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Magazine - Year 1980 - Version 2

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प्रवाह में न बहते रहें, औचित्य भी देखें

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First 20 22 Last
प्रवाह में बहना सरल पड़ता है, उसमें निजी निर्धारण और साहस की आवश्यकता नहीं पड़ती। नदी में पेड़ो से लेकर हाथियों तक बहते चले जाते है। चलते हुए ढर्रे के सहारे किसी भी दिशा को पकडे़ हुए कहीं भी पहुँच जाना सम्भव है। आँधी आती है ओर पते-तिनके को पहँचा दें, उसी का वे नियति मान लेते है।

यही गति उनकी भी होती है, जिनमें न विवेक है न साहस। उचित अनुचित का अन्तर तो कई समझते भी है किन्तु जा ग्राहृय है उसी को अपनाया जाय, ऐसा सोचते हूए भी वैसा करते नहीं बन पड़ता। इसे व्यक्तित्व का पिछड़ापन ही कहा जा सकता है। पराक्रम में प्रखर दीखते हुए भी कितने ही व्यक्ति नीति निर्धारण के सम्बन्ध में अत्यन्त दुर्बल पाये जाते है। व्यवहार क्षेत्र में कई साहसिक निर्णय करने वाले भी आत्म निर्धारण के सम्बन्ध में अत्यन्त दुर्बल पाये जाते है। व्यवहार क्षेत्र में कई साहसिक निर्णय करने वाले भी आत्म निर्धारण में भारी भूल करते रहते है। स्वतन्त्र चिन्तन का अभ्यास न होने से इस सर्न्दभ में दूर तक जाने में अनख लगता है। प्रचलित ढर्रा स्वभाव का अंग बन जाता है, तो उस का अनुकरण ही सरल लगता है।

नये निर्णय करने में असाधारण सूझ-बूझ का परिचय देना पडता है, फिर जीवन क्रम की सक्ष्म समीक्षा करना ओर उसे औचित्यकी कसौटी पर कसना और फिर ढर्रे को उलटकर उत्कृष्टता की रीति-नीति अपनाना तो ओर भी कठिन पड़ता है। इसके लिए आत्मबल चाहिए। आम तौर से लोगो में शरीर बल ही होता है। किसी-किसी में मनोबल भी पाया जाता है। आत्मबल का तो एक प्रकार से अभाव ही दीखता हैं। इसके बिना आत्म निर्धारण हो नहीं पाता। इन्ही कठिनाइयो से घिरी हुई मानवी सत्ता किसी दैत्य के जाल में फँसी हुई अधिक की मर्जी के सम्मुख शिर झुकाय बैठी रहती है। यही है प्रवाह क्रम, जिसमें औसत मनुष्यों का क्रम विधान और भाग्य बंधा रहता है।

मुट्ठी बाँधकर जन्म लेने और हाथ खोले मर जाने वाले असंख्यो का जीवन इसी प्रकार टूटे पत्ते की तरह अनिश्चित दिशा में उड़ता हुआ, प्रायः ऐसी स्थिति में समाप्त होता है, जिसे दुर्भाग्य के समतुल्य ही कहा जा सकता है।

भेड़ो की आँखे तो होती हैं, पर स्वतन्त्र चिन्तन की कभी रहने से उन्हे मुहावरे में अँधी कहते हैं। अंधी इसलिए कि झुण्ड जिधर भी चलता है, वे सभी बिना सोचे समझे उधर ही चलती जाती हैं। अगर उनके मार्ग में कोई कुआँ, खाई आवे तो एक के पीछे एक उसी में गिरती चली जाती है। स्वतन्त्र चिन्तन का आलस उन्हें यह देखने सोचने तक का अवसर नहीं देता कि ढर्रे पर चलने वाले समुदाय को किस विपत्ति का सामना करना पड़ रहा है।

परम्परागत प्रवाह और समूहगत प्रचलन में अपना खिचाव और दबाव तो होता है, पर इतना नहीं कि उसे अपनाने के अतिरिक्त और कोई चारा ही न हो। मछली में स्वतन्त्र निर्धारण की क्षमता होती है मूलतः वह शरीर से तुच्छ और बल में उपहासास्पद होते हुए भी धारा को चीर कर उल्टी भी लोट सकती है। इसमें उस का मनोबल ही चमत्कार प्रस्तुत करता है। शरीरगत शक्ति तो उस स्तर के अन्य जलचरों जितनी ही होती है। स्वतन्त्र चिन्तन और साहसिक निर्धारण ही वह विशिष्टता है जिसके सहारे किन्ही भाग्यवानों को सामान्य स्थिति में रहते हूए भी महा मानव बनने और असाधरण उपलब्धियाँ प्राप्त करने का अवसर मिलता है।

