• News
  • Blogs
  • Gurukulam
English हिंदी
×

My Notes


  • TOC
    • “साधनानुभूति”
    • हम अपने भीतर झाँकना सीखें
    • सुख का मूल पंचशील
    • Quotation
    • विशेष लेख- - इस आपत्ति काल में “अपनों” की ढूँढ़ खोज
    • सच क्या है? चेतना या पदार्थ?
    • साध्य, साधन और सिद्धि
    • विभाजन रेखा (Kahani)
    • चलें काल से परे, समझें महाकाल को
    • यंत्रों का विज्ञान रहस्यमय भी, निराला भी
    • दृष्टिकोण (Kahani)
    • परोक्षजगत से अनुदान बाँटते हमारे पितर
    • कठिनाइयों से डरिये नहीं, जूझिए
    • आत्मीयता सुव्यवस्था एवं विवेकशीलता (Kahani)
    • अंतर्जगत में प्रवेश करें, सत्य को पायें
    • तंत्र शास्त्र उपयोगी भी, विज्ञान सम्मत भी
    • षोडश संस्कारों के मूल में निहित तत्वज्ञान
    • अपनी समस्याएँ आप सुलझाये
    • धर्म-श्रद्धा विवेक सम्मत ही वरेण्य
    • साधना का मूल है-जाग्रत भाव संवेदना
    • जिंदा अध्यात्मवाद ही रहने वाला है
    • गायत्री उपासना विज्ञान की दृष्टि में
    • परंपरा (Kahani)
    • जड़ चेतन गुण-दोषमय
    • व्यवहार व वातावरण (Kahani)
    • सृष्टि की उत्पत्ति विद्युत से हुई या नाद से?
    • यथार्थ को समझें, शब्दों में न उलझें
    • सफलता तक पहुँचने में कठिनाइयाँ भी हैं
    • दान (Kahani)
    • नवयुग का भवन बना बसंती
    • नवयुग का भवन बना बसंती (Kavita)
    • “साधनानुभूति”(Kavita)
    • परमपूज्य गुरुदेव की अमृतवाणी- (गुरुपूर्णिमा पर्व-1986) - देवत्व विकसित करें, कालनेमि न बनें
    • राष्ट्र के आर्थिक-साँस्कृतिक नवजागरण हेतु शाँतिकुँज की अभिनव शिक्षण सत्र योजना
    • परम वंदनीय माताजी पर विशेष- - सेवा साधना की यह तड़प हममें भी आ जाय
    • रीता बनाना तो सीखें (Kahani)
    • अपनों से अपनी बात- - अब यह पुकार अनसुनी न रहने पाए मूर्च्छना व व्यामोह कहीं श्रेयार्थी बनने से हमें वंचित न कर दे
  • My Note
  • Books
    • SPIRITUALITY
    • Meditation
    • EMOTIONS
    • AMRITVANI
    • PERSONAL TRANSFORMATION
    • SOCIAL IMPROVEMENT
    • SELF HELP
    • INDIAN CULTURE
    • SCIENCE AND SPIRITUALITY
    • GAYATRI
    • LIFE MANAGEMENT
    • PERSONALITY REFINEMENT
    • UPASANA SADHANA
    • CONSTRUCTING ERA
    • STRESS MANAGEMENT
    • HEALTH AND FITNESS
    • FAMILY RELATIONSHIPS
    • TEEN AND STUDENTS
    • ART OF LIVING
    • INDIAN CULTURE PHILOSOPHY
    • THOUGHT REVOLUTION
    • TRANSFORMING ERA
    • PEACE AND HAPPINESS
    • INNER POTENTIALS
    • STUDENT LIFE
    • SCIENTIFIC SPIRITUALITY
    • HUMAN DIGNITY
    • WILL POWER MIND POWER
    • SCIENCE AND RELIGION
    • WOMEN EMPOWERMENT
  • Akhandjyoti
  • Login





Magazine - Year 1995 - Version 2

Media: TEXT
Language: HINDI
SCAN TEXT


साधना का मूल है-जाग्रत भाव संवेदना

Listen online

View page note

Please go to your device settings and ensure that the Text-to-Speech engine is configured properly. Download the language data for Hindi or any other languages you prefer for the best experience.
×

