अपनों से अपनी बात- - अब यह पुकार अनसुनी न रहने पाए मूर्च्छना व व्यामोह कहीं श्रेयार्थी बनने से हमें वंचित न कर दे
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त्रेतायुग का अंत का समय चल रहा था। दो महान प्रयोजन उन दिनों उस संधिकाल में संपन्न होने थे। एक अवाँछनीयता-असुरता का उन्मूलन, दूसरा-सतयुग की वापसी वाले उच्चस्तरीय वातावरण का रामराज्य के रूप में स्थापन। दोनों ही कार्य एक दूसरे के पूरक थे। इन महान प्रयोजनों में भगवान श्रीराम की आत्मसत्ता और शेषावतार श्री लक्ष्मण जी की पुरुषार्थ प्रधान कर्तव्य परायणता मिल−जुलकर संपन्न करने में एकनिष्ठ भाव से संलग्न थीं। दोनों प्रयोजनों का मध्याँतर राम-रावण युद्ध के रूप में चल रहा था। इसी बीच एक भयानक दुर्घटना घटित हुई। लक्ष्मण को शक्ति बाण लगा घातक तो नहीं था वह किंतु वे मूर्छित होकर गिर पड़े। अवतार सत्ता का लीला संदोह किसी की समझ में नहीं आ पा रहा था।
बात अवतारी सत्ता की आत्मशक्ति एवं पुरुषार्थ परायणता के समन्वय से ही बनने वाली थी। शालीनता रूपी सीता के अपहरण की परिणति स्वरूप जन्मी वह युद्ध की स्थिति मात्र इतने तक सीमित नहीं थी। यह नीति-अनीति व धर्म-अधर्म के अस्तित्व की रक्षा का प्रश्न था। लक्ष्मण मूर्च्छना से उत्पन्न अर्धांग पक्षाघात जैसी स्थिति से तो उस अभीष्ट उद्देश्य में भारी व्यवधान उत्पन्न होने जा रहा था।
श्री राम सर्व समर्थ होते हुए भी लक्ष्मण जी के बिना स्वयं को असहाय अनुभव कर रहे थे। प्रश्न अवतारी सत्ता के पंगु होने का नहीं था। वह किसी स्थिति में हो सकती भी नहीं। किंतु क्या अनाचार इस सीमा तक बढ़चढ़ कर नीति पर हावी होगा कि वह स्वयं को असमर्थ अनुभव करें, यह सभी विचार रहे थे। किसी अवलंबन की आवश्यकता अवतारी सत्ता को भी पड़ती है। मनुज देहधारण करने पर व सज्जनों के सहकार की आवश्यकता इसी माध्यम से वे प्रतिपादित भी करते रहे हैं। आवश्यकता यह गुहार मचा रही थी कि लक्ष्मण की मूर्च्छना किसी तरह दूर हो। इसके लिए संजीवनी बूटी का कहीं से भी, किसी भी प्रकार लाया जाना अनिवार्य हो गया था। उसे हिमालय जाकर लाये कौन? वह भी इतने कम समय में ताकि चिकित्सा समय रहते आपातकालीन रूप में मिल सके, विलंब न हो जाय। कौन महाबली इस कठिन प्रयोजन को सँभाले? यह प्रश्न बड़ा जटिल था।
दैवी विभूति की तरह प्रतिभावतरण के रूप में हनुमान जी की साहसिकता उभर कर आयी। असंभव को संभव दिखाने की सामर्थ्य उनमें है, यह आत्मबोध उन्हें जामवंत जी ने कराया ही था। उनने ही यह बीड़ा भी उठाया, चल पड़े और समय की माँग पूरी करने के लिए प्राण हथेली पर रखकर जैसे भी बन पड़ा, संजीवनी बूटी लेकर समय पर वापस लौट आए। लक्ष्मण को वह दी गयी, मूर्च्छना जगी और संकट टल गया। दोनों भाई मिलकर वह करने में जुट गये जिसके लिए कि उनका अवतरण हुआ था। प्रयोजन दोनों ही संपन्न हुए। अवाँछनीयता से पीछा छूटा और वह भी बन पड़ा जो सतयुग की वापसी के लिए अनिवार्य था और अवतारी सत्ता के प्रकटीकरण का प्रयोजन पूरा करता था।
