सहकारिता एक अमोघ शक्ति
Listen online
View page note
Please go to your device settings and ensure that the Text-to-Speech engine is configured properly. Download the language data for Hindi or any other languages you prefer for the best experience.
शरीर के कल-पुर्जे मिल-जुलकर काम करते हैं। जब जीवन क्रम सुव्यवस्थित रीति से चलता है, कोई एक अवयव अपने बलबूते कोई उपयोगिता सिद्ध नहीं कर सकता, भले ही कितना ही महत्वपूर्ण क्यों न हो। मशीन में सभी कल-पुर्जे अपने स्थान पर सही रीति से लगें और चलें, तभी वह अपना प्रयोजन पूर्ण कर पाती है। यदि पुर्जे अलग-अलग बिखर जायं तो वे सभी कबाड़ियों की दुकान पर कौड़ी मोल बिकेंगे। कीमती घड़ी की उपयोगिता तभी तक है, जब तक उसके पुर्जे सही स्थान पर लगे और सही रीति से सही काम करते हैं। यदि वे अलग-अलग होकर बिखर जायं, तो फिर उन टुकड़ों का कोई महत्व न रह जायगा।
तिनके मिलकर मजबूत रस्सा बनता है। धागों के समन्वय से कपड़ा बनता है। पतली सींकें मिलकर बुहारी बनती हैं और घर के आंगन को साफ-सुथरा रखती है। यदि सींकें बिखर जायं तो उनमें से अकेली अपनी कोई कुछ भी उपयोगिता सिद्ध न कर सकेगी। मन के एक धागे में पिरोये रहें, तभी माला बनती है। यदि वे अलग-अलग रहें तो कूड़े-कचरे भर में गिने जायेंगे।
परिवार के छोटे-बड़े सदस्यगण मिल-जुलकर एक-दूसरे के लिए उपयोगी सिद्ध होते हैं, पोषण पाते, विकसित होते और सुखी रहते हैं। यदि उन सभी के अलग-अलग रहने का सिलसिला चल पड़े, तो गुलदस्ते की तरह परिवार की शोभा तो नष्ट होगी ही, साथ ही वे अलग रहने वाले घटक हर दृष्टि से दीन-दुर्बल होते जायेंगे, दुःखी रहेंगे और उनमें से कितनों का ही सहारा छूट जाने पर जीवित रह सकना भी संभव न होगा।
चिड़ियां झुण्ड बनाकर रहती, उड़ती और चहकती-फुदकती हैं। यदि वे अलग-अलग रहने लगें, तो जीवन का सारा आनन्द खो बैठें। वन्य पशु समूह बनाकर रहते हैं। यदि वे ऐसा न करें, तो एकाकी रहने वाला ‘इक्कड़’ कहलाने लगें और सामूहिकता के कारण उपलब्ध होने वाले गुणों से वंचित रहने लगें। हंसना-खेलना मिल-जुलकर ही बन पड़ता है। एकाकीपन के साथ तो नीरसता, निस्तब्धता जुड़ जाती है और समय काटना मुश्किल पड़ता है। जेल की काल कोठरी में जिन्हें एकाकी रहना पड़ता है, वे जानते हैं कि उस अवधि में कोई श्रम न करने पर भी वे दिन कितना भारी मन बनाकर काटने पड़ते हैं।
जंजीरें की कड़ियां मिलकर ही एक उपयोगी श्रृंखला बनाती हैं। यदि उनके घटक बिखर जायं, तो फिर उनकी क्या तो उपयोगिता रहे और क्या शोभा? मनुष्य को सामाजिक प्राणी कहा जाता है। उसकी सबसे बड़ी विशेषता यह है कि मिल-जुलकर रहने और एक-दूसरे का सहयोग करते हुए प्रगति पथ पर बढ़ चलने की कला उसने प्राप्त की है। यदि स्वभाव में यह विशेषता न रही होती, तो शारीरिक दृष्टि से लगभग समान स्तर बन्दर, चिंपैंजी, गोरिल्ला, वनमानुष आदि की तरह उसे भी गई-गुजरी स्थिति में दिन गुजारने पड़ते। अभी भी आदिवासी-वनवासी कबीले जहां कहीं बिखरे-बिखरे रहते हैं, वहां उन्हें पिछड़ी स्थिति का अभावग्रस्त और अनगढ़ स्तर का जीवन यापन करना पड़ता है। उत्तरी ध्रुव के एस्किमो कबीले वन्य स्तर का जीवन जीते हैं, पर जब उनमें से कुछ कनाडा जाकर बस गये, तो उनने वहीं के सभ्य निवासियों की तरह जीवन अपना लिया।
