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Magazine - Year 1995 - Version 2

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सफलता तक पहुँचने में कठिनाइयाँ भी हैं

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सफलता का मार्ग सुलभ नहीं है। उसमें पग-पग पर काँटे बिछे हुए हैं। शहद मधुमक्खियों के जहरीले डंकों की बाड़ के भीतर रहता है। जो उन पैने डंकों को सामना कर सकता है वही शहद को पा सकता है। सुँदर व्याघ्रचर्म पाने की इच्छा रखने वालों को काल-सी कराल डाढ़ों वाले व्याघ्र से युद्ध करना होता है। गुलाब के सुँदर फूल की डंठल काँटों से भरी होती है, इन काँटों के खतरे को उठाकर ही कोई उस फूल को तोड़ सकता है। मोती ढूँढ़ने वाले को मगरमच्छों से भरे हुए समुद्र की तली तक दौड़ लगानी पड़ती है। भगवान को प्राप्त करने वाले साधकों को पहले कठोर साधना के कष्टों को सहना पड़ता है। संतति सुख को प्राप्त करने में माता-पिता को अमित कष्ट उठाने पड़ते हैं। कष्ट और कठिनाई का व्यवधान उन्नति की हर दिशा में मौजूद रहता है। ऐसी एक भी सफलता नहीं है जो कठिनाइयों से संघर्ष किये बिना ही प्राप्त हो जाती हो। जीवन के महत्वपूर्ण मार्ग, विघ्न बाधाओं से सदा भरे रहते हैं। यदि परमात्मा ने सफलता का कठिनाई के साथ गठबंधन न किया होता, उसे सर्वसुलभ बना दिया होता तो मनुष्य जाति का वह सबसे बड़ा दुर्भाग्य होता। तब सरलता से मिली हुई सफलता बिलकुल नीरस हो जाती। जो वस्तु जितनी कठिनाई से, जितना खर्च करके मिलती है वह उतनी ही आनंददायक होती है।

कोई शाक या फल जिन दिनों सस्ता और काफी संख्या में मिलता है उन दिनों उसकी कोई पूछ नहीं होती पर जिन दिनों वह दुर्लभ होता है उन दिनों अमीर लोग उसकी खोज कराके महंगे दामों पर खरीदते हैं। मिठाई का आनंद हलवाई नहीं जानता उसका तो उन्हीं को मिलता है जिन्हें वह कभी-कभी ही प्राप्त होती है। अमीर के लिए एक रुपया ठीकरी की बराबर है पर गरीब को वह चन्द्रमा की तरह बड़ा मालूम पड़ता है। स्वास्थ्य का महत्व वही जान सकता है जो बीमारी में पड़ा हुआ है। स्वर्ण की महत्ता इसलिए है कि वह कम मिलता है पर यदि कोयले की तरह सोने की खानें निकल पड़े तो उसे भी लोग वैसी ही लापरवाही से देखेंगे जैसे आज लोहे आदि सस्ती धातुओं को देखा जाता है। जब लकड़ियाँ घिसकर आग पैदा की जाती थी तब अग्नि का बड़ा भारी महत्व था, देवता की तरह उसकी पूजा होती थी पर अब, जब कि दियासलाई के बॉक्स दुकानों में भरे पड़े हैं तब अग्नि की कौन परवा करता है। जिनके संतति नहीं है उनके लिए एक बालक का होना-किसी देवता के अवतार लेने की बराबर महत्वपूर्ण है, पर जिनके यहाँ हर दूसरे साल नये बच्चे आ टपकते हैं उनके लिए नये बालक का जन्म, चिंता, झुझलाहट, दुर्भाग्य सूचक और कष्टदायक होता है।

दुर्लभता और दुष्प्राप्यता से आनंद का घनिष्ठ संबंध है। जब प्रेमी और प्रेमिका दूर-दूर रहते हैं तो एक दूसरे को चन्द्र-चकोर की भाँति याद किया करते हैं परंतु जब सदा ही एक जगह रहना होता है तो दाल में नमक पड़ने या सिंदूर की बिंदी लाने में भूल हो जाने जैसी छोटी बातों पर कलह होने लगते हैं। जो वस्तुएँ दुर्लभ हैं, सर्व साधारण को आसानी से नहीं मिलती उन्हें ही सफलता कहते हैं जिन कार्यों की सफलता सर्वसुलभ है वैसे कार्य तो सब लोग सदा करते ही रहते हैं उनके लिए न कोई पुस्तक पढ़ने की जरूरत होती है और न लेखक को लिखने की। यदि महत्वपूर्ण को प्राप्त करने में कुछ बाधा न होती तो वे महत्वपूर्ण न रहतीं और न उनमें कुछ रस आता। कोई रस और कोई विशेषता, न रहने पर यह संसार बड़ा ही नीरस एवं कुरूप हो जाता, लोगों को जीवन काटना एक भार की भाँति अप्रिय कार्य प्रतीत होने लगता।

