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Magazine - Year 1995 - Version 2

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जड़ चेतन गुण-दोषमय

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जड़ चेतन के युग्म से बने इस विश्व में गुण दोष दोनों ही हैं। कहीं देवत्व है कहीं असुरत्व। देवत्व का पोषण, अभिवर्धन और सम्मान किया जाना चाहिए, साथ ही असुरता की दुरभि, संधियों, कुटिल नीतियों से तथा होने वाले आक्रमण से अपना बचाव भी करना चाहिए।

देवत्व प्रधान-सज्जन पुरुष अपने आदर्श और व्यवहार पर स्थिर रहते हैं। सज्जनता की रीति-नीति से विलग नहीं होते हैं। उनमें पारस्परिक टकराहट भी नहीं होती। यदि कोई स्वयं उनसे टकरा भी जाय तो टूटते नहीं। अपनी दिव्य सत्ता को अक्षुण्ण रखते हैं। किसी भी विपरीत तत्व के समक्ष उनका आत्म समर्पण नहीं होता। जब कि असुरत्व प्रधान दुर्जनों की ठीक इससे विरोधी स्थिति होती है। ये सदा ही दूसरों से टकराने के लिए उतावले रहते हैं। इस संघर्ष में दूसरों का जितना अहित कर पाते हैं उसकी तुलना में कहीं अधिक कष्ट क्लेश स्वयं उठाते हैं।

यह देवत्व और असुरत्व मात्र मनुष्यों तक ही सीमित, हो, ऐसी बात नहीं है। विश्व ब्रह्माण्ड के कण-कण में यह द्वन्द्व व्याप्त है। दैवी गुण प्रधान सज्जन पुरुषों की तरह परमाणु की भी मूल सत्ता होती है। यह अपनी विशेषताओं को नष्ट नहीं होने देती। सभी परमाणु सृजन के काम में जुटे रहते हैं। वे एकत्रित होते, जुड़ते और हिलमिल कर रहते हैं। उनकी संगठन और सृजन भावना है। विभिन्न पदार्थों का निर्माण करती है। नींव की तरह अदृश्य और अविदित रहकर वे सृजन के कार्य में अथक रूप से जुटे रहते हैं। इस समूचे विश्व में जो कुछ भी सुषमा गोचर होती है वह इन्हीं छोटे-छोटे परमाणुओं के परमार्थिक क्रिया−कलाप का सुखद परिणाम है।

परिणाम एकाकी नहीं है। इनके भीतर और भी छोटा परिवार है। इसमें अच्छे बुरे दोनों तत्वों का निर्वाह होता है। इसमें निहित इलेक्ट्रॉन-प्रोट्रान में पृथकतावादी नीति नहीं होती। ये परस्पर एक सूत्र में बंधे रहते हैं। इसके परिणाम स्वरूप वे परस्पर मिलकर अंतः क्रिया द्वारा नवीन कणों में परिवर्तित हो जाते हैं। परमाणु विधा विशारदों ने इस परिवार के अब तक लगभग बीस सदस्य खोजें हैं। इलेक्ट्रान-प्रोट्रान के अतिरिक्त न्यूट्रान, पॉजीट्रान, मेसान, न्यू मेसान, पाई मेसान, के॰ मेसान, हाइपरान, ड्यूट्रान-न्यूट्रिनो जैसे सूक्ष्म कणों से सारा विश्व विनिर्मित हुआ है। इन्हें विश्व भवन की ईंटें कहा जा सकता है।

इसी दैवी अणु शक्ति में एक विरोधी असुर तत्व भी मौजूद है। समय-समय पर यही गिरगिट की तरह नाना प्रकार के रंग बदलता है। टूटता फूटता है और विग्रह विद्वेष उत्पन्न करता है। कुचक्रों का भी यही शिकार होता है और अंततः विनाश और दुर्गति भी इसी की होती है। इस संसार में मात्र देवत्व ही नहीं असुरत्व भी है। संभवतः इसी का परिचय देने के लिए यह प्रतिकण विद्यमान हैं।

परमाणु के प्रत्येक मूलकण के साथ एक प्रतिकण मौजूद रहता है। जैसे इलेक्ट्रान का प्रतिकण पॉजीट्रान, प्रोट्रान का एण्टीप्रोट्रान, न्यूट्रान का एण्टीन्यूट्रान, न्यूट्रिनो का एण्टीन्यूट्रिनो है। ये सभी प्रतिकण अल्पजीवी होते हैं ये जब अपने समान समान कण से टकराते हैं तो भयंकर विस्फोट होता है।

ये विरोधी कण आते कहाँ से हैं? क्यों अवरोध उत्पन्न करते हैं यह रहस्य अभी अबूझ ही बना हुआ है-विज्ञान-वेत्ताओं का अनुमान है कि इस ब्रह्माण्ड में शायद कोई अन्य विश्व ऐसा है जिसे सर्वथा विपरीत या ‘प्रति विश्व’ कहा जा सके। उसकी संरचना इन विपरीत प्रकृति के प्रतिकणों से हुई होगी। वहाँ सब कुछ यहाँ से उलटा ही होगा। इस लोक में सारा पदार्थ एण्टी मैटर होगा। वहीं से यह प्रतिकणों का प्रवाह धरती पर आता होगा और यहाँ कि अणु रचना के साथ उसका सम्मिश्रण परस्पर विरोधी स्थिति उत्पन्न करता होगा। यह प्रति विश्व कहाँ है? यह तो अभी तक नहीं ढूँढ़ा जा सका है। पर उसका अस्तित्व तो एक प्रकार से मान लिया गया है।

