हमारी अद्भुत कायिक संरचना
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मानव शरीर की आधारभूत इकाई है जीवकोष (बायोलॉजिकल सेल)। शरीर में प्रायः साठ अरब के लगभग कोशिकाएँ हैं। प्रत्येक कोश हजारों पॉवर स्टेशन, परिवहन संस्थान एवं संचार संस्थान की मिली-जुली व्यवस्था के रूप में एक - सुसंचालित बड़ा शहर हैं। यहाँ कच्चा माल आयातित होता है, नया माल तैयार किया जाता है। तथा अवशिष्ट मल पदार्थों को निकाल फेंकने की गतिविधियाँ भी सम्पादित होती हैं। एक समर्थ अनुशासन पूर्ण प्रशासन की झाँकी इस इकाई के प्रतिपल के जीवन व्यापार में देखने को मिलती हैं।
जीव कोश इतने सूक्ष्म होते हैं कि एक करोड़ सेल्स आसानी से पिन के सिरे पर बैठ सकते हैं। य सूक्ष्म दर्शक यंत्र की सहायता से ही देखे जा सकते हैं। विस्तार से देखना हो तो इलेक्ट्रान माइक्रोस्कोप का आश्रय लेना होगा। कोश (सेल) की तुलना में सारे शरीर पर दृष्टिपात करें तो वह किसी सौर मण्डल या ब्रह्माण्ड से कम विलक्षण और विराट् नहीं लगेगा। इस तरह पिण्ड व ब्रह्माण्ड की एकात्मता की बात प्रमाणित होती है।
हर जीव कोश में साइटोप्लाज्म जैसी एक बड़ी झील होती है। जिसमें विभिन्न शक्ति केन्द्र तैरते रहते हैं। सतत् इसमें हलचल होती रहती है। माइट्रोकांड्रिया, वैक्योल्स, एण्डोप्लाज्मिक, रेटीकूलम, गाँल्गी बाँडीज जैसी महाशक्तियाँ इस झील में ही अवस्थित होती है। नाभिक (न्यूक्लियस) एवं उसके अन्दर की दुनिया अपने आप एक पूरी सृष्टि है। माता पिता से बच्चों में स्थानान्तरित गुणों की शक्ति को डिऑक्सी, टाइबो न्यूकलिक एसिड (डी.एन.ए.) कहते हैं जो नाभिक में पाए जाने वाले गुण सूत्रों के घटक हैं। इसे वास्तु - शिल्पज्ञ डिजाइनर या अर्टिटेक्ट कह सकते हैं, जो कोशीय अवयवों को यह बताता है कि कैसा व्यवहार करना, क्या बनना, क्या स्वीकार करना व किसे नकार देना। पर बिल्डिंग कांट्रेक्टर की भूमिका आर.एन.ए निभाता है। सैकड़ों विभिन्न प्रकार के प्रोटीन घटकों के निर्माण का डिजाइन डी.एन.ए. की केंचुली में छिपा होता है।
जीवकोषों का पाव स्टेशन है- माइट्रोकांड्रिया। अति सूक्ष्म आकार की ये इकाइयां ईंधन (शक्कर) को जलाकर ऊर्जा उत्पन्न करती हैं। एवं अवशिष्ट (राख) को छोड़ देती हैं जो कार्बनडाइ आक्साइड एवं पानी के रूप में होता है। इस जटिल रासायनिक प्रक्रिया के परिणाम स्वरूप एडिनोसिन ट्राइ फास्फेट (ए.टी.पी.) उत्पन्न होता है, जो कि सर्वभौम ऊर्जा श्रोत है। हर गतिविधि चाहे पलक झपकाने-छाती फूलने, हृदय धड़कने की हो, ऊर्जा की माँग करती है। निद्रा के लिए मस्तिष्क को ऊर्जा की आवश्यकता होती है। स्वप्न बिना ए.टी.पी. के सम्भव नहीं हैं। शरीर में सतत् घुमंतू 5 लाख सेल (रक्त कण) परिव्राजक धर्म की जिम्मेदारी निभाते हैं। सम्भवतः इसी कारण प्रकृति ने स्वयं के उत्पादन के झंझटों से इन्हें मुक्त कर दिया है। ये अपना काम कर बंधन्मुक्त होते चले जाते हैं, नये बनते चले जाते हैं।
हृदय एक शक्तिशाली पम्प के रूप में अविरल गति से रक्त को प्रवाहित किये रहता है। शरीर का यह शक्ति स्रोत आजीवन एक पल को विश्राम किये बिना काम करता रहता है। आराम इसके लिए मौत है। 24 घन्टे कार्य रत बना रहने पर न गरम होता है, न घिसावट आती है, न कल पुर्जे बदलने की आवश्यकता अनुभव होती है। यदि इसी प्रकार का धातु का कोई पम्प लगा दिया जाता तो कितनी बार उसके कल पुर्जे बदलने पड़ जाते और कार्य में गतिरोध होता। किन्तु 250 ग्राम वजन का माँस पिण्ड प्रतिदिन छियानवे हजार किलोमीटर लम्बी रक्तवाहनियों में रक्त संचार बनाये रखता हैं।
कितना विचित्र, विलक्षण है यह मानवी काया का तंत्र? यदि तनिक भी हमने इस जटिलता व इसे बनाने वाले कार्य-कौशल सम्पन्न सृष्टा की सामर्थ्य का अनुमान लगाया होता तो कभी उसकी सत्ता को न नकारा होता। आस्तिकता का प्रथम पाठ यहीं से आरम्भ होता है।

