• News
  • Blogs
  • Gurukulam
English हिंदी
×

My Notes


  • TOC
    • सहकारिता एक अमोघ शक्ति
    • सहयोग अनिवार्य भी आवश्यक भी
    • सहकारिता में सुविधा भी, सफलता भी
    • सहकार से ही उद्धार
    • प्रगतिशीलता कार्यक्षेत्र में उतरे
    • असुरता क्यों भारी पड़ती है?
    • संगठन का मेरुदंड स्वयं बनें
  • My Note
  • Books
    • SPIRITUALITY
    • Meditation
    • EMOTIONS
    • AMRITVANI
    • PERSONAL TRANSFORMATION
    • SOCIAL IMPROVEMENT
    • SELF HELP
    • INDIAN CULTURE
    • SCIENCE AND SPIRITUALITY
    • GAYATRI
    • LIFE MANAGEMENT
    • PERSONALITY REFINEMENT
    • UPASANA SADHANA
    • CONSTRUCTING ERA
    • STRESS MANAGEMENT
    • HEALTH AND FITNESS
    • FAMILY RELATIONSHIPS
    • TEEN AND STUDENTS
    • ART OF LIVING
    • INDIAN CULTURE PHILOSOPHY
    • THOUGHT REVOLUTION
    • TRANSFORMING ERA
    • PEACE AND HAPPINESS
    • INNER POTENTIALS
    • STUDENT LIFE
    • SCIENTIFIC SPIRITUALITY
    • HUMAN DIGNITY
    • WILL POWER MIND POWER
    • SCIENCE AND RELIGION
    • WOMEN EMPOWERMENT
  • Akhandjyoti
  • Login


Back to Books

Books - सर्वतोमुखी सहकारिता

Media: TEXT
Language: HINDI
TEXT


प्रगतिशीलता कार्यक्षेत्र में उतरे

Listen online

View page note

Please go to your device settings and ensure that the Text-to-Speech engine is configured properly. Download the language data for Hindi or any other languages you prefer for the best experience.
×

Add Note


First 4 6 Last
आमतौर से मनुष्य अपनी वृद्धि, समृद्धि दक्षता एवं श्रमशीलता आदि का उपयोग मात्र छोटी परिधि तक सीमित स्वार्थपरता के लिए ही करते रहते हैं। इससे अधिक कुछ बनता है तो दौलत बढ़ाने में, ठाठ-बाट दिखाने में, उत्तराधिकारियों को कुबेर से धनी और इन्द्र-सा बड़प्पन दिलाने में लगे रहते हैं। और भी जो कुछ बच जाता है उसे फिजूलखर्ची में गवा देते हैं। भोजन, वस्त्र और मकान जैसी मौलिक आवश्यकतायें यदि औसत नागरिक स्तर की स्वीकार कर ली जायें तो जन साधारण के लिए यह संभव हो सकता है कि अपने वैभव, श्रम और कौशल का एक महत्वपूर्ण भाग बचा ले और उसे उन कार्यों में लगायें जिनसे सार्वजनीन स्नेह, सद्भाव की अभिवृद्धि होती, सत्प्रवृत्तियों के प्रचलन में योगदान मिलता हो।

गुजारा ठीक तरह चल पड़ने पर कई व्यक्ति अधिक श्रम करने की आवश्यकता नहीं समझते, आराम के साथ समय काटना चाहते हैं। आयु ढलने पर लोग सोचने लगते हैं कि जो कुछ करना था सो कर लिया, अब बैठे-ठाले मौज के दिन काटने चाहिये। नौकरी से रिटायर होने का अर्थ भी यही माना जाता है। लड़के-बच्चे कमाने-धमाने लायक हो जायें और समय पर रोटी मिल जाय तो समझा जाता है कि जो करना था वह कर लिया, अब तो मौज करने के दिन हैं। इधर-उधर उठ-बैठकर, घूम-फिर कर जिन्दगी के दिन काट लेने चाहिये।

