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Magazine - Year 1987 - Version 2

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हमारा रहस्य मय नाभि गह्वर

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'नाभि' पेट के मध्य अवस्थित एक भ्रमर चक्र जैसी गह्वर है। उसकी बड़ी आयु में कुछ विशेष उपयोगिता प्रत्यक्ष रूप से दृष्टिगोचर नहीं होती, पर सूक्ष्म विज्ञान के आधार पर उसकी जाँच पड़ताल की जाए तो यह अपने ढंग का ऐसा विलक्षण अंग है, जिसके साथ अनेकों भौतिक और आध्यात्मिक प्रयोजन जुड़े हुए हैं।

सौंदर्य कला के पारखी नारी की नाभि पर अश्लील कुदृष्टि डालते हैं और उसे गुह्यांगों का शीर्ष भाग मानते हैं। नाभि पर दृष्टि रखी जाए तो समीपवर्ती एवं संबंधित होने के कारण कामुक चिंतन उभरने लगता है। इसलिए शीलवान कुलों की वयस्क नारियों को सभ्यता के अन्यान्य प्रसंगों के साथ यह भी सिखाया जाता है कि वे पेट को ढक कर रखा करें। प्रदर्शन करने पर शिष्ट मर्यादा की उपेक्षा समझी जाती है और इस गलतफहमी से अनाचार परक कई प्रकार के झंझट खड़े होते हैं।

भ्रूण जब गर्भावस्था में होता है तो वह माता के शरीर के साथ जुड़ा रहता है। इसी नलिका के माध्यम से माता का रक्त, मांस, शिशु के शरीर में पहुँचता है। उसे पाकर वह बिंदु कलल अपने आप की अभिवृद्धि करता चलता है। प्रसव काल में भी यह नलिका शिशु के साथ बाहर आती है तब उसे काटकर माता और बच्चे के मध्यवर्ती संबंध सूत्र को अलग किया जाता है। इससे दोनों को पृथक इकाई के रूप में अपना-अपना कार्य अपने बलबूते करने का अवसर मिलता है। बच्चे के पेट में रहने तक माता को भी आहार विहार की अत्यधिक सावधानी रखनी पड़ती है ताकि उदरस्थ शिशु को किसी प्रकार की क्षति न पहुँचे। इस सतर्कता से जननी को प्रसव के उपरांत छुट्टी मिल जाती है। बच्चा भी हर बात के लिए माता पर निर्भर न रह क्रमशः अधिकाधिक स्वावलंबी बनता जाता है। इसलिए नाभि को माता से जोड़ने वाली नली का अंबलाइकल कार्ड का काटना एक प्रकार की हलकी-सी युक्ति है। इसमें दोनों के दायित्व बँटते हैं।

रक्त नलिकाएँ यों प्रत्यक्षतः हृदय के साथ जुड़ती हैं। वहीं से समस्त शरीर को रक्त भेजने और वापस लेकर साफ करने की प्रक्रिया चलती है।यह संचार मार्ग जन्म लेने के उपरांत विकसित होता है। इससे पूर्व नाभि नलिका से ही शिशु शरीर की रक्त नलिका  माता के साथ जुड़ती और पोषण प्राप्त करती है। इसीलिए आयुर्वेद शास्त्र में सोलर प्लेक्सस की स्थली नाभि को ही नाड़ी केंद्र माना गया है।

बड़े होने पर भी नाभि निष्क्रिय नहीं होती है, वरन् महाप्राण में से प्राण खींच कर शरीरगत क्षमताओं का परिपोषण करती रहती है। नासिका के द्वारा वायु का आवागमन होता है, उसी प्रकार नाभि के द्वारा विश्वव्यापी प्राण प्रवाह के साथ संबंध जुड़ता है। कुंडलिनी का उद्गम मूलाधारचक्र है। उसे गुदा और जननेंद्रिय की सीध में जाना जाता है। पर उसका उद्गम छः अंगुल ऊँचाई पर नाभि की सीध में है। मूलाधार को जो अपने कार्य संचालन के लिए ऊर्जा उपलब्ध होती हैं। वह नाभि द्वारा ही बाहर से भीतर तक पहुँचती है। गर्भ का परिपोषण, शुक्र और डिंब के परिपाक में नाभि की अपनी महत्त्वपूर्ण भूमिका है।

