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Magazine - Year 1995 - Version 2

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आज की सारी समस्याओं का एक सामान्य हल है-अध्यात्मवाद। यदि शारीरिक, मानसिक और आर्थिक सभी क्षेत्रों में अध्यात्मवाद का समावेश कर लिया जाये और अपना दृष्टिकोण सर्वथा आध्यात्मिक बना लिया जाये तो सारी समस्याओं का समाधान साथ-साथ होता चले और आत्मिक प्रगति के लिए अवसर एवं अवकाश भी मिलता रहे। विषयों में सर्वथा भौतिक दृष्टिकोण रखने से ही सारी समस्याओं का सूत्रपात होता है। दृष्टिकोण में वाँछित परिवर्तन लाते ही सब काम बनने लगेंगे।

अध्यात्मवाद का व्यावहारिक स्वरूप है संतुलन, व्यवस्था एवं औचित्य। शारीरिक समस्या तब पैदा होती है, जब शरीर को भोग साधन समझ कर बरता जाता है। आहार, विहार और रहन-सहन को विचारपरक बना लिया जाता है। इसी अनौचित्य एवं अनियमितता से रोग उत्पन्न होने लगते हैं और स्वास्थ्य समाप्त हो जाता है। सरदी, जुकाम, सिर दर्द, रक्तचाप, हृदय शूल, अजीर्ण, और यहाँ तक कि कभी-कभी असाध्य राज-रोगों का शिकार बनना पड़ता है यह शारीरिक समस्या बड़ी आसानी से हल हो सकती है यदि इसके विषय में दृष्टिकोण को आध्यात्मिक बना लिया जाय। पवित्रता अध्यात्मवाद का पहला लक्षण है। शरीर को भगवान का मंदिर समझ कर उसे सर्वथा पवित्र और स्वच्छ रखा जाय, आत्म-संयम और नियमितता द्वारा शरीर-धर्म का दृढ़तापूर्वक पालन करते रहा जाय तो शारीरिक संकट की संभावना ही न रहे। वह सदा स्वस्थ और समर्थ बना रहे।

लोग अपनी समस्याओं को यथासाध्य सुलझाने का भी प्रयत्न करते हैं, अर्थ संकट आ जाता है, तो सब कुछ भूलकर उसके सुलझाने में लग जाते हैं, शारीरिक समस्या खड़ी हो जाती है, तो उसका उपाय करने लगते हैं और जब कोई मानसिक उलझन में पड़ जाते हैं, तो उसका उपचार सोचते हैं। पर होता यह है कि एक समस्या सुलझाने में लगे रहने से संसार की दूसरी समस्याओं को अवसर मिल जाता है और वे अपना प्रभाव बढ़ा लेती हैं। जैसे शारीरिक समस्या में संलग्न होने पर आर्थिक संकट उठ खड़ा होता है और अर्थ संकट की ओर ध्यान देने पर मानसिक उद्विग्नता आ घेरती है। इस प्रकार एक के बाद एक, कोई न कोई समस्या सामने आती रहती है और मनुष्य का जीवन उसको सुलझाने में ही तबाह हो जाता है। यदि कोई ऐसा उपाय निकल आये जिसको प्रयोग में लाने पर सारी समस्याएँ एक साथ शमन होती रहें तभी कुछ काम बन सकता है।

मनुष्य का मन शरीर से भी अधिक शक्तिशाली साधन है। इसके निर्द्वन्द्व रहने पर मनुष्य आश्चर्यजनक उन्नति कर सकता है। किंतु खेद है कि आज लोगों की मनोभूमि बुरी तरह विकार-ग्रस्त बनी हुई है। चिंता, भय, निराशा, क्षोभ, लोभ और आवेगों का भूकंप उसे अस्त-व्यस्त बनाये रहता है। स्थिरता, प्रसन्नता और सदाशयता का कोई लक्षण दृष्टिगोचर नहीं होता। ईर्ष्या, द्वेष और रोष क्रोध की नष्टकारी चिताएँ जलती और जलाती ही रहती हैं। लोग मानसिक विकारों, आवेगों और असद्विचारों से अर्थ विक्षिप्त से बने घूम रहे हैं। यदि इस प्रचंड मानसिक पवित्रता, उदार भावनाओं और मनःशक्ति का महत्व समझ और निःस्वार्थ निर्लोभ एवं निर्विकारता द्वारा उसको सुरक्षित रखने का प्रयत्न करते चलें तो मानसिक विकास के क्षेत्र में बहुत दूर तक आगे बढ़ सकते हैं।