कठिनाइयों के न रहने पर एक और हानि होती है कि मनुष्य की क्रियाशीलता, कुशलता एवं चैतन्यता नष्ट हो जाती है। ठोकर खा-खाकर अनुभव एकत्रित किया जाता है। कष्ट की चोट सह कर मनुष्य दृढ़, बलवान और साहसी बनता है। मुसीबत की अग्नि में तपाये जाने पर बहुत सी कमजोरियाँ जल जाती हैं और मनुष्य खरे सोने की तरह चमकने लगता है। हथियार की धार पत्थर पर रगड़ने से तेज होती है खराद पर चढ़ाने से हीरे में चमक आती है। घात-प्रतिघातों की ठोकर खाकर रबड़ की गेंद की तरह अंतःचेतना में उछाल आता है और वह एक स्थान पर पहुँचने की गतिविधि आरंभ कर देती है। बिना चोट लगे गेंद नहीं उछलती, बिना थपकी लगे मृदंग नहीं बजता, बिना एड़ लगाये घोड़े की चाल में तीव्रता नहीं आती मनुष्य भी ऐसे तत्वों से बना हुआ है कि यदि कठिनाई न हो तो उसकी सुप्त शक्तियाँ जाग्रत न हो सकेंगी और जहाँ का तहाँ पड़ा दिन काटता रहेगा।

सफलता में आनंद कायम रखने और शक्तियों के चैतन्य होकर विकास के मार्ग पर प्रवृत्त होने के लिए जीवन में कष्ट और कठिनाइयों का रहना बड़ा ही आवश्यक है। इतिहास में जिन महापुरुषों का वर्णन है उनमें से हर एक के पीछे कष्टों का, दुर्दुम कठिनाइयों में पड़ने का विस्तृत वृत्ताँत है। उसी के कारण वे महापुरुष बने हुए हैं। यदि ईसामसीह के जीवन से उनकी तपश्चर्या और क्रूस पर चढ़ना, इन दो बातों को निकाल दिया जाये तो वह एक साधारण धर्मोपदेशक मात्र रह जायेंगे। राणा प्रताप, शिवाजी, बंदा वैरागी, हकीकत राय, शिव, दधिचि, हरिश्चंद्र, प्रहलाद, लेनिन, गाँधी आदि को परम आदरणीय महापुरुष बनाने का महत्व उनकी कष्ट सहिष्णुता को है, यदि उन्होंने पग-पग कष्ट सहना स्वीकार न किया होता यदि उन्होंने कठिनाइयों और दुःखों को अपनाया न होता तो वे साधारण श्रेणी के भले मनुष्य मात्र रह जाते, महापुरुष का पद उन्हें प्राप्त न हुआ होता।

आकाँक्षा, जागरूकता और परिश्रम-शीलता से बड़े-बड़े कष्ट-साध्य कार्य पूरे हो जाते हैं तो भी यह नहीं कहा जा सकता कि वे शीघ्र ही स्वल्प काल में और बिना कोई खतरा उठाये सफल हो जाते हैं। परमेश्वर बार-बार परीक्षा लेकर मनुष्य के अधिकारी होने न होने की जाँच किया करता है। स्कूलों में तिमाही, छमाही, नौमाही परीक्षाएं होती हैं इसके बाद बड़ी वार्षिक परीक्षा में उत्तीर्ण हो जाता है उसे दर्जा चढ़ाया जाता है। ऐसे करीब डेढ़ दर्जन दर्जे पास करने पर ग्रेजुएट की पदवी मिलती है, सफलता की ग्रेजुएटी लेने के लिए भी मनुष्य को अनेकों खतरों, कष्टों, और निराशाजनक अवसरों की परीक्षायें देनी होती हैं। जो उत्तीर्ण होते हैं वे ही आगे बढ़ते हैं, मनोवाँछित सफलता का रसास्वादन करते हैं। जो इन परीक्षाओं से डर जाते हैं, उन्हें पार करने का प्रयत्न नहीं करते, वे उन्नति के शिखर पर नहीं पहुँच सकते। अभीष्ट सिद्धि की महत्ता को प्राप्त नहीं कर सकते।

