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Magazine - Year 1987 - Version 2

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शान्ति कुँज हरिद्वार में एक-एक महीने के युगशिल्पी सत्र यथावत् चल रहे हैं, नालन्दा विश्वविद्यालय स्तर की इस पढ़ाई में युग परिवर्तन में सफल नेतृत्व की भूमिका निभा सकने योग्य प्रखर प्रतिभाएँ विनिर्मित करना इस प्रशिक्षण का मूलभूत उद्देश्य है। आस्था संकट ने ही इन दिनों अनेकानेक प्रकार की समस्याएँ, उलझन, कठिनाइयाँ खड़ी की हैं। इन सबका एक मात्र समाधान यही है कि लोकमानस का आद्योपान्त परिष्कार किया जाय। दूरदर्शी विवेकशीलता अपनाने और जो उचित है उसी को स्वीकार ने की व्यापक मनोभूमि विनिर्मित के जाय। इसके लिए भावनाशीलों को निजी जीवन में लोभ, मोह की कटौती करके लोक मंगल के लिए समयदान और अंशदान की बढ़-चढ़ कर उदारता साहसिकता दिखाई जाय। जो इतना कर सके उनके लिए यह प्रशिक्षण अमृतोपम है। अब तक हजारों की संख्या में प्राणवान सृजनशिल्पी प्रशिक्षित हुए और कार्य क्षेत्र में उतरे हैं। यह पुनीत प्रक्रिया आगे भी जारी रखेगी। उसे दिव्य चेतना ने इसी उद्देश्य की पूर्ति के लिए विनिर्मित जो किया है।

जिन्हें इन युग संधि के प्रभात पर्व पर अपने जीवन को कृत-कृत्य करना है, उन्हें औसत नागरिक का निर्वाह अपनाना चाहिए। लोभ, मोह और अहंकारी प्रदर्शन की महत्वाकाँक्षाओं को तिलाँजलि देनी चाहिए और अपनी योग्यता के अनुरूप कार्यक्रम बनाने के लिए हरिद्वार से संपर्क साधना चाहिए। अपने क्षेत्र में अपने घर रहकर भी कार्य किया जा सकता है। पर जिन्हें समुचित अवकाश हो वे देशव्यापी कार्यक्रमों पर भी निकल सकते हैं। जिनकी उपयोगिता समझी जायगी उन्हें शान्ति कुँज या किसी सम्बन्धित संस्था में भी स्थायी रूप से नियुक्त किया जा सकता है। पर इन कदमों को उठाने से पूर्व हर हालत में एक महीने का युग शिल्पी शिक्षण प्राप्त कर लेना आवश्यक है। मात्र भावावेश से उत्तेजित व्यक्ति व्यवस्थित रूप से कोई कार्य उतनी खूबसूरती से नहीं कर सकते, जितना कि उन्हें करना चाहिए।

नौ दिन के नये आध्यात्मिक जीवन-सत्र

इस वर्ष प्रायः सभी समर्थ शाखाओं ने अपने-अपने यहाँ शत कुण्डी, चौबीस कुण्डी, गायत्री यज्ञ समेत राष्ट्रीय एकता सम्मेलन सम्पन्न किये हैं। प्रत्येक में हजारों की संख्या में उपस्थिति हुई हैं। जिनसे भी उन कार्यक्रमों का संपर्क सधा है, उन सभी में युग धर्म के निमित्त कुछ सक्रिय योगदान करने के लिए भावांछित, उत्तेजित हो चले हैं। बिगड़ती परिस्थितियों के कारण सम्भावित विभीषिकाएँ उनके मस्तिष्क में घूमी हैं। साथ ही महाकाल के युग निमन्त्रण ने उनका अन्तराल झकझोरा है। इन दबावों से विवश होकर उन्हें सोचना पड़ा है कि मात्र पेट प्रजनन के लिए पशु जीवन नहीं जीना चाहिए, वरन् पूरा समय न निकल सके तो घरेलू काम काज करते हुए भी कुछ ऐसा करना चाहिए जिस संतोषजनक एवं महत्वपूर्ण कहा जा सके।

