• News
  • Blogs
  • Gurukulam
English हिंदी
×

My Notes


  • TOC
    • धर्म का मूल प्रयोजन—सत्य की शोध
    • मानव जीवन की विशिष्टता एवं सार्थकता
    • विज्ञजनों के सत्परामर्श
    • Quotation
    • आत्मा की परमात्मा से गुहार
    • इन्द्रिय लोलुपता (Kahani)
    • प्रभुदर्शन की पूर्वभूमिका
    • देवता और असुर (Kahani)
    • पुरोहित वर्ग किसी की कृपा का मोहताज नहीं
    • विलाप किस बात का
    • मनुष्य का संकल्प बड़ा है (kahani)
    • जापान क्षेत्र की “जेन” साधना
    • Quotation
    • योगाभ्यास के आरम्भिक दो चरण यम-नियम
    • बीमारों के यहाँ (Kahani)
    • सोमरस पान का ज्ञान-विज्ञान
    • Quotation
    • हमारा रहस्य मय नाभि गह्वर
    • फ्रांस और इटली में युद्ध (Kahani)
    • कामुकता का आवेश उन्माद
    • नारी का सन्देश (Sandesh)
    • शोपेन हाॅवर- जर्मनी का ब्रह्मवेत्ता
    • Quotation
    • सबसे बड़ा अजूबा मनुष्य
    • Quotation
    • इच्छाशक्ति का सुनियोजन कैसे करें?
    • मोह का व्यापक प्रेम मे परिवर्तन (Kahani)
    • अध्यात्म क्षेत्र का प्रतिभा पलायन
    • विपत्ति और परिस्थिति (Kahani)
    • जागते रहो! सावधान रहो!
    • Quotation
    • भटकते न फिरें, ध्रुव के साथ जुड़ें
    • पैर पसारना (kahani)
    • जीवन का उद्गम-सविता
    • भक्ति से बड़ा कर्तव्य (Kahani)
    • स्वप्नों में दिव्य संकेतों का सम्मिश्रण
    • प्रत्यक्ष आवश्यकताये और जंजाल (Kahani)
    • मनुष्य भी ज्वालामुखी की तरह फूटता है।
    • परिहास के साथ शालीनता भी जरुरी (Kahani)
    • मनुष्य असाधारण है, अनुपम और अद्भुत भी
    • जो मिला है वह क्या कम है? (Kahani)
    • धरती का देवता....
    • सुसंतति के सम्बन्ध में वैज्ञानिक प्रयोग
    • कर्म से प्रारब्ध बदलो (Kahani)
    • झूँठे आरोपों में गिराने की सामर्थ्य नहीं
    • Quotation
    • धरती देवताओं की क्रीड़ा भूमि
    • मृत्यु का स्मरण (Kahani)
    • अग्नि मीड़े पुरोहित
    • हमारी अद्भुत कायिक संरचना
    • “हर कुफ्र न होता तो में कहता कि तुम खुदा हो”
    • युग परिवर्तन अब दूर नहीं
    • प्रज्ञा समारोहों के साथ जुड़ी हुई अमृताशन प्रक्रिया
    • दुराव और स्वार्थ का व्यवधान (Kahani)
    • अपने से अपनी बात
    • VigyapanSuchana
    • जब अभीप्सा जागे
    • जब अभीप्सा जागे (Kavita)
  • My Note
  • Books
    • SPIRITUALITY
    • Meditation
    • EMOTIONS
    • AMRITVANI
    • PERSONAL TRANSFORMATION
    • SOCIAL IMPROVEMENT
    • SELF HELP
    • INDIAN CULTURE
    • SCIENCE AND SPIRITUALITY
    • GAYATRI
    • LIFE MANAGEMENT
    • PERSONALITY REFINEMENT
    • UPASANA SADHANA
    • CONSTRUCTING ERA
    • STRESS MANAGEMENT
    • HEALTH AND FITNESS
    • FAMILY RELATIONSHIPS
    • TEEN AND STUDENTS
    • ART OF LIVING
    • INDIAN CULTURE PHILOSOPHY
    • THOUGHT REVOLUTION
    • TRANSFORMING ERA
    • PEACE AND HAPPINESS
    • INNER POTENTIALS
    • STUDENT LIFE
    • SCIENTIFIC SPIRITUALITY
    • HUMAN DIGNITY
    • WILL POWER MIND POWER
    • SCIENCE AND RELIGION
    • WOMEN EMPOWERMENT
  • Akhandjyoti
  • Login





Magazine - Year 1987 - Version 2

Media: TEXT
Language: HINDI
TEXT SCAN


सोमरस पान का ज्ञान-विज्ञान

Listen online

View page note

Please go to your device settings and ensure that the Text-to-Speech engine is configured properly. Download the language data for Hindi or any other languages you prefer for the best experience.
×

