सहयोग अनिवार्य भी आवश्यक भी
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सहकारिता का शुभारम्भ परिवार परिकर से होता है। यह मनुष्य में ही नहीं, सृष्टि के अधिकांश विकसित प्राणियों का प्रचलन है। पशु वर्ग के प्राणी अपने बच्चों को जनते ही उन्हें चाट कर गर्भकाल के साथ आने वाली गन्दगी को साफ करते हैं, दूध पिलाते हैं, उनके साथ पूरी मोह-ममता दिखाते हैं। समीप ही रखना चाहते हैं, बिछुड़ना सहन नहीं करते जब तक बच्चा अपने पैरों खड़ा होकर स्वावलम्बी होने योग्य नहीं बन जाता तब तक उसकी देखभाल में कमी नहीं आने देते। दुधारू पशु प्रायः तभी थनों में दूध उतारते हैं जब बच्चा सामने होता है। बिना बच्चे के तो उन्हें डरा-धमका कर ही अनिच्छापूर्वक दूध उतारा जाता है। पक्षियों की ममता तो और भी अधिक होती है, उनमें मादा अण्डों को सेती है, उन पर छाती लगाकर बैठी रहती है। गर्मी से अण्डे पकते हैं, जब वे फूटते हैं और चूजे निकलते हैं तब भी उनके लिए चारा जुटाने का काम उसी का होता है। नर भी इसमें मदद करता है, दोनों मिलकर घोंसला तो प्रसव से पहले ही बना लेते हैं। किस ऋतु में प्रजनन सुविधाजनक रहेगा, इसका उन्हें पहले से ही ध्यान रहता है। बच्चों के प्रति यदि उनके जन्मदाताओं का इतना लगाव न रहे तो उनकी अति दुर्बल स्थिति से उबरकर समर्थ बन सकना सम्भव ही न बन पड़े। आपत्ति आने या आक्रमण होने की दशा में उनके संरक्षक डटकर मुकाबला करते हैं और कई बार तो उसमें अपने प्राण हथेली पर रखकर भी सुरक्षा का प्रबन्ध करते हैं। घोंसला या मांद बनाकर बच्चों की अनुकूलता के प्रबन्ध वे प्रजनन काल आने से पूर्व ही कर लेते हैं।
यह प्रवृत्ति बताती है कि प्रकृति ने प्राणियों की वंश परम्परा चालू रखने के लिए कामुकता में उत्साह और बच्चों के प्रति सहज स्नेह की भावना उत्पन्न कर रखी है। यदि इस मनोवृत्ति का अभाव रहा होता तो प्रजनन और बाल पोषण जैसे झंझट भरे काम में कोई भी प्राणी प्रवृत्त न होता। मक्खी-मच्छर जैसे अति क्षुद्र प्राणियों का वंश विस्तार तो प्रकृति अपने ढंग से करती है, पर जिनकी स्थिति पशु-पक्षी स्तर की भी विकसित हो गई है उन्हें वंश वृद्धि अथवा परिवार-पोषण का उत्साह सहज स्वभाविक रूप से मिला है। मनुष्य उन सब से विकसित स्तर का है, इसलिए उसमें यह प्रवृत्तियां और भी बढ़-चढ़कर पाई जाती हैं। कई बार तो वे सीमा-मर्यादा से भी आगे निकल जाती हैं। यौनाचार के प्रति अति उत्साह कामुकता से सम्बन्धित अनेक कौतुक कराता है। बच्चों का पालन तो स्वभाविक है, पर मनुष्य में उनके प्रति और भी अधिक लगाव पाया जाता है। उनकी साज-सज्जा से लेकर अधिक कमाऊ बनाने और विवाह संयोग बिठाने में अपना दायित्व मानता है, इतना ही नहीं उनके लिए उत्तराधिकार में अधिक से अधिक पूंजी छोड़ मरने के लिए आतुर रहता है। वंश-परम्परा के रूप में चलती रहने वाली यह प्रवृत्तियां मूलतः सहकारिता की ही शाखा-प्रशाखा हैं। विवाह स्वयं में एक बहुत बड़ा सहकार है, पति-पत्नी एक-दूसरे के साथ अति घनिष्ठतापूर्वक बंधते हैं और प्रयत्न करते हैं कि वह सम्बन्ध-सूत्र आजीवन यथावत् बना रहे। इस प्रचलन को सहकारिता की ही एक सुविकसित भाव-संवेदना कहा जा सकता है। भले ही उसमें मोटे रूप से कामुकता की उमंग का प्रधान रोल दिखाई पड़ता है।