Add Note


First 18 20 Last
साधना-उपासना में भावना का होना निताँत आवश्यक माना गया है, अन्यथा पूर्ण लाभ की आशा-अपेक्षा नहीं की जा सकती। भावना को शास्त्रकारों ने पारसमणि कहा है। पारस-पत्थर लोहे को सोना बना देता है, भावना भी मनुष्य को तदनुरूप ही ढाल देती है। कहा भी गया है-”यादृषी भावना यस्य सिद्धिर्भवति तादृषी।” अर्थात् जिसकी जैसी भावना होती है उसे वैसी ही सिद्धि मिला करती है। भावना की महिमा-महत्ता का प्रतिपादन करते हुए ‘रुद्रयामल’ ग्रंथ में कहा है-”भावेन लभते सर्व भावेन देव दर्शनम्। भावेन परमं ज्ञानं तस्माह्णा बावलम्बनम्॥” अर्थात् भाव से ही सब कुछ प्राप्त होता है, भावना की दृढ़ता से ही देव-दर्शन होते हैं, भावना से ही ज्ञान प्राप्त होता है। इसलिए भावना का अवलंबन अवश्य लेना चाहिए। कारण कि-”न काष्ठे विद्यते देवो न पाषाणे न मृण्मयो। भावेहि विद्यते देवस्तस्माद्- भावस्तुकारणम्॥” तात्पर्य यह कि काष्ठ, पाषाण और मिट्टी की मूर्तियों में देवता नहीं होते, वे तो मानसिक भावों में ही रहते हैं और वही उनका कारण है।

अध्यात्मवेत्ता मनीषियों के अनुसार भाव मन का धर्म है। मन में ही इसकी उत्पत्ति होती है और मन में ही इसका लय होता है। अतः यह शक्तियों का उदय होता है। इसलिए जो जैसी भावना करता है, वह वैसी ही शक्तियों को प्राप्त करता है, वैसा ही बन जाता है। स्थूल की गति का कारण सूक्ष्म है। शरीर स्थूल है और भावनायें सूक्ष्म। जैसी भावना-विचारणा होगी, वैसे ही कार्य में शरीर प्रवृत्त होगा। भावना का निर्मल, पवित्र, प्रबल और परमार्थमय होना ही आध्यात्मिक क्षेत्र में ऊँचा उठने का अथवा स्थूल से सूक्ष्म की ओर गति करने का चिन्ह है। व्यक्तिगत रूप में ही नहीं, वरन् हर क्षेत्र, हर कार्य में प्रचण्ड और पवित्र भावना सफलता लाने में समर्थ होती है। भावना ही वह प्रमुख आधार है जो प्रसुप्त पड़ी आँतरिक शक्तियों को जगा देती है। उनमें गति उत्पन्न करती है। भावना से साधना-उपासना के फलीभूत होने का तात्पर्य शक्तियों का गतिमान होना ही है।

अनुसंधानकर्ता विज्ञानवेत्ताओं ने भी भावना की महत्ता को स्वीकार किया है और उसे आधुनिक रूप देकर अनेकों प्रकार के भौतिक प्रयोगों में सफलता प्राप्त की है। पाश्चात्य मनः चिकित्सकों ने प्रार्थना में इसका उपयोग किया है और आशाजनक लाभ उठाये हैं। इस संबंध में नोबेल पुरस्कार विजेता प्रख्यात वैज्ञानिक डॉ. अलेक्सिस कैरेल ने अपनी पुस्तक “मैन दी अननोन” में लिखा है-’भावना से कुछ ही क्षणों में मुँह के घाव, शरीर के अन्य घाव, कैंसर, मूत्राशय के रोग और टी॰ बी॰ आदि के रोगियों के यह रोग पूर्णतः मिटते हुए देखे गये हैं। कोढ़ एवं अन्यान्य त्वचा रोग से पीड़ित लोग स्वस्थ हुए हैं। कनाडा के सुप्रसिद्ध चिकित्सा विज्ञानी डॉ. सी॰ अलबर्ट ई॰ विल्फ भावना के माध्यम से ही चिकित्सा करते थे।

“थ्ज्ञियालाजिया जर्मनकी” पुस्तक के अनुसार विश्वास रखकर ईश्वर से भावनापूर्वक प्रार्थना करने पर बड़ी से बड़ी तथा भयंकर बीमारी से भी मनुष्य छूट जाता है।

