सहकारिता में सुविधा भी, सफलता भी
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संगठना, सहकारिता, पारिवारिकता लगभग मिलते-जुलते शब्द हैं, इनकी उपेक्षा करके न सुख-चैन से रहा जा सकता है और न प्रगति का कोई कहने लायक सरंजाम जुट सकता है। अस्तु हर व्यक्ति को न केवल इस तन्त्र का महत्व समझना चाहिए वरन् उसके उपयोग का यथासम्भव पूरे उत्साह के साथ प्रयत्न भी करना चाहिए।
घर-परिवार से इसका शुभारम्भ होता है, परिवार का अस्तित्व हर किसी के जन्म से पहले ही बना हुआ होता है। बालकों को यही सिखाया जाता है कि सामर्थ्य और बुद्धि का समुचित विकास न होने की स्थिति में वे बड़ों का अनुशासन मानें, उनका सहयोग करें और इस प्रकार रहें जिससे उन्हें अधिक दुलार मिल सके और वे किसी के लिए भारी न पड़ें। यही आरम्भिक शिष्टाचार आजीवन निभाना पड़ता है। कितने ही व्यक्ति कई बातों में अपनी अपेक्षा अधिक कुशल, अनुभवी एवं समर्थ होते हैं, उनके साथ सहयोग बरतने में लाभ ही लाभ है। बच्चे इसी आधार पर लाभान्वित होते हैं। आयु तथा अन्य अनेक विषयों में मनुष्य कितनी ही बातों में दूसरों से पिछड़ा हो सकता है। इस कमी की पूर्ति के लिए अध्ययन-अध्यापन स्तर का क्रम अपनाया जाता है। साहित्य, कला, इतिहास आदि अन्य उपाय भी ज्ञान वृद्धि के हैं, इनका लाभ देने और लाभ लेने की परम्परा अबकी अपेक्षा और भी अधिक उत्साह के साथ चलने की आवश्यकता है। ध्यान इतना ही रखा जाना चाहिए कि कोई दिग्भ्रान्त व्यक्ति अपने बड़प्पन का रौब जताकर अन्य भावनाशीलों को भटकाने में सफल न होने पाये।
संयुक्त परिवार जीवनचर्या की आरम्भिक आवश्यकता है। बड़े यदि छोटों को दुलार, मार्गदर्शन और सहयोग न दें तो उनका प्रगति पथ पर अग्रसर होना तो दूर जीवित रहना तक कठिन हो जाय। औचित्य यह है कि जिस परिवार से सहयोग पाकर समर्थ बना गया है उसे सुखी, स्वावलम्बी, समुन्नत बनाने के लिए अपनी अभिवृद्धि के साथ-साथ योगदान बढ़ाते चला जाय। पितृऋण की मुक्ति इसी को कहते हैं। बचपन की तरह बुढ़ापा भी असमर्थता से जुड़ जाता है, बालकों की तरह वृद्धों को भी सहायता की आवश्यकता होती है। छोटे भी अपने से बड़ों से सहयोग की अपेक्षा करते हैं, बराबर वाले भी आदान-प्रदान की अपेक्षा रखते हैं—पारिवारिकता का तकाजा यही है। नया परिवार बसाने में जब तक उतावली न बरती जाय जब तक कि पिछले परिवार को सुविकसित-स्वावलम्बी न बना लिया जाय। यह कार्य इतना बड़ा और विस्तृत है कि यदि कोई समझदार व्यक्ति अपना विवाह न करे और प्रस्तुत परिवार को ही समुन्नत बनाने में लगा रहे तो यह उसकी दूरदर्शिता ही होगी।