सफलता की मंजिल क्रमशः और धीरे-धीरे पार की जाती है, कठिनाइयों से लड़ता, मरता, चोटें और ठोकरें खाता हुआ ही कोई मनुष्य सफल मनोरथ होता है। साइकिल की सवारी करने वाले जानते हैं कि चढ़ना सीखते समय कई बार उन्हें पटक खानी पड़ती है, तैरने वाले जानते हैं कि पानी में पैर देते ही वे तैराक नहीं बन जाते। कई बार तो दूसरों के द्वारा विघ्न डाले जाते हैं, कई बार दैवी प्रकोप के कारण अनायास ही कुछ अड़चनें आ जाती हैं, कई बार मनुष्य स्वयं भूल कर बैठता है। अपनी असावधानी या भूल के कारण असफल होना पड़ता है। अपनी भूलों को सुधारने के लिए प्रयत्न किया जाता है पर पुराने अभ्यास के कारण वे दोष फिर उमड़ पड़ते हैं, और बना बनाया काम बिगाड़ देते हैं। कई बार प्रयत्न करते हुए भी सफलता नहीं मिलती तो बड़ी निराशा होती है और खिन्न होकर मनुष्य अपने प्रयास को ही बंद कर देता है।

अपने स्वभाव को बदलने का पूरी शक्ति से प्रयत्न तो करना चाहिए पर यह आशा न करनी चाहिए कि इस दिशा में दो चार दिन में ही पूर्ण सुधार हो जायेगा। स्वभाव का अभ्यास धीरे-धीरे बहुत दिन में पड़ता है किसी दुःस्वभाव से पूर्णतया छुटकारा पाने या किसी अच्छी आदत के डालने में बहुत समय तक प्रयत्न करने की आवश्यकता होती है। यह प्रयत्न धैर्य एवं आशान्वित होकर करना चाहिए और जब भूलें हों तो अपने को अधिक सावधान एवं जागरूक करते हुए आगे से अधिक सावधानी बरतने का निश्चय करना चाहिए। रस्सी की रगड़ से जब पत्थर जैसा कठोर पदार्थ घिस सकता है तो कोई कारण नहीं कि हम अपने दोषों और दुःस्वभावों को परिवर्तित या नष्ट न कर सकें।

क्या कोई विद्यार्थी यह सोचकर पढ़ना छोड़ देता है कि मुझसे नित्य भूलें होती हैं, नित्य अध्यापक के सम्मुख मुझे दोषी बनना पड़ता है। भूलें करते हुए भी विद्यार्थी निरंतर अपना अध्ययन जारी रखता है। भूलों को भुला देता है और सफलताओं को स्मरण रखता है। परीक्षा में किसी विद्यार्थी को जब 80 प्रतिशत नंबर प्राप्त होते हैं तो वह फूला नहीं समाता। सब लोग उसकी प्रशंसा करते हैं। इस छात्र ने यद्यपि भूल भी की हैं, 20 प्रतिशत प्रश्न उसने बिलकुल गलत किये हैं। जितने सवाल उसने गलत हल किये हैं उतने अंशों में वह मूर्ख, बेवकूफ, लापरवाह, नालायक, दोषी, तथा असफल है। फिर भी इन दोषों की मात्रा के होते हुए भी-न तो वह विद्यार्थी स्वयं निराश होता है और न कोई उसकी निंदा करता है। क्योंकि उसने भूल की अपेक्षा सावधानी का परिचय अधिक दिया, असफलता से सफलता का पलड़ा भारी रखा है। इतना होना-ऐसा होना-सर्वथा प्रशंसनीय है। इसलिए आधे से अधिक नंबर लाने वाला, पास समझा जाता है उसकी पीठ ठोकी जाती है और प्रशंसा की जाती है। हमें इन विद्यार्थियों से शिक्षा ग्रहण करनी चाहिए। छोटे बालक असफलताओं से नहीं डरते, उनको देखकर पस्त हिम्मत, परास्त, निराश, भयभीत, अस्थिर नहीं होते, वरन् इन छोटी असफलताओं की परवा न करते हुए अपना कार्यक्रम बराबर जारी रखते हैं और अंत में शिक्षा के उच्चशिखर तक पहुँच जाते हैं।