ऐसे उत्कंठित व्यक्तियों के पुरातन सुसंस्कार एकाकी जागे हैं और वे जिस स्तर पर दिन गुजारते रहे हैं, उसकी तुलना में अपनी प्रखरता, प्रतिभा, भावना को भी बढ़ाना चाहते हैं और युग धर्म के निर्वाह में कुछ सेवा साधना में भी हाथ बटाना चाहते हैं। जिनका रुझान कुछ समय शांतिकुंज के वातावरण में रहने-निजी व्यक्तित्व को उच्चस्तरीय बनाने और साधना द्वारा आत्मबल बढ़ाने और अगले दिनों सेवा साधना की दृष्टि से भी यथा सम्भव कुछ करने का मन है। ऐसे लोगों के अनुरोध बड़ी संख्या में उपलब्ध हुए हैं। इतना ही नहीं समर्थ शाखाओं ने भी यह अनुभव किया है कि जितने सहयोगी कार्यकर्ता अभी तक हैं, उतने भर से समय की बढ़ती माँग को पूरा नहीं किया जा सकेगा। उनकी संख्या बढ़नी चाहिए, ताकि नितान्त आवश्यक कार्यों को आरम्भ किया जा सके, आगे बढ़ाया जा सके। सुयोग्य साथियों की सहायता से ही महान् कार्य सम्पन्न होते रहे हैं, हो सकेंगे। इसलिए जहाँ भी इस वर्ष प्रज्ञा समारोह सम्पन्न हुए हैं। उन सभी स्थानों के कार्य संचालकों के मन में यह सूझ उभरी है कि जिन भावनाशीलों के मन में यह सूझ उभरी है कि जिन भावनाशीलों के साथ इन दिनों संपर्क सधा और उत्साह उभरा है न सभी को शान्ति कुँज प्रशिक्षण के लिए भेजा जाय।

मिशन की पत्रिकाओं के इन दिनों पाँच लाख के करीब स्थायी सदस्य हैं। इनमें सभी सेवा धर्म अपनाने के लिए आतुर तो नहीं हैं पर इतना सभी चाहते हैं कि उनका निज का व्यक्तित्व गुण, कर्म स्वभाव की दृष्टि से, शारीरिक मानसिक स्वास्थ्य की दृष्टि से समुन्नत ऊँचा रहे। सभी ओर से स्नेह सहयोग मिले। इसके अतिरिक्त यदि रास्ता चलते कुछ सेवा साधना बन पड़े तो उसे भी किसी कदर करते रहा जाय। यह आकाँक्षा कुछ अपवादों को छोड़कर सभी प्रज्ञा परिजनों के मन में हो सकती है, या थोड़े प्रयत्न से उभारी जा सकती है। सेवा कार्यों में किसी को रुचि भले ही कम हो पर निजी व्यक्तित्व का स्तर हर कोई ऊँचा उठाना चाहता है। यह कामना इन दिनों के लेखों ने यज्ञ आयोजनों एकता सम्मेलनों ने विशेष रूप से उभारी है। मिशन के वरिष्ठ कार्यकर्ता भी इस बात के लिए आतुर हैं कि उनकी सहयोगी अधिक संख्या में बढ़े। यदि कोई मिशन के कार्यों में प्रत्यक्ष सहयोग नहीं भी करता है, मात्र अपने आपको ही आदर्श बना लेता है, तो भी वह मिशन का गौरव बढ़ाता है। प्रकारांतर से सहयोगी की भूमिका ही निभाता है, भले ही वह प्रत्यक्षतः कोई कहने लायक जिम्मेदारी अपने कंधों पर न उठाये। जिन शाखाओं को निष्क्रियता ने घेर रखा है जिन प्रज्ञापीठों में सन्नाटा छाया हुआ है, जो मात्र मंदिर बनकर रह गई हैं, वेषेश रूप से यह चाहती हैं कि उनके संपर्क क्षेत्र में कुछ आदर्श व्यक्ति आगे आयें और अपने परिष्कृत व्यक्तित्व से अनायास ही अनेकों का मन उस दिशा में उभरने लगे। इस प्रकार सहज ही छाई हुई उदासीनता की निष्क्रियता का अन्त हुए बिना न रहेगा।