बात त्रेता युग की है, हजारों वर्ष पुरानी है, पौराणिक आख्यान सी लगती है पर उसका एक लघु संस्करण उदाहरण के रूप में हम सभी के समक्ष इन दिनों है। युगाँतरीय चेतना का दिव्य आलोक-देव संस्कृति दिग्विजय अभियान की श्रृंखला में इक्कीस मील के पत्थर पारकर दैवी आकाँक्षा की पूर्ति में जुटा हुआ है। इस महान प्रयोजन की पूर्ति के निमित्त प्रज्ञापुत्रों की सामूहिक संगठित शक्ति निर्धारित क्रिया–कलापों को-ऋषिसत्ता को दिए गये आश्वासनों को पूरा करने के निमित्त जुटी, जिसे तत्परता की पुरुषार्थ परायणता की प्रति रूप लक्ष्मण की सत्ता का पर्याय कहा जा सकता है।
दैवी आकाँक्षा व लक्ष्मण की तत्परता प्रतिभा की शक्ति का समन्वय यदि ठीक तरह से काम करने की स्थिति में रहा होता तो युगसंधि के पिछले दो वर्षों में इतना कार्य संपन्न हो चुका होता कि उसे देखते हुए इक्कीसवीं सदी के गंगावतरण में किसी भी प्रकार के संदेह की गुंजाइश नहीं रह जाती। किंतु किया क्या जाय? क्या कहें उस दुर्भाग्य को जो लक्ष्मण रूपी परिजनों की संयुक्त शक्ति को, तत्परता को, मूर्च्छना की स्थिति में ले गया, प्रतिभा को प्रस्तुत बनाता चला गया। जो लक्ष्य निर्धारित किया गया था, उस अनुपात में प्रचारात्मक कार्य तो अत्यधिक हुआ अनेकों में आकाँक्षाएँ जागीं देवसंस्कृति के निर्धारणों के प्रति जागरूकता बढ़ी, किंतु उस परिमाण में प्रतिभाएँ निकलकर आगे नहीं आयीं। अश्वमेधिक पुरुषार्थ का लक्ष्य हो हल्ला मचाना नहीं था, अपितु अश्व जैसी गतिमान तीव्र-प्रखर मेधा को समाजोपयोगी बनाना था। क्या यह मेघनाद रूपी विग्रह का मायाजाल है जो आड़े समय में परिजनों के समक्ष उदासीनता-उपेक्षा के रूप में आ खड़ा हुआ है? जो वर्षों से सक्रिय-गतिशील-दोषों के समान प्रज्ज्वलित प्रतिभा संपन्न थे, उनकी पारस्परिक प्रतिद्वन्द्विता के रूप में सामने उपस्थित आ पड़ा है एवं समय का अभाव बताते हुए निजी वैभव विस्तार की महत्वाकाँक्षा के रूप में सामने दीख पड़ रहा है।
यहाँ किसी को निरुत्साहित नहीं किया जा रहा, न यह कहा जा रहा है कि पिछले दिनों कुछ भी कहने योग्य हस्तगत नहीं हुआ। ऋषि युग्म की सूक्ष्मता को उत्तर देने योग्य ऐसी कुछ उपलब्धि ‘परिष्कृत प्रतिभा’ के अवतरण के रूप में हम यदि उचित परिमाण में नहीं बता पा रहे हैं तो इसमें दैवी सत्ता के अनुदान-दैवी अनुष्ठान में किसी प्रकार की कमी की बात नहीं, अपितु इसे एक ऐसा दुर्भाग्य कह सकते हैं जो संभवतः प्रातः की उज्ज्वल लालिमा के उदय होने के पूर्व के अंधकार की तरह मात्र सामयिक ही है। आपत्तिकाल की चुनौती सामने होते हुए भी व्यामोह सामने उभरे और जिस तिस बहाने समर्थों के कन्नी काटने जैसी विडंबना चल पड़े तो इसे क्या कहा जाय? असुरता व दैवी सत्ता के संग्राम में इसे असुरता का आक्रमण ही प्रतिभाओं की मनःस्थिति पर हुआ मान सकते हैं। यह तो नहीं मानते कि यह उज्ज्वल भविष्य के आड़े आने वाला दुर्भाग्य है क्योंकि वह तो दैवी आकाँक्षा है, एक सुनिश्चित भवितव्यता है, प्रज्ञापुत्रों द्वारा नहीं तो किन्हीं के हाथों पूरी होनी ही है।