इस क्षुद्रता से घिरे-बंधे हेय दृष्टिकोण से हर किसी को अपना पीछा छुड़ाना चाहिए। जो इस प्रकार सोचते हों उन्हें कूपमण्डूक बनने, गूलर के भुनगों की तरह सीमित दायरे में किसी प्रकार दिन काटने से रोकना चाहिए। शास्त्र का वह उद्बोधन ध्यान में रखना चाहिए जिसमें कहा गया है कि ‘सौ हाथों से कमा और हजार हाथों से (सत्कर्मों में) खर्च कर।’

कन्या का विवाह करने, बीमारी का इलाज कराने, मुकदमों से निपटने, कर्ज चुकाने जैसे आवश्यक कार्य सिर पर आ जाते हैं तो मनुष्य इनकी पूर्ति के लिए पूरी-पूरी चेष्टा करते हैं। गम्भीरतापूर्वक सोचते हैं, पूरी भागदौड़ करते हैं, साधन जुटाने में कोर-कसर नहीं रहने देते। इसी स्तर का एक और कार्य सामने खड़ा देखना चाहिए, वह है—समाज के स्तर को ऊंचा उठाना, सत्प्रवृत्तियों को सुविकसित करना। इस मार्ग में जो अवांछनीयतायें आड़े आती हैं उन्हें उखाड़ कर निरस्त करना।

एकाकीपन की सीमा में सीमित हो जाना एक बौद्धिक ओछापन है, भावना क्षेत्र का अपराध भी। कारण कि मनुष्य को जो कुछ प्राप्त होता है उसमें निज के पुरुषार्थ का तो एक सीमित अंश ही रहता है, शेष तो अन्यान्यों के सहयोग से ही उपलब्ध हुआ होता है। इस प्रवाह-परम्परा को न तो रोका जाना चाहिए और न तोड़ा। पिछड़े और दुखियारों के बीच रहकर कोई व्यक्ति एकाकी सुविधा सम्पादन से सुखी नहीं रह सकता। मुहल्ले में आग लगी हो तो अपना घर भी सुरक्षित कहां रहता है? गांव में हैजा फैला हो तो उसके कीटाणु अपने घर पर भी धावा बोल सकते हैं। गुण्डों और अनाचारियों से घिरे रहने पर अपनी भी खैर नहीं, भले ही निजी व्यवहार सज्जनों जैसा ही क्यों न हो। उन्नति का अर्थ मात्र शरीर को मोटा बनाना ही नहीं होता वरन् उससे परिवार की, सहकर्मी-सम्बन्धियों की उन्नति जुड़ी हुई है तभी वह समग्र उन्नति कही जायेगी। यदि परिवार में कलह मचा रहता है, रोगों की भरमार हो, दुर्बुद्धि का दौर हो तो फिर कितनी ही खाने-सोने की सुविधा होने पर भी अपने को सुखी नहीं कह सकते। ठीक इसी प्रकार जिस समाज के साथ हम जुड़े हुए हैं उसे सुखी-सन्तुलित रखे बिना भी गुजारा नहीं। कर्तव्यों और उत्तरदायित्वों में एक यह तथ्य भी अत्यन्त घनिष्ठतापूर्वक जुड़ा हुआ है कि अपने परिचय एवं प्रभाव क्षेत्र को भी सुखी, समुन्नत और सुसंस्कृत बनाने में भी किसी प्रकार की कमी न रहने दी जाय। भूख पेट में लगती है, पर पेट भरना ही जीवन निर्वाह का निमित्त नहीं हो सकता। भोजन का पचाना, रक्त बनाना और उस माध्यम से विनिर्मित ऊर्जा को समूचे शरीर में भी तो फैलना चाहिए। यदि भोजन पेट की थैली में भरा रहे, आगे न बढ़े तो फिर समझना चाहिए कि प्राण संकट ही बनकर खड़ा होगा।

