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Magazine - Year 1980 - Version 2

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पदार्थ और प्राणियों की सामर्थ्य का उद्गम

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पृथ्वी क्या है? इसका उत्तर रसायन शास्त्री उसका रासयनिक विश्लेषण करके इतना ही कह सकते है कि यह विभिन्न पदार्थ घटकों एवं तत्वों का समुच्चय मात्र है। बढे़ ढेले कीतरह वह भी इस विशाल ब्रह्माण्ड की एक नन्ही सी इकाई भर वन कर अपना गुजारा कर रही है।

जीव विज्ञानी के लिए पृथ्वी की स्थिति अधिक जटिल और रहस्यपूर्ण है। पदार्थ और चेतन के समन्वय से बने हुए प्राणी दृष्टिगोचर तो असख्यों होते हैं, पर यह विदित नहीं होता कि जीवन का उद्गम स्त्रोत क्या है ? धरती पर भरा हुआ पदार्थ जिन घटकों से बना है, उनमें हलचल भर ले। उनमें जीवन का कोई लक्षण नहीं है। फिर यह जीवन है क्या ? आता कहाँ से हैं ? पदार्थों के साथ क्यों जुड़ता बिछुड़ता है ? प्राणियों की सत्ता पदार्थ मूलक है या चेतना मूलक है ? आदि प्रश्नों की एक सुविस्तृत श्रंखला ऐसी है। जिसके सम्बन्ध में रिचकाल से दार्शनिक एवं वैज्ञानिक माथा-पच्ची करते रहे हैं, किन्तु अभी तक किसी निर्विवाद तथ्य तक पहुँच सकना सम्भव नहीं हुआ है।

विज्ञानिकों का कहना है कि पदार्थ ही अमुक परिस्थितियों में जीवन के रुप में विकसित हो जाता है। किन्तु प्रयोगों से अभी तक इस मत की पुष्टि नहीं हुई विशुद्ध पदार्थ से किसी प्राणी का सृजन सम्भव नहीं हो सका। चेतना का जहाँ पहले से ही अस्तित्व मौजूद है उसी को घटा-बढ़ाकर रुपान्तरण समभव हो सका है। नये सिरे से एक भी जीवाणु की संरचना सम्भव नहीं हो सकी। प्रयोग क्षेत्र की इस निराशा से इस निर्ष्कष पर पहुँचना पड़ता है। कि चेतना एक स्वतन्त्र सत्ता हैं। पदार्थ उसका उपकरण है उद्गम नहीं।

अब प्रश्न यह उत्पन्न होता है कि जीवन यदि स्वतन्त्र है तो उसका धरती पर अस्तित्व किस रुप में है ध्यात्म दर्शन के समाधान अलग है। पदार्थ विज्ञानी किसी प्रत्यक्ष तथ्य के बिना सन्तुष्ट नहीं हो सकते। उनका अनुमान है कि जीवन धर्य का अनुदान है। जो पृथ्वी को अनुग्रहपूर्वक उपलब्ध हुआ है।

जीवन है क्या? इसके उत्तर में तत्व-दर्शन और विज्ञान एक प्रकार से सहमत जैसे दिखते है कि जीवन एक प्रकार का विशिष्ट विद्युत प्रवाह है जिसमें जड़ और चेतन की दोनों विशेषताएँ विद्यमान है। इसकी परिकल्पना विचारशील चुम्बकत्व के रुप में की गई है। अध्यात्म भाषा में इसी को प्राण कहा जाता रहा है। प्राण का चेतन पक्ष पदार्थ को अपने चुम्बकत्व से प्रभावित करता है, उस पर अधिकार जमाता और उपयोग करता है। इतने पर भी उसकी निजी सत्ता मौलिक एवं स्वतन्त्र है। वह पदार्थ के वशवर्ती नहीं है।

