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Magazine - Year 1995 - Version 2

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चलें काल से परे, समझें महाकाल को

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समय का एक नाम ‘काल’ भी है। इसी से ‘महाकाल’ शब्द बना है। महाकाल अर्थात् काल का अधीश्वर। भौतिक जगत में जिसने इस काल को पहचान लिया और उसका सही-सही सदुपयोग करना सीख गया, समझना चाहिए उसने समय-देवता को जीत लिया। समय की आराधना प्रकाराँतर से महाकाल की ही उपासना है।

संसार में समय को सर्वोपरि शक्ति के रूप में मान्यता मिली है। यों शक्तियां प्रायः चुकती, बनती और बदलती रहती हैं, पर एकमात्र काल ही ऐसी शक्ति है, जिसका कभी क्षय नहीं होता। इसी बात को गीता में भी कहा गया है। भगवान कहते हैं-”अहमेवाक्षयः कालो.....” अर्थात् मैं अक्षय काल हूँ। यहाँ इस जगत में सब कुछ क्षणिक और क्षणभंगुर है। सब क्षीण होता रहता है। जो जन्मता है, वह मरता भी है। शाश्वत और सनातन यहाँ कुछ भी नहीं। परिवर्तन चक्र यहाँ सतत् गतिशील है। परिवर्तन अवधि को ही काल कहते हैं। यह काल हमें बदलता प्रतीत इसलिए होता है क्योंकि उसे घटनाओं के परिप्रेक्ष्य में हम देखते हैं। घटनाएँ घटती और गुजरती रहती हैं। अनादि काल से यह क्रम चलाता आ रहा है और अनंत काल तक चलता रहेगा, फिर भी समय वही रहेगा। सृष्टि का जब जन्म हुआ था, तब भी समय वही था और आज जब वह बूढ़ी हो चली है, तब भी समय वही है। वह स्थिर है। जो अस्थिर है, वह सृष्टि है। बदलाव उसी में होता है, वही गतिवान और प्रवाहवान है, पर आँखों को बदलता और बहता समय प्रतीत होता है। यही दृष्टिभ्रम है जबकि काल स्वयं में न तो छोटा है, न बड़ा। वह तो सदा एक जैसा स्थिर है। उसका छोटा-बड़ा होना हमारी अपनी गति पर निर्भर है। यदि भ्रमण प्रकाश जितनी गति से कर पाना संभव हो, तो समय को और ज्यादा सिकोड़ा जा सकता शक्य है। इसी प्रकार यदि किसी ऐसे सूक्ष्म लोक में हम जा सकें, जहाँ पर काल की गति और भी तीव्र हो, तो समय सिकुड़ कर वहाँ अत्यन्त छोटा हो जायेगा। ऐसे में जो कार्य पाँच मिनट में संपन्न होगा, उसके पूरा होने में पृथ्वी पर 5 वर्ष जितना लंबा समय लग सकता है। अलौकिक घटनाक्रमों के मध्य काल के इस प्रकार फैलने और सिकुड़ने की अप्रत्याशित अनुभूति कई बार हो जाती है।

घटना हाबड़ा (प॰ बंगाल) के प्रसिद्ध संत शिव रामकिंकर योगत्रयानन्द के जीवन से संबद्ध है। बहुत दिनों से उन्हें पाणिनि व्याकरण पर पतंजलिकृत महाभाष्य पढ़ने की तीव्र इच्छा थी, किंतु बंगाल में उन दिनों इस ग्रंथ का कोई योग्य विद्वान था नहीं। जो थे, वे बनारस रहते थे। अस्तु बनारस जाकर उन्होंने महाभाष्य पढ़ने का निश्चय किया। तब वहाँ व्याकरण आचार्यों में पंडित गोविंद शास्त्री का बड़ा नाम था शिव रामकिंकर ने उन्हीं से शास्त्र अध्ययन करने की सोची और एक दिन इस आशय का निवेदन लेकर उनके समक्ष उपस्थित हुए। उस दिन पंडित जी ने समय नहीं होने का बहाना बना कर उन्हें लौटा दिया। दूसरे दिन जब वे आये, तब भी उन्होंने अवकाश नहीं होने की बात कही। तीसरे दिन शिव रामकिंकर पुनः आये, किंतु आज भी वही पुराना उत्तर मिला, साथ ही यह भी स्पष्ट कर दिया कि वे कोई अन्य आचार्य तलाशें। उनके पास पहले से ही इतने विद्यार्थी हैं कि किसी दूसरे को अब समय दे पाना बिल्कुल भी संभव नहीं। दो टूक उत्तर पाकर शिव रामकिंकर एकदम हताश हो गये। चलते समय उन्होंने पंडित जी के पैर पकड़ लिये और बड़े दीन भाव से किंचित समय निकाल लेने की प्रार्थना की। आचार्य इतने दयालु थे नहीं कि द्रवित हो उठते। क्रुद्ध होकर पैर झटकते हुए उन्होंने वहाँ से चले जाने को कहा और स्वयं कमरे से बाहर निकल गये।