कठिनाई एक ही थी कि शांति कुँज में इन दिनों केवल एक महीने वाले युग शिल्पी सत्र ही चलते हैं। इतना समय निकाल सकना उसके संभव नहीं, जो अत्यधिक व्यस्त हैं। जो रोज कुआं खोदते रोज पानी पीते हैं अथवा किसी ऐसे कार्य में लगे हैं जिसे थोड़े दिन के लिए भी छोड़ा नहीं जा सकता। इतने पर भी उनकी उत्कंठा शान्तिकुँज के वातावरण में कुछ समय रहने की है, वहाँ रहकर एक गायत्री अनुष्ठान करके आत्मबल बढ़ाने की है। अपने चिन्तन, चरित्र, व्यवहार, स्वभाव एवं व्यक्तित्व में निखार लाने की है, जो अपने को अधिक प्रतिभाशाली लोकप्रिय एवं सम्मानित देखना चाहते हैं।

अब तक शान्ति कुँज के संपर्क में आकर जो भी लौटे हैं, उनमें से अधिकाँश ने यही कहा है कि उन पर पारस स्पर्श से सोना बनाने उदाहरण लागू हुआ है। सीप में स्वाति बूँद पड़ने पर मोती उत्पन्न होने जैसा कुछ चमत्कारी घटित हुआ है। एक महीने के शिक्षण वालों की गणना उनके क्षेत्र में प्रतिभाशाली प्रामाणिक, प्रभावी नेता के रूप में होने लगी है। यहाँ तक कि जो बच्चों का मुण्डन, यज्ञोपवीत कराने, विद्यारम्भ आदि कराने के बहाने एक दो दिन के लिए ही इस आश्रम में ठहरे वे वहाँ की प्रभाव प्रतिक्रिया को आये दिन स्मरण करते रहे। जिनके विवाह शान्ति कुँज में आदर्श परम्परा के साथ सम्पन्न हुए उनके दाम्पत्य जीवन, पारिवारिक जीवन आनन्द उल्लास से भरे रहे, यह उनकी चर्चा है जो आवश्यकतानुसार कारण वश एक दो दिन के लिए ही वहाँ पहुँचे और ठहरे। इन चर्चाओं ने असंख्यों के मन में यह आतुरता उत्पन्न की है कि वे किसी प्रकार कुछ दिन के लिए शान्तिकुँज रहे। वहाँ के दिव्य वातावरण में साधना करें। प्रेरणाओं की भी-पूरी प्राण ऊर्जा का एक अंश उपलब्ध करके अपने को लाभान्वित करें। उस सरसता के रसास्वादन से अपने को कृतकृत्य बनायें।

बहुत दिन अत्यन्त गंभीरतापूर्वक विचार करने के उपरान्त शान्तिकुँज के सूत्र संचालकों ने निश्चय किया है कि दस-दस दिन के जीवन साधना सत्रों की एक श्रृंखला शान्तिकुँज में नये सिरे चलाई जाय। एक महीने के युग शिल्पी सत्र अपने ढंग से अपना क्रम से चलते रहें। साथ ही इन नितान्त अभिनव जीवन साधना सत्रों की दस-दस दिन ले सत्रों की श्रृंखला इसी अप्रैल मास से अलग से चल पड़े।