मनुष्य महान् सम्भावनाओं से भरा पूरा है। सृष्टा ने उसे अपने समतुल्य ही बनाया हैं। उसमें बीज रुप से इतनी समर्थता विघमान है कि उसे जगाने और उपयोग में लाने वाले कुछ ऐसा कर गुजरते हैं, जिसे देखकर साथियों को भी आर्श्चयचकित रह जाना पड़ता है। दिशा निर्धारण मनुष्य को स्वंय करना पड़ता है। उस पर चलने का साहस समेटना भी उसी का काम है। आदर्शो के मार्गे पर चलने वाले निजी प्रयास से इतना ही पराक्रम प्रकट करते हैं, आगे की बात तो स्वंय ही बनती जाती है। हर दिशा में सड़के और सवारियाँ मौजूद हैं, चलने का निर्णय स्वयं ही करना पड़ता है। साथियों की कमी किसी भी सड़क पर नहीं हैं। हर धर्मशाला में उसी दिशा में चलने वाले अनेकों मुसाफिर मिलते है और सहचरों में सहयोग भी बन जाता है।

मनुष्य जन्म जीवधारी के लिए असाधारण सौभाग्य है। इस सुअवसर का लाभ उठा सकने वाले कई ऐसी उपलब्धियाँ प्राप्त करत हैं, जिनके लिए असंख्यों तरसते रहते हैं। इसी जन्म में पूर्णता का लक्ष्य प्राप्त कर सकना नितान्त सरल ओर सर्वथा सम्भव है। इसी जन्म में लोक सम्मान और जन सहयोग का लाभ प्रचुर परिणाम में कमाया जा सकता है। इतना प्रचुर जिसे भावी पीढ़ियाँ भी नत मस्तक होकर भाव -क्षद्धा के साथ प्रस्तुत करती रहे। इसी जन्म में दैवी अनुग्रह अर अद्रश्य सहयोग का लाभ उठाया जा सकता है। ईश्वर प्राप्ति कठिन उनके लिए है, जो उस तक पहुँचने के मार्ग से अपरिचित है। सरल उनके लिए जो सफलता पाने वालों का अनुकरण करने का साहस करते है।

पानी स्वभावतः नीचे की ओर बहता है। समस्त नदी-नाले इसी क्रम से बह रहें है। ऊपर से नीचे कूद पड़ना सरल हैं। नीचे से ऊपर चढ़ना कठिन। कुँए से पानी ऊपर खींचने में कितने साधन जुटाने एवं श्रम करने की आवश्यकता पड़ती है। इसे सभी जानते हैं। यहाँ पशु प्रवृतियों का बाहुल्य है। क्योकि निम्न स्तर के जीव धारियों का ही, इस धरती पर बाहुल्य है। चौरासी लाख योनियों में परिभ्रमण करते समय उसी स्तर के संस्कारों का संग्रह समुच्च्य मनुष्य जन्म में भी बना रहता है। उच्च अवसर मिल जाने पर भी आदतें और इच्छायें , पुराने स्तर की बनी रहती हैं। फिर अधिकाँशो की गति विधियाँ नर पशुओं जैसी ही चलती हैं। संचित कुसंस्कार और कुप्रवृतियों का प्रवाह मिलकर एक ऐसा ढर्रा बना देते हैं, जिसमें तथाकथित बु़िद्धमान भी बुद्धिहीनों की तरह ही बहते चले जाते हैं।

प्रायः भवसागर से उबारने की प्रार्थना ईश्वर सेकी जाती है। पर भवसागर और कुछनहीं अधोगामी दुष्प्रवृतियों कावह प्रवाह-प्रचलन है, जिसमें अधिकाँश जन समूह बहता है। डूबते-उछलते वे किसी अनिश्चित दिशा में बहते चले जाते हैं और वहाँ जा पहँचते है जहाँ अन्धकार और पश्चाताप के अतिरिक्त और कुछ हाथ नहीं लगता।