बहुत समय पूर्व भेड़ियों की मांद में कुछ मनुष्य बालक पाये गये थे। पकड़े पाने पर पाया गया कि वे भेड़िये जैसा ही स्वभाव अपना चुके थे। यही बात किसी के प्रति भी लागू हो सकती है। कारण एक ही था कि बच्चों को जिस प्रकार के सम्पर्क में रहना पड़ा, उसी की वे अनुकृति बन गये।
कहा जाता है कि मनुष्य बुद्धि प्रधान है, पर यह बुद्धि उसका निज का उपार्जन नहीं है। सम्पर्क-सान्निध्य से बन पड़ने वाले आदान-प्रदान की ही वह परिणति है। छोटे बच्चे जिस परिकर में रहते हैं, उसी की भाषा सीख जाते हैं। जो सुन नहीं पाते वे बहरे बोलने में असमर्थ गूंगे बने रहते हैं। ज्ञान वृद्धि के लिए अध्ययन, सम्पर्क, दृश्य, अनुभव ही प्रधान आधार होते हैं। वह जिस भी स्तर का उपलब्ध होता है, मनुष्य उसी ढांचे में ढल जाता है। कोरे कागज पर जैसी-जैसी जो बात अंकित की जाती है, वह आलेख बन जाती है। दर्पण के सामने जैसी छवि उपस्थित होती है, वैसी ही प्रतिच्छाया दीख पड़ती है। समीपवर्ती वातावरण ही मनुष्य को किसी ढांचे में ढालता है। यही कारण है कि पुराने समय में जिन्हें अपने बालकों का व्यक्तित्व उत्कृष्टता के ढांचे में ढालना होता था, वे उन्हें उस स्तर वाले गुरुकुलों में ही आरम्भ से रहने और पढ़ने के लिए भेज देते थे। घरेलू वातावरण में तो वैसी सुविधा होती नहीं थी। जिनका लालन-पालन हेय वातावरण में होता था, उनकी प्रकृति भी उसी ढांचे में ढल जाती थी। इससे सिद्ध है कि मनुष्य को जिस विशेषता से सम्पन्न माना जाता है, वह बुद्धिमत्ता उसकी अपनी सम्पदा नहीं है। उसे कहीं अन्यत्र से ही प्राप्त करना पड़ता है कहना न होगा कि मनुष्य की प्रमुख प्रवृत्ति सहकारिता की पक्षधर है। सुव्यवस्थित परिवारों की संरचना इसी आधार पर बन सकी। समाज संरचना का उद्गम भी वही है। आदान-प्रदान ही वह आधार है, जिससे वस्तुओं का विनिमय और जानकारियों का हस्तान्तरण होता है। यदि मनुष्य में सामाजिकता-सहकारिता की वृत्ति न रही होती, तो निश्चित रूप से वह वनमानुष जैसे वन्य प्राणियों से अधिक अच्छी स्थिति में न पहुंच सका होता। वन्य प्रदेशों में रहने वाले कबीले अभी भी मात्र उतनी ही प्रगति कर पायें हैं, जितना कि उन्हें सम्पर्क-सहकार मिलता रहा है।
