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Reading: ईश्वरीय अपनत्व की कसौटी · Page 1

ईश्वरीय अपनत्व की कसौटी

प्रभु जब किसी को अपना मानते हैं, उसे गहराइयों से प्यार करते हैं, तो उसे अपना सबसे भरोसेमन्द सेवक प्रदान करते हैं और उससे कहते हैं कि तुम हर-हमेशा मेरे प्रिय के साथ रहो, उसका दामन कभी न छोड़ते । कहीं ऐसा न हो कि हमारा प्रिय भक्त अकेला रहकर संसार की चमक-दमक से भ्रमित हो जाये, ओछे आकर्षणों की भूल-भुलैयों में भटक जाये अथवा फिर सुख-भोगों की झाड़ियों में अटक जाये। प्रभु के इस विश्वस्त सेवक का नाम है-दुःख सचमुच वह ईश्वर भक्ति के साथ-साथ छाया की तरह चिपका रहता है।

निःसंदेह यह दुःख ही ईश्वरीय अपनत्व की कसौटी है। ज्यों ही इसका आगमन होता है हमारी चेतना ईश्वरोन्मुख होने लगती है। दुःख का हर पल दिल की गहराइयों में संसार की यथार्थता-उसकी असारता एवं निस्सारता की अनुभूति कराता है। इन्हीं क्षणों में इस सत्य की सघन अनुभूति होती है कि मेरे अपने कितने अधिक पराये हैं ? जिन सगे-सम्बन्धियों मित्रों-परिजनों कुटुम्बियों-रिश्तेदारों को अपना कहने और मानने में गर्व की अनुभूति होती थी, दुःख के सघन होते ही उनके परायेपन के रहस्य एक के बाद एक उजागर होने लगते हैं। इन्हीं पलों में ईश्वर की याद विकल करती है। ईश्वरीय प्रेम अंकुरित होता है। प्रभु के प्रति अपनत्व सघन होने लगता है।

प्रभु का विश्वस्त सेवक दुःख अपने साथ न रहे तो अन्तरात्मा पर कषाय-कल्मष की परतें चढ़ती जाती हैं। “अहं” का विषधर समूची चेतना को डस लेता है। आत्मा के प्रकाश के अभाव में प्रवृत्तियों एवं कृत्यों में पाप और अनाचार की बाढ़ आ जाती है। सत् और असत् का विवेक जाता रहता है। जीव सघन अँधेरे और घने कुहासे से घिर जाता है। घने अँधेरों की मूर्छना में वह संसार के छद्म जाल को अपना समझने लगता है और प्रभु के शाश्वत मृदुल प्रेम को पराया। और तब प्रभु अपने प्रिया को उबारने के लिए उसे अपनाने के लिए अपने सबसे भरोसेमन्द सेवक दुःख को उसके पास भेजते हैं।

जिनके लिए दुःख सहना कठिन है-उनके लिए भगवान को अपना बनाना भी कठिन है। ईश्वर के साथ सम्बन्ध जोड़ने का अर्थ है-जीवन को आदर्शों की जटिल परीक्षाओं में झोंक देना। प्रभु के प्रति अपनी श्रद्धा को हर दिन नई आग में तपाते हुए- उसकी आभा को नित नये ढंग से प्रदीप्त रखना पड़ता है। तभी तो भगवान को अपना बनाने वाले भक्त उनसे अनवरत दुःखों का वरदान माँगते हैं। कुन्ती, मीरा, राबिया, तुकाराम, नानक, ईसा, बुद्ध, एमर्सन, थोरो आदि दुनिया के हर कोने में रहने वाले परमात्मा के दीवानों ने अपने जीवन में आने वाले प्रचण्ड दुःखों को प्रभु के अपनत्व की कसौटी समझकर स्वीकारा और हँसते-हँसते सहा। प्रभु ने जिनको अपनाया, जिन्होंने प्रभु को अपनाया, उन सबके हृदयों से यही स्वर गूँजे है कि ईश्वर-भक्ति एवं आदर्शों के लिए कष्ट सहना यही दो हाथ है, जिन्हें जोड़कर भगवत्प्रार्थना का प्रयोजन सही अर्थों में पूरा हो पाता है ।