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Magazine - Year 1987 - Version 2

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आत्मा की परमात्मा से गुहार

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आत्मा ने परमात्मा से याचना की—“असतो मा सद्गमय”। “तमसो मा ज्योतिर्गमय”। मृत्योर्माऽमृतंगमय”। ये तीनों ही पुकारें ऐसी हैं, जिन्हें द्रौपदी और गज की पुकार के समतुल्य समझा जा सकता है। निर्वस्त्र होते समय द्रौपदी ने अपने को असहाय पाकर भगवान को पुकारा था। गज जब ग्राह के मुख में फँसता ही चला गया, पराक्रम काम न आया, जब जौ भर सूँड़ जल से बाहर रह गई तो उसने भी गुहार मचाई। दोनों को ही समय रहते सहारा मिला। एक की लाज बच गई—दूसरे के प्राण बच गए। जीवात्मा की तात्विक स्थिति भी ऐसी ही है। उसका संकट इनसे किसी भी प्रकार कम नहीं है।

मोटे तौर पर मनुष्य खाता, सोता, रौब गाँठता और शान दिखाता है। विलास-वैभव का यथास्थिति लाभ उठाता है। किन्तु यह सारा सरंजाम शरीर तक ही सीमित है और अस्थिर भी है। समय गतिशील हैं। साथ ही उपलब्धियों की अनुभूतियाँ भी भूतकालीन बनती जाती हैं। इसी बीच इच्छाएँ प्रबल होती हैं, पिछली उपलब्धियाँ स्मरण आती रहती हैं और उससे भी अधिक अच्छी स्थिति पाने की ललक उभरती है; लिप्सा जगती है। पिछले दिन जो मिला था, अगले दिन उससे भी अधिक पाने का मनोरथ इस आतुरता से उभरता है कि वर्तमान की स्थिति असंतोष से ही भरी रहती है। जो मिल चुका वह चला गया। जो इच्छित हैं, उसके मिलने का कोई निश्चय या समय नहीं। इसलिए मृगतृष्णा स्तर की प्यास से हर घड़ी गला सूखता रहता है। संतोष और चैन का अनुभव हो नहीं पाता।  न विगत को वापस बुलाया जा सकता है और न आगत कोई निश्चित आश्वासन ही देता है। इस स्थिति में अशांति, उद्वेग के अतिरिक्त और कुछ पल्ले नहीं पड़ता।

प्रश्न सहज ही उठता है कि इस स्थिति का कारण क्या है? जब इस प्रश्न पर गंभीरता से विचार किया जाता है, तब पता चलता है कि जो असत् था, अस्थिर था, नाशवान था, जाने वाला था, उसे चाहा गया, उसे पकड़ा गया। जो स्थिर था, शाश्वत था, सनातन था, सत्-चित् और आनन्द से ओत-प्रोत था, उसकी ओर से मुँह मोड़ लिया गया; उपेक्षा की गई और नगण्य समझा गया। इसी भूल का परिणाम है कि भीतर और बाहर से सब प्रकार संपन्न होते हुए भी अभावग्रस्तों की तरह, दीन-हीन की तरह, अभागी जिन्दगी जियी गई। सांत्वना न मिल सकी और न किसी को दी जा सकी।