परिवार एक सर्वांगपूर्ण सहकारी समिति है, उसके सभी छोटे-बड़े सदस्य मिल-जुलकर एक-दूसरे के लिए साधन जुटाते हैं। सुख-दुःख में भागीदार रहते हैं, एक दूसरे से सीखते और सिखाते हैं। सामाजिक और आर्थिक दृष्टि से परिवार गठन एक आदर्श है जिसमें चलने वाली विधि-व्यवस्था को देखकर यह सीखा जा सकता है कि बड़े रूप में समाज समुदाय की संगठना किस आधार पर होनी चाहिए और उसकी व्यवस्था का गठन किस प्रकार किया जाना चाहिए।
सामर्थ्य भर अनुदान प्रस्तुत करे और आवश्यकता भर उस तन्त्र की क्षमता में से अपने लिए ग्रहण करे—यह साम्यवादी सिद्धांत परिवार परिकर में सहज स्वभाविक रूप से क्रियान्वित होता रहता है। समर्थ असमर्थों की सहायता करने में कोताही नहीं करते, असमर्थ अपने से बड़ों की स्नेह-संवेदना की तृप्ति में अपने ढंग का योगदान करते हैं। गुलदस्ते में कई प्रकार के फूल होने पर ही शोभा पाते हैं। भोजन में अनेक व्यंजनों की उपस्थिति से तृप्ति मिलती है। उद्यान में अनेक तरह के फल-फूल उगे होते हैं। वन प्रदेश में अनेक जाति के प्राणी अपने चित्र-विचित्र क्रिया-कलापों के द्वारा उस क्षेत्र को मनोरम बनाते हैं। यह प्रकृति की सुरम्य व्यवस्था परिवार के छोटे परिकर में भी सुरम्य और सुव्यवस्थित रूप से देखी जा सकती है। मनुष्य मनुष्य के बीच कितने प्रकार के रिश्ते चल सकते हैं और इस कारण कितनी आवश्यक प्रवृत्तियों का सुनियोजित ढंग से विकास हो सकता है, इसका एक अच्छा नमूना परिवार के बीच देखा जाता है। माता, पिता और संतान के बीच, भाई-भाई के बीच, बहिन-बहिन के बीच, चाची-चाचा, दादा-बाबा आदि के परिकर के सदस्यों के साथ कितने प्रकार के कितने भिन्न और कितने पूरक सम्बन्ध होते हैं, उनके कारण मनुष्य की विभिन्न प्रवृत्तियों को कितना पोषण मिलता है—इसका सुरम्य दृश्य देखना हो तो परिवार के बीच चलने वाली भाव संवेदनाओं और सहयोग की विभिन्न विधाओं का गम्भीरतापूर्वक निरीक्षण करके जाना जा सकता है। घर-घरौंदे के छोटे से आंगन में कितने प्रकार की रीति-नीति विकसित होती और घटकों को मिलाकर एक पूर्ण मनुष्यत्व के अंग-प्रत्यंगों की पूर्ति करती है।
सुनियोजित गृहस्थ में वे सभी विशेषतायें पाई जाती हैं जिन्हें यदि तात्विक रीति से समझा जा सके और विचारपूर्वक अभ्यास में उतारा जा सके तो यह समझा जा सकता है कि उन्हीं प्रवृत्तियों को विकसित रूप में प्रयोग करके समूचे समाज समुदाय का सुव्यवस्थित गठन किस प्रकार हो सकता है? सहकारिता सुनियोजित रीति से व्यवहृत होने पर किस प्रकार शान्ति, सद्भाव और प्रगति का आधार बन सकती है।