जो भी हो, एक बात स्पष्ट है कि राम रूपी प्रज्ञावतार की सत्ता दुविधा की स्थिति में खड़ी लक्ष्मण रूपी प्रतिभा को मूर्च्छना की स्थिति में पड़ी धीमी-धीमी श्वाँस लेती-पाश्चात्य सभ्यता का देव संस्कृति पर आक्रमण सामने होते हुए भी कुछ न करने की स्थिति में देख रही है। लक्ष्मण के धनुष-बाण यदि वह चमत्कार नहीं दिखा पाए जिसकी अपेक्षा महाकाल को है तथा जो आज का युगधर्म है, तो क्या असुरता जीत जाएगी? अवतारी सत्ता के धर्म की स्थापना का संकल्प अधूरा ही रह जाएगा? नहीं, किसी भी स्थिति में नहीं। यदि जाग्रत व्यक्ति भी बहानेबाजी गढ़कर अपनी भावनात्मक दुर्बलता पर समय की व्यस्तता का पर्दा डालने की विडंबना रचेंगे तो युग के श्रीराम की गुहार को सुनने हनुमान अवश्य आयेंगे। युग परिवर्तन की प्रक्रिया को संपन्न करेंगे अपने आराध्य के लिए उस दैवी आकाँक्षा को पूरा करने के लिए जो “संभवामि युगे-युगे” का आश्वासन देकर उसे चरितार्थ करती आयी है। लिप्सा, तृष्णा का, वासना-कुदृष्टि का आज का बाहुल्य भरा वातावरण बजरंगी पुरुषार्थी को कितना खल रहा है, यह ऋषि चेतना की वेदना के मर्म को जानकर भली भाँति समझा जा सकता है।
अब आने वाले बारह वर्ष में जो बसंत पर्व 2006 पर समाप्त होकर सतयुगी पराक्रम संपन्न होता देखेंगे, हनुमान की भूमिका निभाने वाले-लक्ष्मण रूपी प्रतिभा की मूर्च्छना जगाने वाले पराक्रमी-महाबलियों का समय है। 21 अश्वमेधिक पुरुषार्थ राजकोट यज्ञ तक पूरे हो चुके, 5 और संपन्न होकर सत्ताईसवें मनके के रूप में प्रथम पूर्णाहुति के रूप में आँवलखेड़ा में आराध्य देव-परम पूज्य गुरुदेव की जन्मस्थली में संपन्न हो अपना प्रथम चरण पूरा करेंगे। जनवरी 1995 से लेकर नवंबर 1995 तक वह सब कुछ हो जाना है जिसे देखकर यह जाना जा सके कि पूज्यवर एवं स्नेहसलिला परम वंदनीय माताजी ने जो अपेक्षा परिजनों से रखी थी, वह कैसे पूरी होने जा रही है। 1996 से लेकर 2006 तक क्या कुछ होने जा रहा है, कैसे देवसंस्कृति बनने जा रही है इसका एक स्पष्ट “ट्रेलर” आगामी 10 माह में हम देख सकें, इसके लिए हनुमान जैसी “रामकाज कीन्हें बिन, मोहि कहाँ विश्राम” वाली जागरूकता व औरों को सोये लक्ष्मणों की मूर्च्छना मिटाने वाली संजीवनी ला सकने की आतुरता दिखाने का यही समय है।
संजीवनी बूटी कहाँ है, यह तो पता है किंतु सबसे बड़ी आवश्यकता उस हनुमान स्तर की भाव चेतना की है जो अभीष्ट पुरुषार्थ की पूर्ति करके बिगड़े काम को बनाने में संलग्न होकर अपनी वरिष्ठता और यशोगाथा को चिरकाल तक स्मरणीय बना दे, चर्चा का विषय बना दे। अनुकरणीय और अभिनंदनीय स्तर का पौरुष प्रदर्शन करने का ठीक यही समय है। निश्चित ही वह भावचेतना जागेगी एवं “प्रतिभाओं” को जाग्रत कर अश्वमेधिक अनुष्ठानों का लक्ष्य शत-प्रतिशत पूर्ण कर दिखाएगी, लक्ष्मण की मूर्च्छना टूटेगी एवं सामूहिक सज्जनता एक जबर्दस्त टक्कर देकर