• News
  • Blogs
  • Gurukulam
English हिंदी
×

My Notes


  • TOC
    • सहकारिता एक अमोघ शक्ति
    • सहयोग अनिवार्य भी आवश्यक भी
    • सहकारिता में सुविधा भी, सफलता भी
    • सहकार से ही उद्धार
    • प्रगतिशीलता कार्यक्षेत्र में उतरे
    • असुरता क्यों भारी पड़ती है?
    • संगठन का मेरुदंड स्वयं बनें
  • My Note
  • Books
    • SPIRITUALITY
    • Meditation
    • EMOTIONS
    • AMRITVANI
    • PERSONAL TRANSFORMATION
    • SOCIAL IMPROVEMENT
    • SELF HELP
    • INDIAN CULTURE
    • SCIENCE AND SPIRITUALITY
    • GAYATRI
    • LIFE MANAGEMENT
    • PERSONALITY REFINEMENT
    • UPASANA SADHANA
    • CONSTRUCTING ERA
    • STRESS MANAGEMENT
    • HEALTH AND FITNESS
    • FAMILY RELATIONSHIPS
    • TEEN AND STUDENTS
    • ART OF LIVING
    • INDIAN CULTURE PHILOSOPHY
    • THOUGHT REVOLUTION
    • TRANSFORMING ERA
    • PEACE AND HAPPINESS
    • INNER POTENTIALS
    • STUDENT LIFE
    • SCIENTIFIC SPIRITUALITY
    • HUMAN DIGNITY
    • WILL POWER MIND POWER
    • SCIENCE AND RELIGION
    • WOMEN EMPOWERMENT
  • Akhandjyoti
  • Login


Back to Books

Books - सर्वतोमुखी सहकारिता

Media: TEXT
Language: HINDI
TEXT


असुरता क्यों भारी पड़ती है?

Listen online

View page note

Please go to your device settings and ensure that the Text-to-Speech engine is configured properly. Download the language data for Hindi or any other languages you prefer for the best experience.
×

Add Note


First 5 7 Last
संगठन का मूल्य लोग न समझते हों ऐसी बात नहीं है। यदि उससे अनजान रहे होते तो कबीले और गिरोह कैसे बनते? अनेकों जातीय पंचायतें, राजनैतिक पार्टियां दीख पड़ती हैं उनका अस्तित्व प्रकार में कैसे आता? साम्प्रदायिक कर्मकाण्डों के धूम-धड़ाके किस आधार पर विनिर्मित होते? इतना ही नहीं चिड़ियां और वन पशुओं के झुण्ड जहां-तहां विचरते क्यों दीख पड़ते?

शोचनीय और चिन्ताजनक बात एक ही है कि सज्जनों, सेवाभावियों के सत्साहस से संजोये हुए परिकर संगठित रूप से काम करते दिखलाई नहीं पड़ते। इस असंगठन का ही परिणाम यह है कि भ्रष्टता और दुष्टता हर क्षेत्र में पनपती और पैर पसारती दृष्टिगोचर होती है। कारण यह नहीं है कि अनाचार में—असुरता में अधिक शक्ति होती है। अनीति तो दुर्बल ही रही है और रहेगी। अन्धकार का कोई स्वतंत्र अस्तित्व नहीं होता। उसे नापा-तोला नहीं जा सकता है, पकड़ा-बांधा नहीं जा सकता। उसका कोई कर्तव्य पुरुषार्थ भी नहीं देखा जाता। प्रकाश के अभाव का नाम ही अन्धकार है। प्रकाश का अस्तित्व नापा, तोला, जांचा और काम में लाया जा सकता है। प्रकाश की एक छोटी माचिस जला देने पर कमरे भर की वस्तुयें दीखने लगती हैं, पर अन्धकार का कहीं कोई ऐसा मापदण्ड नहीं है जिसे किसी प्रकाशवान क्षेत्र में छोड़कर अन्धेरा किया जा सके। प्रकाश को सत और अन्धकार को असत माना गया है। असत् अर्थात् अस्तित्व रहित। किसी वस्तु का अभाव ही असत् है। असुरता को, अनाचार को भी इसी श्रेणी में गिना जा सकता है। वह तब तक बना ही रहेगा जब तक कि खाई को पाटा न जाय, अन्धकार का प्रतिपक्षी प्रकाश उत्पन्न न किया जाय।