मानवता की गरिमा, स्थिति, नियति और सम्भावना पर विचार कर सकने वाले हर व्यक्ति की मान्यता यह होनी चाहिए कि अपने अंग-अवयवों की तरह, परिवार के सदस्यों की तरह ही सम्बद्ध समाज को भी सुखी-समुन्नत बनाना अनिवार्य स्तर का कर्तव्य है। उसकी पूर्ति किये बिना कोई न तो आत्म सन्तोष प्राप्त कर सकता है और न जन सम्मान का अधिकारी बन सकता है। अविकसित समुदाय के बीच रहकर कोई श्रेयाधिकारी नहीं बन सकता, भले ही उसने निजी क्षेत्र में कितना ही बड़प्पन क्यों न एकत्रित कर लिया हो।

किसी की समग्र सफलता के साथ यह प्रश्नचिह्न भी जुड़ा हुआ है कि उसने अपने सम्पर्क क्षेत्र में प्रगतिशीलता के अभिवर्धन में क्या कुछ योगदान दिया। इस पहेली को अनबूझी स्थिति में नहीं पड़े रहने देना चाहिए। शरीर और परिवार तक ही अपने कर्तव्यों को सीमित न रखकर समाज को भी इसी परिधि में सम्मिलित अनुभव करना चाहिए। अपने उपार्जन में से एक बड़ा अंश सामाजिक उत्कर्ष के लिए भी सुरक्षित रखना चाहिए, लोकमंगल के लिए भी अपनी दक्षता का एक अंश नियोजित किये रहना चाहिए। सब की उन्नति के साथ अपनी उन्नति को अविच्छिन्न रूप से जुड़ी अनुभव करना चाहिए। अतएव अपना जो उपार्जन, वैभव, बड़प्पन है उसका एक महत्वपूर्ण अंश समाज कल्याण के लिए भी सुरक्षित रखना चाहिए—स्वार्थ के साथ परमार्थ भी समुचित अनुपात में जुड़ा रहना चाहिए।

देखा जाता है कि सार्वजनिक हित के कार्य करने के लिए सरकार में आशा-अपेक्षा की जाती है। इस आधार पर जो बन पड़ता है वह सीमित भी होता है और अधूरा भी, क्योंकि उन्हें करने वाले वैतनिक आधार पर निपटाते हैं। उनका निजी व्यक्तित्व, भाव संवेदना, उत्साह उस सीमा तक जुड़ा नहीं रहता जितना कि किसी परमार्थ परायण पुण्यात्मा का होना चाहिए। ऐसी दशा में उसका अधूरा रहना स्वभाविक है, कभी-कभी कुछ धनी-मानी भी यश−कामना से प्रेरित होकर दान-पुण्य करते और सार्वजनिक हित के कार्यों में हाथ बंटाते देखे गये हैं, पर वह उतने ही क्षेत्र तक या कामों तक सीमित रहते हैं जो उन्हें हाथोंहाथ प्रशंसा उपलब्ध करा सकें। कुछ को देवी-देवताओं की प्रसन्नता ही अभीष्ट होती है ताकि बदले में स्वर्ग सोपान पर भौतिक वरदान उपलब्ध हो सकें—ये सभी उथले आधार हैं और अस्थाई भी।

व्यक्ति और समाज की सर्वतोमुखी प्रगति का ठोस-वास्तविक चिरस्थाई और अनवरत-अक्षुण्ण उपाय एक ही है कि हर व्यक्ति अपने निजी निर्वाह की तरह समाजोत्थान को भी अनिवार्य कर्तव्य माने और उसके लिए उदारतापूर्वक अंशदान प्रस्तुत करे। यह अपवाद रूप से नहीं वरन् एक सार्वजनिक प्रथा-प्रचलन के रूप में क्रियान्वित होना चाहिए। समय, श्रम, साधन, कौशल एवं चिन्तन का जो जितना बड़ा अंश लोकहित के लिए अनवरत रूप से नियोजित करता रहे उसी को यह श्रेय मिलना चाहिए कि उसने मानवी गरिमा को पहचाना और तद्नुरूप नीति-निर्वाह के लिए आवश्यक कर्तव्य निबाहा।

