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Magazine - Year 1987 - Version 2

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इच्छाशक्ति का सुनियोजन कैसे करें?

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आधुनिक प्रगतिशीलता का प्रतिपादन है कि मनुष्य की उत्कंठा, अभिलाषा, इच्छा, जिस दिशा में जितनी प्रबल होगी, उसे उतना ही उस क्षेत्र में आगे बढ़ने का अवसर मिलेगा। बुद्धि काम करेगी। योजना बनेगी। साधन जुटेंगे और सहयोगी मिलेंगे। फलतः जो चाहा गया है उसके अनुरूप बानिक बनता चला जाएगा। प्रवाह चल पड़ने पर मंजिल तक पहुँचने में सुविधा होती है। सफलता प्राप्त होने की परिस्थितियाँ निकट आती जाती हैं।

ऐसी ढेरों पुस्तकें इन दिनों छपी हैं, जिनमें इच्छाशक्ति का महत्त्व और माहात्म्य उदाहरणों समेत विस्तारपूर्वक बताया गया है। भौतिक क्षेत्र में जिनने भी, जिस प्रकार की भी, उन्नति की है, उनके पास आरंभ से इच्छित प्रसंग की जानकारी तथा सुविधा भले ही न रही हो, पर उत्कंठा ने कदम उठाए तो प्रतिकूलताएँ अनुकूलता में बदलती चली गईं। अपने स्वभाव के अन्य सहचर भी मिल जाते हैं। उन्हें भी मिले और मिल−जुलकर खोजने तथा करने में मार्ग और भी अधिक सरल हो गया।

आवश्यक नहीं कि सभी महत्त्वाकांक्षी अपनी कामनाएँ पूरी कर ही लेते हों, पर इतना आवश्यक है कि अंतर की अकुलाहट रास्ता वहाँ भी बना लेती है जहाँ वह आरंभ में रुका हुआ प्रतीत होता था। इच्छा शक्ति को मानवी अंतराल की ऊर्जा माना गया है। उसके कारण शक्ति मिलती है। गरमी आती है और हलचल मचती है। यह उत्तेजना निरर्थक नहीं जाती। कुछ न कुछ कर ही गुजरती है। इस प्रतिपादन के पक्ष में अनेक प्रमाण प्रस्तुत किए जाते हैं। ढूँढ़ने पर वे अपने इर्द-गिर्द ही ढेरों मिल जाते हैं। अस्तु कथन, प्रतिपादन और प्रोत्साहन में अभिलाषी लोगों को इसकी स्वीकृति में आपत्ति भी नहीं होती।

यहाँ एक नया प्रश्न उत्पन्न होता है कि महत्वाकांक्षा की दिशाधारा क्या हो? आमतौर से लोग विलास, वैभव और बड़प्पन प्रदर्शन के आकांक्षी पाए जाते हैं। मन की जैसी बनावट है और बहुजनों को जैसा करते देखा जाता है, उसी का अनुकरण करने की अपनी भी इच्छा होती है। दूसरों को समृद्ध, संपन्न देखकर अपना भी मन करता है कि ऐसा ही सुयोग अपने को भी क्यों न मिले? परामर्श दाता मिल जाने पर भी अधिकांश ऐसे होते हैं जो सरल शुभेच्छा से प्रेरित होकर ऐसे ही परामर्श देते हैं, जिनसे सुखी-समृद्ध होने तथा बड़ा आदमी कहलाने का श्रेय मिले।

आवेश धीमी गति से चलता है, तब तक तो न्याय, विवेक और औचित्य का अंकुश बना रहता है और उसी सीमा तक उत्कर्ष की इच्छा की जाती है, जहाँ तक अन्याय अपनाने और अपराध करने का अवसर न आए। पर बाँध महत्त्वाकांक्षाओं के प्रबल होते ही दरारें देने, रिसने लगता है। एक स्थिति वैसी भी आती है कि मर्यादाओं और वर्जनाओं का बाँध पूरी तरह टूट जाता है और दुष्टता, भ्रष्टता अपनाने में कोई संकोच नहीं लगता। बड़प्पन मिलता रहे, किंतु साथ ही बदनामी होती रहे, घृणा-तिरस्कार की वर्षा होती रहे तो जो आनंद प्रतिभाशिलता में सोचा गया था, वह घटने और मिटने लगता है। बड़प्पन की अनुभूति बदनामी से हल्की नहीं होती, भारी ही पड़ती है।

आमतौर से कामना धन, वैभव, बड़प्पन और प्रदर्शन की होती है। इन्हें उपार्जित करके मनुष्य सोचता है कि वह असंख्यों से ऊँचा हो गया। लोग इसे प्रबल पुरुषार्थ और चातुर्य-कौशल का प्रतिफल मानेंगे और सौभाग्यशाली भी कहेंगे। पर देखा गया है कि वैसा होता नहीं। मित्र, पड़ोसियों और संबंधियों में से हर एक के सामने अपनी अपनी समस्याएँ हैं। उनका मन पूरी तरह उन्हीं को सुलझाने में रहता है। दूसरों की ओर रास्ता चलती नजर ही डाली जाती रहती है। किसी के बड़प्पन का इतिहास पढ़ने और धन कमाने की सफलता को सराहने के लिए किसके पास फालतू समय खाली होता है। दुनिया में एक से एक बढ़कर सुसंपन्न और प्रगतिशील पड़े हैं। इनकी विरूदावली गाने में कौन समय निकाले?