इतने पर भी आश्चर्य यह है कि अनाचारी बहुसंख्यक दीखते हैं। इतना ही नहीं वे प्रथम आक्रमण की नीति अपनाकर तात्कालिक सफलता भी पाते हैं, आतंक भी उत्पन्न करते हैं और बहुसंख्यकों को डराने, हावी होने एवं दबाव देकर कुछ भी करा लेने में भी सफल होते हैं। कुछ ही गुण्डे सारे मुहल्ले को आतंकित कर देते हैं। कुछ ही अनाचारी सारे गांव के क्षेत्र की शांति और इज्जत को धूल में मिला देते हैं।

किसी भी छोटे-बड़े क्षेत्र की गणना की जाय तो वहां दुष्ट-दुराचारी थोड़े से ही पाये जा सकेंगे। शेष तो शान्तिप्रिय, साधारण लोग ही रहते हैं। इस संसार में बहुमत सज्जनता का ही है। अन्धकार कितना ही अधिक क्यों न हो वह प्रकाश की तुलना में व्यापक और समर्थ नहीं हो सकता। यही बात अनाचारियों के सम्बन्ध में भी कही जा सकती है। न तो वे बलिष्ठ होते हैं और न अतिरिक्त शक्ति-सम्पन्न। न साहसी न पराक्रमी। पग-पग पर वे छल, दुराव और लुक-छिप का आश्रय लेते हैं। कभी पकड़े जाते हैं तो दण्ड-भय से बुरी तरह, कायरों की तरह कातर होकर गिड़गिड़ाते हैं और छुटकारा पाने के लिए त्राहि-त्राहि करते हैं। इससे वह उक्ति सर्वथा सार्थक दीखती है ‘‘गुण्डा, पहले दर्जे का कायर होता है।’’ उसके किसी मोर्चे पर पैर नहीं टिकते। जोखिम सामने आते ही उखड़ जाता है और भाग खड़ा होता है। छल ही उसकी एक मात्र ढाल होती हैं। कुटिलता का आश्रय लेकर ही वह किसी प्रकार गुजारा करता और जान बचाता है। यह तथ्य किसी भी पुलिस मैन से पूछकर जाना जा सकता है जिन्हें कि एक दो होने पर भी गुण्डों के गिरोह का सामना और उन पर काबू पाना पड़ता है। जेल के कर्मचारी भी जानते हैं कि जिनने छुट्टल होने पर सर्वत्र आतंक मचा रखा था, वे बाड़े में बन्द होने के उपरान्त कैसे निरीह बन जाते हैं और डण्डे के भय से थर-थर कांपते हैं।

वस्तुस्थिति यही है, फिर क्या कारण है कि शांतिप्रिय सज्जन स्तर के लोग बार-बार मार खाते हैं और अनाचारियों के भय से डरते-घबराते और भयभीत रहते हैं? इसका कारण एक ही है कि बहुसंख्यक, समर्थ एवं सौम्य होते हुए भी वे संगठन से कतराते हैं। मिल-जुलकर रहने, संगठित बनने और संयुक्त शक्ति का विकास करने के लिए उनका उत्साह नहीं उभरता। अपने व्यक्तिगत कामों एवं विचारों में ही सामर्थ्य खपा देते हैं, इस ओर ध्यान नहीं देते कि महत्वपूर्ण स्तर की प्रगति के लिए, बड़ी सफलता पाने के लिए संघ शक्ति का प्रकटीकरण एवं संवर्धन आवश्यक है। दुष्टता से जूझने के लिये भी सज्जनों की पारस्परिक संघबद्धता ही नहीं वह समर्थता भी विकसित करने की आवश्यकता है जो अनाचार से लोहा ले सके। यह उपेक्षा या भूल ही भारी पड़ती है और समर्थ होते हुए भी वह पिटते-हारते देखे जाते हैं।