सुदृढ़, स्वास्थ्य, समर्थ मन, स्नेह सहयोग, क्रिया-कौशल, समुचित धन, प्रगतिशील विकास-क्रम, श्रद्धा सम्मान, सुव्यवस्थित एवं संतुष्ट जीवन का आधार केवल एक ही है-अध्यात्म। अपने को सुधारने से संसार सुधर जाता है। अपने को ठीक कर लेने से चारों ओर का वातावरण ठीक बनने में देर नहीं लगती। यह एक निश्चित तथ्य है कि जो अपने को सुधार न सका, अपनी गति-विधि को सुव्यवस्थित न कर सका, उसका इहलौकिक और पारलौकिक भविष्य अंधकारमय ही बना रहेगा। जो इस लोक को नहीं सँभाल सका उसका परलोक क्या सँभलेगा, जो इस जीवन में नारकीय मनोभूमि लिये बैठा है, उसे परलोक में स्वर्ग मिलेगा ऐसी आशा करना व्यर्थ है। स्वर्ग की रचना इसी जीवन में करनी पड़ती है, दुष्प्रवृत्तियों के भव-बंधनों से इसी जीवन में मुक्त होना पड़ता है। परलोक में यही सफलताएं साकार बन जाती हैं। इसलिए मनीषियों ने मनुष्य की सबसे बड़ी बुद्धिमता उसकी आध्यात्मिक प्रवृत्ति को ही माना है।

शारीरिक स्वास्थ्य की अवनति या बीमारियों की चढ़ाई अपने आप नहीं होती वरन् उसका कारण भी अपनी भूल है। आहार में असावधानी, प्राकृतिक नियमों की उपेक्षा, शक्तियों का अधिक खर्च, स्वास्थ्य नाष के यह प्रधान हेतु हैं जो लोग तन्दुरुस्ती पर अधिक ध्यान देते हैं, स्वास्थ्य के नियमों का ठीक तरह पालन करते हैं वे मजबूत और निरोग बने रहते हैं। योरोप अमेरिका के निवासियों के शरीर कितने स्वस्थ एवं सुदृढ़ होते हैं। हमारी तरह वे भाग्य का रोना नहीं रोते वरन् आहार-विहार के नियमों का सख्ती के साथ पालन करते हैं बुद्धि और विवेक का उपयोग निरोगता के लिए करते हैं, जिससे वे न तो बहुत जल्द बीमार पड़ते हैं, न दुर्बल होते हैं और न अल्पायु में मृत्यु के ग्रास बन जाते हैं।

यह सब बातें अचरज की नहीं स्वाभाविक हैं। रोज ही आँखों के सामने इस प्रकार की घटनायें घटित होती रहती हैं संस्कृत में एक उक्ति है जिसका अर्थ है, “दैव भी दुर्बलों के लिए घातक सिद्ध होता है।” जितना बल है, जीवन है, प्राण है उसके उतने ही सहायक और प्रशंसक हैं। जब इनमें कमी आरंभ हुई कि अपने बिराने बनने लगते हैं और मित्र, शत्रु का रूप धारण करने लगते हैं। दुर्बलता को देखकर अकिंचन जीव भी आक्रमण करने और आधिपत्य जमाने की चेष्टा करते हैं। रणक्षेत्र में घायल और अर्धमूर्त हुए सैनिकों की आँखें कौए निकाल ले जाते हैं और सियार उनका पेट चीर कर आँतें खींचते फिरते हैं। यदि वह सैनिक इस दशा में न होता, स्वस्थ और जीवित होता तो इन कौए और सियारों की हिम्मत पास आने की भी न पड़ती वरन् उससे डर कर अपने प्राण बचाने के लिए भागते फिरते। जीवित मनुष्य जिन चींटियों को पैरों से कुचलता रहता है मृत होने पर वे ही चींटियाँ उस शरीर को नोंच-नोंच कर खाने लगती हैं। गुलाब-सा सुँदर शरीर वृद्ध या रोगी होने पर कुरूप एवं घृणास्पद बन जाता है।