प्रगतिक्रम का सिलसिला मनुष्य ने अपने आदिम विकास से ही जारी रखा है। अग्नि प्रज्ज्वलन, कृषि, पशुपालन, वस्त्र, आवास, व्यवसाय, शिक्षा, चिकित्सा, परिवहन आदि की सुविधायें किसी एक की अनुकृति नहीं हैं। वह प्रक्रिया क्रमिक गति से ही चली है। क्रमिक गति से ही यह उपलब्धियां हस्तगत होती रही हैं और उन्हें पिछले वालों ने अगले वालों के हाथ सौंपने का सिलसिला जारी रखा है। इसी क्रम से एक-एक सीढ़ी चढ़ते हुए, एक-एक कदम आगे बढ़ाते हुए यह स्थिति आ पायी है जिसमें कि आज मनुष्य है। यदि सहकारिता की उपलब्धियों से रहित हुआ होता, तो आज मनुष्य उतना ऊंचा नहीं उठ सका होता, जितना कि आज है।
अभी भी जितने सुविधा-साधन उपलब्ध हैं, उनमें से कदाचित ही कोई किसी मात्रा में अपने हाथ से—अपने बुद्धि बल से उपार्जित करता है, अनेकों के अनुदान मिलकर ही एक छोटी वस्तु समग्र रूप में हमारे हाथ तक पहुंच पाती है। उदाहरण के लिए एक माचिस की डिब्बी को लें। वह चीड़ के पेड़ का एक टुकड़ा है। उसे किसी ने काटा होगा। किसी वाहन में रखकर कारखाने तक पहुंचाया होगा। ढोने वाले वाहन को बनाने में जिस कारखाने का उपयोग हुआ, वह भी अनेकों कारीगरों, इंजीनियरों, धातु खोदने-पकाने वालों के सहयोग से बना होगा। तभी वह लकड़ी माचिस कारखाने तक पहुंची होगी। वहां छोटी तीली का रूप देने में कितनी मशीनों का उपयोग हुआ होगा? गन्धक फास्फोरस आदि रसायन लगाने और उन्हें माचिस में लगाने योग्य बनाने में कितनों का कितनी प्रकार का सहयोग लगा होगा। तीलियां रखने की डिब्बी बनाने में, उसके लेबल छापने, चिपकाने में कितनों का श्रम और कौशल लगा होगा इसका अनुमान सहज लगाया जा सकता है। उतने भर काम में हजारों का श्रम, कौशल लगा हो, तो कोई आश्चर्य की बात नहीं।
दैनिक जीवन में हम सैकड़ों वस्तुओं का उपयोग करते हैं। इनका निर्माण स्वयं हमने नहीं किया होता। उसके निर्माण में भी लम्बे जन सहयोग की श्रृंखला जुड़ी होती है। यहां तक कि जिन माता-पिता के द्वारा अपना जन्म हुआ है, जो पत्नी सहचरी बनी है, जिनके माध्यम से आजीविका कमाते हैं, जो विनोद के साधन बने हुए हैं वे भी हमारी स्वयं की कृति नहीं हैं। मित्र मण्डली से लेकर विनोद साधनों, शिक्षा, चिकित्सा जैसे उपकरणों में भी उनका योगदान रहा होता है। कपड़ों की बुनाई, सिलाई, धुलाई आदि में भी न जाने कितने अपना न्यूनाधिक योगदान लगा चुके होते हैं। इस प्रकार समूचा जीवन जिन वस्तुओं और व्यक्तियों के माध्यम से चलता है, वे सभी असंख्यों के सहयोग से विनिर्मित हुए होते हैं। यह लाभ ही मानवी प्रगति का प्रधान कारण है। बुद्धिमत्ता, प्रतिभा, बलिष्ठता, सम्पन्नता, विशिष्टता से अलंकृत व्यक्ति भी यह नहीं कह सकते कि साधनों से लेकर प्रतिभाओं तक को उनने एकाकी उपार्जित किया है। मनुष्य समुदाय को जो अनेकानेक सुविधायें प्राप्त हैं, वे वस्तुतः पारस्परिक आदान-प्रदान के आधार पर ही बन पड़ी और उपलब्ध हुई हैं।
