सच क्या है? चेतना या पदार्थ?
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पदार्थ विज्ञान के अद्भुत चमत्कार के रूप में हम जो-जो विलक्षणताएँ देख पा रहे हैं और अगले दिनों देख सकेंगे, उनकी यदि योग विज्ञान से तुलना की जाय, तो पायेंगे कि दोनों के बीच तिल और ताड़ जितना भारी अंतर है। भौतिक विज्ञान के आविष्कार निश्चय ही सराहनीय हैं और आश्चर्यजनक भी, पर जब योग विज्ञान की उपलब्धियों की चर्चा होती है, तो यही कहना पड़ता है कि वह यदि प्रखर सूर्य है, तो पदार्थ विज्ञान एक टिमटिमाता दीपक।
योग विज्ञान चेतना का विज्ञान है। उसमें प्रगति और परिवर्तन जैसी क्रियाओं में उसकी इसी शक्ति का प्रयोग होता है, जबकि पदार्थ विज्ञान में विद्युत, ताप, गैस एवं परमाणु ऊर्जा जैसी पदार्थगत शक्तियों का उपयोग किया जाता है। यहाँ विज्ञान के जितने भी कौशल हैं, सब इन्हीं के खेल हैं। यह ऊर्जाएँ सूक्ष्म होते हुए भी पदार्थ स्तर की हैं, इसलिए इनके द्वारा लाये गये वह रसायनों की आपसी क्रिया द्वारा रसायन निर्माण संबंधी हों अथवा धातुओं के मिलन-संयोग द्वारा मिश्रधातुओं के उत्पादन संबंधी, सभी एक ही प्रकार के परिवर्तन के परिणाम हैं।
पदार्थ को प्रभावित करने का यह एक तरीका हुआ, किंतु एक दूसरे उपाय से भी इस प्रक्रिया को घटित किया जा सकता है और क्षणमात्र में रूपांतरित कर किसी वस्तु को दूसरे-तीसरे पदार्थ में बदला जा सकता है। यह प्रणाली चेतना विज्ञान की है। योग विज्ञान इसी से संबंधित है। इसमें पदार्थ सत्ता के साथ किसी प्रकार की छेड़खानी नहीं करनी पड़ती, उसे धारण करने वाली चेतना के अणुओं को सक्रिय मात्र कर देना होता है। इतने से ही एक वस्तु का लोप होकर दूसरे का निर्माण हो जाता है।
चेतना विज्ञान में योगियों द्वारा केवल व्यक्तिगत चेतना-अणुओं को विशेष प्रकार से उत्तेजित कर दिया जाता है। इतने से ही शरीर तंत्र एवं अंग-अवयव प्रभावित होकर उच्चस्तरीय ढंग से स्वयमेव क्रिया करने लग जाते हैं। इस क्रम में कई बार वस्तु तो अपरिवर्तित बनी रहती है, पर उसकी कार्य-पद्धति बदल कर असाधारण हो जाती है और अनेक बार क्रिया के साथ-साथ वस्तु में भी थोड़ा-थोड़ा बहुत रूपांतरण हो जाता है। महाभारत के युद्ध में इसी विद्या का प्रयोग करते हुए लड़ाई लड़ी गई थी।उल्लेखों से ज्ञात होता है कि उसमें प्रयुक्त होने वाले शस्त्रास्त्र देखने में तो बिल्कुल सामान्य से थे, पर प्रयोग के दौरान कहर बरपाने वाले परिणाम प्रस्तुत करते थे। इसे पढ़-सुन कर आज ऐसा लग सकता है कि वे या तो दिव्य ढंग से निर्मित दिव्य आयुध रहे होंगे या फिर वस्तुस्थिति की अतिरंजना मात्र, जिसे उस महासागर को महिमामंडित करने के लिए कथाकारों या इतिहासकारों ने गढ़ दी हो, पर वास्तविकता ऐसी है नहीं,। तथ्य यह है कि उसमें युद्ध-कौशल और योगबल का अद्भुत समन्वय हुआ था। इसे नहीं समझ पाने के कारण ही इन दिनों उसे अत्युक्ति मान लिया जाता है, किंतु जब संशयशील आँखें उसको प्रत्यक्ष देख लें, तो फिर उसे झुठलाया कैसे जाय?