पेट भरना अन्य प्राणियों के लिए एक समस्या है, क्योंकि उनकी शरीर रचना, बौद्धिक स्थिति एवं निर्वाह की आवश्यकता को देखते हुए अनवरत प्रयास करने के अतिरिक्त और कोई चारा नहीं। मनुष्य की संरचना इससे भिन्न है। वह शरीर यात्रा की उचित सामग्री अपने श्रम, कौशल और प्रस्तुत व्यवस्था के सहारे तनिक से प्रयास में उपलब्ध कर सकता है। पेट भरने , तने ढकने और छाया आश्रय पाने में किसी को कोई कठिनाई नहीं हो सकती। 6 इन्च का पेट, 6फुट की भुजायें अत्यन्त सरलता पूर्वक कुछ ही घण्टे के पुरुषार्थ से भर सकती है, पर मनुष्य का उसके लिए उद्धिग्न रहना और सारा समय उसी में खपा देना विवेक द्रष्ट्रि से आर्श्चयजनक है। फिर भी देखा यही जाता है कि पेट की रट लगाये हुए, हर कोई अभावों का रोना रोते, हर व्यक्ति बेतरह उसी में व्यस्त पाया जाता है। इस व्यस्तता से न किसी के पास समय बचता है, और न अन्य कुछ सोचने की फुरसत रहती है।

परिवार प्राणियों के सहयोगपूर्वक विकसित होने की एक स्वस्थ परम्परा है। उसमें भार जैसा कुछ नहीं है। माली पेड़-पोधों का संजोता है। पेड़-पौधे माली की आवश्यकताएँ पूरी करते है। सह जीवन को एक अनोख आनन्द परिवार है, वह भार तब बनता है, जब अचिन्त्य चिन्तन अपनाया जाता है। कर्तव्य पालन की बात भुला कर जब व्यामोह की अवाँछनीयता अपनाई जाती है, तो परिजन दुर्गुणी और लोभी विलासी बनते जाते हैं। ऐसी दशा में उन्हे सन्तुष्ट करने के लिए किये गए पक्षपात पूर्ण प्रयास भी कारगर सिद्ध नहीं होते, वरन् उल्टे पड़ते जाते है। हेय द्रष्ट्रिकोण के रहते प्रजनन बढ़ता ओर समस्याओं का बोझ सिर पर लदता जाता है। स्वावलम्बी और सुसंस्कारी बनाने की अपेक्षा जब परिजनोंको सुविधाओं से लादने की द्रष्ट्रि रहती है तो फिर उस विष सिचन से मात्र नरक का ही उत्पादन हो सकता है। आज परिवार में र्स्वग की अनूभूति करने वाले भाग्यशाली कहीं ढूँढू नहीं मिलते। इस कारण परिवार संस्था का स्वरुप ही बदल गया। उनमें से अब नररत्न कहा निकलते है। पालने वाले ओर पलने वाले दोनों ही उस वातारण में घुटन अनुभव करते है। जेलखाने सराय में भी लोग साथ रहते है। इसी स्तर के परिवार प्रकारान्तर से धुँआ अर दुर्गन्ध बखेरने वाले श्मशान ही बने रहते हैं। उस उल्टी स्थिति का कारण वह व्यामोह ही है, जिसमें असीम सुविधा जुटाना और प्रजनन बढ़ाना भर लक्ष्य रहता है।

प्रवाह यही है, औसत मनुष्य इसी में बहता रहता है। माँगा या बिना माँगा परामर्श इसी स्तर का मिल सकता है। जो करता ओर सोचता है वही उसका अभ्यास ओर विश्वास बन जाता है। ऐसी दशा में साथियों के परामर्श में ढर्रे पर लुढकते रहने और दिन काटते रहने से अधिक ऊँचे हो ही नहीं सकते। जो चल रहा है, जो सामने दीखता है, वह भी इसी स्तर का है। लोग अनीतिपूर्वक कमाते ओर अपव्यय में लुटाते ही द्रष्ट्रिगोचर होते है। अलास्य और विलास ही लोक रुचि का विषय है। दुर्व्यसनों ओर दुर्गुणों को प्रगतिशीलता का चिन्ह समझा जाता है। उदाहरण ढूँढने हों तो निष्ठुरता , निर्दयता और कृतघ्नता अपनाये हए स्वार्थ सिद्धि में निरत समुदाय ही इर्द गिर्द घूमता फिरता नजर आता है। यही है, वह प्रवाह जो दुर्बल मन वालों को अपने साथ घसीटता और अन्योंकी तरह बहते चलने को विवश करता है। औसत मनुष्य की यही गति ओर यी नियति है। इसका परिणाम भी स्पष्ट है। दुर्बलता, रुग्णता, उद्धिग्नता दरिद्रता, विपन्नता से हर व्यक्ति संत्रस्त है। समस्याओं और चिन्ताओं का अन्त नहीं। आश्का, अतृप्ति से हर व्यक्ति भयभीत ओर कातर बना हुआ है। निराश ओर खीज का असन्तुलन मनःक्षे़त्र को अर्ध विक्षिप्त बनाये रहता है। मरण की समीपता ओर जीवन की असफलता को साथ मिलाकर देखने पर लगता है अलस्य अवसर हाथ से चला गया। भविष्य की आशा लगाकर भी जिया जा सकता है, पर जिसे वर्तमान से भी बढ़कर भविष्य भी अन्धकारामय दीखे उसकी व्यथा का अनुमान लगा सकना भी कठिन है।