पशु और मनुष्य के बीच जो अन्तर है, उसे बौद्धिक विशेषता कहा जाता है। यदि इसे सही माना जाये तो भी यही कहा जायगा कि उस बुद्धिमत्ता ने सर्वप्रथम सहकारिता के तत्त्व को जाना और अपनाया होगा, अन्यथा काया की दृष्टि से अनेक बातों में पशु-पक्षियों से गया-गुजरा होने पर भी उसने जो सृष्टि के मुकुटमणि की पदवी प्राप्त कर ली है, उसका किसी भी प्रकार सुयोग न बन पड़ा होता। सच तो यह है कि वह वन्य जीवन की कठिनाइयों और प्रतिस्पर्द्धाओं से जूझता हुआ कब का अपना अस्तित्व गंवा बैठा होता।
शासन, समाज, उद्योग, शिक्षा, शोध आदि के अनेकों ऐसे पक्ष हैं, जिनमें निकट भविष्य में और भी बहुत कुछ उपलब्ध होने की आशा तथा संभावना है। उनकी योजना, संभावना और सफलता मात्र इस बात पर टिकी हुई है कि उन प्रयोजनों में कितने सुयोग्यों का कितना घनिष्ठ सहयोग हस्तगत होता है। भूतकाल की ऐतिहासिक प्रगति का आधार भी यही रहा है और भविष्य में भी जो कुछ कहने लायक बन पड़ेगा, उसमें वरिष्ठों का सघन सहयोग ही काम कर रहा होगा।
सहयोग प्राणियों को अपने प्रभाव का परिचय देता है। बन्दर झुण्ड बना कर रहते हैं, परस्पर सहयोग करते हैं। एक को छेड़ने पर समूची मण्डली बदला लेने के लिए दौड़ पड़ती है। फलस्वरूप वे सभी के लिए अनुपयोगी होते हुए भी अपना अस्तित्व यथावत् बनाये हुए हैं। यहां तक कि हनुमान के वंशज कहलाते हुए चना-गुड़ जैसा भोग प्रसाद भी पाते रहते हैं। इसके ठीक विपरीत कुत्तों का उदाहरण है। वे आपस में लड़ते रहते हैं। दूसरे को अपने क्षेत्र में नहीं आने देते, फलस्वरूप एक पर मुसीबत आये तो दूसरे उसमें कोई हस्तक्षेप नहीं करते। फलस्वरूप उसे अकेले ही पिटते रहना पड़ता है। रखवाली तथा दूसरी दृष्टि से उपयोगी होते हुए भी कुत्ता शब्द अपमान का बोधक माना जाता है, शहद की मक्खियां दीमक, चींटी आदि की सहकारिता ही उन्हें समर्थ वर्ग में गिने जाने योग्य बनाती हैं, जब कि अन्यान्य कीड़े-मकोड़े बहुत संख्या में जन्मने पर भी दुर्गति को ही प्राप्त होते रहते हैं। सहकारिता प्राणि जगत की अत्यन्त उच्चकोटि की उपलब्धि है। झुण्ड में रहने वाले प्राणी अपेक्षाकृत अधिक सुरक्षित रहते हैं।
तिनके मिलकर मजबूत रस्सा बनता है। धागों के समन्वय से कपड़ा बनता है। पतली सींकें मिलकर बुहारी बनती हैं और घर के आंगन को साफ-सुथरा रखती है। यदि सींकें बिखर जायं तो उनमें से अकेली अपनी कोई कुछ भी उपयोगिता सिद्ध न कर सकेगी। मन के एक धागे में पिरोये रहें, तभी माला बनती है। यदि वे अलग-अलग रहें तो कूड़े-कचरे भर में गिने जायेंगे।
परिवार के छोटे-बड़े सदस्यगण मिल-जुलकर एक-दूसरे के लिए उपयोगी सिद्ध होते हैं, पोषण पाते, विकसित होते और सुखी रहते हैं। यदि उन सभी के अलग-अलग रहने का सिलसिला चल पड़े, तो गुलदस्ते की तरह परिवार की शोभा तो नष्ट होगी ही, साथ ही वे अलग रहने वाले घटक हर दृष्टि से दीन-दुर्बल होते जायेंगे, दुःखी रहेंगे और उनमें से कितनों का ही सहारा छूट जाने पर जीवित रह सकना भी संभव न होगा।