सत् स्थिर आत्मा है। गुण-कर्म-स्वभाव में सन्निहित मानवी गरिमा भी सत् है। जो सत् को पकड़ता है, अपनाता है और धारण करता है। यह पता चलने पर हिरन की भगदड़ बंद हो जाती है और अपनी ही सुवास सूँघते हुए वह हर घड़ी आनंदविभोर रहता है। भीतर से उभरी गरिमा बाह्य जीवन को भी उल्लसित, विकसित, विभूतिवान बना देती है। चिंतन, चरित्र और व्यवहार में ऐसी शालीनता भर देती है, जिसका प्रतिफल दसों दिशाओं में अमृततुल्य अनुदान बरसाता है। आत्मा ने उसी के लिए पुकार की है कि उसे 'सत्' की उपलब्धि हो। असत् की ओर आँखें मूँदकर दौड़ने की प्रवृत्ति रुके। शांति का सरोवर सामने रहते हुए भी सड़न भरे दलदल में घुस पड़ने और चीखने-चिल्लाने की आदत पर अंकुश लगे। इतना बन पड़े तो किसी से कुछ माँगना-चाहना न पड़े। अपने अंतराल से ही आनंद का ऐसा निर्झर बहे जो अपने को भी गौरव प्रदान करें और दूसरों की हित साधना करते हुए धन्य बने। आत्मा की दूसरी पुकार है— '“तमसो माँ ज्योतिर्गमय'। हे सर्वशक्तिमान ! हमें अंधकार से प्रकाश की और ले चल। जो क्रम अपनाया गया है, वह अंधकार में भटकने के समान है। रात्रि की तमिस्रा में कुछ पता नहीं चलता कि किस दिशा में चल रहे हैं। यथार्थता का बोध न होने से ठोकर खाते और कंटकों की चुभन से मर्माहत होते हैं। कुछ का कुछ समझ में आता है। कुछ का कुछ दीख पड़ता है। शरीरगत सुविधा ही लक्ष्य होती हैं। जड़ का जड़ता के साथ पाला पड़ता है। चेतना का अमृतकुंभ कहाँ रखा है? इसकी प्रतीति ही नहीं होती। वर्तमान और भविष्य अंधकारमय दिखता है। वैभव बटोर लेता है पर वह अंगार बनकर जलता भर हैं। सदुपयोग न बन पड़ने से उत्तम वस्तु भी घातक और निकृष्ट बन जाती है। मनुष्य जीवन में भरी हुई विभूतियाँ यदि सही रूप से पहचानी और प्रयुक्त कि गई होतीं तो उसका लाभ मिला होता, पर अंधकार में तो सर्वत्र भय ही भय है। मृत्यु का भय, हानि का भय, अपहरण का भय, अपनों से भय, वीरानो से भय। अंधकार का, अज्ञान का ही दूसरा नाम भय है। भयानकता कितनी डरावनी होती है, इसे हम रोज ही अनुभव करते हैं। प्राप्त करना चाहते हैं, पर कुछ के बदले कुछ हाथ लगता हैं। अपने बिराने दीखते हैं और बिराने अपने। सुंदर आकृतियाँ भी अंधेरे में भूत-प्रेत जैसी कुरूप और भयंकर लगती हैं। डर से जीवन भर सा गया है। यह अज्ञान- अंधकार की ही करतूत है। प्रकाश भीतर दबा पड़ा है। ऊपर से बरसता नहीं। इस विपन्नता से घिरी हुई आत्मा अपने सृजेता को पुकारता है—“अंधकार से प्रकाश की ओर -अज्ञान से ज्ञान की और ले चल।" भटकाव से निकाल और उस राह पर खड़ा कर जिसे अपनाकर सरलतापूर्वक लक्ष्य तक पहुँचा जा सके।

तीसरी पुकार जीवात्मा की है कि मृत्यु की ओर नहीं अमृत की ओर ले चल। कुसंस्कारिता के कषाय-कल्मष संपर्क-क्षेत्र के प्रचलन, उस ओर घसीटे लिए जा रहे हैं, जिस पर मरण ही मरण हैं। आत्महनन के उपरांत जो कुछ हस्तगत होता है, उसे मरणधर्मा ही कहा जा सकता है। आकाँक्षाओं की बाढ़ के बहाव में न धैर्य टिक पाता है, न विवेक। जीवन कूड़े-करकट की तरह एक गंदे नाले में बहा जा रहा है। न ही किनारा दीखता है, न ठहराव, न आश्रय।

मनुष्य को जीवनरूपी अनुपम संपदा विभूतियों से भरी-पूरी मिली है। पर उनमें से किसी को भी जागृत-जीवन्त करने का अवसर नहीं मिला। जिस संचित पुण्य के आधार पर यह अनुदान मिला था, उसे कौड़ीमोल बेचा, लुटाया और बहाया जा रहा है। यदि बन पड़ा होता तो पंचतत्त्वॉ की काया चले जाने के उपरांत भी यश शरीर जीवित रहता; अनुकरणीय, अभिनंदनीय बनता। प्रकाश स्तंभ की तरह भटकते, टकराते जलयानों को सचेत करता और उनकी विपत्ति टालता। पर ऐसा भी तो कुछ नहीं बन पा रहा है। वासना और तृष्णा के दो पाटों के बीच अपना अस्तित्व पिसता चला जा रहा है। अपहरण और शोषण ही रुचिकर लग रहा हैं। शरीर को, इंद्रियों को, विचारणा को, भविष्य को, सभी को, बर्बाद करने वाली विडंबना ने चेतना पर आधिपत्य जमाया हुआ है। पत्नी से लेकर संतान तक को ऊँचा उठाने की अपेक्षा नीचे गिराने में ही मोह की पूर्ति होती दिखाई पड़ती है। ऐसी है अपनी अनगढ़ समझ, जो अमृत बरबाद करती और विष चाटती है।

हे परमात्मा! अपनी सत्ता का मरण हो रहा है। मौत एक-एक कदम आगे बढ़ती आ रही है, और अब-तब में दबोचने ही वाली हैं। इससे पूर्व हम अपने अंतःकरण को आनंद को, भविष्य को निरंतर मारते-कुचलते रहते हैं। हे परमप्रभु! इस महामरण से हमें बचा ले और हमें अपनी गोद में बिठाकर अमृत का रसास्वादन करा दें।

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