नशे की खुमारी में वस्तुस्थिति को सोच सकना तक सम्भव नहीं रहता। अदूरदर्शिता की खुमारी भी विचित्र है। उसकी तुलना में सब नशे हलके पडते हैं। माया की चर्चा जब तब होती रहती है। आत्म विस्मृति और भवबन्धनों की दःखद परिणिति की भवानकता भी विज्ञजन दर्शाते रहते है इन सबका संकेत उस उनींदी मन’स्थिति से है जो जीवन के मूल्य, महत्व और सदुपयोग के सम्बन्ध में विचार करने तक का अवसर नहीं मिलने देती।

आत्मा-ज्ञान का महत्व शास्त्रकारों और आप्त पुरुषों द्धारा समय समय पर बताया जाता रहता है इसमें न तो कुछ जादू जैसी बात है और न चमत्कारी उपलब्धियों को रहस्य है। यह सीधी सी बात इतनी ही है कि उपलब्ध अवसर की गरिमा, आत्म सत्ता की प्रचण्ड क्षमता ओर उज्जवल भविष्य की सुनिश्चित सम्भावना का गम्भीरता पूर्वक समझा जाय। प्रवाह में बहने वालों की दुर्गति को ध्यानपूर्वक देखा जाय और स्वतन्त्र चिन्तन अपना कर उज्जवल भविष्य की संरचना के लिए उठ खडे़ होना, यह ही है वह निर्धारण जिसका गुरु कृपा, ईश्वरीय अनुकम्पा साधना की सिद्धि आदि नामों से अतंकारिक वर्णन किया जाता है।

इस श्रेय पथ पर आरम्भा से एकाकी चलना पड़ता है साथियों का असहयोग, विरोध, उपहास सहने की कठिनाई तो आरम्भ से ही रास्ता रोक कर खड़ी हो जाती है। यों उनके शुभचिन्तक होने से किसी प्रकार के सन्देह की गुँजाइश नहीं है, और न उनकी ममता, आत्मीयताही कम होती है। अपने द्रष्ट्रिकोण से वे जा उचित समझते हैं, वंही सलाह देते है दूरदर्शिता क अभाव में उनके लिए वह समझना सम्भव ही नहीं होता, जिस पर अत्यन्तिक हित साधन ओर उज्जवल भविष्य निर्भर हैं। अभ्यस्त संकीर्ण स्वार्थपरता की पशु प्रवृतियाँ, प्रचलनकी परम्परा, जन जन द्धारा अपनाई जाने वाली रीति नीति और शुभ चिन्तकों का दबाव मिलकर एक ऐसा चक्रव्यूह बनता है, जिसमें से निकल सकना केवल उन्ही के लिए सम्भव होता है जो स्वतन्त्र चिन्तन और साहसिक निर्धारण के सहारे अपना मार्ग स्वयं बना सके।

मनुष्य जीवन की सफलता इसी में है कि वह उपलब्ध सौभाग्य का सदुपयोग कर सके। व्यक्तित्व का उच्चस्तरीय निर्माण सबसे बड़ा पुरुषार्थ है। जिसके सहारे ने केवल अपना वरन् अपने समय ओर सर्म्पक क्षेत्र का काया कल्प कर सकना भी बन पड़ता है। विशिष्टता ओर वरिष्ठता उपलब्ध करने के लिए इतना ही आन्तरिक परिवर्तन पर्याप्त है कि प्रवाह की अनुपयुक्तता को समझाजाय ओर उससे पृथक अपन रास्ता अपना भविष्य आप बनाने का निश्चय किया जाय।

