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Magazine - Year 1987 - Version 2

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सुसंतति के सम्बन्ध में वैज्ञानिक प्रयोग

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मनुष्य की यह एक स्वाभाविक इच्छा रहती है कि उसकी संतति सुयोग्य और समुन्नत हो। पर इसका उपाय-उपचार प्रायः अच्छी शिक्षा एवं अच्छे वातावरण पर आश्रित समझा जाता रहा है। एक मान्यता यह भी रही है कि माता और पिता का स्वास्थ्य सौंदर्य ही नहीं कौशल भी वंश-परम्परा पर आधारित है। इसलिए सुयोग्य जोड़ों से उत्पन्न की गई संतति ही समुन्नत हो सकती हैं।

पर यह मान्यताएँ उथली ही ठहराई गई हैं, क्योंकि उपरोक्त प्रयोग उपचार करने पर भी संतति वैसी न बन पड़ी जैसी कि अभीष्ट थी। विज्ञान ने गहराई में उतरकर उसका आधार आनुवाँशिकी में खोजा है और परम्परागत गुण-सूत्रों को, जीन समुच्चय को इसका कारण माना है। वे कहते हैं कि बाहर से यौवन और सौंदर्य से भरपूर होते हुए भी किन्हीं दंपत्तियों का जीन्स सम्मिश्रण ऐसा हो सकता है, जिससे संतान पिता-माता की तुलना में बदले हुए स्वभाव की हो।

जीन्स की परम्परागत परिणति असंदिग्ध है, पर वह शरीर संरचना तक ही सीमित है। अफ्रीका के नीग्रो अमेरिका के ठण्डे देशों में रहते हुए भी रंग-रचना की दृष्टि से काले व वैसे ही हैं जैसे कि उनके पूर्वज थे। जो गोरे लोग अफ्रीका में बसे हैं अपनी परम्परागत गोरी चमड़ी बनाए हुए हैं। अरबों का लम्बा और काँगो निवासियों का बौना होना भी देश बदल देने पर भी यथावत बना रहता है। यही बात मंगोलियन जातियों के संबंध में भी है।

आकृतियों से भी अधिक महत्व प्रगति एवं बुद्धिमत्ता का है। यह परम्परा कैसे आगे बढ़े? इसके लिए पौधों में कलम लगाने के सिद्धान्त में सफलता मिलने की बात आगे सोची जाने लगी हैं। गधे और घोड़ी के संयोग से खच्चर जाति का एक नया प्रजनन संभव हुआ है। वैज्ञानिकों का दिमाग इन दिनों इसी दिशा में चल रहा है और वे जीन्स की समर्थता को अद्भुत मानते हुए मनुष्यों में भी “कलम प्रणाली” (क्रास ब्रीडिंग) का प्रचलन करने के लिए प्रयत्न कर रहे हैं।

जीन्स में परम्परा गत दोष-दुर्गुणों का संशोधन करना भी संभव हुआ है और उनके स्थान पर नई विशिष्टताओं का समावेश करने में भी सफलता मिली है। पेड़ पौधे में यह प्रयोग बहुत पहले ही सफल हो चुका है। विजातियों के साथ यौन संबंध स्थापित करने की प्रक्रिया को दृष्टिगत रख किसी भी नर को शुक्राणु किसी नारी के शरीर में पहुँचाये जाने के कृत्रिम गर्भाधान के प्रयास में भी सफलता मिल रही है। पूर्वकाल में यह मात्र यौन संपर्क से ही संभव था। तब निर्धारित पति-पत्नियों में गुण सूत्र विपन्न हों तो कोई अन्य चारा नहीं था। यद्यपि वैदिक-पौराणिक काल में “नियोग-प्रक्रिया” के अनेक उदाहरण मिलते हैं। अब तो (1) जीन्स का परिमार्जन तथा (2) किसी शरीर में उनका बिना सहवास के भी प्रवेश बन पड़ना संभव हो गया है।

सुप्रसिद्ध पुस्तक “इन हिज इमेज, क्लोनिंग ऑफ मैन” पुस्तक के लेखक डेविड रोरविक को यदि विकसित किया जा सके तो बिना संभोग के भी समर्थ एवं सुयोग्य व्यक्तियों की प्रतिलिपि संतानें पैदा की जा सकेंगी।” अपनी इस पुस्तक में उसने अमरीका के एक करोड़पति की कार्बन-काँपी तैयार करने में सफलता प्राप्त करने का भी दावा किया है और लिखा है कि वह बिल्कुल सामान्य शिशु का सामना कृत्य भी सम्मिलित हैं।