Add Note


First 15 17 Last
मस्तिष्क में अनेकानेक क्षमताओं का निवास है। आँख, नाक, कान आदि की बनावट ऐसी है कि उनमें से स्राव भीतर से बाहर निकलते हैं। बाहर से भीतर को कोई वस्तु डाली जाए तो उसका विशेष प्रभाव नहीं पड़ता। भीतर गहराई तक प्रवेश करने की उसमें गुंजाइश नहीं है। फिर मस्तिष्क को उत्तेजित, सक्रिय, संतुलित कैसे किया जाए? इसका एक उपाय योगविज्ञान के आचार्यों ने ढूँढ़ निकाला है। वह है—तालु मार्ग द्वारा सोमरस पान। तालु को मस्तिष्क की आधार भूमि या पृष्ठ भूमि कहा गया है।

तालु की बनावट शहद की मक्खी के छत्ते जैसी है। उसमें अलग-अलग कितने ही कोष्ठक बने हुए हैं। इन सब का उपयोग है। मुख के दो प्रयोजन हैं—एक खाना, दूसरा बोलना। इन दोनों ही कामों में तालु भाग की अपनी भूमिका रहती हैं। दाँतों से सटा हुआ भाग उच्चारण में योगदान करता है। जीभ तालु की सहायता से भोजन को उलटती पलटती है। तथा बोलने में भी उस भाग की सहायता लेती है। मुख में जीभ सीधी नहीं रहती, उसकी नोक तालु से सटी रहती है। मौनकाल में प्रायः ऐसा ही देखा जाता है। तालु का पिछला भाग जहाँ ऊपर चंचुक रूप में लटका रहता है, वहाँ से पहले का थोड़ा-सा भाग ऐसा है, जो कम ही काम में आता है। इसके उपरांत तो भोजन की नली आरंभ हो जाती है। श्वास नाड़ी भी उसके साथ ही चल पड़ती है। कभी-कभी ऐसा भी होता देखा गया है कि भोजन का कुछ अंश श्वास नली में चला जाता है तो उस फँसाव को निकालने के लिए गले को बहुत जोर लगाना पड़ता है।

गले का ओरो व नेजोफेरिंक्स नामक भाग ही आगे की ओर इस स्थिति में है कि वह मस्तिष्क से अधिक संबंधित है। मस्तिष्कीय आवेशों को वाणी द्वारा कटुभाषण की प्रेरणा मिलती है। इसी प्रकार जीभ के द्वारा गरम भाषा बोलने पर मस्तिष्क उत्तेजित एवं असंतुलित हो जाता है। शरीर विज्ञान और मनोविज्ञान ने भी इस अध्यात्म मान्यता की पुष्टि की है कि यह क्षेत्र मस्तिष्क से अन्य अंगों की तुलना में अधिक संवेदनशील है।

सहलाने, थपकी देने से, राहत मिलती है और नींद आ जाती है। पैर दबाने से, वाइब्रेशन थेरेपी से एवं एक्युप्रेशर चिकित्सा से भी ऐसा ही होता है। तालु के उपरोक्त स्थान को मस्तिष्क के पैर कहा जा सकता है। वैज्ञानिकों ने इस स्थान को राथकेज पाउच नाम दिया है व कहा है कि पिट्यूटरी यहीं से विकसित होता है। इस स्थान को सहलाने से तनाव दूर होते हैं और मानसिक संतुलन ठीक करने में सहायता मिलती है। इसके अतिरिक्त मनःक्षेत्र में जो महत्त्वपूर्ण शक्तियाँ काम करती हैं उनकी विकृत स्थिति का संतुलन ठीक करने में सहायता मिलती है। स्वाभाविक है कि यह कार्य पिट्यूटरी के उत्तेजन से संभव हो पाता है।

इतना ही नहीं जिह्वा के उस क्षेत्र में ऐसा दिव्य रस मिलता है जो उसके वचनों में मिठास भरता है। स्वाद संबंधी विकृति को सुधारता है।

आध्यात्मिक विद्या के जानकर यह भी कहते है कि इस क्षेत्र से यदि स्रावों की तनिक-सी मात्रा भी उपलब्ध की जा सके तो मस्तिष्क का विवेक बढ़ता है और शरीर तथा मन के बीच पाई जाने वाली विकृतियों का भी समाधान होता है।

खेचरी मुद्रा उस साधना का नाम है, जिसमें जीभ को पीछे की ओर मोड़कर तालु के पिछले भाग से सटाया जाता है और फिर उसे धीरे-धीरे सहलाया जाता है। इसके लिए जिह्वा को अधिक लंबी, अधिक कोमल बनाने का पूर्ण अभ्यास करना पड़ता है।

