिशा में हवा चलने पर, झंझा और तूफान आने पर, उ6म वेग से बाढ़ आई नदी में भी तैरकर पार हो जाते हैं ओर जो तैरना नहीं जानते वे शान्त, स्थिर जल में भी होशोहवाश खो बैठते हैं ओर डूब मरते हैं। सही द्रष्टि से सोचने की कला भी ऐसी ही है। यदि वह आ गई तो व्यक्ति सभी परिस्थितियों में शान्त, सन्तुलित और सन्तुष्ट रह लेता है ओर ठीक ढग से सोचना नहीं आता, वस्तुओं ओर परिस्थितियों को उनके सही सर्न्दभ में देखना जिन्हें नहीं आता वे साधारण परिस्थितियों में भी उद्धिग्न और दुःखी हो उठते हैं।

इसका क्या कारण है ? उत्तर एक ही है विचारों का प्रभाव, विचारों की शक्ति। विचार ही व्यक्तियों को प्रतिकूल परिस्थितियों में डटे रहने और साहसपूर्वक उन्हें चीरकर आगे बढ़ने की शक्ति प्रदान करते हैं और विचार ही अच्छी से अच्छी परिस्थितियों में व्यक्ति को निराश, हताश, ओर पस्त हिम्मत बना देते हैं। वस्तुतः विचार एक शक्ति है और शक्ति का भला या बुरा कैसा भी उपयोग किया जा सकता है। शक्ति का सदुपयोग होता है या दुरुपयोग यह उपयोग करने वाले पर निर्भर है। आग एक खाना भी पकाती है ओर उसी से मकान भी जलाया जा सकता है। विचार भी आग से कम नहीं है, वरन् अधिक ही है। उनसे परिस्थितियों और जीवन के गम्भीर व बड़े उतार-चढ़ावों को बड़ी आसानी से भी पार किया जा सकता है और उनके कारण सीधी-सपाट सड़क पर भी ठोकर खाकर गिरा जा सकता है।

विचारों की शक्ति के सम्बन्ध में प्रो. एलीशाग्रे ने अपनी पुस्तक ‘मिरेकल्स आफ नेचर’ में लिखा है- ‘प्रकाश की तुलना में विचार विघुत की प्रवाह गति कहीं अधिक है। इसे अभी यन्त्रों द्धारा मापा या देखा नहीं जा सका तो भी यह एक तथ्य है कि विचार मात्र कल्पनाओं का उभार न होकर एक शक्तिशाली पदार्थ है। उनकी गति ओर क्षमता ज्ञात भौतिक शक्तियों में सबसे अधिक है।’ वस्तुतः विचारों की शक्ति के कुछ साधारण से अनुभव ही हमें होते है। जैसा कि प्रारम्भ में बताया गया, विचारों के प्रभाव का ज्ञान बहुत सामान्य ही हो पाता है। यघपि वह भी कोई कम नहीं है। फिर भी विचारों में कितनी शक्ति है ? इसका अनुमान लगा पाना अभी तक न विज्ञान के लिए सम्भव हुआ है ओर न ही कोई विचारक उसका अनुमान कर पाये हैं।

लुईरा क्राउन ने विचारों के शक्ति के सम्बन्ध में कहा है- ‘ताप, विघुत आदि की ऊर्जा केवल भौतिक पदार्थो को ही नरम-गरम करती ओर उनमें परिवर्तन कर सकती है, किन्तु विचारों की शक्ति समूचे वातावरण से ही आर्श्चयजनक मात्रा में परिवर्तन कर सकती है। तना को प्रभावित कर सकने वाली क्षमताओं में चारों का स्थान ही सर्वपरम है। वे आने उद्गम स्थान को, विचार करने वाले को सबसे अधिक प्रभावित करते हैं ओर फिर अपने समीप क्षेत्र पर प्रभाव डालते हुए असीम दूरी तक बढ़ते चले जाते है। उनकी सामर्थ्य का स्तर प्रेरक व्यक्तित्व की प्रतिभा के अनुरुप करता है ओर उसी के अनुसार अन्यान्य व्यक्तियों, प्राणियों ओर यहाँ तक कि वस्तुओं का भी प्रभावित किया जा सकता है।