चिड़ियां झुण्ड बनाकर रहती, उड़ती और चहकती-फुदकती हैं। यदि वे अलग-अलग रहने लगें, तो जीवन का सारा आनन्द खो बैठें। वन्य पशु समूह बनाकर रहते हैं। यदि वे ऐसा न करें, तो एकाकी रहने वाला ‘इक्कड़’ कहलाने लगें और सामूहिकता के कारण उपलब्ध होने वाले गुणों से वंचित रहने लगें। हंसना-खेलना मिल-जुलकर ही बन पड़ता है। एकाकीपन के साथ तो नीरसता, निस्तब्धता जुड़ जाती है और समय काटना मुश्किल पड़ता है। जेल की काल कोठरी में जिन्हें एकाकी रहना पड़ता है, वे जानते हैं कि उस अवधि में कोई श्रम न करने पर भी वे दिन कितना भारी मन बनाकर काटने पड़ते हैं।
जंजीरें की कड़ियां मिलकर ही एक उपयोगी श्रृंखला बनाती हैं। यदि उनके घटक बिखर जायं, तो फिर उनकी क्या तो उपयोगिता रहे और क्या शोभा? मनुष्य को सामाजिक प्राणी कहा जाता है। उसकी सबसे बड़ी विशेषता यह है कि मिल-जुलकर रहने और एक-दूसरे का सहयोग करते हुए प्रगति पथ पर बढ़ चलने की कला उसने प्राप्त की है। यदि स्वभाव में यह विशेषता न रही होती, तो शारीरिक दृष्टि से लगभग समान स्तर बन्दर, चिंपैंजी, गोरिल्ला, वनमानुष आदि की तरह उसे भी गई-गुजरी स्थिति में दिन गुजारने पड़ते। अभी भी आदिवासी-वनवासी कबीले जहां कहीं बिखरे-बिखरे रहते हैं, वहां उन्हें पिछड़ी स्थिति का अभावग्रस्त और अनगढ़ स्तर का जीवन यापन करना पड़ता है। उत्तरी ध्रुव के एस्किमो कबीले वन्य स्तर का जीवन जीते हैं, पर जब उनमें से कुछ कनाडा जाकर बस गये, तो उनने वहीं के सभ्य निवासियों की तरह जीवन अपना लिया।
बहुत समय पूर्व भेड़ियों की मांद में कुछ मनुष्य बालक पाये गये थे। पकड़े पाने पर पाया गया कि वे भेड़िये जैसा ही स्वभाव अपना चुके थे। यही बात किसी के प्रति भी लागू हो सकती है। कारण एक ही था कि बच्चों को जिस प्रकार के सम्पर्क में रहना पड़ा, उसी की वे अनुकृति बन गये।
कहा जाता है कि मनुष्य बुद्धि प्रधान है, पर यह बुद्धि उसका निज का उपार्जन नहीं है। सम्पर्क-सान्निध्य से बन पड़ने वाले आदान-प्रदान की ही वह परिणति है। छोटे बच्चे जिस परिकर में रहते हैं, उसी की भाषा सीख जाते हैं। जो सुन नहीं पाते वे बहरे बोलने में असमर्थ गूंगे बने रहते हैं। ज्ञान वृद्धि के लिए अध्ययन, सम्पर्क, दृश्य, अनुभव ही प्रधान आधार होते हैं। वह जिस भी स्तर का उपलब्ध होता है, मनुष्य उसी ढांचे में ढल जाता है। कोरे कागज पर जैसी-जैसी जो बात अंकित की जाती है, वह आलेख बन जाती है। दर्पण के सामने जैसी छवि उपस्थित होती है, वैसी ही प्रतिच्छाया दीख पड़ती है। समीपवर्ती वातावरण ही मनुष्य को किसी ढांचे में ढालता है। यही कारण है कि पुराने समय में जिन्हें अपने बालकों का व्यक्तित्व उत्कृष्टता के ढांचे में ढालना होता था, वे उन्हें उस स्तर वाले गुरुकुलों में ही आरम्भ से रहने और पढ़ने के लिए भेज देते थे। घरेलू वातावरण में तो वैसी सुविधा होती नहीं थी। जिनका लालन-पालन हेय वातावरण में होता था, उनकी प्रकृति भी उसी ढांचे में ढल जाती थी। इससे सिद्ध है कि मनुष्य को जिस विशेषता से सम्पन्न माना जाता है, वह