जिन्हें नया परिवार बसाना है, विवाह करना है उन्हें भी इतना ध्यान तो रखना ही चाहिए कि आजीविका उपार्जन कर सकने योग्य होने के उपरान्त मात्र पति-पत्नी तक ही शौक-मौज में निरत-सीमित नहीं हो जाना चाहिए। जिनके सहयोग से अपनी समर्थता सम्भव हुई उनकी ओर से सर्वथा मुंह मोड़ लेना कृतघ्नता भी है और अनैतिकता भी। नये उत्साह में नई उपलब्धि में, नई कमाई में प्रायः यही भूल होती है। समय और धन का उपयोग दो तक सीमित रहे तो अधिक असुविधा बन पड़ती है, लोग उसी ओर ढुलक जाते हैं। फलतः समूचा परिवार घाटे में रहता है, यह एक प्रकार का प्रतिभा पलायन है। अपने देश में उच्च शिक्षा प्राप्त करने में जनता का प्रचुर धन खर्च कराने के उपरान्त विदेश में जा बसने पर स्वयं तो अधिक सुविधा उपार्जित कर ली जाती है, पर जिस परिवार ने, जिस देश ने उन्हें सुयोग्य बनाया था उसके लिए प्रतिदान कुछ भी नहीं मिल पाता, इसलिए प्रतिभा पलायन की भर्त्सना होती रहती है। यही बात उन पर भी लागू होती है जो कमाने योग्य होते हैं, वे अपनी सुविधा ही सब कुछ मान लेते हैं और जिनका ऋण सिर पर चढ़ा था उन्हें अंगूठा दिखा देते हैं।
संयुक्त परिवार में नैतिकता का निर्वाह अधिक अच्छी तरह बन पड़ता है। सामाजिकता इस छोटे क्षेत्र में विकसित होकर सम्बन्धियों, पड़ौसियों और परिचितों को प्रभावित करती है। यह अच्छी परम्परा है और इसमें कमाने और बिना कमाने वाले सभी की गाड़ी न्यायोचित ढंग से खिंचती चली जाती है और किसी भी वर्ग को पिछड़ी स्थिति में पड़े रहने का दुःख सहन नहीं करना पड़ता, यही उचित है और यही आवश्यक। संयुक्त परिवार प्रथा से मुंह मोड़ लेने के उपरान्त पाश्चात्य देशों में बालकों, वृद्धों और पिछड़ों को अपने भाग्य पर अवलम्बित रहकर बुरे दिन गुजारने पड़ रहे हैं। यह प्रचलन जहां भी चलेगा वहां दुर्दिन देखने पड़ेंगे।
परिवार का विस्तार इतना होना चाहिए जिसकी सुव्यवस्था भली प्रकार बन सके। यह एक-दो पीढ़ियों तक ही चल पाता है बाद में सदस्य संख्या अधिक बढ़ जाने पर उन्हें छोटे टुकड़ों में विभक्त होना पड़ता है। निर्वाह, भोजन, देखभाल, कर्तव्यों का परिपालन सीमित क्षेत्र में ही बन पड़ता है, इसलिए अपनी स्थिति के अनुरूप संयुक्त परिवार भी सीमित सदस्यों के ही होने चाहिए।
सहकारिता के अधिक लाभों को देखते हुए विचारशील वर्ग में पारिवारिकता को भी सहकारिता के आधार पर नई पद्धति से गठित किया जा रहा है। इसे ‘ लार्जर फैमिली’ कहा जाता है और वृहत्तर परिवार का नाम दिया जाता है—यह प्रयोग जहां भी हुए हैं सफल रहे हैं।
एक संगठन के अन्तर्गत उसके सदस्यों के लिए एक जगह सेना की छावनी जैसा, छात्रावासों जैसा संयुक्त भोजनालय चले तो इसमें समय, श्रम और धन की भारी बचत होती है। छोटे परिवार के लिए एक या कई महिलायें मात्र भोजन पकाने, सफाई करने में लगी रहे तो उनके सामर्थ्य का यह अत्यंत दुरुपयोग हुआ। शेष खाली बचे समय का अपव्यय ही हुआ—यह बुरी बात है। आर्थिक, सामाजिक और राष्ट्रीय सभी दृष्टियों से छोटे परिवार हानिकारक बैठते हैं। अपवाद रूप में वे तभी ठीक बैठते हैं जब होटल में रहने और वहीं खाने की व्यवस्था बने, उसमें भा सामाजिकता का अभाव ही रहता है।