प्राण की विवेचना दार्शनिकों नपे परब्रह्म की शक्ति प्रवाह के रुप में लगभव वैसी ही की है जैसी कि विज्ञानी पदार्थ की मूल-सत्ता परमाणुओं के रुप में नहीं तरंगों एवं कम्पनों के रुप में मानते हैं किन्तु विज्ञानी प्रमाण उनका प्रत्यक्षवाद अब तक इतना ही जान सका है कि जीवन सूर्य से उतरता है और वह पदार्थ को चुम्बकत्व के रुप में और जीवनधारियों को संकल्प के रुप में उपलब्ध होता है। पदार्थो में हलचल और प्राणियों में संकल्प की गतिविधियाँ अलग-अलग हैं फिर भी उनके मध्य बहुत कुछ प्रवाह साम्य देखा जा सकता हैं।

जहाँ तक चुम्बकत्व का सम्बन्ध है उसे कई दृष्टियों से पदार्थ जगत पर छाया हुआ विशिष्ट अनुशासन कह सकते हैं। धरती की भीतरी और बाहरी गतिविधियाँ उसी पर निर्भर है। अपनी धुरी पर घूमता-कक्षा में परिभ्रमण करना-अनायास ही नहीं होता रहता। इसमें उसका वह चुम्बकत्व ही कारण है जो भीतर से गति उभारता है और उसे अग्रगामी रहने के लिए आगे धकेलता है। पृथ्वी की सूर्य परिक्रमा और उसके परमाणुओं की अन्तःसंरचना में उसी स्तर की भ्रमण चर्या का चलना यह बताता है। कि यह उसी चुम्बकत्व की करतूत है। पृथ्वी के शक्ति प्रवाहों का पर्यवेक्षण करने पर जाना जाता है कि पृथ्वी एक विशाल चुम्बक है। उत्तरी और दक्षिणी ध्रुव उसके मध्य केन्द्र हैं। यह चुम्बक ऊपरी परत पर ही छाया हुआ नहीं है वरन् उसके अन्तराल में भी भरा पड़ा है और जब भी उसे अवसर मिलता है ऊपर आकर अपने अस्तित्व का परिचय देता है।

पिछले दिनों जो ज्वालामुखी पृथ्वी पर फूटे हैं और उनके लावे में लोहे के कण बहकर जम गये हैं। उनमें चुम्बक के वह गुण विद्यमान हैं जिनसें पृथ्वी के 60000000 वर्षों तक के चुम्बकीय इतिहास का ज्ञान प्राप्त किया जा सकता है। मारशैक अलेक्जैंडर ने अपनी पुस्तक में लिखा है- भूतत्व वेत्ता जितना अधिक ज्ञात करते जाते हैं उनका यह विश्वास उतना ही पृष्ट होता जाता है कि पृथ्वी के अनेक रहस्यों का उत्तर चुम्बकत्व में निहित प्रतीत होता है।

काफी समय तक वैज्ञानिकों की यह धारणा रही है कि चुम्बत्व का केन्द्र उत्तरी तथा दक्षिणी ध्रुव है किन्तु पिछली शताब्दियों में जिन दिनों नौ सेना का तेजी से विकास हुआ समुद्रों में तैरने वाले जहाजों ने पाया कि पृथ्वी के विषुवत वृत्तीय क्षेत्र में जाने पर दिक्सूचक (कम्पास) की सुई बिलकुल सीधी सिर के बल खड़ी हो जाती है। इस तथ्य की खोज ने यह सिद्ध किया कि पृथ्वी स्वयं में एक चुम्बक है। उसके गर्भ में उत्तरी और दक्षिणी ध्रुव को जोड़ती हुई एक ऐसी चुम्बक धारा प्रवाहित होती रहती है। जिस तरह मनुष्य शरीर में उत्तरी धु्रव मस्तिष्क और दक्षिणी ध्रुव मूलाधार को सुषुम्ता शीर्षक का विद्युत चुम्बकीय जीवन प्रवाह।

