जीवन का उद्गम-सविता
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देवताओं की विविधता, बहुलता, विभिन्नता, साधक की श्रद्धा के साथ जुड़ी हुई हैं। श्रद्धा ही विकसित रूप में देवता का रूप धारण करती हैं। मनुष्यों की मान्यताओं एवं भावनाओं में अन्तर होता हैं। इसी आधार पर श्रद्धा के बीजाँकुर फलित होते हैं। विश्वास के दुर्बल होने पर देवता भी दुर्बल हो जाते हैं। समर्थ और फलदायक वे होते हैं जिन्हें भावनापूर्वक श्रद्धा विश्वास से सींचा गया है। इसके अभाव में छबि या प्रतिमा कौतूहल मात्र बनकर रह जाती है। आस्थावान के लिए इष्ट देव की अनुकम्पा चमत्कारी बनकर प्रकट होती हैं किन्तु अनास्थावान के लिए उसका कोई महत्व नहीं। उसे उसमें कोई विशेषता दिखाई नहीं पड़ती।
पिता के चित्र को देखकर भावनाशील संतति का मस्तक झुक जाता है। उनकी स्मृति एवं उपस्थिति का अनुभव होता है, किन्तु जिनका उससे कोई सम्बन्ध नहीं उनके लिए वह व्यक्ति विशेष की तस्वीर मात्र है। वह उसकी रेखाओं को देखता और सुन्दर असुन्दर का निर्णय करता है। राष्ट्रीय ध्वज, देश भक्तों के लिए अतिशय सम्मान के योग्य है, पर जिसमें इस प्रकार की भावनाएँ नहीं, उनके लिए वह कपड़े का टुकड़ा मात्र हैं।
श्रद्धा अपने आप में एक शक्ति है। मान्यताएँ अपना प्रत्यक्ष प्रभाव दिखाती हैं। झाड़ी का भूत और रस्सी का साँप अँधेरे में दीख पड़ता है। भले ही वस्तुस्थिति वैसी न हो पर मान्यता अपना प्रभाव दिखाती है। भयंकर होने पर वह डरा सकती है और सुखद संवेदना से भरी-पूरी होने पर वह हृदय की कली खिला सकती है। प्रिय-अप्रिय की सुन्दर-कुरूप की परिभाषा यही है कि जो अपने को सुहाया उसकी श्रेष्ठता मानी गई, जो अप्रिय लगा वह उपयोगी होते हुए भी निरुपयोगी माना जाता है। व्यक्ति, पदार्थ या देवता अपनी ही मान्यता के अनुरूप दीख पड़ते हैं। उनकी प्रतिक्रिया भी प्रतिध्वनि या प्रतिछबि जैसी होती है।
यदि तथ्यों के अनुरूप देवताओं के प्रति आस्था उत्पन्न करनी हो तो धरती माता, पवन प्रवाह, मेघमाला, सूर्य चन्द्र जैसी दिव्य सत्ताओं को कृतज्ञता भरा नमन किया जा सकता है। दूरवर्ती के प्रति अधिक आकर्षण होता है। समीपवर्ती के प्रति अरुचि या अवज्ञा की मनःस्थिति बनने लगती है। इस दृष्टि से धरती, वनस्पति, पवन जल आदि को सामान्य समझा जा सकता है और सबके अधिक दूर होने के कारण अपने सौर मण्डल का अधिष्ठाता सूर्य अधिक श्रेयाधिकारी प्राचीन प्रतीत होता है। उसके प्रति देव मान्यता की परम्परा भी अधिक है।
सूर्य प्रत्यक्ष देवता है। वह आँखों से उदीयमान देखा जा सकता है। उसकी ज्योति एवं ऊष्मा का लाभ निरन्तर उठाते हैं। रात्रि के समय चन्द्र बनकर सूर्य ही अपनी परावर्तित आभा का परिचय देता हैं सूर्य प्राणियों की वनस्पतियों की आत्मा है। उसी के कारण जल थल और नभ की ऐसी स्थिति बनी हुई है, जिसमें जीवन विकसित हो सके। सूर्य ही समुद्र का जल भाप बनाकर मेघ वर्षा का प्रबंध करता है। जल के आधार पर ही जीवधारी और पदार्थ विनिर्मित, विकसित और विघटित होते रहते हैं। दृश्यमान परब्रह्म नाम से भी उसकी मनीषियों ने अभ्यर्थना की हैं।
