षोडश संस्कारों के मूल में निहित तत्वज्ञान
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मनुष्य के व्यक्तित्व के विकास में संस्कारों का सर्वप्रथम स्थान है। लोगों का सदा से ही विश्वास रहा है कि मनोविचारों का प्रभाव मनुष्य की कार्य करने की प्रवृत्ति और शक्ति पर पड़ता है। इस प्रकार संस्कार भविष्य के लिए प्रगति का संदेश देते हैं और उत्साह बढ़ाते हैं। मानव जीवन की प्रगति के पथ में संस्कार सोपान के समान हैं, जो क्रम से उसको अधिक ऊँचा उठाते जाते हैं। मुनिवर पराशर ने संस्कारों की उपयोगिता का उल्लेख इन शब्दों में किया है-”जिस प्रकार चित्रण अनेक रंगों के द्वारा प्रस्फुटित होता है, वैसे ही विधिपूर्वक संपन्न किए हुए संस्कारों के द्वारा व्यक्ति में ब्राह्मणत्व का विकास होता है।”
भारतीय संस्कृति के अनुसार मनुष्य के जीवन का एक मात्र यही उद्देश्य माना गया है कि वह अपने जीवनकाल में अधिक से अधिक सुख एवं आनंद की प्राप्ति करे और जीवन के पश्चात् उसे स्वर्ग अथवा मुक्ति की प्राप्ति हो। अतः सर्वप्रथम आवश्यकता यह है कि मानव जीवन दीर्घायु हो। उपनिषद्कारों ने सौ वर्ष के कर्मठ जीवन की कल्पना की थी। “कुर्वन्नेवेह कर्माणिजिजीविषेच्छते समाः!” सौ वर्ष के जीवन में पूर्ण आनंद की प्राप्ति के लिए आवश्यक था कि शरीर स्वस्थ रहे और इन्द्रियाँ सशक्त रहें। तभी तो जीवन में आनंद की प्राप्ति संभव हो सकती है। इसी को ध्यान में रखते हुए ऋषियों ने सभी दिशाओं में व्यक्तित्व के विकास के लिए योजनायें बनाईं। मानव के व्यक्तित्व का विकास जितनी मात्रा में जिस दिशा में हो पाता है, उतनी ही मात्रा में उस दिशा में जीवन की सफलता संभव होती है। देव संस्कृति के अंतर्गत व्यक्तित्व के विकास का प्रथम सोपान संस्कार परंपरा के माध्यम से ही आरंभ हुआ।
आयुर्वेदिक रसायन बनाने की अवधि में उन पर कितने ही संस्कार डाले जाते है। कई बार कई प्रकार के रसों में उन्हें गजपुट आदि विधियों द्वारा अग्नि में जलाया, तपाया जाता है, तब कहीं, वह रसायन ठीक तरह तैयार होती है और साधारण-सी राँगा, जस्ता, ताँबा, लोहा, अभ्रक, सोना, जैसी कम महत्व की धातु चमत्कारिक शक्ति संपन्न बन जाती हैं। ठीक इसी तरह मनुष्य को भी समय-समय पर विभिन्न आध्यात्मिक उपचारों द्वारा सुसंस्कृत बनाने की महत्वपूर्ण पद्धति भारतीय तत्व वेत्ताओं ने विकसित की थी। उसका परिपूर्ण लाभ उस देशवासियों ने हजारों लाखों वर्षों से उठाया है। किसी व्यक्ति को सुसंस्कृत बनाने के लिए शिक्षा, सत्संग, वातावरण, परिस्थिति, सूझ-बूझ आदि अनेक बातों की आवश्यकता होती है। सामान्यतः ऐसे ही माध्यमों से लोगों की मनोभूमि विकसित होती है। इसके अतिरिक्त तत्ववेत्ताओं ने मनुष्य की अंतः भूमिका को श्रेष्ठता की दिशा में विकसित करने के लिए कुछ ऐसे सूक्ष्म उपचारों का भी आविष्कार किया है जिनका प्रभाव शरीर तथा मन पर ही नहीं सूक्ष्म अंतः करण पर भी पड़ता है और उसके प्रभाव से मनुष्य को गुण, कर्म, स्वभाव की दृष्टि से समुन्नत स्तर की ओर उठने में सहायता मिलती है।