घटना परमहंस विशुद्धानंद से संबंधित है और उन दिनों की है, जब वे अपने झाल्दा स्थित आश्रम में प्रवास कर रहे थे। एक रोज उद्धवनारायण नामक एक शिष्य ने आकर पूछा कि महाभारत में जिन अग्निबाण, वृष्टि बाण जैसे आयुधों की चर्चा है, क्या ऐसे बाण तब सचमुच ही अस्तित्व में थे क्या? अथवा यह सब अलंकारिक उल्लेख मात्र हैं? परमहंस देव ने सिर हिलाते हुए सहमति प्रकट की और कहा कि निश्चय ही तब ऐसे शस्त्रास्त्र थे। इसके साथ ही उन्होंने सामने उगे हुए सरकंडों में से तीन को तोड़ लाने को कहा और शिष्य से पूछा-”क्या तुम उसे देखना चाहोगे?” शिष्य ने “हाँ” कर अपनी अभिलाषा प्रकट की। इसके बाद उनने एक सरकंडे का छिलका उतारा, उसको प्रत्यंचा बनाकर सरकंडे के दोनों सिरों पर बाँध दिया। इस प्रकार एक धनुष बन गया। फिर कुछ मंत्र पढ़े। इसके साथ ही वह एक सुँदर धात्विक धनुष में परिवर्तित हो गया। तत्पश्चात् दूसरे सरकंडे को अभिमंत्रित किया। वह धातु का तीक्ष्ण नोक वाला बन गया।
अब शिष्य को संबोधित करते किया-”यह एक सामान्य तीर कमान है। योग बल द्वारा अब मैं इसे असाधारण बनाऊँगा।” इतना कह कर बड़े विनीत भाव से ऊपर आकाश की ओर निहारते हुए कोई स्तुति की, तदुपराँत सामने खड़े एक विशाल बरगद वृक्ष को लक्ष्य कर उसे छोड़ दिया। घनघोर गर्जन करता हुआ वह तीव्र वेग से चल पड़ा और पेड़ को विदीर्ण कर दूसरी ओर निकल गया। इसके साथ ही वृक्ष में आग लग गई। विशुद्धानंद का स्वर पुनः उभरा-”विज्ञान की समस्त युक्तियाँ और सारे साधन मिलकर भी इस अग्नि को शाँत नहीं कर सकते। इसके पश्चात् उन्होंने तीसरा सरकंडा उठाया। पूर्ववत् उसे भी धात्विक तीर में बदला। फिर वरुण देवता का आह्वान कर उसमें प्रतिष्ठित किया। पीछे उसका भी संधान सामने के बरगद पर कर दिया। तीर लगते ही तरुवर की आग कुछ ही क्षण में बुझ गई।
तदुपराँत धनुष-बाण को हाथ में लेकर उनने आँखें बंद कर लीं। वह देखते-देखते पुनः तीन सरकंडों में रूपांतरित हो गये।
यह चेतना विज्ञान की उपलब्धि है। योग विज्ञान उसी से संबंधित है। इसकी सबसे बड़ी विशेषता यह है कि इसमें चेतना कणों को सक्रिय निष्क्रिय कर देने मात्र से एक वस्तु का तिरोभाव होकर उसमें दूसरे का आविर्भाव हो जाता है। दूसरे शब्दों में यहाँ किसी भी पदार्थ को प्रकट किया जा सकना संभव है। भौतिक विज्ञान में यह सुविधा नहीं उसमें एक द्रव्य को दूसरे में परिवर्तित करने के लिए उच्चस्तर की साधन-सुविधाएँ चाहिए। इतने पर भी इस बात की कोई गारण्टी नहीं कि इच्छित पदार्थ को प्राप्त कर ही लिया जायेगा।
इस मूलभूत अंतर को जान लेने के बाद यह निश्चय करना हमारी निजी समझ पर निर्भर है कि हम किसे श्रेष्ठ और सर्वोपरि मानें एवं जीवन में किसकी महत्ता को स्वीकार करें-पदार्थ विज्ञान या चेतना विज्ञान को?