यह प्रकृति इन दिनों सूखी, कुम्हलाई, मरी-मुरझाई दीखती है होना यह चाहिए कि यह उत्साह जन-जन में जगाया जाय और उसे उल्लास स्तर तक पहुंचाया जाय। सभी को इस अनिवार्यता का बोध रहे।

समाजोपयोगी कार्यों में से कुछ ही सरकार कर पाती है। जितना करती है उसके लिए भी जनता को भारी टैक्स अदा करना पड़ता है। यदि सारे कार्य उसी के जिम्मे रहें तो समूचा उत्पादन उसी में खप जाय और लोगों की साधनशक्ति ही समाप्त हो जाय। उपयुक्त यही है कि लोग स्वयं उत्साहपूर्वक उन कार्यों को अपने प्रयत्न से सम्पन्न करें, जो देखने में सामान्य किन्तु वस्तुतः अति महत्वपूर्ण हैं। उदाहरण के लिए सफाई के प्रश्न को ही लें, उसे सही स्थिति में न रख पाने के कारण सर्वत्र कुरूपता, असभ्यता दीखती है और बीमारियां धीमी गति से पनपकर असंख्यों के अकाल मृत्यु का कारण बनती हैं।

घर के भीतर तो लोग किसी कदर सफाई कर भी लेते हैं, पर बाहर निकलते ही सब ओर गन्दगी का माहौल दीख पड़ता है, उसे साफ करने के लिए पग-पग पर सफाई कर्मचारियों की आवश्यकता प्रतीत होती है, उसे जुटाने के लिए जनशक्ति और धनशक्ति कहां से आये? उपाय एक ही है कि स्वयंसेवी स्तर के व्यक्ति मिल-जुलकर अपने-अपने घर को स्वच्छ रखने का दायित्व उठावें और उसके लिए नियमित रूप से प्रतिदिन समयदान करें। कचरे का यदि सदुपयोग किया जा सके तो उसे बहुमूल्य खाद में बदला जा सकता है, उससे वनस्पतियों के उत्पादन-अभिवर्धन में भारी सहायता मिल सकती है। गांधीजी ने सार्वजनिक सेवा में स्वच्छता को प्रथम स्थान दिया था। वे टोली बनाकर आसपास के क्षेत्र में सफाई करने के लिए झाड़ू-टोकरा लेकर निकलते थे और उस प्रदर्शन से जन-जन में यह चेतना जगाते थे कि स्वच्छता पर अधिकाधिक ध्यान देकर सभ्य कहलाने का अधिकारी बनना चाहिए। स्वास्थ्य ही नहीं सुरुचि से भी इसका सीधा सम्बन्ध है। गली-कूचे, सड़क-नालियां, कुओं के इर्द-गिर्द की कीचड़ उथले तालाब अपने समीप से निकलने वालों से पुकार करते हैं कि उन्हें गन्दगी की दुर्दशा से उबारा जाय। इतने सफाई कर्मचारी नियुक्त किया जाना असम्भव हैं, जिसमें हर गली-कूचे को साफ-सुथरा रखा जा सके। ऐसी दशा में सफाई सेना के रूप में लोकसेवी कार्यकर्ताओं को अपने अभियान की शुरुआत करना चाहिए। दरिद्रता, रुग्णता और पिछड़ेपन का निमित्त कारण आलस्य और प्रमाद है। वह कहां-किस रूप में विद्यमान है? इसे जांचना हो तो उस क्षेत्र की गन्दगी या सफाई को देखकर सरलतापूर्वक निष्कर्ष निकाला जा सकता है। समयदान का प्रथम प्रयोग यह है कि अपने शरीर, वस्त्र, आवास, उपकरण से लेकर मुहल्ला-पड़ौस, गांव-गांव के अपनी पहुंच वाले स्थानों की सफाई रखे जाने का व्यापक अभियान चलाया जाय।