इस आध्यात्मिक उपचार का नाम “संस्कार” है। संस्कार का अर्थ है किसी वस्तु को ऐसा रूप देना, जिसके द्वारा वह अधिक उपयोगी बन जाये। उपवन में लगाये हुए किसी पौधे को प्रकृति जब अपने ढंग से बढ़ती जाती है तो माली अपनी कैंची से उस पौधे की टहनियाँ और पत्तों को काट-छाँट कर अन्य पौधों के सामंजस्य में लाकर उसका संस्कार करता है। मानव के संस्कार के द्वारा उस योजना का बोध होता है जो उसकी शारीरिक और मानसिक शुद्धि के साथ ही उसके समक्ष भावी जीवन की उत्थानमयी परंपरा प्रस्तुत करती है। संस्कार प्रायः व्यक्तिगत होते हैं पर ऐसा होने पर भी संस्कार संपादन की साधारणतः सारी प्रक्रियायें सामूहिक होती हैं और इस प्रकार समाज के समक्ष समय-समय पर जीवन के उच्चतम आदर्शों की प्रतिष्ठा होती रहती है। भारत की सदा से धारणा रही है कि मानव के व्यक्तित्व विकास के लिए आध्यात्मिक दिशाओं का तत्वानुशीलन और अनुपालन तथा गुरुजनों द्वारा किसी व्यक्ति के आत्मिक प्रगति के लिए कामना करना विशेषतः वैदिक मंत्रों के माध्यम से प्रभावोत्पादक और समर्थ सिद्ध होता है। संस्कार की प्रक्रियाओं में देवताओं के समक्ष शुद्ध, संस्कृत और उन्नतोन्मुख भावी जीवन की प्रतिज्ञा की जाती है। इसके पीछे तथ्य यह है कि भावनाओं और विचारों के अनुकूल हमारी परिस्थितियों की रूपरेखा बनती है और इन्हीं के अनुरूप हमारी शक्तियों और प्रवृत्तियों का विकास या ह्रास होता है।
संस्कार विधि में दिव्य शक्तियों का आवाहन और उनके ग्रहण की कल्पना का उदय धर्म की तत्संबंधी चेतना को प्रकट करता है। यह आयोजन शुभ और कल्याण की अभिवृद्धि तथा अशुभ अमंगल के निवारण के लिए प्रधान रूप से होता रहा है। संस्कृति के आदिकाल से ही मानव के जीवन में नित्य ही ऐसे अवसर आते रहे हैं, जब वह दिव्य शक्तियों का सहारा ढूँढ़ता रहा है। भावी जीवन को कल्याणमय और अभ्युदयशील बनाने का विचार स्वाभाविक है। ऐसी परिस्थिति में वह निश्चयपूर्वक कहा जा सकता है कि संस्कृति के आदिकाल से ही संस्कारों का प्रचलन किसी न किसी रूप में प्रत्येक भू भाग में सदा ही रहा है और रहेगा।
दैवी संस्कृति के अंतर्गत संस्कार 16 प्रकार के हैं जिन्हें ‘षोडश संस्कार’ कहते हैं। माता के गर्भ में आने के दिन से लेकर मृत्यु तक की अवधि में समय-समय पर प्रत्येक दैवी संस्कृति के अनुयायी को 16 बार संस्कारित करके एक प्रकार का आध्यात्मिक रसायन का रूप प्रदत्त किया जाता रहा है। प्राचीनकाल में प्रत्येक भारतीय इसी प्रकार का एक जीता जागता रसायन होता था। मनुष्य शरीर में रहते हुए भी उसकी आत्मा देवताओं के स्तर की बनती थी। यहाँ के निवासी ‘भूसुर’ अर्थात् पृथ्वी के देवता कहे जाते थे। उनके निवास की यह पुण्य भूमि भारत माता ‘स्वर्गादपि गरीयसी’ समझी जाती थी, संस्कारवान व्यक्तियों को तथा उनके निवास स्थान को ऐसा गौरव मिलना उचित भी था।
सोलह संस्कारों में गर्भाधान, पुँसवन, सीमंत, जातकर्म, नामकरण, निष्क्रमण, अन्नप्राशन, चूड़ाकर्म, कर्णवेध, उपनयन, वेदारंभ, समावर्तन, विवाह, वानप्रस्थ, संन्यास, व अन्त्येष्टि इस क्रम से वर्णित किये गये हैं, किंतु आज के समय में जो व्यावहारिक नहीं हैं, या जिनकी उपयोगिता नहीं रही, उन छः को छोड़कर तथा जन्म दिवस, विवाह दिवस जैसे आज के दो महत्वपूर्ण संस्कारों को जोड़कर कुल बारह संस्कार ऐसे हैं, जो अपनी वैज्ञानिक महत्ता से समूचे समाज को नयी दिशा दे सकते हैं। इसमें प्रयत्न यह भी किया गया है कि जिन संस्कारों को छोड़ना पड़ा है उनकी महत्वपूर्ण प्रक्रियायें एवं शिक्षायें उन संस्कारों में जोड़ दी जायँ जिन्हें उन्हीं दिनों मनाया जाता है। गर्भाधान, पुँसवन, सीमंत, इन तीनों की प्रमुख प्रक्रिया गर्भवती के लिए नियत एक ही