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Magazine - Year 1995 - Version 2

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परम वंदनीय माताजी पर विशेष- - सेवा साधना की यह तड़प हममें भी आ जाय

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अपने दिल में कसक हो, दूसरों का दुख दर्द खुद की पीड़ा बन जाय तो सेवा मनुष्य का स्वभाव बन जाती है। वंदनीय माता जी का यह कथन स्वयं उनके अपने स्वभाव का बोध कराता है। वह जब जहाँ रहीं, वहाँ के अड़ोसी-पड़ोसी हों अथवा घर में काम करने वाले नौकर, मजदूर, रिश्तेदार, कुटुँबी हों या मिशन के काम करने वाले कार्यकर्ताओं का समूह इन सभी की तकलीफों में बराबर की हिस्सेदार नहीं। उनकी सेवा-संवेदना न कभी जाति-पाँति के बंधनों में बँधी और न गरीबी-अमीरी के खाई-खंदकों में फँसी। सतत् एक ही दर्द उनमें समाया रहा कि पीड़ित की पीड़ा का निवारण कैसे हो भले ही इसके लिए उन्हें कुछ भी संकट क्यों न उठाना पड़े।

इतने पर भी उनका सेवाभाव कोरी भावुकता कभी नहीं रहा। इसके पीछे थी एक समग्र जीवन दृष्टि, एक मौलिक चिंतन-प्रणाली, जिसे अपना सकने पर जीवन चेतना-परमात्म चेतना की ऊँचाइयों को छूने लगती है। इसे उन्हीं के भावों में कहें तो “आत्म विकास की ओर अभिमुख गतिविधियों, क्रिया प्रणालियाँ अनेकों स्थानों पर प्रचलित हैं। अलग-अलग पथ अपने दायरे के अनुरूप इनका विशिष्ट स्वरूप घोषित करते हैं। सभी का अपना महत्व भी है, पर समग्रता की दृष्टि से विवेचन-विश्लेषण करने पर इनमें से ज्यादातर को प्रायः एकाँगी मानना पड़ता है। समूची मानव प्रकृति को रूपांतरित कर सके, जिंदगी के हर हिस्से को दिव्यता से भरा-पूरा कर सके, ऐसी प्रणाली ढूँढ़ने पर शायद ही एक-आध मिले। जो मिलेगी भी, वह किसी विशिष्ट योग्यता की अपेक्षा रखती हुई। समग्रता के प्रश्न पर विचार करने पर सर्व जनसुलभ साधना प्रणालियों की खोज बीन कर विभिन्न विचारकों महापुरुषों, श्रेष्ठतम योगियों की दृष्टि एक ही बिंदु पर टिकती है और वह बिंदु-सेवा है।

इसके सभी आयामों को उन्होंने न केवल स्पर्श किया बल्कि जिया और अनुभव किया। उन्होंने सेवा कुछ पाने के लिए नहीं, बल्कि अपने अंदर उभर आए दर्द को कम करने क लिए की। बात उनके घिया मण्डी-मथुरा में निवास के दिनों की है। वही वैरागपुरा में एक विधवा स्त्री एक टूटी-फूटी कोठरी में अपने छोटे बच्चे के साथ रहा करती थी। उसका कोई सहारा न था। जिस किसी तरह गरीबी में दिन कट रहे थे। उसकी उम्र तो बीस बाईस वर्ष रही होगी, पर गरीबी की मार ने उसे असमय बूढ़ा कर दिया था।

बाजार में सामान खरीदते समय एक दिन माता जी की नजर उस पर पड़ गयी। क्या कुछ नहीं था इस नजर में। हृदय की अबूझ भाषा आँखों से वह निकली थी। एक ऐसी भाषा जिसे उन्होंने कहा और गुलाब देवी नाम की उस महिला ने सुना और समझा। वह उसको अपने घर ले आयीं। उसके बालक को स्कूल में भर्ती कराया। गुलाब देवी की आदत हर बात पर ‘ए जू’ कहने की थी। सो परिवार के सभी सदस्य उसे ‘एजू’ कहने लगे। माताजी उसे इसी नाम से पुकारती।