फिर यह समय ईर्ष्याप्रधान भी हो गया है। किसी की बढ़ोत्तरी देखकर लोग प्रसन्न नहीं होते, वरन् जलते हैं। ईर्ष्या करते हैं। चोर, बेईमान बतलाकर भर्त्सना करते हैं और अवसर मिलता है तो नीचा दिखाने में भी नहीं चूकते। एक दूसरे की प्रशंसा स्वार्थवश ही की जाती है; अन्यथा निंदा, उपहास, छिद्रान्वेषण करना ही इन दिनों का आम रिवाज है। धन के अनावश्यक संग्रह से उसे झपटने वाले, अपने को उत्तराधिकारी समझने वाले, चापलूसी की कीमत चाहने वाले इस फिकर में रहते हैं कि इस भंडार में से जितनी जल्दी जितना ले भागा जाए। उसके लिए कोई पक्ष या विपक्ष का कौतुक खड़ा किया जाए। जो प्रशंसा से काबू में न आएँ, उनके सामने भय, आतंक का कोई ऐसा खेल खड़ा किया जाए, जिससे डरकर वह कुछ उगले और संपदा का एक भाग उसे भी दे। ऐसे लोगों के षड़यंत्र कई बार बड़े दुरूह होते हैं और उनकी चोट कई बार बड़ी करारी बैठती है। संपन्नता, बड़प्पन, और वाहवाही लूटने की ललक में एक खराबी यह है कि वह जितना परिश्रम कराती, जितना कुचक्र रचाती हैं, उसका एक छोटा अंश भी अपने निज के काम नहीं आता। जमाखोरी का अधिकांश अपव्यय में उड़ जाता है। चमचे, चापलूस मूल्य से नहीं खरीदे जाते। वे हर घड़ी कुछ चाहते हैं। आड़े वक्त पर तो अपनी तथाकथित वफादारी की पूरी कीमत वसूल लेते हैं। इस प्रकार की समस्याओं में से कुछ तो उनकी बुनी हुई या खड़ी की हुई ही होती हैं।

जो पैसा पूरी ईमानदारी और मेहनत से कमाया जाता है, उसी का सदुपयोग भी बन पड़ता है, अन्यथा उसमें से अधिकांश अपव्यय में चला जाता है। ठाठ बाट खड़ा करना कम खर्चीला नहीं है। बातूनी मित्रों को साथ रखना हो और उनके मुँह प्रशंसाएँ सुननी हों तो इसकी कीमत चुकाने में भी निरंतर उनका मुँह मीठा करना पड़ता है। बड़प्पन लूटने के लिए अपव्यय आवश्यक है। यह अपव्यय दुर्व्यसनों और कुकर्मों में ही होता है। मुक्त हस्त से लूटने वालों को असंयमजन्य अनेकों आधि व्याधियाँ होती हैं। पेट खराब होने से लेकर अनिद्रा जैसे अनेकों रोग घेरते हैं और दवा दारू में, महंगी परिचर्या में, ढेरों खर्च हो जाता है। नशेबाजी, व्यभिचार, यारबाजी, आवारागर्दी जैसे दुर्व्यसन उस फालतू कमाई का अधिकांश अपव्यय करा देते हैं जो भड़काई गई महत्वाकांक्षाओं की पूर्ति के लिए छल बलपूर्वक इकट्ठा किया गया था।

महत्त्वाकांक्षाओं का चालू अर्थ अधिकाधिक मात्रा में धन, वैभव समेटना और लोगों पर अमीरी की, चतुरता की छाप डालना है। इस उद्देश्य की पूर्ति के लिए समय, श्रम, बुद्धिबल और मनोबल को दाँव पर लगाना पड़ता है। इतना ही नहीं, नीति मर्यादा तक को तिलांजलि देनी पड़ती है। इतना कर गुजरने में जिंदगी खपा  देने पर भी लेखा-जोखा लेने पर प्रतीत होता है कि पल्ले कुछ नहीं पड़ा। जो कमाया गया था, उसे मसखरे उड़ा ले गए।