बुद्धिमत्ता उसकी अपनी सम्पदा नहीं है। उसे कहीं अन्यत्र से ही प्राप्त करना पड़ता है कहना न होगा कि मनुष्य की प्रमुख प्रवृत्ति सहकारिता की पक्षधर है। सुव्यवस्थित परिवारों की संरचना इसी आधार पर बन सकी। समाज संरचना का उद्गम भी वही है। आदान-प्रदान ही वह आधार है, जिससे वस्तुओं का विनिमय और जानकारियों का हस्तान्तरण होता है। यदि मनुष्य में सामाजिकता-सहकारिता की वृत्ति न रही होती, तो निश्चित रूप से वह वनमानुष जैसे वन्य प्राणियों से अधिक अच्छी स्थिति में न पहुंच सका होता। वन्य प्रदेशों में रहने वाले कबीले अभी भी मात्र उतनी ही प्रगति कर पायें हैं, जितना कि उन्हें सम्पर्क-सहकार मिलता रहा है।
प्रगतिक्रम का सिलसिला मनुष्य ने अपने आदिम विकास से ही जारी रखा है। अग्नि प्रज्ज्वलन, कृषि, पशुपालन, वस्त्र, आवास, व्यवसाय, शिक्षा, चिकित्सा, परिवहन आदि की सुविधायें किसी एक की अनुकृति नहीं हैं। वह प्रक्रिया क्रमिक गति से ही चली है। क्रमिक गति से ही यह उपलब्धियां हस्तगत होती रही हैं और उन्हें पिछले वालों ने अगले वालों के हाथ सौंपने का सिलसिला जारी रखा है। इसी क्रम से एक-एक सीढ़ी चढ़ते हुए, एक-एक कदम आगे बढ़ाते हुए यह स्थिति आ पायी है जिसमें कि आज मनुष्य है। यदि सहकारिता की उपलब्धियों से रहित हुआ होता, तो आज मनुष्य उतना ऊंचा नहीं उठ सका होता, जितना कि आज है।
अभी भी जितने सुविधा-साधन उपलब्ध हैं, उनमें से कदाचित ही कोई किसी मात्रा में अपने हाथ से—अपने बुद्धि बल से उपार्जित करता है, अनेकों के अनुदान मिलकर ही एक छोटी वस्तु समग्र रूप में हमारे हाथ तक पहुंच पाती है। उदाहरण के लिए एक माचिस की डिब्बी को लें। वह चीड़ के पेड़ का एक टुकड़ा है। उसे किसी ने काटा होगा। किसी वाहन में रखकर कारखाने तक पहुंचाया होगा। ढोने वाले वाहन को बनाने में जिस कारखाने का उपयोग हुआ, वह भी अनेकों कारीगरों, इंजीनियरों, धातु खोदने-पकाने वालों के सहयोग से बना होगा। तभी वह लकड़ी माचिस कारखाने तक पहुंची होगी। वहां छोटी तीली का रूप देने में कितनी मशीनों का उपयोग हुआ होगा? गन्धक फास्फोरस आदि रसायन लगाने और उन्हें माचिस में लगाने योग्य बनाने में कितनों का कितनी प्रकार का सहयोग लगा होगा। तीलियां रखने की डिब्बी बनाने में, उसके लेबल छापने, चिपकाने में कितनों का श्रम और कौशल लगा होगा इसका अनुमान सहज लगाया जा सकता है। उतने भर काम में हजारों का श्रम, कौशल लगा हो, तो कोई आश्चर्य की बात नहीं।