आचार्य के इस व्यवहार से वे बहुत दुखी हुए। उसी क्षण उन्होंने संकल्प किया कि ज्ञानार्जन के निमित्त अब वे किसी के पास नहीं जायेंगे। अपमान और उपेक्षा की वेदना इतनी गहरी थी कि वे उस दिन भोजन नहीं कर सके और बिना खाये सो गये, पर नींद भी कहाँ आने वाली थी। बार-बार उनके मन में वही दृश्य उभर उठता और स्वयं को कोसते हुए कहते “कितना अभागा हूँ! जिज्ञासा होने पर भी ज्ञान-दान करने वाला कोई नहीं” यह सोचते हुए मध्य रात्रि के करीब उनकी आँखें लग गईं। एक घंटे पश्चात् नींद अचानक खुली, तो कमरे को दिव्य आलोक से आलोकित पाया। सामने देखा, तो एक सौम्य मानव-मूर्ति जर्जर, किंतु तेजस्वी काया में करुण नेत्रों से उनकी ओर निहार रही है। कुछ क्षण पश्चात् उनकी मधुर वाणी मुखरित हुई-”दुख मत कर। किसी ने तुम्हें महाभाष्य नहीं पढ़ाया तो क्या हुआ? मैं पढ़ाऊँगा। मैंने ही उसकी रचना की है। जा ग्रंथ ले आ।” यह सुनकर शिव रामकिंकर गदगद हो उठे। महापुरुष को साष्टाँग प्रणाम निवेदित किया और महाभाष्य ले आये। इसके बाद वे दिव्य पुरुष ग्रंथ पढ़ाने लगे। आरंभ से लेकर अंतिम सूत्र की विशद् व्याख्या की। ग्रंथ जब समाप्त हुआ, तो वे आशीर्वाद देकर अंतर्धान हो गये। चेतना लौटने पर शिव रामकिंकर अपने भाग्य को सराहने लगे। खुशी के मारे उनके नेत्र सजल हो उठे, तभी सामने की दीवार पर टँगी घड़ी पर अकस्मात् दृष्टि गई। ठीक 15 मिनट बीते थे। वे कुछ आश्चर्य में पड़ गये। महाभाष्य की ओर नजरें गईं, तो वह इतना मोटा था कि पंद्रह मिनट तो क्या, पंद्रह घंटे में भी उसे पूरी तरह पढ़ और हृदयंगम कर पाना कठिन था। परीक्षा के लिए उन्होंने उसे उलटना-पलटना आरंभ किया, तो यह जानकर घोर अचंभा हुआ कि सारे सूत्र उनके पढ़े हुए हैं। जिस भी सूत्र पर निगाहें जमतीं, उसी की व्याख्या मस्तिष्क में घुमड़ने लगती। इससे उन्हें यह निश्चय हो गया कि उन देवपुरुष ने आद्योपाँत ग्रंथ पढ़ाया है, पर इतने कम समय में अध्यापन कैसे संभव हो सका? इस उलझन को वे किसी भी प्रकार नहीं सुलझा सके।