मानवी सौहार्द्र का एक सारगर्भित मन्त्र है—‘वसुधैव कुटुम्बकम्’ अर्थात् समस्त विश्व को एक कुटुम्ब माना जाय। समर्थ असमर्थों के प्रति उदारता बरतें और असमर्थ उस उपलब्धि पर प्रसन्नता प्रकट करते हुए कृतज्ञता की अभिव्यक्ति करें। हंसते-हंसाते जीने, मिल बांटकर खाने की नीति परिवार में तो चलती ही है, यदि उसी को बड़े रूप में समस्त समुदाय के बीच क्रियान्वित किया जा सके तो फिर समझना चाहिए कि सीमित साधन के रहते हुए भी सघन सहकारिता अपनाते हुए जिओ और जीने दो का उद्देश्य भली प्रकार प्राप्त किया जा सकता है।
परिवार में अवांछनीयता पनपने पर उससे निबटने के अनेक उपाय हैं। उचित अनुचित का भेद करने का विवेक यदि जगा सकें और जगाया जा सके तो भूलें बताने और समझने का उपक्रम चल सकता है। इस विधा को अपनाने पर मनोमालिन्य और कलह के अनेकों अवसर टल सकते हैं, उद्दण्डता बरतने पर आतुर सदस्यों के साथ असहयोग, उपेक्षा जैसे साधारण दीखने वाले हथियार भी करारी चोट कर सकते हैं और मनमानी करने वाले की नीति पर चलने के लिए बाधित कर सकते हैं। भर्त्सना अपने आप में एक बड़ा दण्ड है, पर वह पीठ पीछे नहीं सामने प्रयोग किया जाना चाहिए। प्रताड़ना के यह सहज तरीके हैं जो वहां अच्छा खासा प्रभाव दिखाते हैं जहां पहले से ही आत्मभाव का सूत्र किसी सीमा तक विद्यमान है।
आवश्यक नहीं कि हर कोई निजी वंशवृद्धि करे और अपना अलग परिवार बसाये। पुरातनकाल में भी यह आवश्यक नहीं था। अब भी उद्देश्य विशेष में लगे हुए व्यक्ति इतना समय नहीं निकाल पाते कि परिवारी जनों को अपेक्षित स्नेह, सहयोग, समय दे सकें और पर्याप्त साधन जुटा सके—ऐसी दशा में वे यही उचित समझते हैं कि अलग से निजी परिवार न बढ़ाया जाय। इन दिनों असाधारण रूप से बढ़ती जनसंख्या और उस कारण बढ़ती समस्याओं को देखते हुए बुद्धिमान यही समझते हैं कि वर्तमान परिस्थितियों में विद्यमान परिवार के सदस्यों के प्रति अपने कर्तव्यों का परिपालन ही पर्याप्त है। निजी विवाह करके निजी बच्चे पैदा करने में विद्यमान परिवार की सुविधाओं में कटौती होती है, अपनी जिम्मेदारियां अतिरिक्त रूप से बढ़ती हैं और समाज की प्रगति में अड़चन उत्पन्न होती है। इसलिए अच्छा यही है कि पहले से ही जिन परिवारों के साथ सम्बन्ध जुड़े हैं उन्हीं को अधिक सुविकसित करते हुए एक आदर्श की स्थापना की जाय।
सन्त प्रकृति के लोकसेवी आमतौर से अविवाहित ही रहते हैं क्योंकि निजी परिवार का बोझ लाद लेने पर फिर लोकमंगल के लिए उतना समय नहीं मिल पाता जिसमें आत्मसंतोष मिल सके और अभीष्ट लक्ष्य की प्राप्ति के लिए बढ़-चढ़कर कुछ कहने लायक काम बन सके। ऐसे सुयोग अपवाद रूप में ही कभी कहीं मिलते हैं जिनमें पति-पत्नी, कुटुम्बी-सम्बन्धी आदि के विचार परमार्थ प्रयोजनों का समर्थन कर सकें या सहयोग दे सकें। आमतौर से उनकी दृष्टि निजी समृद्धि बढ़ाने में ही बुद्धिमत्ता अनुभव करती है और उसी के लिए परामर्श देती एवं दबाव डालती है। खींचतान में न परिजन ही संतुष्ट रह पाते हैं और न उच्च उद्देश्यों की पूर्ति के लिए कुछ ऐसा करते बन पड़ता है जिसके बल पर आंतरिक प्रफुल्लता उपलब्ध हो सके। मनुष्य जीवन की महत्ता, उपलब्ध शक्तियों के समग्र उपयोग से बन पड़ने वाली संभावना तथा समय की असाधारण मांग को देखते हुए उच्चस्तरीय आत्मायें सोचती हैं कि इतने महत्वपूर्ण प्रयोजनों को तिलांजलि देकर क्यों नया परिवार बसाने का जंजाल मोल लें जबकि पहले ही अनेकों समूह सेवा-सहायता की मांग के लिए हाथ पसारे खड़े हैं।