असुरता के मायापाश के बंधनों को समूल उखाड़ फेंकेगी। इस आशावादिता के पीछे अपने इष्ट पर उनके वचनों पर दृढ़ विश्वास तो है ही, साथ ही विशिष्ट स्तर के धर्मानुष्ठानों से स्थान-स्थान पर जाग्रत हुई तपः ऊर्जा के एकीकृत हो क्रमशः शक्ति पुँज के रूप में उभर कर आने का ऋषि सत्ता प्रदत्त पूर्वाभास रूपी सिद्धि भी है। फिर यह सब क्यों कहा जा रहा है? इसलिए कि इतिहास साक्षी है कि असमंजस-व्यामोह ही पौरुष प्रदर्शन में हमेशा आड़े आया है, इसीलिए बजरंगी, पुरुषार्थ के जागरण की हनुमान स्तर की, रामदरबार में जबर्दस्ती घुस पड़ने वाले पवनसुत के स्तर की, श्रद्धा समर्पण की, भावचेतना के जागरण की गुहार बारंबार लगायी जा रही है।
अर्जुन पर भी ऐसा ही व्यामोह एक बार सवार हुआ था। कर्तव्य युद्ध में कटिबद्ध होने से कतरा रहे अर्जुन को चित्र, विचित्र स्तर के बहाने सूझने लगे थे व नारायण को-अवतारी सत्ता को अंततः उसे कहना ही पड़ा-
क्लैव्यं मा स्म गमः पार्थ नैतत्वयुपपद्यते। क्षुद्रं हृदयदौर्बल्यं त्यक्त्वोतिष्ठ परंतप॥
अर्थात् “असमय में मोह को प्राप्त हुए हे परंतप! यह नपुँसकता तुझे शोभा नहीं देती। तू हृदय की इस तुच्छ दुर्बलता को त्याग कर युद्ध के लिए कमर कस कर खड़ा हो जा।” यही नहीं योगीराज श्रीकृष्ण ने अर्जुन की दुनिया भर की मोहग्रस्त बहानेबाजी पर करारी चोट लगाते हुए यह भी कहा - ”अनार्य
जुष्टमस्वर्ग्यकीर्तिकरमर्जुन” अर्थात् जो कुछ भी तू कर रहा है और जैसा भी मानस बना रहा है वह श्रेष्ठ पुरुषों द्वारा आचरित नहीं है। वह तो अनाड़ियों जैसा है, साथ ही कलंक की कालिख पोतने वाला भी।” गीता के दूसरे अध्याय व तीसरे व द्वितीय श्लोक में जो उद्बोधन छिपा पड़ा है, वह आज के सभी मूर्च्छित लक्ष्मणों एवं मोहान्ध अर्जुनों के प्रति ही है, जिनमें विपुल प्रतिभा का भण्डार भरा पड़ा है किंतु साहसिकता अंदर से उभर कर नहीं आ पा रही है। श्रीकृष्ण के उद्बोधन ने अर्जुन की मूर्च्छना को झकझोर डाला और वह गांडीव उठाकर नये जोश के साथ रथ पर जो बैठा-यह कहते हुए-”स्थितोअस्मि गतसंदेहः करिष्ये वचनं तव” द्वितीय अध्याय व अठारहवें अध्याय में काफी कुछ गीता ज्ञान भरा है किंतु उसे तभी समझा जा सकता है जब अर्जुन जैसी मनःस्थिति में पहुँच कर श्रीकृष्ण की शरण में बैठकर समझा जाय। संधिकाल की इस वेला में इस ज्ञान का इतना सार ही समझना काफी है कि ईश्वर की इच्छा के-दैवी आकाँक्षा के अनुरूप चलने में ही समझदारी है-शेष सारे तर्क बेकार हैं।
अब समय आ गया है जब हम सभी को देखना है कि अर्जुन में श्रीकृष्ण के शब्दों द्वारा तथा लक्ष्मण में हनुमान की साहसिकता द्वारा लायी संजीवनी द्वारा जो प्राण फूँके गए थे, वैसा ही कायाकल्प स्तर का परिवर्तन इन दिनों जीवंतों में हो सकता है कि नहीं। “जीवंत” की परिभाषा पूज्यवर के उस सद्वाक्य में दी गयी है-”जीवंत वे हैं जिनका रक्त गर्म, हृदय नर्म, मस्तिष्क ठंडा एवं पुरुषार्थ प्रखर हो।” साहसिकता तो हो किंतु आतुरता उतावलापन नहीं-ठण्डा मस्तक रखकर तनावग्रस्त न हों जो नर्म हृदय-संवेदनशील अंतःकरण के माध्यम से भावचेतना जगाते हुए अपने परमभक्त का संघर्षशीलता का प्रखर पुरुषार्थ का परिचय दे सकें व भवबंधनों से उबरकर देवमानव का जीवन जीने का आनंद ले सकें। समय की कसौटी संधिकाल की इस मध्य वेला में खरे-खोटे की परीक्षा करने के लिए हठपूर्वक सामने आ खड़ी हुई है। उसे न झुठलाया जा सकता है, न बहकाकर चलती किया जा सकता है।