दैनिक जीवन में हम सैकड़ों वस्तुओं का उपयोग करते हैं। इनका निर्माण स्वयं हमने नहीं किया होता। उसके निर्माण में भी लम्बे जन सहयोग की श्रृंखला जुड़ी होती है। यहां तक कि जिन माता-पिता के द्वारा अपना जन्म हुआ है, जो पत्नी सहचरी बनी है, जिनके माध्यम से आजीविका कमाते हैं, जो विनोद के साधन बने हुए हैं वे भी हमारी स्वयं की कृति नहीं हैं। मित्र मण्डली से लेकर विनोद साधनों, शिक्षा, चिकित्सा जैसे उपकरणों में भी उनका योगदान रहा होता है। कपड़ों की बुनाई, सिलाई, धुलाई आदि में भी न जाने कितने अपना न्यूनाधिक योगदान लगा चुके होते हैं। इस प्रकार समूचा जीवन जिन वस्तुओं और व्यक्तियों के माध्यम से चलता है, वे सभी असंख्यों के सहयोग से विनिर्मित हुए होते हैं। यह लाभ ही मानवी प्रगति का प्रधान कारण है। बुद्धिमत्ता, प्रतिभा, बलिष्ठता, सम्पन्नता, विशिष्टता से अलंकृत व्यक्ति भी यह नहीं कह सकते कि साधनों से लेकर प्रतिभाओं तक को उनने एकाकी उपार्जित किया है। मनुष्य समुदाय को जो अनेकानेक सुविधायें प्राप्त हैं, वे वस्तुतः पारस्परिक आदान-प्रदान के आधार पर ही बन पड़ी और उपलब्ध हुई हैं।
पशु और मनुष्य के बीच जो अन्तर है, उसे बौद्धिक विशेषता कहा जाता है। यदि इसे सही माना जाये तो भी यही कहा जायगा कि उस बुद्धिमत्ता ने सर्वप्रथम सहकारिता के तत्त्व को जाना और अपनाया होगा, अन्यथा काया की दृष्टि से अनेक बातों में पशु-पक्षियों से गया-गुजरा होने पर भी उसने जो सृष्टि के मुकुटमणि की पदवी प्राप्त कर ली है, उसका किसी भी प्रकार सुयोग न बन पड़ा होता। सच तो यह है कि वह वन्य जीवन की कठिनाइयों और प्रतिस्पर्द्धाओं से जूझता हुआ कब का अपना अस्तित्व गंवा बैठा होता।
शासन, समाज, उद्योग, शिक्षा, शोध आदि के अनेकों ऐसे पक्ष हैं, जिनमें निकट भविष्य में और भी बहुत कुछ उपलब्ध होने की आशा तथा संभावना है। उनकी योजना, संभावना और सफलता मात्र इस बात पर टिकी हुई है कि उन प्रयोजनों में कितने सुयोग्यों का कितना घनिष्ठ सहयोग हस्तगत होता है। भूतकाल की ऐतिहासिक प्रगति का आधार भी यही रहा है और भविष्य में भी जो कुछ कहने लायक बन पड़ेगा, उसमें वरिष्ठों का सघन सहयोग ही काम कर रहा होगा।
सहयोग प्राणियों को अपने प्रभाव का परिचय देता है। बन्दर झुण्ड बना कर रहते हैं, परस्पर सहयोग करते हैं। एक को छेड़ने पर समूची मण्डली बदला लेने के लिए दौड़ पड़ती है। फलस्वरूप वे सभी के लिए अनुपयोगी होते हुए भी अपना अस्तित्व यथावत् बनाये हुए हैं। यहां तक कि हनुमान के वंशज कहलाते हुए चना-गुड़ जैसा भोग प्रसाद भी पाते रहते हैं। इसके ठीक विपरीत कुत्तों का उदाहरण है। वे आपस में लड़ते रहते हैं। दूसरे को अपने क्षेत्र में नहीं आने देते, फलस्वरूप एक पर मुसीबत आये तो दूसरे उसमें कोई हस्तक्षेप नहीं करते। फलस्वरूप उसे अकेले ही पिटते रहना पड़ता है। रखवाली तथा दूसरी दृष्टि से उपयोगी होते हुए भी कुत्ता शब्द अपमान का बोधक माना जाता है, शहद की मक्खियां दीमक, चींटी आदि की सहकारिता ही उन्हें समर्थ वर्ग में गिने जाने योग्य बनाती हैं, जब कि अन्यान्य कीड़े-मकोड़े बहुत संख्या में जन्मने पर भी दुर्गति को ही प्राप्त होते रहते हैं। सहकारिता प्राणि जगत की अत्यन्त उच्चकोटि की उपलब्धि है। झुण्ड में रहने वाले प्राणी अपेक्षाकृत अधिक सुरक्षित रहते हैं।