प्रश्न यह नहीं कि अपना निजी परिवार बसाया जाय या जो पहले से ही विद्यमान हैं उनकी सेवा-सहायता में लगा जाय। यह अपनी सूझ-बूझ के ऊपर निर्भर है और अपनी परिस्थितियों के ऊपर भी। प्राचीनकाल में परिव्राजक अविवाहित रहते थे और गुरुकुल चलाने वाले उपाध्यायों को उस सुविस्तृत कार्य के लिए सहधर्मिणी के सहयोग की आवश्यकता पड़ती थी। यह अपनी मनःस्थिति और परिस्थिति पर निर्भर है कि कौन किस प्रकार का जीवनयापन करे, पर इतना निश्चित है कि हर किसी को समुदाय के बीच ही रहना पड़ता है। सन्तों के भी अपने-अपने वर्ग, संगठन और आश्रम होते हैं। वे मिलजुल कर ही किसी प्रयोजन को पूरी तरह सम्पन्न कर पाते हैं।
एकाकी व्यक्ति कितना ही समर्थ एवं सुयोग्य क्यों न हो अपने स्तर का सहकार एकत्रित किये बिना कोई बड़ा काम नहीं कर सकता। अकेला चला भाड़ नहीं फोड़ सकता। एक चावल की खिचड़ी नहीं पक सकती, एक ईंट की मस्जिद नहीं चुनी जा सकती है। एक हाथ से ताली नहीं बजती, एक पहिये की गाड़ी नहीं चलती। संगठन हर बड़े काम के लिए खड़ा करना पड़ता है। यहां तक कि सामान्य जीवनयापन के लिए भी कइयों के समूह में रहना आवश्यक है। आदान-प्रदान का उपक्रम इसी आधार पर बनता है, शक्ति के उद्भव का यही सुनिश्चित आधार भी है। ईसा, बुद्ध, गांधी, राम, कृष्ण आदि से लेकर सन्त समुदायों तक को अपने स्तर के लोगों को ढूंढ़ना, उभारना, निखारना और संघबद्धता अपनाने के लिए सहमत करना पड़ा था। विषय—निजी निर्वाह की उच्चस्तरीय आदर्शों के निर्वाह का तारतम्य बिठाना, हर हालत में समुदाय में सम्मिलित होने या अनेकों को आमन्त्रित करके एक जुट होने की प्रक्रिया है। हर हालत में सहकारिता आवश्यक है, सांसारिक व्यवस्था से लेकर निर्माण कार्यों में इसकी महती आवश्यकता पड़ती है। इस तथ्य को समझते हुए हर किसी को सहकारी जीवन की उपयोगिता समझनी चाहिए और इस कला का अभ्यस्त होना चाहिए कि सामूहिकता को चरितार्थ करने के लिए किस रीतिनीति को अपनाया जाय और उसे सुव्यवस्थित कैसे बनाया जाय।
यह प्रवृत्ति बताती है कि प्रकृति ने प्राणियों की वंश परम्परा चालू रखने के लिए कामुकता में उत्साह और बच्चों के प्रति सहज स्नेह की भावना उत्पन्न कर रखी है। यदि इस मनोवृत्ति का अभाव रहा होता तो प्रजनन और बाल पोषण जैसे झंझट भरे काम में कोई भी प्राणी प्रवृत्त न होता। मक्खी-मच्छर जैसे अति क्षुद्र प्राणियों का वंश विस्तार तो प्रकृति अपने ढंग से करती है, पर जिनकी स्थिति पशु-पक्षी स्तर की भी विकसित हो गई है उन्हें वंश वृद्धि अथवा परिवार-पोषण का उत्साह सहज स्वभाविक रूप से मिला है। मनुष्य उन सब से विकसित स्तर का है, इसलिए उसमें यह प्रवृत्तियां और भी बढ़-चढ़कर पाई