देवासुर संग्राम के अनेकानेक पौराणिक उपाख्यान पढ़ने-सुनने को मिलते हैं उन सब का एक ही उपक्रम है—असुरों ने आक्रमण किया, देवता हारे और भागे। इसके उपरान्त उन्हें अकल आई, संगठित हुये और संयुक्त शक्ति का विकास किया। भीतर से नया विश्वास और साहस उपजा, सूझ-बूझ ने काम दिया और उपयुक्त स्थिति बनी। इतना होते ही दैवी शक्ति का अनुदान भी उन्हें उपलब्ध हुआ। सही समझ आने पर सही मार्ग का अवलम्बन किया, प्रत्याक्रमण संजोया गया। अबकी बार सारी स्थिति बदल गई, असुरों को परास्त होना पड़ा और देवताओं ने अपना खोया वर्चस्व पुनः उपलब्ध किया।

इस प्रकार के ही समस्त देवासुर संग्राम वाले कथानक हैं। सभी का एक ही निष्कर्ष निकलता है कि मात्र सज्जन या सौम्य होना ही पर्याप्त नहीं, साथ ही समर्थ और बलिष्ठ भी होना चाहिए। यहां एक बात और भी स्मरणीय है कि शरीर बल एवं शस्त्रबल गिने तो बलिष्ठता में ही जाते हैं, पर वास्तविक चिरस्थाई बल संगठन ही होता है। संयुक्त शक्ति ही वास्तविक शक्ति है। मिल-जुल कर रहने, एक दूसरे की कठिनाई में सहायता करने, अनीति के विरुद्ध मोर्चा लगाने और अनाचारियों की दाल न गलने देने के लिए एकजुट होकर तनकर खड़े हो जाने की प्रक्रिया भी ऐसी है जिससे दुष्टता को एक कदम आगे बढ़ने के लिये सौ बार विचार करना पड़ता है।

संगठन का प्रदर्शन तो एक साथ या इकट्ठे जन समुदाय को देखकर भी हो जाता है, पर वास्तविकता तब बन पड़ती है जब एक दूसरे के साथ संयुक्त शक्ति के रूप में उभरे, एक दूसरे को यह विश्वास दिलाये कि कठिन समय में हम सब विशेष रूप से एक रहेंगे और एक दूसरे की सहायता करने में पीछे न रहेंगे। इसके लिये बिना उद्देश्य की, मात्र कौतूहलवश एकत्रित हुई भीड़ जन समुदाय भर ही कही जा सकती है। उसके पीछे कोई शक्ति न होने से अभीष्ट प्रयोजन की सिद्धि सफल नहीं हो पाती। संगठन की शर्त है—एक विचारधारा और लक्ष्य निर्धारण की स्थिति होना। इस प्रकार का एकत्रीकरण भी सशक्त समारोह का स्वरूप प्रदर्शित करता है। जुलूस, समारोह, रैली, आयोजन, प्रदर्शन, हड़ताल आदि के पीछे यही भावना प्रदर्शित होती है कि एक विचारणा के आधार पर एक उद्देश्य के लिए कितने लोग एक साथ हैं और वे कुछ करने के लिये अपना निश्चय कितने साहस के साथ प्रदर्शित करते हैं। जब सामान्य प्रदर्शन हवा को इधर से उधर मोड़ने में बड़ी भूमिका निभा सकते हैं तो जहां वस्तुतः किसी बड़े उद्देश्य के लिये ठोस संगठन और सुनिश्चित कार्यक्रम हो तो जनता का रुख बनाने-बदलने में उसका अच्छा-खासा महत्व हो सकता है।