संस्कार में जोड़ दी गयी है। जातकर्म और नामकरण का विधान सम्मिलित बना दिया गया है। वेदारंभ के पश्चात् उपनयन एवं समावर्तन का विधान एक ही यज्ञोपवीत संस्कार में है। अतः उपयोगी संस्कारों में पुँसवन, नामकरण, अन्नप्राशन, चूड़ाकर्म, उपनयन, विद्यारंभ संस्कार युवावस्था के पूर्व के हैं। जन्म काल से लेकर युवावस्था तक पहुँचते समय छःहों संस्कार महत्वपूर्ण मोड़ पर लगाये गये दिशा निर्देश पट्टिका का प्रथम भाग, अथवा पूर्वार्ध है। उत्तरार्ध में विवाह, वानप्रस्थ, अंत्येष्टि तथा श्राद्धतर्पण महत्वपूर्ण है। इसमें पारिवारिक सुख शाँति से लेकर मृत्यु जैसी संवेदना पूर्ण स्थिति में मानसिक संतुलन बिठाये रखने का महत्वपूर्ण अभ्यास सम्मिलित है। जन्म दिवस एवं विवाह दिवस संस्कार व्यक्तिगत एवं पारिवारिक जीवन में आत्म समीक्षा करने के लिए प्रेरित करते हैं। इनके माध्यम से व्यक्तिगत एवं दाम्पत्य जीवन में उगने वाले खरपतवारों की सफाई वर्ष में एक बार की जाती है और नया उत्साह एवं उमंग के वातावरण में भविष्य को उज्ज्वल बनाने का संकल्प किया जाता है। युगानुकूल परिस्थितियों में ये दोनों ही संस्कार अत्यंत महत्वपूर्ण हैं।
हमारी प्राचीन महत्ता एवं गौरव गरिमा को गगनचुँबी बनाने में जिन अनेक सत्प्रवृत्तियों को श्रेय मिला था उसमें एक बहुत बड़ा कारण यहाँ की संस्कार पद्धति को भी माना जा सकता है। यह पद्धति सूक्ष्म अध्यात्म विज्ञान की अति प्रेरणाप्रद प्रक्रिया पर अवलंबित है। वेद मंत्रों के सस्वर उच्चारण से उत्पन्न होने वाली ध्वनि तरंगें, यज्ञीय उष्मा के साथ संबद्ध होकर एक अलौकिक वातावरण प्रस्तुत करती हैं। जो भी व्यक्ति इस वातावरण में होते हैं या जिनके लिए भी उस पुण्य प्रक्रिया का प्रयोग होता है वे उससे प्रभावित होते हैं। यह प्रभाव ऐसे परिणाम उत्पन्न करता है जिससे व्यक्तियों के गुण-कर्म-स्वभाव आदि की अनेकों विशेषताएं प्रस्फुटित होती हैं। संस्कारों की प्रक्रिया एक ऐसी आध्यात्मिक उपचार पद्धति है जिसका परिणाम व्यर्थ नहीं जाने पाता। व्यक्तित्व के विकास में इन उपचारों से आश्चर्यजनक सहायता मिलती देखी जाती है। परिवार को संस्कारवान बनाने की, कौटुँबिक जीवन को सुविकसित बनाने की एक मनोविज्ञान सम्मत एवं धर्मानुमोदित प्रक्रिया को संस्कार पद्धति कहा जाता है। हर्षोत्सव के वातावरण में देवताओं की साक्षी, अग्निदेव की उपस्थिति, धर्म भावनाओं से ओत−प्रोत मनोभूमि, स्वजन संबंधियों की उपस्थिति पुरोहितों द्वारा कराया हुआ धर्मकृत्य, यह सब मिल-जुलकर संस्कार से संबंधित व्यक्ति को एक विशेष प्रकार की मानसिक अवस्था में पहुँचा देते हैं।
संस्कार के समय जो प्रतिज्ञायें की जाती हैं, वे अपना गहरा प्रभाव सूक्ष्म मन पर छोड़ती हैं और वह बहुधा इतना गहरा एवं परिपक्व होता है कि उसकी छाप अमिट नहीं तो चिरस्थायी अवश्य बनी रहती है। संस्कारों के द्वारा अंतर्मन पर ऐसी छाप डाली जाती है जो किसी व्यक्ति को सुसंस्कृत सुविकसित, सौजन्ययुक्त एवं कर्तव्य परायण बनाने में समर्थ हो सके। ऋषियों ने अपनी आध्यात्मिक एवं मनोवैज्ञानिक शोधों के आधार पर इस पुण्य प्रक्रिया का निर्माण किया है। वह जितनी प्रभावशाली पूर्वकाल में थी उतनी ही आज भी है, यदि उसे ठीक ढंग से उचित व्यवस्था के साथ, उपयुक्त भारतीय संस्कृति का यह उपादान मनुष्य को महामानव, बनाने की दिशा में एक महत्वपूर्ण सोपान है।