भावना से ऋद्धि-सिद्धियाँ प्राप्त करने, आरोग्य एवं दीर्घायु प्राप्त करने तथा अन्य प्रकार के लाभ उठाने की इस वैज्ञानिक पद्धति को भारतीय ऋषि-मनीषियों ने बहुत पहले खोज लिया था जिसकी पुष्टि आधुनिक विज्ञानवेत्ता भी कर रहे हैं। उनका मत है कि अभाव की पूर्ति के लिए गिड़गिड़ाना उचित नहीं है। उससे आत्महीनता की भावना उत्पन्न होती है और आशा जनक लाभ भी नहीं होता है। भावना के समय अशुभ के स्थान पर शुभ के, रोग के स्थान पर निरोगता के, अभाव के स्थान पर वैभव और ऐश्वर्य के भाव संकेत मन को देने चाहिए। जिस इष्ट की पूर्ति करने की इच्छा है, उसे अपने भावना नेत्रों से पूरा होते देखना चाहिए। यह भाव-संकेत जितना तीव्र और सुदृढ़ विश्वास पर आधारित होगा, सफलता उतनी ही शीघ्रता से प्राप्त होगी।

इस संदर्भ में ख्याति लब्ध विद्वान अलबर्टविल्फ ने अपनी कृति- ‘‘लेसन्स इन लिविंग” में लिखा है-”परमात्मा से हमें यह कामना नहीं करनी चाहिए कि वह हमें स्वास्थ्य प्रदान करें, वरन् उसका ढंग यह होना चाहिए कि कल के लिए उन्होंने आज मुझे पूर्ण स्वस्थ कर दिया। श्री रिवेका वीयर्ड ने इस विषय का स्पष्ट प्रतिपादन करते हुए अपनी पुस्तक “एवरी मैंस सर्च” में कहा है कि-”शक्ति की धारा को विपरीत शुभ दिशा में प्रवाहित करने के लिए आवश्यक है कि जिस परिणाम को हम उपस्थित देखना चाहते हैं, उस परिस्थिति को हम अपने अंतराल के भाव संस्थान में निर्मित करें और अपनी चिंता के विपरीत भाव का चिंतन करें।” उदाहरण के लिए धन के अभाव को दूर करने के लिए यह नहीं कहना चाहिए कि हे ईश्वर! मैं अत्यंत संकट में हूँ, उसे दूर करो, वरन् मानस नेत्रों से अपने प्रभु के सर्व समर्थ, शक्तिशाली और महान ऐश्वर्यों के रूप को निहारना चाहिए और भावना करनी चाहिए कि उनके उत्तराधिकारी और ज्येष्ठ पुत्र होने के नाते इन ऐश्वर्यों पर हमारा स्वाभाविक अधिकार है अतः इस अधिकार को मान्यता देते हुए भगवान स्वयं हमारे रिक्त स्थान की-अभाव की पूर्ति कर रहे हैं, हमारे भंडारों को भर रहे हैं और हम भी ऐश्वर्यशाली बन रहे हैं। इस शुभ भावना के शक्ति का प्रवाह हमारी ओर परिवर्तित होगा, यह सुनिश्चित है।

वस्तुतः भावना एक मनोवैज्ञानिक प्रक्रिया है जिसका सीधा प्रभाव हमारे अचेतन मन पर पड़ता है। अचेतन मन-जिसे गुप्त मन भी कहते हैं, ईश्वर प्रदत्त शक्ति का भाण्डागार है, दिव्य क्षमताओं का वह मूल स्रोत है। ईश्वर से उत्तराधिकार में मिली समस्त शक्तियाँ वही सोयी पड़ी हैं। उन्हें प्राप्त करने के लिए ही विविध प्रकार की यौगिक साधनायें, उपासनायें एवं तपश्चर्या का आश्रय लेना पड़ता है। इनमें भावनाओं का महत्वपूर्ण योगदान होता है। यही वह सूक्ष्म उपाय-उपचार है जिसकी पहुँच गुप्त मन तक होती है सही भावनायें हमारे गुप्त मन का नव निर्माण करती हैं और हमारे चारों ओर का संसार वैसा ही बनता चला जाता है। भाव प्रवणता से अचेतन मन परिष्कृत होता जाता है और प्रसुप्त पड़ी अतीन्द्रिय क्षमतायें जाग्रत होने लगती हैं। अंदर से बाहर की ओर एक आध्यात्मिक प्रवाह चलने लगता है, परिणाम स्वरूप शक्तियों का नवसृजन होता है, बिखरी शक्तियाँ एकाग्र होकर दिव्यताओं एवं महानताओं का नवनिर्माण करती हैं जिनसे इच्छानुसार भौतिक सिद्धियों एवं आध्यात्मिक विभूतियों के लाभ प्राप्त होते हैं।