जाती हैं। कई बार तो वे सीमा-मर्यादा से भी आगे निकल जाती हैं। यौनाचार के प्रति अति उत्साह कामुकता से सम्बन्धित अनेक कौतुक कराता है। बच्चों का पालन तो स्वभाविक है, पर मनुष्य में उनके प्रति और भी अधिक लगाव पाया जाता है। उनकी साज-सज्जा से लेकर अधिक कमाऊ बनाने और विवाह संयोग बिठाने में अपना दायित्व मानता है, इतना ही नहीं उनके लिए उत्तराधिकार में अधिक से अधिक पूंजी छोड़ मरने के लिए आतुर रहता है। वंश-परम्परा के रूप में चलती रहने वाली यह प्रवृत्तियां मूलतः सहकारिता की ही शाखा-प्रशाखा हैं। विवाह स्वयं में एक बहुत बड़ा सहकार है, पति-पत्नी एक-दूसरे के साथ अति घनिष्ठतापूर्वक बंधते हैं और प्रयत्न करते हैं कि वह सम्बन्ध-सूत्र आजीवन यथावत् बना रहे। इस प्रचलन को सहकारिता की ही एक सुविकसित भाव-संवेदना कहा जा सकता है। भले ही उसमें मोटे रूप से कामुकता की उमंग का प्रधान रोल दिखाई पड़ता है।
परिवार एक सर्वांगपूर्ण सहकारी समिति है, उसके सभी छोटे-बड़े सदस्य मिल-जुलकर एक-दूसरे के लिए साधन जुटाते हैं। सुख-दुःख में भागीदार रहते हैं, एक दूसरे से सीखते और सिखाते हैं। सामाजिक और आर्थिक दृष्टि से परिवार गठन एक आदर्श है जिसमें चलने वाली विधि-व्यवस्था को देखकर यह सीखा जा सकता है कि बड़े रूप में समाज समुदाय की संगठना किस आधार पर होनी चाहिए और उसकी व्यवस्था का गठन किस प्रकार किया जाना चाहिए।
सामर्थ्य भर अनुदान प्रस्तुत करे और आवश्यकता भर उस तन्त्र की क्षमता में से अपने लिए ग्रहण करे—यह साम्यवादी सिद्धांत परिवार परिकर में सहज स्वभाविक रूप से क्रियान्वित होता रहता है। समर्थ असमर्थों की सहायता करने में कोताही नहीं करते, असमर्थ अपने से बड़ों की स्नेह-संवेदना की तृप्ति में अपने ढंग का योगदान करते हैं। गुलदस्ते में कई प्रकार के फूल होने पर ही शोभा पाते हैं। भोजन में अनेक व्यंजनों की उपस्थिति से तृप्ति मिलती है। उद्यान में अनेक तरह के फल-फूल उगे होते हैं। वन प्रदेश में अनेक जाति के प्राणी अपने चित्र-विचित्र क्रिया-कलापों के द्वारा उस क्षेत्र को मनोरम बनाते हैं। यह प्रकृति की सुरम्य व्यवस्था परिवार के छोटे परिकर में भी सुरम्य और सुव्यवस्थित रूप से देखी जा सकती है। मनुष्य मनुष्य के बीच कितने प्रकार के रिश्ते चल सकते हैं और इस कारण कितनी आवश्यक प्रवृत्तियों का सुनियोजित ढंग से विकास हो सकता है, इसका एक अच्छा नमूना परिवार के बीच देखा जाता है। माता, पिता और संतान के बीच, भाई-भाई के बीच, बहिन-बहिन के बीच, चाची-चाचा, दादा-बाबा आदि के परिकर के सदस्यों के साथ कितने प्रकार के कितने भिन्न और कितने पूरक सम्बन्ध होते हैं, उनके कारण मनुष्य की विभिन्न प्रवृत्तियों को कितना पोषण मिलता है—इसका सुरम्य दृश्य देखना हो तो परिवार के बीच चलने वाली भाव संवेदनाओं और सहयोग की विभिन्न विधाओं का गम्भीरतापूर्वक निरीक्षण करके जाना जा सकता है। घर-घरौंदे के छोटे से आंगन में कितने प्रकार की रीति-नीति विकसित होती और घटकों को मिलाकर एक पूर्ण मनुष्यत्व के अंग-प्रत्यंगों की पूर्ति करती है।