कृत्रिम गर्भाधान द्वारा गर्भाशय के बाहर संतान निर्माण में ब्रिटेन के दो वैज्ञानिकों का नाम आता है। ये हैं-कैम्ब्रिज विश्वविद्यालय के आर.जी. एडवर्ड्स वेब्सटर एवं आँलम जनरल अस्पताल (यू.के.के) डॉ. पी. सी. स्टेपार्ट। उनने बंध्या नारियों को छोटे आपरेशनों के बाद संतानोत्पादन में समर्थ ही नहीं बनाया वरन् कृत्रिम गर्भाधान के सहारे समुन्नत स्तर की संतानें भी उत्पन्न करायीं। अमरीका के प्रजनन विज्ञानी डॉ. हैरिस ने भी इस स्तर के प्रयोग किये और परिणामों को देखते हुए भावी संभावनाओं के संबंध में उत्साहपूर्ण को देखते हुए भावी संभावनाओं के संबंध में उत्साहपूर्ण सफलताओं का संकेत दिया। उनका कथन है कि इक्कीसवीं सदी की पीढ़ी सशक्त, समुन्नत, बुद्धिमान हो, इसके लिए कृत्रिम प्रयोग किए जाने अत्यन्त अनिवार्य हैं।

जैक्सन प्रयोगशाला बारबाहट्र मैने (यू.एस.ए) के जीवन प्रजनन विभाग के विशेषज्ञ वैज्ञानिक पीटरहोप के अनुसार स्तनपायी जीवों का कार्बन-काँपी तैयार करना मुश्किल अवश्य है, पर असंभव नहीं।

फ्राँसीसी जीव वैज्ञानिक जीन रोंसे की मान्यता है कि “मानव कलम का उपयोग समर्थ व गुण सम्पन्न व्यक्तित्वों के निर्माण में किया जा सकता है, साथ ही इस विधि द्वारा व्यक्ति को अमर भी बनाया जा सकता हैं।

मिनिसोटा विश्वविद्यालय के जीवन कोशिका विशेषज्ञ रॉबर्ट मैकिवेल ने निम्न जाति के जीवधारियों पर मानवी कलम लगाकर उन्हें नर पशु नर स्तर के नये जीवधारियों की संरचना की बात सिद्धान्ततः स्वीकारी है। उनका कहना कि यह आवश्यक नहीं कि समान जाति के बीच ही प्रजनन प्रक्रिया सीमित रहे। यह कदम मैथुन क्रिया द्वारा तो नहीं पर जीन्स आरोपण के प्रयोगों द्वारा आज न सही कल संभव हो सकता है। फिलाडेल्फिया के राँबर्टे ब्रिग्स ने भी इस संभावना को अक्षरशः स्वीकार करते हुए इस दिशा में शोध करने पर बल दिया है।

जर्मनी के तीन मूर्धन्य वंशानुक्रम विज्ञानी डॉ. आखेन बेवर, डॉ. आयोजिन फिशर एवं डॉ. फ्रिट्ज लेंज लेंज ने ह्यूमन हैरेडिटी’ नामक एक पुस्तक लिखी है। इसमें उन्होंने वासना के उभार में चल रहे अंधाधुन्ध विवाह संबंधों के कारण संतान पर होने वाले दुष्प्रभाव को मानवी भविष्य के लिए चिन्ताजनक बताते हुए कहा है कि “अनियंत्रित विवाह के कारण पीढ़ियों के वर्तमान स्तर में बहुत गिरावट आ रही हैं।”

म्यूटेशन विशेषज्ञ व ख्याति प्राप्त विज्ञानी टर्नियर का कथन है- “मानसिक अशक्तता का भी पीढ़ियों पर प्रभाव पड़ता है और इससे पीढ़ियाँ उत्तरोत्तर निम्नतर स्तर की बनती जाती हैं, जबकि मनोबल सम्पन्न एवं साहसी व्यक्ति तेजस्वी एवं गुणवान संतति पैदा करते हैं। इसलिए मानसिक रूप से कमजोर व्यक्तियों का सशक्त पीढ़ी के निर्माण हेतु बन्ध्याकरण कर देना चाहिए। उनका समर्थन कितने व्यक्ति करेंगे, मालूम नहीं, पर हो सकता है कोई सनकी तानाशाह यही कर गुजरे।

लेटर बर्ग, कैलीफोर्निया के नोबुल पुरस्कार विजेता वैज्ञानिक डॉ. जोशुला का विचार है कि संसार के मूर्धन्य व्यक्तित्वों के शुक्राणु संचय करने के लिए एक ऐसे बैंक की स्थापना की जानी चाहिए जो उपयुक्त स्तर की महिलाओं के माध्यम से समर्थ व गुण सम्पन्न संतानें प्राप्त करने के काम आ सकें।

कैलीफोर्निया के वयोवृद्ध वैज्ञानिक रॉबर्ट के ग्राहम ने भी पिछले दिनों एक अत्यंत विलक्षण अभियान चलाया था। उनने पाँच नोबुल पुरस्कार विजेता वैज्ञानिकों के शुक्राणुओं को इकट्ठा कर “शुक्राणु बैंक” की स्थापना की थी। इस अद्भुत बैंक के निर्माण का अपना उद्देश्य बताते हुए उन्होंने कहा कि इन शुक्राणुओं द्वारा तीक्ष्ण मस्तिष्क की महिलाओं की अणु कोशा को निषेचित कर असामान्य आई. क्यू. वाले बच्चे पैदा किये जा सकेंगे। अपने इस प्रयास में वे तीन महिलाओं का अभी तक कृत्रिम गर्भाधान भी करा चुके हैं। उन्हें कितनी सफलता मिली, यह समय बताएगा।