श्वास नासिका द्वारा शरीर में भीतर प्रवेश करती है। इससे आगे बढ़कर वह नाभिचक्र के अन्तःक्षेत्र से टकराती है और फिर समस्त शरीर की कोशाओं को प्राण चेतना देने के लिए बिखर जाती है। श्वास आघात से नाभि क्षेत्र में भी एक अत्यंत धीमी धड़कन चलती है। इसलिए उसे दूसरा हृदय भी कहा गया है। यह सारा वर्णन स्थूल एनाॅटामी की भाषा में नहीं, सटलर एनाॅटामी  के माध्यम से समझा जाना चाहिए।

सूक्ष्मशरीर में तीन ग्रंथियाँ प्रमुख हैं। मस्तिष्क के मध्य भाग ब्रह्मरंध्र में ब्रह्म ग्रंथि, दोनों पसलियों के मिलन स्थान पर हृदयचक्र के स्थान पर विष्णु ग्रंथि, नाभि चक्र में मूलाधार से जुड़ी हुई रुद्र ग्रंथि। यहाँ ग्रंथियों का तात्पर्य रत्न-राशि को किसी पोटली में रख कर गाँठ बाँध लेने जैसा है। यह तीनों ही तीनों लोकों में कही भी उपलब्ध न होने वाली संपदाएँ हैं। साधारणतया यह गांठ मजबूती के साथ बँधी रहती हैं। किंतु इनमें से आवश्यकतानुसार वैभव और वर्चस्व खोजा एवं निकाला जा सकता है। ऋद्धि सिद्धियों की आवश्यकतानुसार इसी में से पूर्ति की जा सकती है। सर्वविदित है कि मस्तिष्क में अवस्थित ब्रह्मग्रंथि ज्ञान की, हृदयस्थित विष्णु ग्रंथि वैभव की और नाभि स्थित रुद्रग्रंथि पराक्रम की अधिष्ठात्री है। इन विभूतियों से संपन्न होने के लिए त्रिविध ग्रंथियों के बेधन का विशिष्ट विधान है।

चर्चा यहाँ नाभिग्रंथि की हो रही है। उसका प्रखरीकरण करने के लिए मूलबंध, उड्डियान बंध और जालंधर बन्ध जैसे उपक्रम अपनाने पड़ते हैं। उन विधियों को किसी अनुभवी के संरक्षण में ही सीखा जा सकता है। पुस्तकों में उन्हें कार्यान्वित करने की विधियाँ छपी हैं। पर उस आधार पर करने लगने की अपेक्षा यही उत्तम है कि जानकार के समीप या संरक्षण में उन्हें क्रियान्वित किया जाय। थोड़ी भी भूल होने से उलटे परिणाम की आशंका रहती है।

नाभि क्षेत्र को सजग समर्थ बनाए रहने के लिए कई उपयोगी अभ्यास हैं। उनमें सबसे सरल यह है कि चित लेटकर पेट की यथा संभव अधिक से अधिक फुलाया और कुछ रुक-रुककर सिकोड़ा जाए। इससे उस क्षेत्र का आकुंचन प्रकुंचन होने से निष्क्रियता दूर होती है और रक्त संचार में गतिशीलता आती है। साथ ही उस क्षेत्र से संबंधित छोटे बड़े अवयवों पर उपयोगी प्रभाव पड़ता है।

शक्ति ग्रंथों में मूलाधार के सदृश नाभि गह्वर में शक्ति का, दुर्गा का निवास माना गया है और कहा गया है कि इस गुहा में महाशक्ति अदृश्य रूप में निवास करती है। साथ ही उनकी सहचरी 64 योगिनियाँ भी सेवारत रहती हैं। इस स्थान पर ध्यान करने से भगवती की सिद्धि अपेक्षाकृत जल्दी होती है।

योग शास्त्र में 'नाभिचक्र काम व्यूह ज्ञानम्' अर्थात् नाभि चक्र में ध्यान करने से काम क्षेत्र के सभी रहस्यों की जानकारी मिलती है। विदित होता कि किसकी काम शक्ति में क्या गुण दोष हैं। साधक अपने संबंध में तथा किसी दूसरे के काम क्षेत्र के संबंध में आवश्यक जानकारी प्राप्त कर सकता है। यह ज्ञान ऐसा है जिसके आधार पर सुसंतति का उत्पादन ही नहीं, देव मानवों का अवतरण भी संभव हो सकता है।

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