सुनियोजित गृहस्थ में वे सभी विशेषतायें पाई जाती हैं जिन्हें यदि तात्विक रीति से समझा जा सके और विचारपूर्वक अभ्यास में उतारा जा सके तो यह समझा जा सकता है कि उन्हीं प्रवृत्तियों को विकसित रूप में प्रयोग करके समूचे समाज समुदाय का सुव्यवस्थित गठन किस प्रकार हो सकता है? सहकारिता सुनियोजित रीति से व्यवहृत होने पर किस प्रकार शान्ति, सद्भाव और प्रगति का आधार बन सकती है।
मानवी सौहार्द्र का एक सारगर्भित मन्त्र है—‘वसुधैव कुटुम्बकम्’ अर्थात् समस्त विश्व को एक कुटुम्ब माना जाय। समर्थ असमर्थों के प्रति उदारता बरतें और असमर्थ उस उपलब्धि पर प्रसन्नता प्रकट करते हुए कृतज्ञता की अभिव्यक्ति करें। हंसते-हंसाते जीने, मिल बांटकर खाने की नीति परिवार में तो चलती ही है, यदि उसी को बड़े रूप में समस्त समुदाय के बीच क्रियान्वित किया जा सके तो फिर समझना चाहिए कि सीमित साधन के रहते हुए भी सघन सहकारिता अपनाते हुए जिओ और जीने दो का उद्देश्य भली प्रकार प्राप्त किया जा सकता है।
परिवार में अवांछनीयता पनपने पर उससे निबटने के अनेक उपाय हैं। उचित अनुचित का भेद करने का विवेक यदि जगा सकें और जगाया जा सके तो भूलें बताने और समझने का उपक्रम चल सकता है। इस विधा को अपनाने पर मनोमालिन्य और कलह के अनेकों अवसर टल सकते हैं, उद्दण्डता बरतने पर आतुर सदस्यों के साथ असहयोग, उपेक्षा जैसे साधारण दीखने वाले हथियार भी करारी चोट कर सकते हैं और मनमानी करने वाले की नीति पर चलने के लिए बाधित कर सकते हैं। भर्त्सना अपने आप में एक बड़ा दण्ड है, पर वह पीठ पीछे नहीं सामने प्रयोग किया जाना चाहिए। प्रताड़ना के यह सहज तरीके हैं जो वहां अच्छा खासा प्रभाव दिखाते हैं जहां पहले से ही आत्मभाव का सूत्र किसी सीमा तक विद्यमान है।
आवश्यक नहीं कि हर कोई निजी वंशवृद्धि करे और अपना अलग परिवार बसाये। पुरातनकाल में भी यह आवश्यक नहीं था। अब भी उद्देश्य विशेष में लगे हुए व्यक्ति इतना समय नहीं निकाल पाते कि परिवारी जनों को अपेक्षित स्नेह, सहयोग, समय दे सकें और पर्याप्त साधन जुटा सके—ऐसी दशा में वे यही उचित समझते हैं कि अलग से निजी परिवार न बढ़ाया जाय। इन दिनों असाधारण रूप से बढ़ती जनसंख्या और उस कारण बढ़ती समस्याओं को देखते हुए बुद्धिमान यही समझते हैं कि वर्तमान परिस्थितियों में विद्यमान परिवार के सदस्यों के प्रति अपने कर्तव्यों का परिपालन ही पर्याप्त है। निजी विवाह करके निजी बच्चे पैदा करने में विद्यमान परिवार की सुविधाओं में कटौती होती है, अपनी जिम्मेदारियां अतिरिक्त रूप से बढ़ती हैं और समाज की प्रगति में अड़चन उत्पन्न होती है। इसलिए अच्छा यही है कि पहले से ही जिन परिवारों के साथ सम्बन्ध जुड़े हैं उन्हीं को अधिक सुविकसित करते हुए एक आदर्श की स्थापना की जाय।