वस्तुतः उपरोक्त घटना त्रिआयामी विश्व से परे एक ऐसे सूक्ष्म संसार की है जहाँ का टाइम-स्केल स्थूल जगत से भिन्न है। वहाँ कार्य-संपादन की गति इतनी तीव्र होती है कि समय सिकुड़ने लगता है, जबकि प्रत्यक्ष जगत में यह गति इतनी मंद है कि समय फैलता प्रतीत होता है। यही कारण है कि समय के दूसरे आयाम में जो कार्य पार्थिव घड़ी के हिसाब से 15 मिनट में संपन्न होता प्रतीत होता है, उसी को स्थूल विश्व में संपादित करने पर 15 दिन जितना लंबा अंतराल लग जाता है। ऐसा इसलिए होता, क्योंकि दोनों प्रकार के लोकों में समय और क्रिया के बीच की गति में अंतर है। इहलोक में समय का वेग भीषण है, जबकि अदृश्य लोकों में उसकी रफ्तार क्रिया के आगे धीमी पड़ने लगती है। यदि किसी प्रकार क्रिया का वेग बढ़ा कर समय के बराबर कर दिया जाय, तो एक ऐसी भी अवस्था आयेगी, जहाँ समय में ठहराव का आभास मिलेगा, अर्थात् समय का बोध समाप्त हो जायगा। विज्ञानवेत्ताओं के अनुसार यह स्थिति ब्लैक होल में उत्पन्न होती हैं, किंतु आत्मवेत्ता इसे अंतर्जगत की सर्वोपरि उपलब्धि के रूप में स्वीकारते हैं। उनका मानना है कि इस दिव्य उपलब्धि का झण ऐसा होता है, जिसमें समय के अभाव का अनुभव होता है। ऐसा लगता है, जैसे काल के पंख लग गये और वह उड़ गया। यही वह अवस्था है, जिसे अध्यात्म विज्ञान में ब्रह्मानंद-दिव्यानंद की समय-शून्य अवस्था कहकर अभिहित किया गया है।

प्रभु ईशु से एक बार एक जिज्ञासु ने प्रश्न किया कि आप जिस अलौकिक राज्य की चर्चा करते हैं, वहाँ विशेष बात क्या होगी? उनने उत्तर दिया-”वहाँ ‘समय’ नहीं होगा। यही उसकी सबसे बड़ी विशिष्टता होगी।”

सचमुच महावीर से लेकर मुहम्मद साहब तक सब इस एक तथ्य को अंगीकार करते हैं कि ईश्वर-प्राप्ति के क्षण समय का अस्तित्व नहीं रहता। सभी इस बात पर सहमत हैं कि वह जो पल है वह वास्तव में “टाइमलैस मूवमेंट-कालातीत अवस्था” है। इस अवस्था में योगियों का प्राण कंपन और काल की गति एकदम बराबर होती है। इसके उपराँत यदि प्राण-वेग को और बढ़ा दिया जाय, तो फिर काल के विगत और अनागत वाले हिस्से में प्रवेश कर सकना संभव है। यती लोग इसी प्रक्रिया द्वारा भूत और भविष्य के अंतराल में उतरते और अविज्ञात का ज्ञान प्राप्त करते है। परिष्कृत अभ्यस्त चेतना द्वारा ही यह सब संभव है। जिनकी देह-चेतना अनभ्यस्त और अनाड़ी स्तर की है, उनके लिए यह कार्य आकाश कुसुम खिलाने जैसा है। वहाँ चेतना के काल-गह्वर में उतर पाना तो क्या, शरीर से बाहर निकलना भी अशक्य जैसा बना रहता है, किंतु जो ऐसा कर पाते हैं और जिनने इतनी सामर्थ्य अर्जित कर ली है कि काया से बाहर आ सकें, वे इसे स्पष्ट अनुभव करते हैं कि किस प्रकार इस अवस्था में समय संबंधी अवरोध बिल्कुल समाप्त हो जाता है। यदि इस स्थिति में वर्षों रह कर फिर शरीर में प्रवेश किया जाय, तो प्रवेशार्थी को ऐसा आभास होगा, मानो अभी कुछ ही क्षण बीते हैं। कारण यह है कि प्रत्यक्ष विश्व से परोक्ष विश्व का टाइम-स्केल भिन्न है। जैसे-जैसे अधिकाधिक सूक्ष्म की गहराई में उतरते जायेंगे, वैसे ही वैसे टाइम-स्केल संबंधी पृथकता बढ़ती जायगी और अवधि उत्तरोत्तर और सिकुड़ती चली जायेगी।