उपासना संदर्भ में सूर्य को सविता कहा गया है और सविता की शक्ति को सावित्री नाम दिया गया है। सावित्री अर्थात् गायत्री। आद्यशक्ति-महाप्रज्ञा। शक्ति शक्ति वाक्देवी-मंत्र विद्या की अधिष्ठात्री, मंत्र विचार है, विवेक प्रेषक। ओजस् तेजस् वर्चस् का प्रतीक प्रतिनिधि। शब्द ही ज्ञान है। लेखनी और वाणी के द्वारा उसी का आराधन अध्यवसाय किया जाता है। शब्द के उसके नर बानर बने रहने में कोई संदेह नहीं। सविता का प्रकाश विवेक कहा जाता है। उसकी दिव्य शक्ति को वाणी कहते हैं। सामान्य प्रयोग में वह वार्तालाप के रूप में प्रयुक्त होती है किन्तु उच्च भूमिका में वह मंत्र शक्ति बन जाती है। मंत्र विद्या का प्राण गायत्री महामंत्र में सन्निहित है। सावित्री में आत्म की और भौतिकी का उभयपक्षीय समावेश हैं इसीलिए उन्हें बला और अतिबला नाम दिया गया है। पौराणिक कथानकों में उस एक ही शक्ति को द्विधा कहा गया है। परब्रह्म की परा और अपरा शक्तियाँ पत्नियाँ वे ही हैं। भारतीय अध्यात्म में ज्ञान तथा विज्ञान का जो पुट है उसे सृष्टि सत्ता में विकसित किया गया है। सत्ता क्षेत्र में उसे सर्वोपरि माना गया है। वही महादेव है।
देव मान्यता के आरम्भ काल में सर्वप्रथम प्रतिष्ठापना सूर्य की ही हुई। वह प्रत्यक्ष एवं दृश्यमान भी है। जल का अर्घ्य चढ़ाकर उसकी सर्व सुलभ पूजा अर्चा भी बन पड़ती है। उसके उदय, अस्त का काल संध्या कहा गया है और उस अवसर पर वन्दन-नमन का प्रावधान रखा गया है। यही है सनातन वैदिक सम्पदा। भारतीय तत्व दर्शन सविता की ही अभ्यर्थना करता है। अन्यान्य देवताओं के मुख मण्डल पर जो तेजोवलय है वह प्रकट करता है कि देवताओं का देवत्व सविता की छत्रछाया में ही विकसित हुआ है।
जिन दिनों आत्मिकी की आराधना का-उदय हुआ उस समय प्राथमिकता सूर्य की ही थी। जिन क्षेत्रों में सभ्यता का विकास हुआ वहाँ पूजा प्रयोग में सविता को ही अपनाया गया। पुरातत्व विज्ञान ने धरातल से जो आदि सभ्यता के चिन्ह ढूँढ़े हैं, उनसे सूर्य प्रतिमाएँ प्रमुख हैं। वे तेजस् युक्त गोलाकार है। पीछे उनमें मनुष्य के चेहरे का भी आरोपण हुआ।
सम्प्रदायों का विभेद जब तक नहीं हुआ था तब तक शाश्वत सनातन धर्म को ही मानवी मान्यता ने अंगीकार किया था और सूर्य ही समूची मानव जाति का आराध्य था। उसकी गति, आभा एवं ऊर्जा की त्रिविधि क्षमताओं को लेकर त्रिदेवी की कल्पना जगी। तीन देवियाँ यही हैं। त्रिवेणी-त्रिपदा के रूप में इन्हीं का तीर्थ संगम हैं।
पुरातत्व के देवालय पक्ष में सूर्य प्रतीकों की ही स्थापना वाले प्रमाण उपलब्ध हुए हैं। पुरातन सभ्यताओं के प्रतीकों में सूर्य का अविच्छिन्न समावेश है। देवालयों में सूर्य प्रतीक ही अतिशय पुरातन हैं। विकासमान सभ्यताओं के साथ वह उच्चस्तरीय सम्मान का अधिष्ठाता रहा। भारत में कोणार्क जैसे कतिपय मंदिर उन दिनों बने थे, जिन दिनों भारत का वर्चस्व समस्त भूमण्डल पर छाया था।
गायत्री महामंत्र में भारतीय वाङ्मय का क्रमिक विकास हुआ है। गायत्री का केन्द्र बिन्दु सविता ही है। मंत्र शक्ति का अवतरण उसी से होता है। सूर्योपस्थान वस्तुतः सविता के तेजस् का स्थूल, सूक्ष्म और कारण शरीरों में अवतरण की अवधारण की प्रक्रिया है।
भौतिक विज्ञान ने प्रकृति के अंचल में समाहित अनेकानेक रहस्यमयी शक्तियों की खोज की है। वे कहाँ से आईं? इसका पता लगाने पर पाया गया है कि यह सूर्य का ही अनुदान है। रेडियो तरंगें, लैसर किरणें, ब्रह्माण्डीय किरणें, पराबैगनी किरणें आदि का क्रमिक रहस्योद्घाटन होता चला जा रहा है। साथ ही यह भी स्पष्ट होता जाता है कि इन सबका एक ही उद्गम केन्द्र है- सूर्य।
व्यावहारिक, कारोबारी संसार में सब से अधिक आवश्यकता ऊर्जा की है। उसी सहारे अनेकानेक यंत्र बनते और की है। ताप की आवश्यकता शक्ति के लिए, प्रकाश के लिए, उत्पादन के लिए, वर्षा के लिए आवश्यक होती हैं। सूर्य ऊर्जा का पुँज है। जब ईंधन के अन्य सारे स्रोत समाप्त हो जायेंगे तब मात्र सूर्य पर रही मनुष्य को हर दृष्टि से निर्भर रहना पड़ेगा। यही देवता जीवन मरण का साथी था, है और रहेगा।