आज-कल वैज्ञानिक ‘जीन’ के घटक डी. एन. ए. में आमूल-चूल परिवर्तन कर वाँछित गुण सम्पन्न व्यक्तित्वों के निर्माण की बात सोच रह हैं। इसके लिए अनेकानेक विधियाँ सुझायी गई हैं। प्रथम विधि में एक जजीन के डी. एन. ए. को दूसरे जीन में प्रत्यारोपित करने की बात सोची गयी है। दूसरी विधि मेंक वायरस या बैक्टरीयोफाँज की सहायता से डी. एन. ए के न्यूकलिओटाइडों में फेर बदल का प्रस्ताव रखा गया है। चौथी विधि पार्थेनोजेनेसिस की है। वस्तुतः आज अमेरिका के प्रायः एक सौ से भी अधिक विश्व विद्यालयों एवं निजी शोध संस्थानों में जीन्स परिवर्तन एवं प्रत्यारोपण पर विशद अनुसंधान कार्य चल रहा है। इंग्लैण्ड, फ्रांस, जर्मनी एवं यू. एस. एस. आर. में भी इस दिशा में प्रयोग चल रहे हैं।

विस्काँसिन विश्वविद्यालय के प्रोफेसर ई. एम. राँस अपनी जातीय विशेषताओं पर आधारित पुस्तक “प्रिंसिपल्स ऑफ सेशियाँलाँजी” में लिखते हैं- “परम्परा से प्राप्त नैतिक संस्कारों में उत्तरी यूरोप के निवासी दखिझाी यूरोप के निवासियों से बहुत आगे हैं।” एक उदाहरण के द्वारा उन्होंने अपनी इस बात को और भी अधिक दृढ़ता प्रदान की है। और इसे प्रामाणिक बताते हुए कहते हैं कि जहाजी दुर्घटनाओं के अवसर पर उत्तरी यूरोप के निवासियों में दक्षिणी यूरोप के निवासियों की तुलना में अनुशासन कर्तव्यनिष्ठा दुर्बलों के प्रति करुणा एवं सेवा भक्ति अधिक पायी जाती है। दक्षिणी यूरोप के निवासी ऐसे अवसरों पर घबड़ा कर अपना संतुलन खो देते हैं दूसरों के बचाव की तुलना में ऐसे वक्त में वे मात्र आत्म रक्षा की बात सोचते हैं जबकि उत्तरी यूरोपवासियों की प्रवृत्ति इसके ठीक विपरीत पायी जाती है।”

मिनीसोटा विश्वविद्यालय में गत आठ वर्षों से चल रहे अनुसंधान कार्य के बाद वैज्ञानिक इस निष्कर्ष पर पहुँचे हैं 350 जुड़वा बच्चों पर किए गए अध्ययन से ऐसा लगता है कि कार्ल मार्क्स एवं सिगमण्ड फ्रायड अपने नेचर विरुद्ध नर्चर सिद्धान्त के प्रतिपादन में गलत थे। मार्क्स कहते थे कि आदमी को पुनः बनाया जा सकता है जबकि ये वैज्ञानिक कहते हैं कि परम्परागत मूल्यों का परिपालन एवं आँतरिक अनुबंध विशुद्धतः जीन्स द्वारा निर्धारित होता है। डॉ. डेविड लाइकेन कहते हैं कि यह अध्ययन प्रमासात करता है कि मासलेवल पर विचारणा व मान्यता परिवर्तन के प्रयास आनुवांशिकी स्तर पर हो चाहिए। अन्य तथ्यों को ध्यान में रखते हुए वैज्ञानिक क्षेत्र में यह ऊहापोह चल रहा है कि वह से पूर्व रंग रूप का अधिक स्थिति का नहीं गुण सूत्रों का भी परीक्षण किया जाना चाहिए और किस प्रकृति की संतान उत्पन्न करनी हो, उसी के अनुरूप विवाह निश्चित होना चाहिए।

यदि यह न बन पड़े तो गुण सूत्रों के परिवर्तन एवं उन्हें कृत्रिम गर्भाधान के माध्यम से उपयुक्त खेत में उपयुक्त बीज डालने का प्रयास कार्यान्वित किया जाना चाहिए। यह कार्य बिना दाम्पत्य जीवन की मर्यादा नष्ट किए होता रह सकता है।

अभी वैज्ञानिक किसी निष्कर्ष पर पहुँचे नहीं हैं। फिर भी यदि उनका यह प्रतिपादन सही सिद्ध हुआ तो नर नारियों को पुरातन कायाकल्प सिद्धांतों के अनुरूप दाम्पत्य-जीवन में ही जीन्स परम्परा का परिवर्तन सरल हो जाएगा।

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