सामान्यतः मनुष्य का क्रिया-व्यापार जाग्रत अवस्था में संपन्न होता है। इस अवस्था का जो समय है, वह मानव द्वारा निर्मित है। यह वह काल नहीं, जिसे भगवान ने ‘अक्षय काल’ कहा है। इसलिए पृथ्वी का समय बीतता रहता है। सूर्योदय हुआ-सुबह हो गई, दिन का प्रारंभ हुआ। शाम हुई, अंधेरा घिरा-रात आ गई। दिन समाप्त हुआ। इस प्रकार 24 घंटे बीत गये। काल संबंधी यह विभाजन पृथ्वी और सूर्य पर आधारित है तथा आदमी द्वारा बनाया गया है। पृथ्वी को चौबीस भागों में विभक्त कर दिन-रात को उतने ही घंटों में बाँट दिया गया। घंटे साठ मिनटों में और हर मिनट को पुनः साठ सेकेण्डों में विभाजित किया गया। यह हमारी अपनी व्यवस्था है, प्रकृति की नहीं। निसर्ग में तो वह अविभाज्य है। जाग्रत में सामान्य चेतना की दशा में हम इसी काल विभाजन से अपना काम चलाते हैं। इससे जब कुछ गहराई में उतरते हैं, तो यह विभाजन स्वतः ही समाप्त हो जाता है, किंतु फिर भी भिन्न-भिन्न चेतना स्तर अपनी सूक्ष्मता के आधार पर टाइम-स्केल की पृथकता बनाये रखते हैं। स्वप्न, सुषुप्ति और तुरीय यह चेतना की शेष तीन अवस्थाएँ हैं। काल-विज्ञान के अनुसार चेतना की सबसे मंदगति जाग्रत अवस्था में है, इसी कारण समय उसमें असाधारण रूप से बड़ा प्रतीत होता है। तुरीय अर्थात् समाधि की स्थिति में उसकी गति सर्वाधिक होती है, इसलिए उस दिशा में समय का बंधन समाप्त हो जाता है। तुरीयावस्था प्राप्त एक योगी जितनी अवधि में पृथ्वी की परिक्रमा कर लेता है, यदि वही प्रदक्षिणा जाग्रत अवस्था में की जाये तो शायद पूरा जीवन बीत जायगा। स्वप्न, चेतना की दृष्टि से जाग्रत से कुछ उच्चावस्था है, अतएव समय का वेग थोड़ा मंद पड़ जाता है। सपनों की अवधि मुश्किल से पाँच-सात मिनट की होती है, किंतु जब आँख खुलती है और दृष्टि घड़ी पर जाती है, तो आश्चर्य होता है कि इतने स्वल्प काल में स्वप्न द्रष्टा ने जीवन के विशाल भाग का सफर तय कर लिया। उसका विवाह हो गया, नौकरी लग गई, बच्चे हो गये और अब शादियाँ हो रही हैं। घड़ी इस संपूर्ण अवधि को मात्र पाँच मिनट बता रही है, जबकि व्यवहारिक जीवन में इस यात्रा में तीन चौथाई भाग खप जाता। यह कैसे हुआ? हमारी अपनी गति के कारण। उसमें चेतना-कणों का वेग बढ़ गया और उस प्रतिस्पर्धा में समय पिछड़ गया, हम आगे निकल गये, जिससे युगों का कार्य पलों में पूरा होता दिखाई पड़ता है। सुषुप्ति की रफ्तार उससे भी तीव्र है और सर्वाधिक है तुरीयावस्था की, जिसमें फिर समय आड़े नहीं आता। किसी संकटग्रस्त शिष्य ने पृथ्वी के सुदूर कोने में गुरु का स्मरण किया और पलक झपकते ही उसे सहायता मिल जाती है, न तो समय संबंधी रुकावट सामने आती है, न विशाल भौगोलिक दूरी। कारण एक ही है वेग का अत्यधिक बढ़ जाना।

टेलीपैथी, क्लेयरवायन्स आदि भी चेतना की भिन्न-भिन्न अवस्थाएँ हैं, जिनमें समयाँतराल सिमट कर छोटा-सा हो जाता है। गुरु, दुर्गम हिमालय में साधनारत है और शिष्य पृथ्वी के दूसरे छोर-अमेरिका में रह रहा है। दोनों के मध्य कोई भौतिक संचार माध्यम उपलब्ध नहीं, किंतु फिर भी शिष्य का मार्गदर्शन होता रहता है। यह सब घड़ी भर में घटित हो जाता है। यदि उस घटना को जिसे उसने अनुभूति स्तर पर आत्मसात् किया है, लिखें तो कदाचित् घंटे भर का भी समय लग सकता है, किंतु टेलीपैथी क्रम में उतना बड़ा प्रसंग क्षणमात्र में घट जाता है। कारण कि घटनाक्रम को सुस्त बनाने वाले भौतिक व्यवधान वहाँ नहीं रहे।