जो वस्तु जितनी टिकाऊ और मजबूत होती है उसके तैयार होने में उतनी देर लगती है, बाजीगर हथेली पर सरसों उगाकर तमाशा दिखाता है पर उस सरसों का तेल किसी ने नहीं निकलवाया है। वह हथेली पर उगी हुई सरसों कुछ ही देर बाद नष्ट हो जाती है। जो पौधे एक दो महीने में ही बहुत बड़े हो जाते हैं वे कुछ ही महीने जीकर नष्ट भी हो जाते हैं। मक्खी अपने जन्म से 60 घंटे बाद युवा हो जाती है और अंडे देने लगती है परंतु तीन सप्ताह में वह बूढ़ी होकर मर भी जाती है। इसके विपरीत आम बरगद जैसे जो पौधे धीरे-धीरे बढ़ते हैं वे बहुत दिन तक जीते हैं। मनुष्य का बचपन एक दर्जन से भी अधिक वर्ष रहता है। फलस्वरूप उसकी आयु भी लंबी होती है। फूँस की झोंपड़ी जल्दी बनती और जल्दी बिगड़ती है, पर वे मकान जो ईंट चूने से बहुत दिन में बन पाते हैं मुद्दतों खड़े रहते हैं धीरज, दृढ़ता और मजबूती के साथ जो कार्य सँभाल-सँभाल कर किये जाते हैं उनमें देर तो जरूर लगती है पर स्थायित्व अधिक होता है वे जल्दी नष्ट नहीं होते। इसलिए यदि कोई कार्य जल्दी ही पूरा न होता हो, प्रगति धीरे-धीरे होती हो, तो अधीर न होना चाहिए, निरंतर प्रयत्न करते रहने वाले को एक न एक दिन सफलता मिलकर रहती है।

कई बार आकस्मिक परिस्थितियाँ आड़े आ जाती हैं और बने काम को बिगाड़ देती हैं। सफलता की मंजिल पूरी हो चुकने के नजदीक होती है कि यकायक कोई ऐसा वज्र प्रहार हो जाता है कि सारे मनसूबे धूल में मिल जाते हैं। पूरा प्रयत्न करने, पूरी सावधानी बरतने, पर भी इस प्रकार के संकट सामने आ जाते हैं, जो बिलकुल ही आकस्मिक होते हैं पहले से उनकी कल्पना भी नहीं रहती। मृत्यु, विछोह, चोरी, अग्निकाँड, रोग, युद्ध, तूफान, वर्षा, शत्रु प्रहार,षडयंत्र, राजदण्ड, घाटा, वस्तुओं की टूट-फूट, विश्वासघात, अपमान, ठगा जाना, दुर्घटना, भूल आदि कारणों से ऐसी भयंकर परिस्थितियाँ सामने आ खड़ी होती हैं, जिनकी पहले से कोई संभावना ही न थी। जिन्हें ऐसी विषम स्थिति में होकर गुजरने का साहस, अनुभव या अभ्यास नहीं होता, वे यकायक घबरा जाते हैं किंकर्तव्य विमूढ़ हो जाते हैं, उन्हें सूझ नहीं पड़ता कि क्या करें क्या न करें। ऐसे अवसरों पर कई व्यक्ति पागल हो जाते हैं, कई आत्म हत्या कर बैठते हैं, कई घोर निराशावादी होकर कपड़े रंग लेते हैं या अन्य किसी प्रकार से भविष्य को अंधकार के गर्त में पटककर अर्ध विक्षिप्त अवस्था में दिन काटते रहते हैं।

यह स्थिति मनुष्य जैसे विवेकशील प्राणी के गौरव को गिराने वाली है। विपरीत परिस्थितियाँ मनसूबों में मिला देने की क्षमता रखती हैं। यह ठीक है, पर यह भी ठीक है कि सदा ही हर घास की ग्रीष्म की चिल–चिलाती धूप जला डालती है, उस समय ऐसा प्रतीत होता है कि घास को धूप ने सर्वथा परास्त कर दिया, परंतु यह स्थिति सदा नहीं रहती क्योंकि विध्वंसक तत्वों की सत्ता बहुत ही क्षणिक एवं स्वल्प जीवी हुआ करती है। ग्रीष्म समाप्त होते ही वर्षा आती है और जली भुनी घास फिर सजीव एवं हरी-भरी हो जाती है।

जीवन जीने की यही सही रीति-नीति है कि सतत् अध्यवसायरत रहा जाय। असफलताओं से सीखा जाय, सफलताओं में उन्मत्त न हुआ जाय। स्वयं को सशक्त समर्थ बनाकर प्रतिकूलताओं से जूझ कर ही जीवन संग्राम लड़ा जाता है।

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