इस संबंध में महर्षि वशिष्ठ का मत है कि-”बीज की जाति का ही पौधा उगता है और संकल्पों की जाति की परिस्थितियाँ पैदा होती हैं। आत्मा जैसी-जैसी भावना करती है, वह शीघ्र वैसी ही हो जाती है और उसी प्रकार की शक्ति से पूर्ण हो जाती है।” इसे प्रत्यक्ष जीवन में सर्वत्र होते हुए देखा जा सकता है कि जिसकी भावना भीतर से भलाई, सच्चाई, प्रेम, सहानुभूति, करुणाशील, वात्सल्य और सद्भावों से ओत−प्रोत होती है वह सदा सुखी रहता है, क्योंकि प्रतिक्रिया से उसमें दिव्य गुणों का बाहुल्य हो जाता है। इसके विपरीत जो व्यक्ति सदा स्वार्थ, ईर्ष्या, धोखेबाजी, छल-छद्म, कपट, काम-क्रोध, अहंकार, दूसरों को हानि पहुँचाने का भाव रखता है, उसमें यह दुर्गुण दिनों दिन बढ़ते जाते हैं और पाप अत्याचार की ओर उसकी प्रवृत्ति भी बढ़ती जाती है, जिसके परिणाम स्वरूप वह नाना प्रकार के कष्ट उठाता है। सुख-दुख, उन्नति-अवनति, बंधन-मोक्ष हमारी भावनाओं पर आधारित हैं। जा अपने को अयोग्य, असमर्थ, अभागा व अशक्त मानता है, वह वैसा ही बनता जाता है। इसके विपरीत जो अपने को योग्य, समर्थ, भाग्यवान और शक्तिवान समझता है, वह भी वैसा ही बनता जाता है। अपने आपको नीच या महान, सुखी या दुखी, साधारण या असाधारण, पवित्र या अपवित्र, सदाचारी या दुराचारी, पापी या पुण्यात्मा, चतुर या मूर्ख, निर्बल या सबल, भाग्यहीन या भाग्यवान बनाना भावना के ही खेल हैं, जो जैसी भावना करता है वह वैसा ही बन जाता है।

महात्मा गाँधी ने कहा है-”अपने को निर्बल समझने वाला ही निर्बल है।” जीवन रेखा का लिखना भावना के अधिकार में है। भाग्य को बनाना भावना शक्ति का ही खेल है। वह इसको जिधर चाहे मोड़-मरोड़ ले जाती है। होमियोपैथी के जन्मदाता डॉ. हैनीमेन ने अपने ग्रंथ “आर्गेनन ऑफ मेडिसिन” में लिखा है कि भावनाओं से रोग उत्पन्न भी किये जा सकते हैं और अच्छे भी किये जा सकते हैं। यदि किसी को यह विश्वास दिलाया जा सके कि वह पूर्णतः स्वस्थ एवं सक्षम है तो वह थोड़े ही दिनों में सचमुच स्वस्थ-समर्थ बन जायेगा। पाश्चात्य मनीषी चार्ल्स डिक्सन के शब्दों में “जिस मनुष्य की जैसी आँतरिक भावनायें होंगी, उसकी बाह्य रूपरेखा वैसी ही बन जायेगी।”