संसार में अनेकों सुँदर दृश्य, पदार्थ मौजूद हैं पर यदि अपनी आँखें जाती रहें दिखाई न पड़े तो सृष्टि के सभी पदार्थ अदृश्य हो जायेंगे, सर्वत्र अंधकार ही छाया दीखेगा। दृश्य पदार्थों की सारी सुँदरता नष्ट हो जायेगी।

जिस वेश्या पर यौवनकाल में प्रेमीजन चील-कौओं की तरह मँडराते रहते थे वृद्धा होने पर उसके पास कोई दुःख दर्द की भी सुध लेने नहीं जाता। माता से जब तक बालक दूध तथा जीवन धारण करने की सुविधाओं को प्राप्त करने के लिए उस पर निर्भर रहता है तब तक उससे अत्यधिक प्रेम करता है। माता जरा-सी देर के लिए भी बच्चे को छोड़कर कहीं चली जाय तो वह रोने लगता है। उसी की गोदी में चिपके रहने की इच्छा करता है। पर जब वही माता बूढ़ी हो जाती है, जवान बच्चे के लिए कुछ लाभदायक नहीं रहती तब बेटे का व्यवहार बदल जाता है। वह उपेक्षा ही नहीं करता तिरस्कृत भी करने लगता है।

भोगवाद की बढ़ती अतृप्त लालसा ने जन-मानस को विश्रृंखल बना दिया है। विकसित एवं विकासशील देशों में आये दिन होने वाली आत्महत्याओं और विभिन्न अपराधों में वृद्धि इसके प्रत्यक्ष प्रमाण हैं। आत्महत्या में अमेरिका व कनाडा का पहला स्थान है जबकि जापान दूसरे नंबर पर है। विश्लेषण करने वाले कई प्रकार से इसका विवेचन कर सकते हैं किंतु यह सुनिश्चित है कि भोगवादी जीवन अध्यात्मवाद से परे होने के कारण कई प्रकार के संत्रास, विक्षोभ, तनाव एवं कष्ट सभी के लिए लाया है। आत्महत्याओं के अनेक कारण हो सकते हैं किंतु विशेष कारणों में-निराशा, पारिवारिक कलह, आर्थिक कठिनाई, शराब तथा अनीश्वरवाद की गणना की जाती है।

कहना न होगा कि यह सब कारण भौतिक भोगवाद की ही देन हैं। इतने कारोबारी तथा शक्ति संपन्न देश में निराशा का क्या कारण? क्या कारण है कि इन्हीं देशों में “आत्महत्या करने के एक सौ पचास उपाय” नामक “फाइनल एक्जिट” पुस्तक सर्वाधिक बिक्री वाली पुस्तक है। स्पष्ट है कि भोगवाद का अंत निराशा में ही होता है। भोगवादी शीघ्र ही मिथ्या एवं नश्वर सुखों में अपनी सारी शक्तियाँ नष्ट कर डाला करते हैं, जिससे अकाल ही में खोखले होकर निर्जीव हो जाते हैं। ऐसी दशा में न तो उनके लिए किसी वस्तु में रस रहता है और न जीवन में अभिरुचि। स्वाभाविक है उन्हें एक ऐसी भयानक निराशा आ घेरे जिसके बीच जी सकना मृत्यु से भी कष्टकर हो जाये। पर मुसीबत यह कि उनके आस-पास का भोगपूर्ण वातावरण उन्हें अधिकाधिक ईर्ष्यालु, चिंतित तथा उपेक्षित बनाकर जीने योग्य ही नहीं रखता और वे अनीश्वरवादी होने से, आत्मा-परमात्मा को भूले हुए कोई आधार न पाकर आत्महत्या के जघन्य पाप का ही सहारा लेते हैं।

निश्चित ही अब सभी को समझ में आ रहा है कि भोगवाद-पूँजीवाद व साम्यवाद की मृगमरीचिका के टूटने के बाद अब अध्यात्मवाद ही एक मात्र मार्ग रह गया है जो जन-जन के मनों को शांति दे सकता है। अध्यात्मवाद जीवन जीना सिखाती है। भोग करते हुए कैसे त्याग वाला जीवन जियें इसके सूत्र हमें देता है। अच्छा हो हम समय रहते सँभलें, पाश्चात्य सभ्यता के आक्रमण से स्वयं को बचायें व अपनी संस्कृति के मूल तत्व अध्यात्म को जीवंत जाग्रत बनाए रखें। इसी में हमारा अस्तित्व है तथा यही मार्ग हमें देवत्व की ओर ले जायेगा।

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