‘एजू’ भोजन पकाने में उनकी मदद करने लगी। परंतु उसका प्रारब्ध भोग अभी बहुत कुछ बाकी था। सो वह अक्सर बीमार रहती। उसके कई काम माता जी स्वयं करतीं। बाद के दिनों में उसे स्तन का कैंसर हो गया। उन्होंने उसे हर तरह के आश्वासन देकर किसी तरह सरोजनी नायडू अस्पताल आगरा भेजा। काफी दिन इलाज चला। आप्रेशन का खर्चा, सवेतन छुट्टी और बच्चे की पढ़ाई, के साथ अखण्ड ज्योति कार्यालय में काम की व्यवस्था उन्होंने की।

इतना करके ही वह संतुष्ट नहीं हुईं। बीमारी के दिनों में उसके हाथ-पैरों में मालिश जैसी सेवाएँ वह स्वयं करतीं। उनसे मालिश करवाना ‘एजू’ को अच्छा नहीं लगता था। रोकने का भरसक प्रयास करने पर भी जब वह सफल न होती तो रो पड़ती। उसकी आँखों से आँसू पोछते हुए वह समझाती-तू रोती क्यों है? यह सब मैं तेरे लिए थोड़े करती हूँ। फिर किसके लिए? गुलाब देवी की आँखों में आश्चर्य सघन हो उठता। अपने लिए उनके मुख से निकले ये दो शब्द आश्चर्य का अद्भुत समाधान थे। हाँ अपने लिए तू बीमार पड़ी है, यह देखकर मुझसे रहा नहीं जाता। जी तड़प उठता है, मन बेचैन रहता है क्या करूं और कुछ तो कर नहीं पाती, मालिश कर देती हूँ, तुझे खाना बनाकर दे देती हूँ, तो मन को तसल्ली मिल जाती है।

सच तो यही है उनकी ‘सेवा’ क्रिया की कुशलता में नहीं विवश, बेबस, व्याकुल भावनाओं में बसती थी। यों आजकल समाज सेवा एक फैशन के रूप में उभर चुकी है। न जाने कितनी सेवा संस्थाएँ कायम हो चुकी हैं, न मालूम कितने अस्पताल खुल चुके हैं। पर इनमें कहीं आध्यात्मिकता का भाव तो दिखाई नहीं देता। लगता यही है कि यदि इससे आध्यात्मिकता उभरती होती, आत्म-विकास की ओर जीवन गतिशील होता, तो सेवा करने वालों की संख्या के अनुरूप साधकों और योगियों की बाढ़ आयी होती, पर स्थिति ऐसी नहीं है। इस संदेह का समाधान करते हुए एक बार उन्होंने अपनी बात-चीत के दौरान कहा था-”यदि समाज-सेवियों की संख्या के अनुरूप आत्म विकसित लोग दिखाई नहीं देते हैं तो साधना के लिए तपस्या के लिए घर से निकलने वालों की संख्या के अनुरूप आत्मोत्कर्ष के धनी संत-महात्मा कहाँ हैं? इसका सीधा मतलब यही है कि बात को समझा नहीं गया। उसे ठीक ढंग से अपनाया नहीं गया।

किसी भी साधना प्रणाली में प्रवेश हेतु अनिवार्य योग्यता है, नैतिकता। पतंजलि हों या गोरखनाथ, कपिल हों या भगवान श्रीकृष्ण, लाओत्से, ताओ, बुद्ध, बाषो कोई भी क्यों न हों, इस अनिवार्य योग्यता के बिना अपनी प्रणाली में प्रवेश नहीं देते। यदि प्रवेश मिलता भी है, तो प्रवेशिका स्तर पर। इसे उत्तीर्ण किए बगैर, पूर्ण नैतिक हुए बिना साधना पद्धति में स्थान नहीं। लोक सेवा के लिए भी यही शर्त है। अनैतिक व्यक्ति कभी सच्चा लोक सेवी नहीं बन सकता।

प्रवेश पाने के बाद शुरू होता है, साधना क्रम। इसमें हठयोग जहाँ अपना समूचा ध्यान शरीर पर जमाता है। राजयोग मानसिकता में फेर-बदल करता है। तंत्र की गुह्य पद्धतियाँ प्राणिक जगत में परिवर्तन व रूपांतरण का रुख अपनाती हैं। किंतु इन तीनों आधारों में एक साथ निखार आए, ये शुद्धात्म चेतना का प्रवाह धारण कर सकें, ऐसी स्थिति नहीं बन पाती है।