अपना सुविस्तृत परिचय लिखते हुए आवेदन पत्र भेजा जाय। स्वीकृति प्राप्त की जाय और सत्र प्रारम्भ होने से एक दिन पहले आ जायँ और सत्र समाप्ति होने वाले दिन या दूसरे दिन चले जायँ। ताकि पिछले या अगले शिक्षार्थियों को स्थान खाली मिले। हर महीने तारीख 1 से 9 तक पहला सत्र। दूसरा 11 से 19 तक। तीसरा 21 से 29 तक चला करेगा। ता. 10.20.30 के तीन दिन इसलिए खाली रखे गये हैं किस उनमें आगन्तुकों, विदाई वालों को आवागमन की सुविधा रहे और स्थान आदि की सफाई भी ठीक प्रकार हो सके।

आवेदन पत्र हर शिक्षार्थी को हाथ से ही लिखना पड़ेगा। उसमें किस महीने के किस शिविर में आना चाहते हैं (1) नाम (2) पूरा पता (3) आयु (4) शिक्षा (5) जन्म जाति (6) व्यवसाय (7) मिशन की किन पत्रिकाओं को नियमित रूप से पढ़ते रहें हैं। (8) कोई शारीरिक मानसिक रोग तो नहीं है। विशेषतया छूत का (9) आश्रम के अनुशासनों को ठीक प्रकार पालन करते रहने का आश्वासन। इतना विवरण सादे कागज पर विस्तारपूर्वक लिख भेजने से आवेदन पत्र मान लिया जायगा और जिन्हें उपयुक्त समझा जायगा, उन्हें पत्र मान लिया जायगा और जिन्हें उपयुक्त समझा जायगा, उन्हें पत्र द्वारा स्वीकृति भेज दी जायेगी।

यहाँ एक बात विशेष रूप से स्मरण रखने की है कि तीर्थ पर्यटकों की अनगढ़ भीड़ साथ में लेकर कोई भी न चले, कारण की अनगढ़ भीड़ साथ में लेकर कोई भी न चले, कारण कि घुमक्कड़ों का मात्र दृष्टिकोण होता है, सैलानियों की तरह जहाँ-तहाँ घूमते फिरना और चित्र विचित्र इमारतें देखते फिरते फिरना उन्हें सत्र के उद्देश्यों से कोई सहानुभूति नहीं होती। इसलिए वे शिक्षार्थियों को चैन से नहीं बैठने देने। साधना और शिक्षण में निरन्तर विघ्न उत्पन्न करते हैं और घुमाने ले चलने के लिए हर घड़ी दबाव देते रहते हैं। परिणाम यह होता है कि इन शिविरों में जो लोग सम्मिलित होने आये हैं, उनका कोई प्रयोजन निष्फल हो जाते हैं। इसलिए उचित यही है कि साथ में झुण्ड ले चलने की बात मन में से बिल्कुल निकाल दी जाय। जिन्हें साथ लाया जाय- जिनके लिए आवेदन पत्र भेजकर स्वीकृति माँगी जाय, वे सभी ऐसे होने चाहिए जिनके लिए शिविर प्रधान हो जो निर्धारित विषयों की समता भी समझते हों। बुड्ढे बीमार, सड़े गले, एवं अशिक्षित स्त्री बच्चों को तीर्थ यात्रा के बहाने लेकर चलना सत्र के मूलभूत उद्देश्य को ही समाप्त करना है। वाक्छल अपनाकर ऐसे लोगों के लिए स्वीकृति प्राप्त करने की चतुरता किसी को भी नहीं दिखानी चाहिए।