वृहत्तर कुटुम्ब में, उस संगठन के सदस्यों के लिए एक ही जगह भोजन बनने, कपड़ों की धुलाई का तन्त्र एक रहने, छोटे बच्चों को खिलाने और पढ़ाने के लिए एक व्यवस्था रहने से सभी को सुविधा रहती है। कुछ को इस व्यवस्था के अन्तर्गत स्वतन्त्र काम मिलता है, शेष सब लोगों के लिए पर्याप्त समय खाली बचता है जिसका उपयोग अन्य अधिक महत्वपूर्ण कार्यों में हो सकता है। अगले दिनों समझदारी और सुव्यवस्था का तकाजा यही होगा कि ऐसे मुहल्ले या गांव बस जिनकी घरेलू व्यवस्था एक छोटे तन्त्र के अन्तर्गत संभाली जाती रहे और शेष सभी वयस्क एवं समर्थ लोग अधिक महत्वपूर्ण कार्यों में संलग्न रहकर अपने समाज की अधिक प्रगति कर सकने का सुयोग बना सकें। एक बच्चे की देखभाल पर एक महिला घिरी रहे, मर्द का खाना पकाने भर में उसकी दिनचर्या खप जाय—यह प्रचलन किसी के लिए भी, किसी भी प्रकार सुविधाजनक नहीं हो सकता, अस्तु यह बदलना ही होगा। वृहत्तर परिवारों की सहकारी समिति बनाकर रहने में ही हर किसी को, हर दृष्टि से अधिक लाभ मिल सकेगा। इस परिपाटी को वर्तमान में ‘कम्यून’ नाम दिया गया है, इस मान्यता को अपनाने वाले ‘कम्युनिस्ट’ कहलाये। अब तो उसका स्वरूप राजनैतिक बन गया है, पर जब कभी लोगों का ध्यान जीवन निर्वाह पद्धति को अधिक सुविधाजनक बनाने की ओर जायेगा तब उन्हें वृहत्तर परिवार की योजना ही बनानी पड़ेगी। मिल-जुलकर रहने की सामाजिकता का, अनुशासन और संयम का निर्वाह भी इसी प्रक्रिया के अन्तर्गत हो सकता है।
आर्थिक क्षेत्र में अधिक सुविधापूर्वक अधिक लोगों के लिए समान स्तर की आजीविका उपलब्ध कराने के लिए सहकारी समितियों का गठन किया जाता है। सहकारी स्टोरों पर शुद्ध खाद्य पदार्थ मिलने और अन्य आवश्यक वस्तुयें उचित मूल्य पर सही स्तर की मिलने की सुविधा बन सकती है। ‘सुपर मार्केट’ सफल हो रहे हैं, उनकी उपयोगिता और सुविधा हर किसी को आकर्षित एवं प्रभावित कर रही हैं। यदि ऐसे स्टोर गांव-गांव, मुहल्ले-मुहल्ले खुल सकें तो आज जो महंगे मोल में खराब चीजें मिलने की उपभोक्ताओं की शिकायत रहती है—वह न रहे। अनेक स्थानों पर भटकने की अपेक्षा लोग एक ही स्थान पर सभी आवश्यक वस्तुयें खरीद सकें और मूल्य भी औचित्य की सीमा के अन्तर्गत ही देना पड़े।
कितने ही प्रकार के छोटे-बड़े व्यवसाय और निर्माण जगह-जगह चलते हैं, उनका लाभांश व्यक्ति विशेष को ही मिलता है। दृष्टिकोण सीमित रहने से कर्मचारियों को सदा काम और उचित वेतन मिलता रहे इसका प्रबन्ध नहीं हो पाता। यदि सहकारी समिति के अन्तर्गत उसके संचालक न केवल उत्पादन का वरन् उपभोक्ताओं और श्रमिकों का हित-साधन भी जोड़कर रखें तो निश्चय ही जहां सम्बन्धित लोगों को अधिक सुविधा रहेगी वहां नये-नये उद्योगों की श्रृंखला भी इस आधार पर चल सकती है। कुटीर उद्योग अगले दिनों देश की बेकारी, बेरोजगारी और गरीबी की समस्या का हल करेंगे। उनका सुव्यवस्थिति संचालन सहकारिता के आधार पर ही संभव है। कच्चा माल देना और बना माल खरीद कर मण्डियों में खपाना सहकारी संगठनों के आधार पर ही सम्भव हो सकता है। पूंजी की आवश्यकता पड़ने पर उन्हें बैंकों द्वारा आवश्यक ऋण भी अधिक सुविधापूर्वक मिल सकता है। इस प्रकार बिखरे देहातों में कुटीर उद्योगों का विस्तार भी सहकारिता को अपनाये बिना सम्भव नहीं।