सन्त प्रकृति के लोकसेवी आमतौर से अविवाहित ही रहते हैं क्योंकि निजी परिवार का बोझ लाद लेने पर फिर लोकमंगल के लिए उतना समय नहीं मिल पाता जिसमें आत्मसंतोष मिल सके और अभीष्ट लक्ष्य की प्राप्ति के लिए बढ़-चढ़कर कुछ कहने लायक काम बन सके। ऐसे सुयोग अपवाद रूप में ही कभी कहीं मिलते हैं जिनमें पति-पत्नी, कुटुम्बी-सम्बन्धी आदि के विचार परमार्थ प्रयोजनों का समर्थन कर सकें या सहयोग दे सकें। आमतौर से उनकी दृष्टि निजी समृद्धि बढ़ाने में ही बुद्धिमत्ता अनुभव करती है और उसी के लिए परामर्श देती एवं दबाव डालती है। खींचतान में न परिजन ही संतुष्ट रह पाते हैं और न उच्च उद्देश्यों की पूर्ति के लिए कुछ ऐसा करते बन पड़ता है जिसके बल पर आंतरिक प्रफुल्लता उपलब्ध हो सके। मनुष्य जीवन की महत्ता, उपलब्ध शक्तियों के समग्र उपयोग से बन पड़ने वाली संभावना तथा समय की असाधारण मांग को देखते हुए उच्चस्तरीय आत्मायें सोचती हैं कि इतने महत्वपूर्ण प्रयोजनों को तिलांजलि देकर क्यों नया परिवार बसाने का जंजाल मोल लें जबकि पहले ही अनेकों समूह सेवा-सहायता की मांग के लिए हाथ पसारे खड़े हैं।
प्रश्न यह नहीं कि अपना निजी परिवार बसाया जाय या जो पहले से ही विद्यमान हैं उनकी सेवा-सहायता में लगा जाय। यह अपनी सूझ-बूझ के ऊपर निर्भर है और अपनी परिस्थितियों के ऊपर भी। प्राचीनकाल में परिव्राजक अविवाहित रहते थे और गुरुकुल चलाने वाले उपाध्यायों को उस सुविस्तृत कार्य के लिए सहधर्मिणी के सहयोग की आवश्यकता पड़ती थी। यह अपनी मनःस्थिति और परिस्थिति पर निर्भर है कि कौन किस प्रकार का जीवनयापन करे, पर इतना निश्चित है कि हर किसी को समुदाय के बीच ही रहना पड़ता है। सन्तों के भी अपने-अपने वर्ग, संगठन और आश्रम होते हैं। वे मिलजुल कर ही किसी प्रयोजन को पूरी तरह सम्पन्न कर पाते हैं।
एकाकी व्यक्ति कितना ही समर्थ एवं सुयोग्य क्यों न हो अपने स्तर का सहकार एकत्रित किये बिना कोई बड़ा काम नहीं कर सकता। अकेला चला भाड़ नहीं फोड़ सकता। एक चावल की खिचड़ी नहीं पक सकती, एक ईंट की मस्जिद नहीं चुनी जा सकती है। एक हाथ से ताली नहीं बजती, एक पहिये की गाड़ी नहीं चलती। संगठन हर बड़े काम के लिए खड़ा करना पड़ता है। यहां तक कि सामान्य जीवनयापन के लिए भी कइयों के समूह में रहना आवश्यक है। आदान-प्रदान का उपक्रम इसी आधार पर बनता है, शक्ति के उद्भव का यही सुनिश्चित आधार भी है। ईसा, बुद्ध, गांधी, राम, कृष्ण आदि से लेकर सन्त समुदायों तक को अपने स्तर के लोगों को ढूंढ़ना, उभारना, निखारना और संघबद्धता अपनाने के लिए सहमत करना पड़ा था। विषय—निजी निर्वाह की उच्चस्तरीय आदर्शों के निर्वाह का तारतम्य बिठाना, हर हालत में समुदाय में सम्मिलित होने या अनेकों को आमन्त्रित करके एक जुट होने की प्रक्रिया है। हर हालत में सहकारिता आवश्यक है, सांसारिक व्यवस्था से लेकर निर्माण कार्यों में इसकी महती आवश्यकता पड़ती है। इस तथ्य को समझते हुए हर किसी को सहकारी जीवन की उपयोगिता समझनी चाहिए और इस कला का अभ्यस्त होना चाहिए कि सामूहिकता को चरितार्थ करने के लिए किस रीतिनीति को अपनाया जाय और उसे सुव्यवस्थित कैसे बनाया जाय।