भोजन निवास आदि का प्रबंध आश्रम में है। वस्त्र अपने लेकर चलना चाहिए। कुर्ता धोती सभी के लिए आवश्यक परिधान है। पेन्ट, तहमद, अण्डरवियर पहनकर अनगढ़ पोशाक में फिरते रहना वर्जित है। नौ दिनों में एक गायत्री अनुष्ठान करना होता है। अन्य साधनाएँ भी जो आवश्यक समझी जाती हैं, बताई या कराई जाती हैं। दिनचर्या, प्रातः से सायंकाल तक की व्यस्त हैं उसमें जहाँ-तहाँ भटकने की न तो गुंजाइश है और न आज्ञा। नौ दिनों के बीच में ही दो दिन आधे-आधे दिन के लिए पर्यटन की छुट्टी दी जाती हैं जिसमें एक दिन हरिद्वार से सम्बन्धित और एक दिन में ऋषिकेश के समीपवर्ती स्थान देख लिए जाते हैं। शिविरों सत्संग प्रवचन के विषय व्यक्तित्व परिष्कार, परिवार निर्माण एवं समाजगत सद्व्यवहार का प्रचलन मुख्य विषय हैं। आध्यात्मिकता का पुट तो इन सभी प्रसंगों में आदि से अन्त तक रहता है। व्यक्ति गत समस्याओं से समाधान सम्बन्धी परामर्श का भी उचित अवसर मिलता है। साधना, स्वाध्याय, संयम और सेवा आत्मोत्कर्ष के यह चार प्रमुख सोपान हैं। इन्हें निबाहा जाय, इसका हर व्यक्ति की मनःस्थिति एवं परिस्थिति के अनुरूप ऐसा निर्धारण किया जाता है। जो बिना किसी कठिनाई के भविष्य में भी कार्यान्वित हो सके।

एक मास के युग शिल्पी सत्र और नौ दिन के जीवन साधना सत्रों का अन्तर भली भाँति समझा जाना चाहिए। किसमें आना है? कब आना है? इसका स्पष्ट उल्लेख करना चाहिए, युग शिल्पी सत्रों के प्रमुख विषय हैं। (1) सुगम संगीत (2) भाषण सम्भाषण (3) पौरोहित्य के माध्यम से लोक शिक्षण (4) जड़ी बूटी उपचार (5) सत्प्रवृत्ति संवर्धन एवं दुष्प्रवृत्ति उन्मूलन के लिए कार्यान्वित किये जाने एवं दुष्प्रवृत्ति उन्मूलन के लिए कार्यान्वित किया जाने वाले आवश्यक विधि विधान और उनके बीच आने वाले मोड़-तोड़ो का समाधान।

प्रज्ञा मिशन में परिजनों में से जो कोई हरिद्वार आये हिमालय यात्रा के लिए उधर से गुजरे वे शान्ति कुँज ब्रह्मवर्चस् का दर्शन, अवलोकन किये बिना न जायें। यह युग तीर्थ है। उसमें (1) ऋषि परम्परा (2) साधना परम्परा (3) तीर्थ परम्परा (4) पौरोहित्य परम्परा (5) आरण्यक परम्परा (6) आयुर्वेद परम्परा (7) ज्योतिर्विज्ञान परम्परा आदि अनेक परम्पराओं का ऐसा समन्वय मिलेगा जैसा कदाचित ही कहीं अन्यत्र देखने को मिले। इस दर्शन से प्राचीन काल का समयुग अवधि का साधु ब्राह्मण वानप्रस्थ परिपाटी का प्रत्यक्ष दर्शन मिलता है और देखने वाला कृत कृत्य होकर लौटता है। अपनी यात्रा को सार्थक मान कर लौटता है।

प्रज्ञा मिशन में परिजनों में से जो कोई हरिद्वार आये हिमालय यात्रा के लिए उधर से गुजरे वे शान्ति कुँज ब्रह्मवर्चस् का दर्शन, अवलोकन किये बिना न जायें। यह युग तीर्थ है। उसमें (1) ऋषि परम्परा (2) साधना परम्परा (3) तीर्थ परम्परा (4) पौरोहित्य परम्परा (5) आरण्यक परम्परा (6) आयुर्वेद परम्परा (7) ज्योतिर्विज्ञान परम्परा आदि अनेक परम्पराओं का ऐसा समन्वय मिलेगा जैसा कदाचित ही कहीं अन्यत्र देखने को मिले। इस दर्शन से प्राचीन काल का समयुग अवधि का साधु ब्राह्मण वानप्रस्थ परिपाटी का प्रत्यक्ष दर्शन मिलता है और देखने वाला कृत कृत्य होकर लौटता है। अपनी यात्रा को सार्थक मान कर लौटता है।

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