पिछलें दिनों जब-जब पृथ्वी पर भयंकर चक्रवात या तूफान उमडे़ यह पाया गया कि उस समय पृथ्वी का चुम्बकीय क्षेत्र बहुत बुरी तरह से अस्त-व्यस्त हुआ। उस स्थिति में न केवल मनुष्य अपितु जीव जन्तु तक बुरी तरह प्रवाहित होते हैं। भूकम्पों की सबसे अधिक अच्छी भविष्य वाणी उस क्षेत्र के पक्षियों तथा जीव-जन्तुओं की हलचलों से मिलता है। भूकम्प आने से पूर्व पक्षियों यहाँ तक कि सर्प जीवों का पलायन इस बात की पुष्टि करता है कि पृथ्वी के चुम्बकीय क्षेत्र की सूक्ष्म हलचलें, जीवों के उस चुम्बकीय क्षेत्र को जिससे चिन्तन प्रादुर्भूत होता है प्रभावित करती है। अतएव पृथ्वी में व्याप्त चुम्बकत्व से जैव चुम्बकत्व में कोई न कोई साम्य अवश्य होना चाहिये।

इस दिशा में भूगर्भ शास्त्री गिर्ल्वट और मैक्सबेल के प्रयोगों का जिक्र करते हुये डाँ. अलेक्जैंडर मारशैक ने अपनी पुस्तक”पृथ्वी ओर अन्तरिक्ष” के पृष्ठ 121 में यह स्वीकार किया है। कि पृथ्वी के चुम्बकीय क्षेत्र पर नित्य सूर्य के किसी अज्ञात विकिरण का प्रभाव पड़ता है। यह प्रभाव जिस क्रम में घटता बढ़ता है उसी क्रम में पृथ्वी के जीवन में भी हल्के-भारी परिवर्तन होते हैं अतएव कहना न होगा कि प्रत्यक्षतः मनुष्य की, जीवधारियों की अन्तचेतना को भी सूर्य ही प्रभावित करता है।

सूर्य के सीधे अनुदान भी पृथ्वी को कम नहीं मिलते, पर उससे भी बड़ी उपलब्धि ब्रह्माण्ड किरणों की है। यह ब्रह्माण्ड किरणें यों अर्न्तगही मानी जाती हैं फिर भी उनका अनुदान पृथ्वी को सूर्य के माध्यम से ही मिलता है। बिजली उत्पादन केन्द्र से ट्रान्सफारमर और मीटरों में होती हुई चलने वाले उपकरणों तक पहुँचती हैं। इसी प्रकार ब्रह्माण्डीय किरणें भी सीधी समस्त पृथ्वी पर अनियन्त्रित रुप से बरस कर महाविनाश का खतरा उत्पन्न नहीं करतीं वरन् क्रमिक गति से भूलोक पर अवतरित होती है। यह अवतरण सर्वप्रथम ध्रुव क्षेत्र में होता है और फिर वहाँ से आवश्यकतानुसार प्राणियों और पदार्थों के लिए वितरित होता रहता है।

उत्तरी धु्रव पर दृष्टिगोचर होने वाले मेरु प्रकाश को सूर्य का प्राण, अनुदान एवं ब्रह्माण्डीय किरणों के उपयोगी अवतरण का प्रतीक प्रतिनिधि कह सकते हैं। ब्रह्माण्ड किरणों और सूर्य अनुदानों का विशिष्ट पर्यवेक्षण करने पर पृथकता रहते हुए उनके भीतर अद्भूत साम्य पाया गया है। इससे प्रतीत होता है कि ब्रह्माण्डीय किरणें धरती से सर्म्पक साधने से पूर्व सूर्य से सरोवर में स्नान कर लेती हैं और उसके रंग में रंगी हुई साड़ी पहन कर इस लोक में प्रवेश करती हैं। यदि वे निर्वस्त्र होकर बरसने लगे तो उस गुगुप्सा को सहन करना ही कठिन हो जाय।