महाभारत के दौरान भगवान द्वारा गीता का उपदेश भी वस्तुतः ऐसी ही एक प्रक्रिया थी, जिसमें कृष्ण और अर्जुन के मध्य मौन संवाद हुआ था। दोनों ओर की सेनाएँ जब युद्ध के लिए अमादा हों, तो भला इस स्थिति में इतनी फुर्सत कहाँ कि कोई जीवन संबंधी गंभीर दर्शन की शिक्षा दे सके। यदि दे भी तो अर्जुन स्तर का कोई योद्धा, जिस पर युद्ध का बहुत कुछ परिणाम निर्भर है, समयक्षेप कर पराजय को आमंत्रण क्यों कर देगा? नहीं, भगवान द्वारा ऐसा अविवेकपूर्ण कार्य नहीं हो सकता। जो हो सकता है, वह एकमात्र अंतर्संवाद ही है, जिसमें शब्दों का वैखरी प्रयोग न होकर ‘परा’ वाणी प्रयुक्त हुई हो। यह टेलीपैथी है। समरभूमि में यही संभाव्य हो सकती है और व्यवहारिक भी। इसमें समय कितना लगा होगा कहना कठिन है, पर यह निश्चित है कि इस भूमिका में काल का कोई मूल्य और महत्व रह नहीं जाता, बिल्कुल गौण हो जाता है। यही चेतना का सर्वाधिक महत्वपूर्ण पहलू है।

एक बार परमहंस विशुद्धानंद के पास एक श्रद्धालु भक्त आया और अपनी टूटी हुई रुद्राक्ष की माला देकर उसे शास्त्रोक्त ढंग से बना देने का आग्रह किया। परमहंस ने माला अपनी मुट्ठी में बंद कर ली और हाथ को हवा में दो-चार बार लहराया। इसके बाद उस शिष्य की ओर बढ़ाते हुए कहा-”यह लो तैयार हो गई।” माला सचमुच बहुत अच्छे ढंग से गुँथी हुई थी। इतनी जल्दी यह कैसे तैयार हो गई? इस प्रश्न के उत्तर में उन्होंने इतना ही कहा कि गुह्य विषय को सामान्य बुद्धि नहीं समझ सकती, फिर भी इतना जान लो कि यह “क्षण-विज्ञान” के प्रयोग द्वारा विनिर्मित की गई, जिसमें पृथ्वी का एक पल एक वर्ष जितना खिंच कर लंबा हो जाता है।

समय को घटा-बढ़ा सकना साधारण स्थिति और अवस्था में भी संभव है। एक महामानव, जो काल के हर कण का सुनियोजित ढंग से उपयोग करता है, समय को इतना लघु बना लेता है कि कब वह जवान से बूढ़ा हो गया, पता ही नहीं चलता। इस मध्याँतर में उसने इतने ढेरों कार्य कर लिये, इसकी प्रतीति तक नहीं होती। जब होती है, तो यह जान कर अचंभा होता है कि इतनी स्वल्प अवधि में कई जन्मों जितने कार्य किस प्रकार बन पड़े। दूसरी ओर वे लोग हैं, जिनके सामने यह पहाड़ की तरह अड़ जाता है, वह काटे नहीं कटता, न बिताये बीतता हैं वस्तुतः समय न तो किसी लिए घटता है, न बढ़ता है-न फैलता, न सिकुड़ता है। यह दो भिन्न जीवनशैलियों के दो भिन्न परिणाम हैं। समय सबको बराबर मिला हुआ है। एक इसी अंतराल में आश्चर्यजनक ढंग से असंख्यों पराक्रम कर दिखाता और महापुरुषों की पंक्ति में आ खड़ा होता है, जबकि दूसरे के लिए पुरुषार्थ तो क्या, जीवन-यात्रा करना भी भारी पड़ने लगता है। एक स्थिति में पलों का अभाव अनुभव होता है, तो दूसरी में वह इतना विशाल कि अनावश्यक मालूम पड़ता है, जबकि दोनों के लिए काल-विस्तार एक जितना है, फिर वह पृथक् परिणतियाँ क्यों? इसे समझने के लिए काल ओर उसकी शक्ति को भली-भाँति जानना होगा, तभी ऐसा कुछ कर पाना शक्य है, जो जीवन में अभिनंदनीय और अभिवंदनीय बनकर प्रस्तुत हो सके।

काल की शक्ति अप्रतिम स्तर की है। इस महाकाली की उपासना भी करते हैं, फिर भी उसके अधिष्ठाता महाकाल और तत्वदर्शन से अनभिज्ञ बने हुए हैं। जिस दिन हम सब ‘काल’ अर्थात् समय को पहचान कर जीवन में उसका समुचित उपयोग कर सकेंगे, समझना चाहिए महाकाल और महाकाली की यथार्थ अभ्यर्थना हमारी उसी दिन से प्रारंभ हुई।

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