महानता अंपनाने में उतना जोखिम, उतना कष्ट, उतना सन्तोष और उतना घाटा नहीं है जितना कि व्यामोह में संग्रस्त ओछी रीति-नीति अपनाने मे। उत्कृष्टता अपनाने में जो घाटा है उसे संयम ओर सन्तोष अपनाने भर से सहज ही पूरा किया जा सकता है। सादगी अपनाने, सन्तोष से रहने ओर व्यामोह सेबचने में इतना ही घाटा है कि चकाचौंध उत्पन्न करने वाली विडम्बना नहीं बन पाती और आकाँक्षा को गुजरे ओर कर्तव्य पालन तक सीमित रखना पड़ता है।

अमीरी की वितृष्णा में जो जितनी कमी कर सके, अहन्ता का उन्माद जो जितना घटा सके वह उसी अनुपात से अपने भीतर महानता की सत्प्रवृतियाँ विकसित होती देखेगा। कहना न होगा कि महानता का मूल्य वितृष्णाओं पर अंकुश रखने के रुप में जो चुका सकेगा वह उतना बहुमूल्य सौभाग्य खरीदेगा ऐसे दूरदर्शी न भौतिक द्रष्ट्रि से घाटे में रहते हैं ओर न आत्मिक आनन्द उपलब्ध करने से वंचित रहते है। उन्हे दुहरा लाभ है। साँसारिक द्रष्ट्रि से वे व्यामोह ग्रस्तों की तुलना में कहीं अधिक अर समुन्नत रहते है। उन्हे अपेक्षाकृत अधिक स्नेह सम्मान मिलता है। सच्चे मिंत्रो ओर सहयोगियों की उन्हें कमी नहीं रहती। साथ ही आत्ससन्तोष का लाभ अनायास ही मिलता रहता है जिसकी झाँकी मात्र पाने के लिए संसारी लोग न जाने कितना कमाते और कितना लुटाते रहते है।

अहृन्ता की तृप्ति के लिए लोक सम्मान पान के उपाय खोजे जाते है। इसके लिए फिजूल खर्ची और उदण्ड़ता का प्रदर्शन ही लोगों से बन पड़ता है। यदि इस मूर्खता से मुह मोड़ा और शालीनता तथा उदारता का उपक्रम अपनाया जा सके तो निश्चय ही उतना गहरा लोक सम्मान मिलने लगेगा जिसके सहारे आत्म गौरव का आनन्द हर घड़ी मिलता रहे।

दैवी अनुग्रह ही याचना ओर अभिलाषा अनेकों करते रहते है। वे जानते हैं कि जो अपने पुरुषार्थ से नहीं मिलता वह दैवी अनुकम्पा से मिल सकता है। इसके असंख्यो उदाहरण भी है। भक्त गाथा का प्राचीन इतिहास और वर्तमान का प्रत्यक्ष अनुभव यह बताता ह कि जो ईश्वरीय अनुकम्पा के अधिकारी बन सके, वे असाधारण उपलब्धियाँ करललगत करने में भी सफल हुए है।

साधना के चमत्कारों की आधारशिला तो उत्कृष्ट द्रष्ट्रिकोण और आदर्श चरित्र पर ही रखी गई है। ब्राह्मणतत्व में उज्जवल चरित्र और साधुता में परमार्थ परायणता की अवधारणा है। जो व्यक्तित्व को जितना परिष्कृत करता जायेगा उसके नगण्य से पूजा उपचार, भी आर्श्चयजनक चमत्कारों का आधार बनते जायेगे। उत्कृष्ट जीवन ही ईश्वरीय अनुदानों का ऋद्धि-सिद्धियों का आधारभूत कारण है, उसे जितना ज्यादा समझा जा सके उतना ही उतम है।

अशक्तों ओर पराबलम्बियों का प्रवाह में बहने के अतिरिक्त और कोई चारा नहीं। किन्तु जो जागृत ओर जीवन्त है। विवेकी ओर साहसी हैं उन्हें ईश्वर से अमानत जीवन सम्पदा का उपयोग करने सम्बन्धी सर्वोपरि महत्व के प्रश्न का समाधान करने के लिए दूरदर्शिता का ही आश्रय लेना चाहिए। जा जीवन्त ओर जागृत है उन्हें उपलब्ध अवसर का सर्वोतम उपयोग करने की बात सोचनी ओर तदनुरुप नये कदम उठाने की तैयारी करनी चाहिए। इसकेलिए आज का मुहूर्त ही सर्वश्रेष्ठ है।

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