लोक सेवा जिसे गुरुदेव ने साधना की समग्र प्रणाली कहा है, इसे अपनाने पर व्यक्ति के तीनों ही आधार न केवल सशक्त होते हैं, निखार आता है, वरन् समूची अंतर्शक्तियां अपने यथार्थ रूप में अभिव्यक्त होने लगती हैं। बात को और स्पष्ट करते हुए वह कहने लगे अपना शरीर पार्थिव चेतना का प्रतिनिधित्व करता है, जिसका गुण है जड़ता। इस तमस् का सत्व में रूपांतरण ही अभीष्ट है। जिन्होंने लोकसेवा को साधना पद्धति के रूप में अपना लिया है, वे इसे प्रथम चरण में ही पा लेते हैं। क्योंकि सच्चे साधक को तो नाम, यश, विहीन क्रियाशीलता चाहिए। इसे ही तमस् का सत्व में रूपांतरण समझा जा सकता है। सारे आवेग, कामुकता, क्रोध, मोह, लोभ आदि प्राणिक स्तर पर अपनी जड़ जमाए रहते हैं। प्रचलित योगों के किसी भी साधक को इनकी जड़े उखाड़ने में पसीने आ जाते हैं। फिर भी कभी-कभी असफलता हाथ लगती है। विश्वामित्र, और दुर्वासा की कहानियाँ कौन नहीं जानता। सालों-साल की तपश्चर्या के बाद भी अनेकों बार काम-क्रोध के हाथों पराजित होना पड़ा, दूसरों का भी यही हाल हुआ।

जबकि अपने भाव में निष्ठा समाज सेवी इस स्तर को कुछ ही वर्षों में रूपांतरित करने में सफल हो जाते हैं। यह रूपांतरण, कामुकता का भावुकता में, क्रोध का बुराइयों के प्रति रोष में, मोह का प्रेम में, और लोभ का उदारता में हो जाता है। इसमें साम्राज्य रहता है कामनाओं का। एक के बाद दूसरी आ धमकती है। यही सिलसिला चलता रहता है। अन्य भागों के पथिक जहाँ अपनी तमाम कोशिशों के बावजूद स्वर्ग या किसी स्वप्न लोक के सुख सपने नहीं छोड़ पाते। वहीं सेवानिष्ठ साधक सर्वे भवन्तु सुखिनः की भावना से ओत-प्रोत रहता है।

योग के विभिन्न मार्गों की चरम परिणति कैवल्य, स्थिति-प्रज्ञता, समत्व, एकात्मभाव को ही माना गया है। इसी की विभिन्न स्थितियाँ मुक्ति, जीवन मुक्ति, विदेह मुक्ति के नाम से जानी जाती हैं। विभिन्न योगियों की स्थितियाँ कब मिलती हैं यह तो पता नहीं, पर सेवानिष्ठ साधक अपने वर्तमान जीवन में ही इस परम लाभ से लाभान्वित होता देखा जाता है। लोभ, मोह, अहंकार से छुटकारा मिला कि उपरोक्त स्थितियाँ मिलीं। जिसने सर्वहित में अपने स्वार्थों की बलि दे दी उसे लोभ कैसा? वैयक्तिकता से उपराम जो सारे समाज को अपना परिजन, समूचे विश्व को अपना घर मानता है उसमें मोह की गुंजाइश कहाँ? सुहृदं सर्व भूतानां में जिसकी स्थिति है, जो स्वयं को विनम्र सेवक, औरों को सेव्य मानता है उसके पास अहंकार भला कैसे फटक सकता है। यही कारण है कि वह इसी जीवन में मुक्ति का परम लाभ प्राप्त कर जीवन मुक्त की स्थिति में आनंदित रहता है।