पिछली पीढ़ी के साधकों को उनके मार्गदर्शक इस प्रयोजन के लिए पहले जिह्वा दोहन की क्रिया कराते थे। इस संदर्भ में काली मिर्चों को पीस कर जीभ के ऊपर और नीचे लेप किया जाता था। जब मुँह से पानी का स्राव होने लगता था, तब जीभ को थोड़ा-थोड़ा करके आगे खींचने, लंबा करने का प्रयास चलता था, दुधारू पशुओं के थन जिस प्रकार नीचे व नीचे और दबाए जाते हैं, वही व्यवहार जिह्वा के साथ किए जाने के कारण इसे दोहन क्रिया कहते हैं। इसका उद्देश्य यह था कि जीभ अपेक्षाकृत लंबी हो जाए और तलु के पिछले भाग को उसकी नोक छूने लगे। लंबाई पर्याप्त बढ़ गई या नहीं, इसकी परीक्षा इस प्रकार की जाती थी कि जीभ बाहर निकालने पर वह नासिका के अग्रभाग को छूने लगे।

इतनी सफलता मिलने पर तालु को सहलाने से जीभ को दिव्य रसास्वादन मिलता है। वह स्वाद—मिठाई, खटाई, जैसा नहीं, वरन् जीभ में आनंदप्रद उत्तेजना देने जैसा होता है। उसमें रस आता है और देर तक उस क्रिया को करते रहने का मन करता है। तांत्रिक प्रसंगों में आलंकारिक रूप में इसकी तुलना काम सेवन से भी दी गई है। जिह्वा को शिश्न और तालु गह्वर को योनि बताया गया है।

पुरातन मान्यताओं में अब की जन साधारण की शारीरिक और मानसिक परिस्थितियों को देखते हुए जिह्वा दोहन जैसे कार्य नहीं करने चाहिए। अब हठयोग की अधिकांश क्रियाओं को प्रकृति विरोधी और हानिकारक ठहराया जा रहा है। नेति, धौति, वस्ति, वज्रोली जैसी क्रियाओं की उपयोगिता-अनुपयोगिता के संबंध में अब अच्छा खासा विवाद उठ खड़ा हुआ है और शरीर शास्त्री उस प्रकार का जोखिम न उठाने की सलाह दे रहे हैं। इस विवादास्पद स्थिति में जिह्वा-दोहन की बात को छोड़ भी दिया जाए तो भी संकल्प बल के सहारे जिह्वा को दिव्य रसास्वादन की अनुभूति हो सकती है। और मस्तिष्क के उपयोगी भाग को अधिक सक्रिय एवं संतुलित बनाया जा सकता है।

इन दिनों खेचरी मुद्रा के साधकों के लिए इतना ही पर्याप्त होगा कि वे इस क्रिया को करने से पूर्व अच्छी तरह मुँह साफ कर कुल्ला कर लें, इसके लिए प्रयुक्त किए जाने वाले पानी में एक चुटकी नमक एक लोटे के हिसाब से डालकर उस तनिक खारी पानी से दस बीस कुल्ले गरारे के साथ कर लेने चाहिए। इससे मुँह में कहीं लगी छिपी गंदगी साफ हो जाएगी और तालु के अधिक संवेदनशील भाग तक जिह्वा पहुँचाने में किसी गंदगीजन्य संकट की आशंका न रहेगी। इस स्थिति में जिह्वा के अग्रभाग से तालु के पिछले भाग का अत्यन्त धीमा स्पर्श किया जाए। सहलाने की क्रिया ऐसी न हो, जिसमें किसी प्रकार रगड़ पड़ने और वहाँ की त्वचा पर असाधारण दबाव पड़ने की आशंका हो।

इस क्रिया के साथ भाव संवेदना का सम्मिश्रण आवश्यक है। यह कल्पना करनी चाहिए कि जिस प्रकार मधुमक्खियों के छत्ते से शहद टपकता है वैसा ही दिव्य रस का आस्वादन करने का अवसर जिह्वा को मिल रहा है। यह शहद जैसा मीठा न होकर सोमरस जैसा आध्यात्मिक है। भावना प्रधान है। यह समूचे शरीर में उत्साह,उल्लास की लहर दौराता है। इसी के साथ-साथ यह चिंतन भी करना चाहिए कि सहस्रार के इस अधोभाग को उत्तेजना मिलने से समूचे मस्तिष्क क्षेत्र को राहत मिल रही है। समर्थता, सक्रियता का दौर बन रहा है।