अशिक्षा दूसरी विपत्ति है, उससे भी जन-जन की गरदन को बन्धनमुक्त किया जाना चाहिए। अपने देश में दो तिहाई अशिक्षित हैं, उन सभी को स्कूलों में भरती कर सकना असम्भव है। उपाय एक ही है कि हर शिक्षित अपने समीपवर्ती दो अशिक्षितों को शिक्षित बनाने के लिए उनके घर पहुंचने या अपने घर बुलाने का व्रत लें। निरक्षरता से जुड़ी अनगढ़ता भी है, उसे दूर करने के लिए स्वाध्याय और सत्संग का प्रचलन निरन्तर चलते रहना चाहिए। लम्बे समय से चली आ रही मूढ़मान्यताओं, कुरीतियों, अवांछनीयताओं, अशिष्टताओं को दूर करने के लिए एक सुधारवादी आन्दोलन चलना चाहिए। उसके लिए गोष्ठी-आयोजनों की भी आवश्यकता है, पर उससे भी अधिक आवश्यकता यह है कि निरक्षरता हटते ही आगे की पढ़ाई दुश्चिन्तन और अनाचरण के विरुद्ध आरम्भिक पुस्तकों से की जाय। इसके लिए पुस्तकालय खुलें, तद्नुरूप साहित्य छपें और उसे पढ़ाने के लिए उसी स्तर का प्रयत्न किया जाय—जैसा कि साक्षरता के सम्बन्ध में सोचा गया है। मात्र अक्षर ज्ञान ही साक्षरता नहीं है, उसके साथ व्यक्ति, परिवार और समाज में प्रगतिशीलता लाने वाले सर्वतोमुखी ज्ञान विस्तार की मुहिम भी संभाली जानी चाहिए।

यह कुछ छोटे उदाहरण हैं। सत्प्रवृत्ति, संवर्धन और दुष्प्रवृत्ति उन्मूलन के अगणित कार्य इन दिनों अपने देश में सर्वत्र बिखरे पड़े हैं। नशेबाजी, भिक्षा व्यवसाय, खर्चीली शादियां, नारी का पिछड़ापन, जाति और सम्प्रदायों के आधार पर जड़ जमाये बैठा पिछड़ापन दूर किये जाने की इन्हीं दिनों आवश्यकता है अन्यथा जनशक्ति और धनशक्ति का निरन्तर अपव्यय ही होता रहेगा और आजीविका बढ़ने पर भी दुष्प्रचलनों के रहते खुशहाली के दर्शन न हो सकेंगे। इस प्रकार के कार्यों को सम्पन्न करने के लिए सेवाभावियों के ऐसे वर्ग को आगे आना चाहिए जो सामूहिकता के सूत्र में संघबद्ध होकर कार्य करें। ऐसा समुदाय खड़ा करना एक ऐसा कार्य है जिस पर प्रगति की सर्वतोमुखी संभावनायें अवलम्बित हैं।

नजर उठाकर अपने इर्द-गिर्द ही देखा जाय तो ऐसे असंख्यों सेवा कार्य दीख और सूझ पड़ेंगे जिन्हें करने के लिए कुछ लोग संगठित रूप से आगे बढ़ें तो न केवल सामयिक आवश्यकतायें ही पूरी हों वरन् प्रसुप्त मानस वाले असंख्यों को सृजनात्मक प्रयोजनों के लिए कुछ करने की भी प्रेरणा मिले।