अश्वमेधिक पराक्रम के इस क्रम में नये जीवंत प्राणवान व्यक्ति बहुसंख्य मात्रा में आगे बढ़कर आए हैं किंतु कार्य की व्यापकता को देखते हुए पुराने प्राणवान समझे जाने वाले, पूज्यवर एवं मातृसत्ता के हृदय के टुकड़े समझे जाने वालों की निष्क्रियता, चिंतन पर छायी अवसाद भरी मानसिकता, समय के साथ न चलकर चिरपुरातन बहिरंगी कर्मकाँडी स्वरूप तक सीमित रह कुछ आगे का न सोच पाने की दीर्घसूत्रता यह कह रही है कि अब पूर्णाहुति तक के शेष दस माहों का यह बहुमूल्य समय गँवाया न जाय। सक्रियता का अनुपात व स्तर बढ़ाया जाय तथा बदलते समय के अनुकूल प्रगतिशील चिंतन में स्वयं को नियोजित कर उन उत्तरदायित्वों को निभाने के लिए स्वयं को तत्पर किया जाय, जिनसे युग परिवर्तन का उपक्रम पूरा संपन्न हुआ माना जा सके।
यश लूटने, नाम कमाने, समाचार पत्रों में स्मारिका में फोटो या नाम छपाने, कार्य समिति में अपना स्थान बनाने की होड़ के बजाय आदर्शवादिता के क्षेत्र में होड़ मची होती, सक्रियता के स्तर को बढ़ाने की प्रतिस्पर्धा हुई होती, तो उपरोक्त पंक्तियाँ लिखने की संभवतः आवश्यकता न पड़ती। करना इतना भर है कि जितने व्यक्तियों तक महाकाल की सत्ता का संदेश श्रद्धाँजलि पर्व 1990 से लेकर 1994 की दिसंबर में संपन्न राजकोट अश्वमेध यज्ञ तक पहुँचा, उनको अनुयाज प्रक्रिया के अंतर्गत व्यक्ति-परिवार एवं समाज के अभिनव निर्माण के सूत्र हृदयंगम करा दिए जायँ। युग संजीवनी के रूप में, पूज्यवर की प्राणचेतना के रूप में, विद्यमान “अखण्ड ज्योति” पत्रिका “युगनिर्माण योजना” “युगशक्ति गायत्री” पत्रिका एवं पाक्षिक प्रज्ञाअभियान के माध्यम से व्यावहारिक कार्यक्रम देने वाली मार्गदर्शिका उन तक पहुँचा दी जाय। युगधर्म के परिपालन के निमित्त दुष्प्रवृत्ति उन्मूलन व सत्प्रवृत्ति संवर्धन के कार्यक्रम कैसे संपन्न हों, इनका प्रशिक्षण लेने के लिए अधिकाधिक को प्रेरित कर उन्हें कार्यक्षेत्र में लगा दिया जाय। नवंबर 1995 से दिसंबर 1996 तक के चौदह माह के समय को इसीलिए “अनुयाज वर्ष” घोषित कर पूरे भारतवर्ष की प्रसुप्त प्रतिभा का एक बार तीव्र मंथन करने का निर्देश ऋषियुग्म की सत्ता की ओर से मिला है। यदि हमने आगामी दस-चौदह इन चौबीस माहों का सदुपयोग कर अश्वमेधिक ऊर्जा का समुचित सुनियोजन कर लिया तो श्रेय-सम्मान के भागीदार तो हम बनेंगे ही, 600 करोड़ व्यक्तियों के भाग्योदय-नवयुग के अनुरूप उनके बदलने-ढलने रूपी पुरुषार्थ का एक नमूना भी प्रस्तुत कर सकेंगे आशा है, यह पुकार अनसुनी न रहेगी।
*समाप्त*