बड़े व्यापारों में भी अब लिमिटेड कम्पनियों के आधार पर सहकारी संस्थायें ही एक मात्र आधार रह गई हैं। शेयर खरीदने वाले भी अपनी पूंजी का अच्छा लाभ कमा लेते हैं और देश में नये व्यवसाय बढ़ाने में भी सहायक सिद्ध होते हैं। व्यक्ति विशेष निजी लाभ के लिए दिवालिया निकालने जैसी अवांछनीयता भी बरत सकता है, पर सहकारी अर्थ संस्थानों में संचालक समितियों के तत्वाधान में ऐसी भूलें कम ही होती हैं।
निजी उद्योग अपनी विश्वसनीयता अधिक लालच के वशीभूत होकर गंवाते चले जा रहे हैं। ऐसी दशा में प्रामाणिकता, सामाजिकता और सफलता बनाये रखने के लिए सहकारी व्यवसायों को बड़े रूप में चलाना ही उपयोगी रह जायेगा। तब यह कठिनाई न रहेगी कि छोटे व्यवसाय में बड़ा परिवार चलाने के लिए उसमें अनौचित्य का समावेश करके अधिक लाभ कमाने की बात सोचनी पड़े।
छोटे उद्योग चलाने वाले यदि मिल-जुलकर एक संयुक्त तन्त्र बना लें तो उन्हें पूंजी की मार्केट ढूंढ़ने की कठिनाई का सामना न करना पड़े। किसानों की छोटी जोते मिलकर एक बड़ा संयुक्त फार्म बना लें तो उनके सभी भागीदारों को अपेक्षाकृत अधिक लाभ मिलेगा और अधिक निश्चिन्तता रहेगी। पशुपालन अपने देश का एक बड़ा उद्योग है, पर पशु शक्ति का, उनके उत्पादनों का सदुपयोग न बन पड़ने से वह भी घाटे में ही चला जाता है। पशुओं का स्तर न बढ़ पाने के कारण वे पालने वालों के लिए उत्साहवर्धक भी नहीं रह जाते। ऐसी दशा में यदि बड़े पैमाने पर पशु पालन चले तो उन के दूध, ऊन, गोबर आदि का अधिक लाभदायक उद्योग चल सकता है। चारे के बड़े उत्पादन केन्द्र बन जाने से उनके दुर्बल, कमजोर रह जाने की शिकायत भी न रहे। पशुओं द्वारा परिवहन भले ही अमेरिका जैसे धनवान देशों के लिए व्यर्थ हो गया हो, पर भारत जैसे निर्धन देश में अभी भी माल ढोने और वाहनों का उपयोग करने की पूरी गुंजाइश है। वे ट्रक, ट्रैक्टर, बस आदि का किसी सीमा तक अभी भी मुकाबला कर सकते हैं, पर यह सब एकाकी प्रयोगों से नहीं—मिल-जुलकर की जाने वाली व्यवस्था से ही सम्भव है।
सभी जानते हैं कि स्कूल में भर्ती करके विद्यार्थी का पढ़ना सुविधाजनक पड़ता है। यदि हर विद्यार्थी के लिए पढ़ाई की अलग-अलग व्यवस्था की जाय तो वह अत्यधिक कठिन पड़ेगी। ठीक इसी प्रकार उद्योग व्यवसाय के क्षेत्र में संयुक्त शक्ति वाले सरंजाम जुटाये जा सके तो आर्थिक और सामाजिक पिछड़ेपन से बहुत हद तक छुटकारा पाया जा सकता है। जहां पूंजी का, साधनों का अभाव नहीं वहां तो कोई एकाकी व्यक्ति भी अपना व्यवसाय सफलतापूर्वक चला सकता है, पर जहां साधनों का, दक्षता का अभाव है वहां तो साझेदारी ही अभीष्ट प्रयोजन सिद्ध कर सकती है, समाजवाद इसी चिन्तन पद्धति का नाम है।