रगड़ से ऊष्मा उत्पन्न होती है। विशेषतया जो भाग आमतौर से निष्क्रिय रखे जाते हैं, उनका स्पर्श गुदगुदी उत्पन्न करता है। गरदन, बगल, जननेंद्रिय जैसे स्थानों को हिलते जुलते रूप से स्पर्श करने पर गुदगुदी स्तर की उत्तेजना उत्पन्न होती है। इसी आधार पर खेचरी मुद्रा के भी वे लाभ मिलते हैं, जिनका योग ग्रंथों में विस्तारपूर्वक विवरण मिलता है।

आरंभ पाँच मिनट से करते हुए हर महीने एक-एक मिनट बढाते हुए अंतिम अवधि पंद्रह मिनट तक पहुँचा देनी चाहिए। इससे अधिक करना प्रारंभिक स्थिति में नुकसान पहुँचाने वाला होता है।


First 15 17 Last


Other Version of this book



Version 2
Type: TEXT
Language: HINDI
...

Version 1
Type: SCAN
Language: HINDI
...


Releted Books


Articles of Books

  • धर्म का मूल प्रयोजन—सत्य की शोध
  • मानव जीवन की विशिष्टता एवं सार्थकता
  • विज्ञजनों के सत्परामर्श
  • Quotation
  • आत्मा की परमात्मा से गुहार
  • इन्द्रिय लोलुपता (Kahani)
  • प्रभुदर्शन की पूर्वभूमिका
  • देवता और असुर (Kahani)
  • पुरोहित वर्ग किसी की कृपा का मोहताज नहीं
  • विलाप किस बात का
  • मनुष्य का संकल्प बड़ा है (kahani)
  • जापान क्षेत्र की “जेन” साधना
  • Quotation
  • योगाभ्यास के आरम्भिक दो चरण यम-नियम
  • बीमारों के यहाँ (Kahani)
  • सोमरस पान का ज्ञान-विज्ञान
  • Quotation
  • हमारा रहस्य मय नाभि गह्वर
  • फ्रांस और इटली में युद्ध (Kahani)
  • कामुकता का आवेश उन्माद
  • नारी का सन्देश (Sandesh)
  • शोपेन हाॅवर- जर्मनी का ब्रह्मवेत्ता
  • Quotation
  • सबसे बड़ा अजूबा मनुष्य
  • Quotation
  • इच्छाशक्ति का सुनियोजन कैसे करें?
  • मोह का व्यापक प्रेम मे परिवर्तन (Kahani)
  • अध्यात्म क्षेत्र का प्रतिभा पलायन
  • विपत्ति और परिस्थिति (Kahani)
  • जागते रहो! सावधान रहो!
  • Quotation
  • भटकते न फिरें, ध्रुव के साथ जुड़ें
  • पैर पसारना (kahani)
  • जीवन का उद्गम-सविता
  • भक्ति से बड़ा कर्तव्य (Kahani)
  • स्वप्नों में दिव्य संकेतों का सम्मिश्रण
  • प्रत्यक्ष आवश्यकताये और जंजाल (Kahani)
  • मनुष्य भी ज्वालामुखी की तरह फूटता है।
  • परिहास के साथ शालीनता भी जरुरी (Kahani)
  • मनुष्य असाधारण है, अनुपम और अद्भुत भी
  • जो मिला है वह क्या कम है? (Kahani)
  • धरती का देवता....
  • सुसंतति के सम्बन्ध में वैज्ञानिक प्रयोग
  • कर्म से प्रारब्ध बदलो (Kahani)
  • झूँठे आरोपों में गिराने की सामर्थ्य नहीं
  • Quotation
  • धरती देवताओं की क्रीड़ा भूमि
  • मृत्यु का स्मरण (Kahani)
  • अग्नि मीड़े पुरोहित
  • हमारी अद्भुत कायिक संरचना
  • “हर कुफ्र न होता तो में कहता कि तुम खुदा हो”
  • युग परिवर्तन अब दूर नहीं
  • प्रज्ञा समारोहों के साथ जुड़ी हुई अमृताशन प्रक्रिया
  • दुराव और स्वार्थ का व्यवधान (Kahani)
  • अपने से अपनी बात
  • VigyapanSuchana
  • जब अभीप्सा जागे
  • जब अभीप्सा जागे (Kavita)
About Shantikunj

Shantikunj has emerged over the years as a unique center and fountain-head of a global movement of Yug Nirman Yojna (Movement for the Reconstruction of the Era) for moral-spiritual regeneration in the light of hoary Indian heritage.

Navigation Links
  • Home
  • Literature
  • News and Activities
  • Quotes and Thoughts
  • Videos and more
  • Audio
  • Join Us
  • Contact
Write to us

Click below and write to us your commenct and input.

Go

Copyright © SRI VEDMATA GAYATRI TRUST (TMD). All rights reserved. | Design by IT Cell Shantikunj