कितने ही प्रकार के संगठन जहां-तहां दीख पड़ते हैं, पर स्वयंसेवी समुदायों को कार्यक्षेत्र में उतरते जहां-तहां ही देखा जाता है। इस अभाव की पूर्ति किये जाने का यही समय है। इसका शुभारम्भ कुछ उत्साहीजनों को समयदान और अंशदान के लिए नियमित रूप से संलग्न रहने का व्रत लेकर करना चाहिए। अग्रगामी अपने पीछे चलने वाले अनुयायी सहज ही बना लेते हैं।
First 4 6 Last


Other Version of this book



सर्वतोमुखी सहकारिता
Type: TEXT
Language: HINDI
...


Releted Books



सर्वतोमुखी उन्नति
Type: SCAN
Language: HINDI
...

सर्वतोमुखी उन्नति
Type: TEXT
Language: HINDI
...

మానసిక సంతులనం
Type: SCAN
Language: TELUGU
...

Mental Balance
Type: SCAN
Language: ENGLISH
...

மன சமநிலை
Type: SCAN
Language: TAMIL
...

Health Wealth and Spirituality
Type: SCAN
Language: ENGLISH
...

प्रखर प्रतिभा की जननी इच्छा शक्ति
Type: SCAN
Language: HINDI
...

प्रखर प्रतिभा की जननी इच्छा शक्ति
Type: TEXT
Language: HINDI
...

मस्तिष्क प्रत्यक्ष कल्पवृक्ष
Type: SCAN
Language: HINDI
...

मस्तिष्क प्रत्यक्ष कल्पवृक्ष
Type: TEXT
Language: HINDI
...

प्रतिष्ठा का उच्च सोपान
Type: TEXT
Language: HINDI
...

प्रतिष्ठा का उच्चसोपान
Type: SCAN
Language: HINDI
...

सावधानी और सुरक्षा
Type: TEXT
Language: HINDI
...

सावधानी और सुरक्षा
Type: SCAN
Language: EN
...

गायत्री की शक्ति और सिद्धि
Type: SCAN
Language: EN
...

सद्विचारों की सृजनात्मक शक्ति
Type: TEXT
Language: HINDI
...

मरे तो सही, पर बुद्धिमत्ता के साथ
Type: TEXT
Language: HINDI
...

मरे तो सही, पर बुद्धिमत्ता के साथ
Type: SCAN
Language: EN
...

धन का सदुपयोग
Type: TEXT
Language: HINDI
...

धन का सदुपयोग
Type: SCAN
Language: HINDI
...

બુદ્ધિ વધારવાના ઉપાય
Type: SCAN
Language: GUJRATI
...

बुद्धि बढ़ाने की वैज्ञानिक विधि
Type: SCAN
Language: EN
...

ఐశ్వర్యము యోక్య మానసికస్థితి
Type: SCAN
Language: TELUGU
...

સર્વતોમુખી ઉન્નતિ
Type: SCAN
Language: GUJRATI
...

Articles of Books

  • सहकारिता एक अमोघ शक्ति
  • सहयोग अनिवार्य भी आवश्यक भी
  • सहकारिता में सुविधा भी, सफलता भी
  • सहकार से ही उद्धार
  • प्रगतिशीलता कार्यक्षेत्र में उतरे
  • असुरता क्यों भारी पड़ती है?
  • संगठन का मेरुदंड स्वयं बनें
About Shantikunj

Shantikunj has emerged over the years as a unique center and fountain-head of a global movement of Yug Nirman Yojna (Movement for the Reconstruction of the Era) for moral-spiritual regeneration in the light of hoary Indian heritage.

Navigation Links
  • Home
  • Literature
  • News and Activities
  • Quotes and Thoughts
  • Videos and more
  • Audio
  • Join Us
  • Contact
Write to us

Click below and write to us your commenct and input.

Go

Copyright © SRI VEDMATA GAYATRI TRUST (TMD). All rights reserved. | Design by IT Cell Shantikunj