एक नाव में इकट्ठे बैठकर लोग बड़ी नदियों को भी आसानी से पार कर लेते हैं, हर व्यक्ति का अलग-अलग तैरकर पार होना कठिन है। इस तथ्य को जीवन के हर क्षेत्र में प्रयुक्त किया जाना चाहिए। व्यक्तिवादी संकीर्णता की प्रवृत्ति को स्वार्थपरता कहा जाता है, स्वार्थ को नैतिक दृष्टि से तो हेय माना ही गया है, सामाजिक और आर्थिक दृष्टि से भी वह घाटे का सौदा है। चोर-डाकू तक गिरोह बनाकर ही सफल हो पाते हैं। एकाकी स्थिति में तो उनके लिए भी कुछ करते-धरते बन पड़ना कठिन है। अतः अधिक लाभप्रद और अधिक सफल प्रयोगों के लिए सहकारिता का दृष्टिकोण अपनाना और वैसी ही व्यवस्था बनाना और भी अधिक आवश्यक हो जाता है।
संयुक्त परिवार जीवनचर्या की आरम्भिक आवश्यकता है। बड़े यदि छोटों को दुलार, मार्गदर्शन और सहयोग न दें तो उनका प्रगति पथ पर अग्रसर होना तो दूर जीवित रहना तक कठिन हो जाय। औचित्य यह है कि जिस परिवार से सहयोग पाकर समर्थ बना गया है उसे सुखी, स्वावलम्बी, समुन्नत बनाने के लिए अपनी अभिवृद्धि के साथ-साथ योगदान बढ़ाते चला जाय। पितृऋण की मुक्ति इसी को कहते हैं। बचपन की तरह बुढ़ापा भी असमर्थता से जुड़ जाता है, बालकों की तरह वृद्धों को भी सहायता की आवश्यकता होती है। छोटे भी अपने से बड़ों से सहयोग की अपेक्षा करते हैं, बराबर वाले भी आदान-प्रदान की अपेक्षा रखते हैं—पारिवारिकता का तकाजा यही है। नया परिवार बसाने में जब तक उतावली न बरती जाय जब तक कि पिछले परिवार को सुविकसित-स्वावलम्बी न बना लिया जाय। यह कार्य इतना बड़ा और विस्तृत है कि यदि कोई समझदार व्यक्ति अपना विवाह न करे और प्रस्तुत परिवार को ही समुन्नत बनाने में लगा रहे तो यह उसकी दूरदर्शिता ही होगी।
जिन्हें नया परिवार बसाना है, विवाह करना है उन्हें भी इतना ध्यान तो रखना ही चाहिए कि आजीविका उपार्जन कर सकने योग्य होने के उपरान्त मात्र पति-पत्नी तक ही शौक-मौज में निरत-सीमित नहीं हो जाना चाहिए। जिनके सहयोग से अपनी समर्थता सम्भव हुई उनकी ओर से सर्वथा मुंह मोड़ लेना कृतघ्नता भी है और अनैतिकता भी। नये उत्साह में नई उपलब्धि में, नई कमाई में प्रायः यही भूल होती है। समय और धन का उपयोग दो तक सीमित रहे तो अधिक असुविधा बन पड़ती है, लोग उसी ओर ढुलक जाते हैं। फलतः समूचा परिवार घाटे में रहता है, यह एक प्रकार का प्रतिभा पलायन है। अपने देश में उच्च शिक्षा प्राप्त करने में जनता का प्रचुर धन खर्च कराने के उपरान्त विदेश में जा बसने पर स्वयं तो अधिक सुविधा उपार्जित कर ली जाती है, पर जिस परिवार ने, जिस देश ने उन्हें सुयोग्य बनाया था उसके लिए प्रतिदान कुछ भी नहीं मिल पाता, इसलिए प्रतिभा पलायन की भर्त्सना होती रहती है। यही बात उन पर भी लागू होती है जो कमाने योग्य होते हैं, वे अपनी सुविधा ही सब कुछ मान लेते हैं और जिनका ऋण सिर पर चढ़ा था उन्हें अंगूठा दिखा देते हैं।