एक पर अनीति होती रहे और अन्य सब इसका तमाशा देखते रहें, रोकथाम के लिये मिल-जुलकर आगे न बढ़ें तो जब अपनी बारी आयेगी तब दूसरे लोग भी क्यों किसी प्रकार की मदद देंगे। उनका समर्थन किस आधार पर प्राप्त होगा—यह उपेक्षा और असहयोग की प्रवृत्ति दीन-दुर्बलों, असहाय-असमर्थों में पाई जाय तो उन्हें क्षम्य विवश भी कहा जा सकता है, पर जब सुयोग्य व्यक्ति भी अपने स्तर के लोगों के साथ सम्पर्क बढ़ाने और संगठित होकर दैवी शक्ति का उद्भव करने की आवश्यकता नहीं समझते, उस दिशा में कुछ करने के लिए तत्पर नहीं होते तो फिर तथाकथित दुर्जन सज्जन में किसे उत्कृष्ट और निकृष्ट बताया जाय—यह सूझ नहीं पड़ता। संगठन की तराजू पर बुरे लोग भारी पड़ते हैं और वे इसी आधार पर सज्जनों को त्रास देते और दबाते-दबोचते रहते हैं।
First 5 7 Last


Other Version of this book



सर्वतोमुखी सहकारिता
Type: TEXT
Language: HINDI
...


Releted Books



सर्वतोमुखी उन्नति
Type: SCAN
Language: HINDI
...

सर्वतोमुखी उन्नति
Type: TEXT
Language: HINDI
...

మానసిక సంతులనం
Type: SCAN
Language: TELUGU
...

Mental Balance
Type: SCAN
Language: ENGLISH
...

மன சமநிலை
Type: SCAN
Language: TAMIL
...

Health Wealth and Spirituality
Type: SCAN
Language: ENGLISH
...

प्रखर प्रतिभा की जननी इच्छा शक्ति
Type: SCAN
Language: HINDI
...

प्रखर प्रतिभा की जननी इच्छा शक्ति
Type: TEXT
Language: HINDI
...

मस्तिष्क प्रत्यक्ष कल्पवृक्ष
Type: SCAN
Language: HINDI
...

मस्तिष्क प्रत्यक्ष कल्पवृक्ष
Type: TEXT
Language: HINDI
...

प्रतिष्ठा का उच्च सोपान
Type: TEXT
Language: HINDI
...

प्रतिष्ठा का उच्चसोपान
Type: SCAN
Language: HINDI
...

सावधानी और सुरक्षा
Type: TEXT
Language: HINDI
...

सावधानी और सुरक्षा
Type: SCAN
Language: EN
...

गायत्री की शक्ति और सिद्धि
Type: SCAN
Language: EN
...

सद्विचारों की सृजनात्मक शक्ति
Type: TEXT
Language: HINDI
...

मरे तो सही, पर बुद्धिमत्ता के साथ
Type: TEXT
Language: HINDI
...

मरे तो सही, पर बुद्धिमत्ता के साथ
Type: SCAN
Language: EN
...

धन का सदुपयोग
Type: TEXT
Language: HINDI
...

धन का सदुपयोग
Type: SCAN
Language: HINDI
...

બુદ્ધિ વધારવાના ઉપાય
Type: SCAN
Language: GUJRATI
...

बुद्धि बढ़ाने की वैज्ञानिक विधि
Type: SCAN
Language: EN
...

ఐశ్వర్యము యోక్య మానసికస్థితి
Type: SCAN
Language: TELUGU
...

સર્વતોમુખી ઉન્નતિ
Type: SCAN
Language: GUJRATI
...

Articles of Books

  • सहकारिता एक अमोघ शक्ति
  • सहयोग अनिवार्य भी आवश्यक भी
  • सहकारिता में सुविधा भी, सफलता भी
  • सहकार से ही उद्धार
  • प्रगतिशीलता कार्यक्षेत्र में उतरे
  • असुरता क्यों भारी पड़ती है?
  • संगठन का मेरुदंड स्वयं बनें
About Shantikunj

Shantikunj has emerged over the years as a unique center and fountain-head of a global movement of Yug Nirman Yojna (Movement for the Reconstruction of the Era) for moral-spiritual regeneration in the light of hoary Indian heritage.

Navigation Links
  • Home
  • Literature
  • News and Activities
  • Quotes and Thoughts
  • Videos and more
  • Audio
  • Join Us
  • Contact
Write to us

Click below and write to us your commenct and input.

Go

Copyright © SRI VEDMATA GAYATRI TRUST (TMD). All rights reserved. | Design by IT Cell Shantikunj