मेरु प्रकाश ध्रुवों पर सर्वाधिक रहता है पूर्वी ग्रीनलैण्ड का वह भाग जहाँ एस्किमों लोग रहते हैं वहाँ का आकाश ही पृथ्वी के सामान्य आकाश से सर्वथा भिन्न है। वहाँ जाडे़ के दिनों में प्रायः प्रतिदिन आकाश में रंग-बिरंगे दीप्तिवलियाँ देखते ही बनती है। दर्शक इस तरह आत्म विभोर हो उठते हैं मानो वह कोई स्वप्नों का र्स्वग हो। ऐसे मेरु प्रकाश भूमध्य सागर में भी जब-तब अनायास देखने को मिल जाते हैं अलास्का उत्तर कनाडा एन्टार्कटिका उत्तरी साईबेरिया तथा नार्वे में भी यदा-कदा देखने को मिलते हैं। वह दृश्य कितना विलक्षण होता है उसका वर्णन करते हुए- रोमन इतिहास कार लिवों ने लिखा है-इस क्षण आकाश एकाएक करोड़ों अदृश्य अग्नि शिखाओं से दमकने लगा-लोग भयभीत हो उठे और आँख मूँदकर ईश्वर का भजन करने लगे। रोमन सम्राट ने तो यह समझा कि शहर में आग लग गई हैं अतएव उसने अति शीघ्र अग्नि शामक दस्ते भेज दिये। यूनानी दार्शनिक अरस्तु ने इस मेरु प्रकाश को देखकर लिखा था-आकाश में विलक्षण आकृतियाँ खाइयाँ और भीषण अन्तराल लाल लाल रंग की दूर तक फैली चादर किसी इन्द्रजाल से कम नहीं लगता थी।

मेरु प्रकाश का जब-जब सर्म्पक स्थापित हुआ ऐसी मनोरम ध्वनियाँ सुनाई दी जो अद्भूत थी। उन्हें नक्षत्रों की ध्वनियाँ मना गया है, पर उनका अध्ययन सौर सक्रियसता में ही अब तक सम्भव हो पाया है।

इस मेरु प्रकाश की संरचना के मूल में भी सूर्य ही है जिसके लिये सूर्य-संक्रान्ति काल को अध्ययन के लिये सर्वाधिक उपयुक्त पाया गया है।

मेरु प्रकाश अनेक प्रकार के होते है, प्रकाश की उद्दीप्ति, ज्वाला किरणों की चाप तथा पहियों जैसा कुछ अद्दंश्य कुछ दृश्य और कहीं-कहीं उभयनिष्ठ अर्थात् मरुस्थल की-सी बनती बिगड़ती झिलमिल। रंगे विलक्षण एकदम सफेद जैसे आतिशबाजी सुर्ख पीलापन लिये हरे-नीले, बैंगनी तथा भूरे रंग के भी। जिस समय यह अस्तित्व में आते हैं, पृथ्वी का चुम्बकीय क्षेत्र पूरी तरह अस्त-व्यस्त हो उठता हैं। उस समय वायुयानों के दिक् सूचक यन्त्र काम करना बन्द कर देते है ऐसी उड़ान को “अन्धी उड़ान” की संज्ञा दी गई है वायुयान चालक उससे हमेशा सावधान रहते हैं।

वैज्ञानिकों ने व्याख्या की है कि यह अलौकिक संरचना सूर्च के अति सूक्ष्म उत्सर्जित कणों इलैक्ट्रान तथा प्रोटानों की गति में अनायास परिवर्तन का प्रतिफल है सामान्य अवस्था में यह कण 1000 मील प्रति घण्टे की चाल चल सकते हैं जबकि असामान्य अवस्था में उनकी गति सूर्य प्रकाश की गति अर्थात् 186000 मील प्रति सेकेण्ड की गति से होती है। पृथ्वी की ओर चलते हुए वे अपने चुम्बकीय गुणों के कारण ध्रुवों की ओर मुड़ते हैं यह सामान्य प्रकाश की दिशा में हस्तक्षेप होता है, इसी कारण इस तरह के दृश्य दिखाई देने लगते हैं।