संयुक्त परिवार में नैतिकता का निर्वाह अधिक अच्छी तरह बन पड़ता है। सामाजिकता इस छोटे क्षेत्र में विकसित होकर सम्बन्धियों, पड़ौसियों और परिचितों को प्रभावित करती है। यह अच्छी परम्परा है और इसमें कमाने और बिना कमाने वाले सभी की गाड़ी न्यायोचित ढंग से खिंचती चली जाती है और किसी भी वर्ग को पिछड़ी स्थिति में पड़े रहने का दुःख सहन नहीं करना पड़ता, यही उचित है और यही आवश्यक। संयुक्त परिवार प्रथा से मुंह मोड़ लेने के उपरान्त पाश्चात्य देशों में बालकों, वृद्धों और पिछड़ों को अपने भाग्य पर अवलम्बित रहकर बुरे दिन गुजारने पड़ रहे हैं। यह प्रचलन जहां भी चलेगा वहां दुर्दिन देखने पड़ेंगे।
परिवार का विस्तार इतना होना चाहिए जिसकी सुव्यवस्था भली प्रकार बन सके। यह एक-दो पीढ़ियों तक ही चल पाता है बाद में सदस्य संख्या अधिक बढ़ जाने पर उन्हें छोटे टुकड़ों में विभक्त होना पड़ता है। निर्वाह, भोजन, देखभाल, कर्तव्यों का परिपालन सीमित क्षेत्र में ही बन पड़ता है, इसलिए अपनी स्थिति के अनुरूप संयुक्त परिवार भी सीमित सदस्यों के ही होने चाहिए।
सहकारिता के अधिक लाभों को देखते हुए विचारशील वर्ग में पारिवारिकता को भी सहकारिता के आधार पर नई पद्धति से गठित किया जा रहा है। इसे ‘ लार्जर फैमिली’ कहा जाता है और वृहत्तर परिवार का नाम दिया जाता है—यह प्रयोग जहां भी हुए हैं सफल रहे हैं।
एक संगठन के अन्तर्गत उसके सदस्यों के लिए एक जगह सेना की छावनी जैसा, छात्रावासों जैसा संयुक्त भोजनालय चले तो इसमें समय, श्रम और धन की भारी बचत होती है। छोटे परिवार के लिए एक या कई महिलायें मात्र भोजन पकाने, सफाई करने में लगी रहे तो उनके सामर्थ्य का यह अत्यंत दुरुपयोग हुआ। शेष खाली बचे समय का अपव्यय ही हुआ—यह बुरी बात है। आर्थिक, सामाजिक और राष्ट्रीय सभी दृष्टियों से छोटे परिवार हानिकारक बैठते हैं। अपवाद रूप में वे तभी ठीक बैठते हैं जब होटल में रहने और वहीं खाने की व्यवस्था बने, उसमें भा सामाजिकता का अभाव ही रहता है।
वृहत्तर कुटुम्ब में, उस संगठन के सदस्यों के लिए एक ही जगह भोजन बनने, कपड़ों की धुलाई का तन्त्र एक रहने, छोटे बच्चों को खिलाने और पढ़ाने के लिए एक व्यवस्था रहने से सभी को सुविधा रहती है। कुछ को इस व्यवस्था के अन्तर्गत स्वतन्त्र काम मिलता है, शेष सब लोगों के लिए पर्याप्त समय खाली बचता है जिसका उपयोग अन्य अधिक महत्वपूर्ण कार्यों में हो सकता है। अगले दिनों समझदारी और सुव्यवस्था का तकाजा यही होगा कि ऐसे मुहल्ले या गांव बस जिनकी घरेलू व्यवस्था एक छोटे तन्त्र के अन्तर्गत संभाली जाती रहे और शेष सभी वयस्क एवं समर्थ लोग अधिक महत्वपूर्ण कार्यों में संलग्न रहकर अपने समाज की अधिक प्रगति कर सकने का सुयोग बना सकें। एक बच्चे की देखभाल पर एक महिला घिरी रहे, मर्द का खाना पकाने भर में उसकी दिनचर्या खप जाय—यह