महत्वाकांक्षाओं की सही दिशा वह है जिसमें आत्मगौरव बढ़ाने और लोक मंगल के लिए कुछ कर गुजरने की उमंग उठती है। संसार में अगणित ऐसे महापुरुष हुए हैं, जिनकी चरित्र- निष्ठा और सेवाभावना चिरकाल तक असंख्यों के लिए अभिनंदनीय और अनुकरणीय बनी रही है। सेवा और सुधार के लिए सदा ही माँग रहती है। पिछड़ों को उठाने और भटको को राह लगाने की आवश्यकता हर समय हर क्षेत्र में अनुभव की जाती है। इस संदर्भ में अवांछनीयताओं से जूझना और सदाशयता के लिए पथ प्रशस्त करना पड़ता है। यह सब तो करना ही होता है, दूसरों को भी उसी राह पर चलने के लिए एड़ी छोटी का पसीना एक करना पड़ता है। यह उसी से बन पड़ेगा जो अपनी व्यक्तिगत आकांक्षाएँ एवं आवश्यकताएँ कम रखे। स्वल्प संतोषी बन कर ‘सादा जीवन उच्च विचार’ की कार्य पद्धति अपनाए।

आदर्शवादी व्यक्ति भूखे नंगे नहीं रहते। वे हरामखोरी नहीं करते। इसलिए यह भी ध्यान रखना पड़ता है कि अपनी आवश्यकता कम रखें। वस्तुतः इतनी कम हो कि यदि उन्हें काम चलाऊ कसौटी पर कसकर जमा संग्रहीत किया जाए तो उन्हें कुछ ही घण्टे के परिश्रम से कमाया जा सकता है। यदि उत्तराधिकारियों के लिए मुफ्त का ब्याज उपहार में देना नहीं है तो वह भी काम चलाऊ मात्रा में सरलतापूर्वक संग्रह किया जा सकता है। संतोषी वृत्ति धारण करने पर साधारण गुजारा भी निर्वाह तथा सम्मान के लिए पर्याप्त हो सकता है। इसके उपरांत जो समय, श्रम, चिंतन, एवं कौशल बच जाता है, उन्हें उन कार्यों में लगाया जा सकता है, जिनसे जीवन की सफलता का आधार बन सके।

शरीर को विलास चाहिए। मन को वैभव से प्रसन्नता होती है पर अपनी आत्म सत्ता तो शरीर से भिन्न है; साथ ही काया का यह ठिकाना भी नहीं कि वह कितने समय साथ देगी। शरीर छूट जाने के उपरांत तो बड़प्पन और गरीबी का गुणगान या उपेक्षा का कोई महत्त्व नहीं रह जाता। जो व्यक्ति इस जन्म में राजा है, वही कर्मवश गधा या कुम्हार बन जाता है तो इस परिवर्तन के बाद पूर्व जन्म के राजा की ख्याति उसके लिए किस काम आई। आत्मा की अमरता का सिद्धांत यदि स्वीकारा जाए  और शरीरों को वस्त्र बदलने की तरह आए दिन का झंझट माना जाए तो फिर ख्याति की महत्वाकांक्षा बहुत ही छोटी, घटिया और अस्थायी वस्तु रह जाती है। वह सामयिक भी है, अस्थिर और क्षणिक भी। जब पूर्व जन्मोँ के यश अपयश इन दिनों हमारे किसी काम नहीं आते, उस निन्दा प्रशंसा का आज कोई प्रभाव नहीं रहा तो इस जन्म में हो रही निंदा प्रशंसा का शरीर बदल जाने पर कोई प्रभाव न रहेगा। जब आज हमें पूर्वजन्मों की ख्याति कुख्याति का कोई असर अपने ऊपर नहीं है, तो भविष्य में उसके बने रहने की क्या आशा की जाए?

बदलते क्षणों की तरह शरीरों के धारण करने और उतारने का सिलसिला भी चलता ही रहता है। यश अपयश शरीरों तक सीमित है। यह सोचते हुए वाहवाही लूटने, शान बघारने, शेखी दिखाने, प्रशंसा सुनने के लिए ओछे हथकंडे अपनाना दूरदर्शिता नहीं है। मिथ्या प्रदर्शन तो रंगमंचों के नट, नटनियाँ भी कर लेते हैं। वे क्षण भर के लिए राजा, मंत्री, तपस्वी, भिखारी कुछ भी बन जाते हैं। पर प्रदर्शन समाप्त होते ही अपने सारे कपड़े पहन लेते हैं और सादे कर्मचारी की तरह रहते हैं।

इच्छा शक्ति का नियोजन और प्रगति का मूल्यांकन भौतिक वैभव के संपादन या लोगों के बीच बड़े कहलाने लिए नहीं करना चाहिए, वरन् यदि विवेक जागे तो विचारणा और साहसिकता और ऐसे उद्देश्य के लिए किया जाना चाहिए, जिन्हें तुच्छ, अस्थायी एवं बचकानी बुद्धि का चुनाव न कहा जाए।


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