इस तरह यह स्पष्ट हो जाता है कि कण-कण में विरोधी तत्व विद्यमान है। कुछ गुणमय कुछ दोषमय। गोस्वामी तुलसीदास ने इसी कारण विश्व को जड़ चेतना को “गुण दोषमय” बताया है और कहा है कि “संत हंस गुण गहहि प्य परिहरि वारि विकार।” इस गुण दोषमय विश्व में किसे स्वीकारें किसे छोड़ें? कौन उपयोगी है कौन निरुपयोगी? इसका निर्धारण बाह्य कलेवर उसकी चमक दमक से होना असंभव है। इसके लिए नीर-क्षीर को पृथक् करने में समर्थ विवेक बुद्धि की आवश्यकता है।

यह विवेक परमात्मा ने मनुष्य को विरासत में सौंपा है। जिसके द्वारा वह अपनी विकास यात्रा सुगमता से पूरी कर सकता है। इसका अंजन लगाने से वह दिव्य दृष्टि प्राप्त होती है जिससे यात्रा पथ के अवरोध समझ में आ जाते हैं। संभव है यह अवरोध आकार प्रकार की दृष्टि से लुभावने दिखें, पर यथार्थ में होते अवरोध ही हैं। इनसे बचना ही उत्तम है। अन्यथा मंजिल पा सकना दुष्कर ही नहीं असंभव भी होगा। इनको त्याज्य मान त्याग करने में ही कल्याण है।

परमात्मा ने गुण दोषमय विश्व की इस प्रकार की अद्भुत संरचना संभवतः मनुष्य के विवेक बुद्धि की परीक्षा करने के लिए ही की है। सामान्यतया देखा यही जाता है कि हम इस परीक्षण में अनुत्तीर्ण घोषित हो जाते हैं। कारण कि विवेक की जगह चालाकी, धूर्तता अपनाने लगते हैं। परिणाम स्वरूप गुण दोषों का विवेचन तो बन नहीं पड़ता उलटे गुणों की जगह दोष ही संग्रह करने लगते हैं। हमारी स्थिति दुर्योधन की तरह बन पड़ती है जो युधिष्ठिर की राज सभा में जल के स्थान पर थल और थल के स्थान पर जल के विभ्रम में आकर जगह-जगह ठोकर खाता और गिरता फिरा। उसकी जग हँसाई भी खूब हुई। इससे उसने अपनी गलती तो स्वीकार नहीं की उलटे तथ्य समझने पर महाभारत रचा डाला।

इसी तरह हम भी संसार की चकाचौंध के सम्मोहन जाल में फंसकर गुण दोषों का विभेद करने में असमर्थ हो जाते है। इस तरह लगातार दोषों को ही इकट्ठा करते रहने के कारण व्यक्तित्व भी असुरत्व से भरने लगता है। परिणाम यही होता है कि संसार हमारे ऊपर हंसता है। यदि कोई इस औचित्य, अनौचित्य का भेद समझाने आता है तो उसकी विवेक-युक्त बातों को सम्मोहित विभ्रमित बुद्धि स्वीकारती नहीं उलटे क्रोधित हो लड़ाई झगड़ा करने हेतु प्रेरित करती है। परिणाम स्वरूप हमें जहाँ प्रगति पथ के सोपानों पर चढ़ते हुए उत्कर्ष की चोटी पर जा पहुँचना चाहिए था, वहीं अपने स्थान से भी लुढ़कते हुए अवगति के गर्त में जा गिरते हैं।

ऐसी स्थिति आने ही क्यों दी जाय? परमात्मा की दी हुई अमूल्य मणि-विवेक के प्रकाश का प्रयोग कर बाह्य जगत की यथार्थता ही नहीं अपने अंतराल की यथार्थता को भी क्यों न पहचाना जाय? संसार में जहाँ जो भी प्रगति के लिए आवश्यक है उसी को ग्रहण क्यों न किया जाय? संत कबीर के शब्दों में-”सार-सार को गहि रहें थोथा देहिं उड़ाय” की नीति अपनाने में ही मनुष्य का कल्याण सन्निहित है।

बुद्धि को विवेक-युक्त बनाये रखने सु असुर सत्ता-जो बाहर भी है और भीतर भी, की सारी कोशिशें न कामयाब हो जायेंगी फिर तो दोष−दुर्गुण या असुरत्व स्पर्श भी न कर पायेंगे और प्रगति का पथ प्रशस्त होता चला जायेगा। यात्रा सुगम और सहजता के लिए हर किसी को विवेक का इस्तेमाल करने की हंस जैसी रीति-नीति अपनानी चाहिए। इसी में कुशलता और मानव जीवन की सार्थकता है।

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