प्रचलन किसी के लिए भी, किसी भी प्रकार सुविधाजनक नहीं हो सकता, अस्तु यह बदलना ही होगा। वृहत्तर परिवारों की सहकारी समिति बनाकर रहने में ही हर किसी को, हर दृष्टि से अधिक लाभ मिल सकेगा। इस परिपाटी को वर्तमान में ‘कम्यून’ नाम दिया गया है, इस मान्यता को अपनाने वाले ‘कम्युनिस्ट’ कहलाये। अब तो उसका स्वरूप राजनैतिक बन गया है, पर जब कभी लोगों का ध्यान जीवन निर्वाह पद्धति को अधिक सुविधाजनक बनाने की ओर जायेगा तब उन्हें वृहत्तर परिवार की योजना ही बनानी पड़ेगी। मिल-जुलकर रहने की सामाजिकता का, अनुशासन और संयम का निर्वाह भी इसी प्रक्रिया के अन्तर्गत हो सकता है।
आर्थिक क्षेत्र में अधिक सुविधापूर्वक अधिक लोगों के लिए समान स्तर की आजीविका उपलब्ध कराने के लिए सहकारी समितियों का गठन किया जाता है। सहकारी स्टोरों पर शुद्ध खाद्य पदार्थ मिलने और अन्य आवश्यक वस्तुयें उचित मूल्य पर सही स्तर की मिलने की सुविधा बन सकती है। ‘सुपर मार्केट’ सफल हो रहे हैं, उनकी उपयोगिता और सुविधा हर किसी को आकर्षित एवं प्रभावित कर रही हैं। यदि ऐसे स्टोर गांव-गांव, मुहल्ले-मुहल्ले खुल सकें तो आज जो महंगे मोल में खराब चीजें मिलने की उपभोक्ताओं की शिकायत रहती है—वह न रहे। अनेक स्थानों पर भटकने की अपेक्षा लोग एक ही स्थान पर सभी आवश्यक वस्तुयें खरीद सकें और मूल्य भी औचित्य की सीमा के अन्तर्गत ही देना पड़े।
कितने ही प्रकार के छोटे-बड़े व्यवसाय और निर्माण जगह-जगह चलते हैं, उनका लाभांश व्यक्ति विशेष को ही मिलता है। दृष्टिकोण सीमित रहने से कर्मचारियों को सदा काम और उचित वेतन मिलता रहे इसका प्रबन्ध नहीं हो पाता। यदि सहकारी समिति के अन्तर्गत उसके संचालक न केवल उत्पादन का वरन् उपभोक्ताओं और श्रमिकों का हित-साधन भी जोड़कर रखें तो निश्चय ही जहां सम्बन्धित लोगों को अधिक सुविधा रहेगी वहां नये-नये उद्योगों की श्रृंखला भी इस आधार पर चल सकती है। कुटीर उद्योग अगले दिनों देश की बेकारी, बेरोजगारी और गरीबी की समस्या का हल करेंगे। उनका सुव्यवस्थिति संचालन सहकारिता के आधार पर ही संभव है। कच्चा माल देना और बना माल खरीद कर मण्डियों में खपाना सहकारी संगठनों के आधार पर ही सम्भव हो सकता है। पूंजी की आवश्यकता पड़ने पर उन्हें बैंकों द्वारा आवश्यक ऋण भी अधिक सुविधापूर्वक मिल सकता है। इस प्रकार बिखरे देहातों में कुटीर उद्योगों का विस्तार भी सहकारिता को अपनाये बिना सम्भव नहीं।
बड़े व्यापारों में भी अब लिमिटेड कम्पनियों के आधार पर सहकारी संस्थायें ही एक मात्र आधार रह गई हैं। शेयर खरीदने वाले भी अपनी पूंजी का अच्छा लाभ कमा लेते हैं और देश में नये व्यवसाय बढ़ाने में भी सहायक सिद्ध होते हैं। व्यक्ति विशेष निजी लाभ के लिए दिवालिया निकालने जैसी अवांछनीयता भी बरत सकता है, पर सहकारी अर्थ संस्थानों में संचालक समितियों के तत्वाधान में ऐसी भूलें कम ही होती हैं।