सुर्य द्वारा पृथ्वी पर बरसने वाले अनुदान का दृश्य रुप ध्रुवों का मेरु-प्रकाश और अदृश्य रुप में बरसने वाले चुम्बकत्व हैं। यह विभिन्न किरणों के रुप में धरती पर आता है और पदार्थों को विद्युत एवं प्राणियों को संकल्प का अनुदान देता है। इन अनुदानों का एक उदाहरण पराबैंगनी किरणो का है। वे ही प्राणियों के निर्वाह के लिए आवश्यक रसायन विटामिन डी. का उत्पादन करतीं तथा हानिकारक उत्पादनों को निरस्त करने में लगी रहती हैं।

सूर्य के माध्यम से धरती को जो मिलता है भविष्य में मानवी प्रयत्नों से उसमें घट-बढ़ हो सकेगी, ऐसी मान्यता है। जहाँ तक प्राण-प्रवाह का सम्बन्ध है वहाँ तो और भी बड़ी सम्भावनायें एवं आशाएँ विद्यमान हैं ब्रह्माण्डीय किरणें धरती को सीमित मात्रा में सीमित गति से प्राप्त होती हैं, पर यदि सूर्य को अनुकूल बनाया जा सके तो उसकी शिफारिस से विश्व भण्डार से इतने बडे़ अनुदान मिल सकते हैं जिससे मनुष्य सृष्टा का युवराज न रहकर स्थानापत्र भी बन सकता है। सूर्य के प्रकाश को जितनी मात्रा पूरी करने में दो दिन लगते हैं उतनी यात्रा ब्रह्माण्डीय किरणें दस मिनट में पूरी कर सकती हैं। इनकी अनुमानित गति 286000ग्10000000000 (दस अरब) इलैक्ट्रान वाल्ट मील प्रति सेकेण्ड की है। इस गति से चल सकना यदि किसी के लिए सम्भव हो तो वह समय की गति का अवरोध समाप्त कर सकता है और भूतकाल की परिस्थितियों के-उस समय के प्राणियों के साथ रह सकने का आनन्द ले सकता है। ब्रह्माण्ड के एक छोर से दूसरे छोर तक पहुँचने में उसे कुछ ही समय लगेगा। सूर्य अक्षाँश पर प्राय 27 दिन में एक बार इन किरणों को विशेष प्रभाव पड़ता है। उस दिन इस तारक को-पसीना छूटता और कँप कपी आती है।

पृथ्वी के अस्तित्व का विश्लेषण करते हुए इस निर्जीव ढेले में पाई जाने वाली अगणित विशिष्टताओं का प्रधान आधार सूर्य ही सिद्ध होता है। सूर्य ही निमित्त है। उसे भी उपलब्ध ऊर्जा ब्रह्माण्डीय किरणों से मिलाती है। इतना जानने के बाद अन्तिम निर्ष्कष तक पहुँचने का एक ही कदम शेष रह जाता है कि यह ब्रह्माण्डीय किरणें आखिर क्या हैं ? और कहाँ से आती है। इसका उत्तर देर-सवेर में यही स्वीकार करना है कि जिस प्रकार सूर्य की सप्त किरणें होती हैं और उसी प्रकार ब्रह्म की ऊर्जा तरंगे ब्रह्माण्डीय किरणों के रुप में न केवल धरती का-सूर्य का, वरन् समस्त ब्रह्माण्ड का अस्तित्व बनाये रहने एवं अग्रगामी बनने के लिए अनुग्रह पूर्वक अभीष्ट सामर्थ्य प्रदान करती है। प्राण उन्हीं से बरसता है स्वरुप ओर बल, ज्ञान और सम्वेदन उसी के अनुदान हैं।

पृथ्वी की सत्ता सूर्य का अनुदान, ब्रह्माण्डीय किरणों का वैभव समझ सकने वाले ब्रह्म सत्ता की महत्ता भी स्वीकार कर सकते हैं। शोध प्रयत्नों की सर्वोच्च स्थिति नहीं हो सकती है कि परब्रह्म से सम्बन्ध साधा जाय-उसका अनुग्रह पाया जाय और अपनी सत्ता को उसी महत्ता के अनुरुप बनाया जाय जैसी की उन क्षमताओं के महान भाण्डागार-परब्रह्म परमेश्वर की है।

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