विचार शक्ति का वह अति सामर्थ्यवान स्तर गहन अनुसन्धान का विषय है। यहाँ चर्चा इतनी ही की जा रही है कि किस प्रकार कोई व्यक्ति इस शक्ति का उपयोग अपने सामान्य जीवन क्रम में करके सुखी व सन्तुष्ट रह सकता है ? विचारधारा को सही खा जाए तो कोई भी व्यक्ति किन्ही भी परिस्थितियों में सुखी रह सकता है, और जीवन के किसी भी क्षेत्र में अवाँछनीय कूड़ा-करवट अनुपयुक्त विचारों के रुप में भर लिया गया तो उनकी सड़ाँद से जीवन का एक-एक कण और एक-एक क्षण विषाक्त हो जाता है। शरीर सन्तुलन गड़बड़ा जाता है और साधारण जीवन की सामान्य समस्याओं का सही हल ढूँढना भी सम्भव नहीं रह जाता।

मानवीय मस्तिष्क में उठने वाली विचारणाओं भावतरंगों को मोटे तौर पर दो भागों में बाँटा जा सकता है- एक सृजनात्मक ओर दूसरा ध्वंसात्मक। सृजनात्मक विचारों या भावनाओं में उन्हें लिया जा सकता है जो जीवन में आनन्द और सुख-सन्तोष की सृष्टि करते हैं। इस श्रेण्ी में प्रसन्नता, सन्तुष्टि, आशा, हिम्मत, करुणा, सहृदयता, सहानुभूति, सेवा आदि की गणना की जा सकती है। ध्वंसात्मक भावनाओं और विचारणाओं में क्रोध, घृणा, ईर्ष्या, निराश, खीझ आदि को गिना जा सकता है। जीव विज्ञानियों और मनःशास्त्रियों के अनुसार सृजानात्मक चिन्तन शरीरी पर उत्साहवर्धक अनुकल प्रभाव डालता है और इसके विपरीत ध्वंसत्माक चिन्तन के कारण उद्धिग्न हुआ मस्तिष्क अपनी कार्यक्षमता गँवा बैठता है क्योंकि उस स्थिति में मस्तिष्क की सारी शक्तियाँ कुन्द पड़ जाती है और जड़ हो जाती है। जब इन भावनाओं का आधिपत्य रहता है तो मस्तिष्क कि कर्त्तव्य विपूढ़ होकर यह भूल जाता है कि इन ध्वंसकारी भावनाओं से किस प्रकार उबरा जाए ? उस स्थिति में प्रायः उलटे विचार ही सामने आते है जिन्हें अपनाने पर और नई उलझनें पैदा ही जाती हैं। मकन में आग लगने पर या कोई खतरा अनायास सामने प्रस्तुत होने पर लोग जिस प्रकार अपना सन्तुलन खो बैठते हैं तथा यह नहीं समझ पात कि क्या किया जाए ? न उनमें कुछ सोचने, विवारने और उपाय ढूँढने की ही कोई सामर्थ्य आती है, उसी प्रकार की स्थिति मस्तिष्क की उस समय होती है जब ध्वंसात्मक चिन्ताएँ विचारणएँ भभक उठती हैं।

दोनों स्तर के विचारों भावों का शरीर पर भी प्रत्यक्ष अभाव देखा जा सकता है। प्रसन्नता की मनःस्थिति में मनुष्य की आँखे चमकने लगती हैं, चेहरा गुलाबी हो उठता है, गालो व पुलकन उभरी हुई दिखाई पड़ती है और समूचा मुख मण्डल दीप्तिमन्त हो उठता है। इस स्थिति में व्यक्ति सहज ही आकर्षक और सुन्दर प्रतीत होने लगता है। इसके विपरीत क्रोध और घृणा के आवेश में व्यक्ति काँपने और हाँपने लगता है, वह चीखने-चिल्लाने लगता है। चेहरे पर तनाव ओर उत्तेजना के लक्षण प्रत्यक्ष दिखाई देने लगते हैं। होठ सख जाते हैं ओर मुहँ से ऐसे शब्द निकलते हैं जिनसे न कुछ लाभ होता है और न ही किसी प्रयोजन की सिद्धि होती है। इसके विपरीत आरोप और अपमान का ऐसा वातावरण बनता है, बन जाता है कि दूसरों की अपेक्षा अपनी ही हानि अधिक होती है।

विचारों और भावनाओं की शक्ति को, उनके प्रभावों को समझना चाहिए तथा सही ढंग से विचार करने की शक्ति विकसित करनी चाहिए ताकि जीवन को सरस, सरल, सुखद तथा आनन्दपूर्ण बनाया जा सके।

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