निजी उद्योग अपनी विश्वसनीयता अधिक लालच के वशीभूत होकर गंवाते चले जा रहे हैं। ऐसी दशा में प्रामाणिकता, सामाजिकता और सफलता बनाये रखने के लिए सहकारी व्यवसायों को बड़े रूप में चलाना ही उपयोगी रह जायेगा। तब यह कठिनाई न रहेगी कि छोटे व्यवसाय में बड़ा परिवार चलाने के लिए उसमें अनौचित्य का समावेश करके अधिक लाभ कमाने की बात सोचनी पड़े।
छोटे उद्योग चलाने वाले यदि मिल-जुलकर एक संयुक्त तन्त्र बना लें तो उन्हें पूंजी की मार्केट ढूंढ़ने की कठिनाई का सामना न करना पड़े। किसानों की छोटी जोते मिलकर एक बड़ा संयुक्त फार्म बना लें तो उनके सभी भागीदारों को अपेक्षाकृत अधिक लाभ मिलेगा और अधिक निश्चिन्तता रहेगी। पशुपालन अपने देश का एक बड़ा उद्योग है, पर पशु शक्ति का, उनके उत्पादनों का सदुपयोग न बन पड़ने से वह भी घाटे में ही चला जाता है। पशुओं का स्तर न बढ़ पाने के कारण वे पालने वालों के लिए उत्साहवर्धक भी नहीं रह जाते। ऐसी दशा में यदि बड़े पैमाने पर पशु पालन चले तो उन के दूध, ऊन, गोबर आदि का अधिक लाभदायक उद्योग चल सकता है। चारे के बड़े उत्पादन केन्द्र बन जाने से उनके दुर्बल, कमजोर रह जाने की शिकायत भी न रहे। पशुओं द्वारा परिवहन भले ही अमेरिका जैसे धनवान देशों के लिए व्यर्थ हो गया हो, पर भारत जैसे निर्धन देश में अभी भी माल ढोने और वाहनों का उपयोग करने की पूरी गुंजाइश है। वे ट्रक, ट्रैक्टर, बस आदि का किसी सीमा तक अभी भी मुकाबला कर सकते हैं, पर यह सब एकाकी प्रयोगों से नहीं—मिल-जुलकर की जाने वाली व्यवस्था से ही सम्भव है।
सभी जानते हैं कि स्कूल में भर्ती करके विद्यार्थी का पढ़ना सुविधाजनक पड़ता है। यदि हर विद्यार्थी के लिए पढ़ाई की अलग-अलग व्यवस्था की जाय तो वह अत्यधिक कठिन पड़ेगी। ठीक इसी प्रकार उद्योग व्यवसाय के क्षेत्र में संयुक्त शक्ति वाले सरंजाम जुटाये जा सके तो आर्थिक और सामाजिक पिछड़ेपन से बहुत हद तक छुटकारा पाया जा सकता है। जहां पूंजी का, साधनों का अभाव नहीं वहां तो कोई एकाकी व्यक्ति भी अपना व्यवसाय सफलतापूर्वक चला सकता है, पर जहां साधनों का, दक्षता का अभाव है वहां तो साझेदारी ही अभीष्ट प्रयोजन सिद्ध कर सकती है, समाजवाद इसी चिन्तन पद्धति का नाम है।
एक नाव में इकट्ठे बैठकर लोग बड़ी नदियों को भी आसानी से पार कर लेते हैं, हर व्यक्ति का अलग-अलग तैरकर पार होना कठिन है। इस तथ्य को जीवन के हर क्षेत्र में प्रयुक्त किया जाना चाहिए। व्यक्तिवादी संकीर्णता की प्रवृत्ति को स्वार्थपरता कहा जाता है, स्वार्थ को नैतिक दृष्टि से तो हेय माना ही गया है, सामाजिक और आर्थिक दृष्टि से भी वह घाटे का सौदा है। चोर-डाकू तक गिरोह बनाकर ही सफल हो पाते हैं। एकाकी स्थिति में तो उनके लिए भी कुछ करते-धरते बन पड़ना कठिन है। अतः अधिक लाभप्रद और अधिक सफल प्रयोगों के लिए सहकारिता का दृष्टिकोण अपनाना और वैसी ही व्यवस्था बनाना और भी अधिक आवश्यक हो जाता है।