भावना की शक्ति अपरिमित एवं महान है। इस भावनाशक्ति ने ही मीरा को दिये हुए विष को अमृत में बदल दिया था। उसी भावनाशक्ति से धन्ना भक्त ने पत्थर को भगवान बनाया था। यह भावना की शक्ति ही थी कि रामकृष्ण परमहंस को माँ काली द्वारा अपने हाथों प्रसाद खिलाते हुए देखा गया था। सुदामा के कच्चे चावलों एवं शबरी के जूठे बेरों में भावना का समावेश होने से उनमें इतनी मिठास आ गयी थी भगवान ने उनको बड़े चाव से खाया था। महर्षि रमण मौन रहते हुए भी अपनी भावतरंगों से संपर्क में आने वाले हर किसी को आप्लावित कर देते थे। भावना स्वयं में एक बड़ी शक्ति है। संत, महात्मा, ऋषि, देवदूत इसी के पुँज होते हैं। उनके हृदय के अंतराल से निकलने वाली प्रचंड भाव तरंगें केवल निकटवर्ती व्यक्तियों तक ही सीमित नहीं रहतीं, वरन् परमात्मचेतना से ओत−प्रोत व सृष्टि के समस्त प्राणि समुदाय को चमत्कारिक रूप से प्रभावित करती है। शक्ति की ज्वालायें हर किसी के अंदर धधक रही हैं। ऊपर जमी, कषाय-कल्मष रूपी भस्म को दूर करने से हर कोई इसका अनुभव कर सकता है। आवश्यकता केवल भावनात्मक जागरण की है। साधना-उपासना की सफलता का मूल आधार भावना ही है। इसके अभाव में सारे कर्मकाँड भारभूत ही सिद्ध होते हैं।

First 18 20 Last


Other Version of this book



Version 1
Type: SCAN
Language: HINDI
...

Version 2
Type: TEXT
Language: HINDI
...


Releted Books


Articles of Books

  • “साधनानुभूति”
  • हम अपने भीतर झाँकना सीखें
  • सुख का मूल पंचशील
  • Quotation
  • विशेष लेख- - इस आपत्ति काल में “अपनों” की ढूँढ़ खोज
  • सच क्या है? चेतना या पदार्थ?
  • साध्य, साधन और सिद्धि
  • विभाजन रेखा (Kahani)
  • चलें काल से परे, समझें महाकाल को
  • यंत्रों का विज्ञान रहस्यमय भी, निराला भी
  • दृष्टिकोण (Kahani)
  • परोक्षजगत से अनुदान बाँटते हमारे पितर
  • कठिनाइयों से डरिये नहीं, जूझिए
  • आत्मीयता सुव्यवस्था एवं विवेकशीलता (Kahani)
  • अंतर्जगत में प्रवेश करें, सत्य को पायें
  • तंत्र शास्त्र उपयोगी भी, विज्ञान सम्मत भी
  • षोडश संस्कारों के मूल में निहित तत्वज्ञान
  • अपनी समस्याएँ आप सुलझाये
  • धर्म-श्रद्धा विवेक सम्मत ही वरेण्य
  • साधना का मूल है-जाग्रत भाव संवेदना
  • जिंदा अध्यात्मवाद ही रहने वाला है
  • गायत्री उपासना विज्ञान की दृष्टि में
  • परंपरा (Kahani)
  • जड़ चेतन गुण-दोषमय
  • व्यवहार व वातावरण (Kahani)
  • सृष्टि की उत्पत्ति विद्युत से हुई या नाद से?
  • यथार्थ को समझें, शब्दों में न उलझें
  • सफलता तक पहुँचने में कठिनाइयाँ भी हैं
  • दान (Kahani)
  • नवयुग का भवन बना बसंती
  • नवयुग का भवन बना बसंती (Kavita)
  • “साधनानुभूति”(Kavita)
  • परमपूज्य गुरुदेव की अमृतवाणी- (गुरुपूर्णिमा पर्व-1986) - देवत्व विकसित करें, कालनेमि न बनें
  • राष्ट्र के आर्थिक-साँस्कृतिक नवजागरण हेतु शाँतिकुँज की अभिनव शिक्षण सत्र योजना
  • परम वंदनीय माताजी पर विशेष- - सेवा साधना की यह तड़प हममें भी आ जाय
  • रीता बनाना तो सीखें (Kahani)
  • अपनों से अपनी बात- - अब यह पुकार अनसुनी न रहने पाए मूर्च्छना व व्यामोह कहीं श्रेयार्थी बनने से हमें वंचित न कर दे
About Shantikunj

Shantikunj has emerged over the years as a unique center and fountain-head of a global movement of Yug Nirman Yojna (Movement for the Reconstruction of the Era) for moral-spiritual regeneration in the light of hoary Indian heritage.

Navigation Links
  • Home
  • Literature
  • News and Activities
  • Quotes and Thoughts
  • Videos and more
  • Audio
  • Join Us
  • Contact
Write to us

Click below and write to us your commenct and input.

Go

Copyright © SRI VEDMATA GAYATRI TRUST (TMD). All rights reserved. | Design by IT Cell Shantikunj