वंदनीय माताजी स्वयं तो इस आनंद से विभोर रही हों, औरों को भी उन्होंने दोनों हाथों से यह आनंद लुटाया। अनेकों की उन्होंने लोभ-मोह, अहंता की बेड़ियाँ तोड़ीं। इस तथ्य के सत्य होते हुए भी शंकाकुल मन सवाल करता है साधना की इस समग्र प्रणाली के रहते अपने ऊपर लोक-सेवी का लेबल चिपकाने पर भी जो लोग इसके लाभों से वंचित हैं, इसका कारण क्या है? स्वयं की खामीं, दो टूक जवाब था उनका। गरीबों को गले लगाने तथा कष्ट पीड़ितों की मदद करने की बात हर कोई करता है, लेकिन अपने आस-पास के ऐसे लोगों पर ध्यान देना अनावश्यक लगता है। जिन्हें वस्तुतः सहायता की आवश्यकता है। इस संदर्भ में उन्होंने एक घटना क्रम सुनाते हुए कहा था-मैं नाम तो नहीं लूँगी उनका, यद्यपि उस समय उनका बहुत नाम था। जब कभी हम लोगों को उनसे मिलना होता, वह यही कहते क्या बताऊँ आज अमुक मीटिंग में जाना है। आज दरिद्र बच्चों को दूध बाँटने का कार्यक्रम है। आज माताओं को बच्चों के पालन-पोषण का व्यावहारिक ज्ञान देना है।

एक दिन जब हम लोग (माता जी एवं गुरुजी) उनके घर पहुँचे तो वह घर पर नहीं थे। उनकी नौकरानी थी। वह उनके बंगले के पीछे वाले कमरे में रहती थी। उस दिन उसका बच्चा न्यूमोनिया के कारण बुरी तरह तड़प रहा था। मैंने पूछा-दवा दी। उत्तर में वह मौन रही। मैंने कहा-क्यों दवा क्यों नहीं दी? अपने साहब से कहती तो वे किसी के पास भेज देते। उनकी जान-पहचान के बहुत से लोग हैं। नौकरानी फफक कर रो पड़ी। बोली-दो दिन से कह रही हूँ। लेकिन हम गरीबों की सुनता कौन है? पैसे माँगे थे, वह भी नहीं मिले। बाद में सुनने को मिला-उसका बच्चा दवा न मिलने के कारण गुजर गया।

आजकल ज्यादातर लोग लोक सेवा का सिक्का अपनी प्रतिष्ठा जमाने के लिए उपयोग करते हैं। देखा यही जाता है उनके मन में दीन-दुखियों के प्रति करुणा और सेवा की बात तो दूर, नैतिकता से भी कोई वास्ता नहीं। लोक सेवा उनके लिए वीडियो फिल्म बन जाने, अखबारों में फोटो छपवाने का अच्छा माध्यम है। इस तरह की लोकसेवा का अगर विश्लेषण किया जाय तो वह मात्र फैशन साबित होती है। जिसके पास करने को कोई काम नहीं अथवा जो यह समझते हैं कि इस प्रकार समाज में कुछ इज्जत कमा लेंगे या जिसके पास पूर्वजों की कमाई हुई पैतृक संपदा है कि उससे आराम से निर्वाह हो जाय, वे लोकसेवा का मुखौटा लगा लेते हैं।

कहने का मतलब यह नहीं है कि लोकसेवा कोई करता नहीं। सच्चाई तो यह है कि निष्ठावान लोक सेवी आत्म प्रचार और अपनी सेवाओं का ढोल पीटने के स्थान पर मूक भाव से अहिर्निश जनसेवा में लगे रहते हैं। हमने भी इंसान को भगवान समझकर सेवा की है। सेवा करते गए और धन्य होते चले गए। उनका जीवन उनके इस कथन का प्रमाण है। गुलाब देवी जैसे अनेकों पीड़ितों के आँसू पोछना हो या लोकसेवा के विश्वव्यापी सरंजाम जुटाना हो हर कहीं उनमें आत्माहुति का भाव ही प्रबल रूप से सक्रिय रहा। एक तड़प जो उन्हें जीवन के अंतिम क्षणों तक बेचैन-विफल किए रही यदि हम लोगों को जनसेवा का व्रती बना सके तो समझना चाहिए कि जीवन मुक्ति का आनंद दूर नहीं। बस जरूरत इस बात की है कि जिन आदर्शों की स्थापना हम समाज में होते हुए देखना चाहते हैं उन आदर्शों को स्वयं हम अपने में उतारें। कथनी से नहीं करनी से अपने जीवन को उदाहरण के रूप में रखकर ठीक अपनी माँ की तरह।

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