सहकार से ही उद्धार
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समान विचारों और समान क्रिया-कलापों के लिए सम्मिलित चिन्तन और सामूहिक रीति-नीति अपनायें तो बौद्धिक और भौतिक दोनों ही दृष्टि से प्रगति का अवसर मिलता है। इस तथ्य को ध्यान में रखते हुए भारतीय समाज संरचना में वर्णाश्रम व्यवस्था को प्रमुखता दी गयी है।
अध्यापक, विचारक, साहित्य-सृजेता, उपदेशक, समाज-सेवी, सत्प्रवृत्ति संवर्धन में निरत स्तर के लोग ब्राह्मण कहे जाते हैं। वे यों एकाकी रहकर भी कुछ न कुछ तो करते ही रह सकते हैं, पर यदि उनका सुव्यवस्थित समूह-संगठन हो, तो एक-दूसरे के सहयोग एवं आदान-प्रदान से उनकी विधा और भी अधिक समुन्नत हो सकती है। घर का वातावरण उसी स्तर का बने, तो बच्चे को भी उस पैतृक परम्परा का लाभ अनायास ही मिल सकता है। एक के बाद दूसरी पीढ़ी को भी अधिक प्रगति का अवसर मिल सकता है। संभवतः इसी आधार पर ब्राह्मण वर्ग के बीच घनिष्ठता और अधिक सान्निध्य रखने को ध्यान में रखते हुए वह वर्ग बना होगा।
यही बात क्षत्रिय, वैश्य, श्रमजीवी आदि के सम्बन्ध में भी लागू होती है। कई जातियां फौज और पुलिस में रहकर अपना कौशल जितनी अच्छी तरह दिखा पाती हैं, उतनी अन्य कार्यों में सफल नहीं होतीं। व्यवसाय क्षेत्र में सफलता प्राप्त करने वालों में मारवाड़ी, पंजाबी अधिक सफल देखे गये हैं। इसी प्रकार कारीगर वर्ग के परिवारों में वह कौशल आरम्भ से ही सीखने को मिलता है इसलिए अधिक सफल होने की गुंजाइश उनमें रहती है।
पिछले दिनों जब समाज की संगठना व्यवसायों के आधार पर संगठित होने की थी, तब वर्णाश्रम धर्म का सहज प्रचलन था, पर अब स्थिति बदल गयी है। पिता का—पूर्वजों का व्यवसाय उसके वंशज करें ही, यह अनिवार्य नहीं रहा। अब इच्छानुसार व्यवसाय अपनाने की छूट है। ऐसी दशा में जन्म-जाति की भी कोई तुक नहीं रह गयी, फिर भी कर्म-कौशल में यह तथ्य यथावत है कि यदि एक प्रकृति या प्रवृत्ति के लोग अधिक घनिष्ठ होकर रहें, तो उन्हें सुविधा भी अधिक रहेगी और सफलता भी अधिक मिलेगी। इन दिनों जन्म के आधार पर तो नहीं, पर वर्ण का मूल आधार ‘व्यवसाय’ अब भी यह अपेक्षा रखता है कि उस वर्ग के लिए पारस्परिक घनिष्ठता का अनुपात अधिक रखें। इससे उनका कौशल भी निखरता है और हितों के संरक्षण का भी अधिक सुयोग बनता है। अब प्रायः सभी प्रगतिशील क्षेत्रों में वर्गों के आधार पर सभायें, समितियां, यूनियनें तो प्रसिद्ध हैं ही। व्यापारी भी अपने-अपने व्यवसाय के दायरे में सभा-समितियां बनाते हैं।
धार्मिक मान्यताओं के अनुरूप सम्प्रदाय बने हैं। विद्वानों के विद्वत्-परिषदों का गठन होता रहता है। कलाकार भी अपने वर्ग गठन करते हैं। विकृतियां तो हर क्षेत्र में प्रवेश करतीं और सुधरती रहती हैं। इस दृष्टि से इन संगठनों में भी कुछ न कुछ, कहीं न कहीं गड़बड़ियां देखी जा सकती हैं। उनके बीच पारस्परिक विग्रह भी स्वार्थ को लेकर होता रहता है। इतने पर भी संगठन की उपयोगिता कम नहीं होती। उनका प्रचलन बढ़ता ही जा रहा है। यदि उनमें टकराव की विसंगतियां न हों, तो उनसे लाभ भी है। मिल-जुल कर सोचने, काम करने और प्रचलन में सुधार-परिवर्तन करने से अन्ततः प्रगति की संभावनायें ही बढ़ती हैं। यह तथ्य बताते हैं कि सामाजिक प्रगति में, कौशल की अभिवृद्धि के क्षेत्र में संगठन की कितनी भूमिका हो सकती है। इस तथ्य को एक प्रकार से सार्वभौम मान्यता मिल चुकी है, मिलती जा रही है।
शासन क्या है? एक प्रकार से प्रजाजनों की बहुमुखी व्यवस्था बनाने का संगठन ही है। समाज क्या है? एक क्षेत्र में रहने वाले एक प्रकार की मान्यता वालों का एकत्रीकरण ही है। यह विधा अब सार्वभौम रूप धारण कर चुकी है। राष्ट्रसंघ की संगठना यही है। भविष्य की कल्पनाओं में यह मान्यता सम्मिलित होती जाती है कि समस्त विश्व अगले दिनों एकता और समता के केन्द्र पर केन्द्रित होकर रहेगा।
एक क्षेत्र में किसी वस्तु का उत्पादन बड़ी मात्रा में होता है, किन्तु दूसरे क्षेत्र में उसका अभाव रहने से बाहर से मंगाने की आवश्यकता पड़ती है। यह परिवहन क्रम प्रायः हर क्षेत्र में छोटे-बड़े रूप में चलता ही रहता है। इसके लिए ढुलाई का सरंजाम भी जुटाना पड़ता है। यह कार्य इन दिनों व्यक्तिगत रूप से ही सम्पन्न होता है। व्यक्तिगत स्वार्थ की जहां भी प्रमुखता रहती है, वहां अधिक मुनाफा कमाने की प्रवृत्ति ही सहज पनपती है। आवागमन के सिलसिले में नकली चीजों की मिलावट कर लेना भी सरल पड़ता है। इन गड़बड़ियों को रोकने के लिए सामूहिकता का क्रियान्वयन सरल पड़ता है। मिल-जुलकर चोरी, बेईमानी करने में कम गुंजाइश रहती है। भेद जल्दी-फूटता है, जबकि एकाकी व्यवसाय में निरत एकाकी व्यक्ति अपनी चालाकी छिपाये भी रह सकता है। साथ ही लागत मूल्य की जानकारी न रहने पर कीमतें भी खरीदारों से मनमानी वसूल की जा सकती हैं। उपभोक्ताओं पर यह दुहरी मार न पड़े, इसके लिए आवश्यक है कि परिवहन व्यवसाय में सामूहिकता का समावेश किया जाय, उसे सहकारिता के सहारे चलाया जाय। तब यदि कुछ लाभांश रहता होगा, तो वह उस सहकारी समूह में बंट जाया करेगा और एक के स्थान पर अनेक लोग लाभान्वित होंगे। सही दाम पर सही चीज मिलने की सम्भावना तो निश्चित रूप से रहेगी ही।
देखा गया है कि बड़ी पूंजी वाले किसी व्यवसाय पर अपना अधिकार जमा लेते हैं। उनकी प्रतिस्पर्द्धा में छोटी पूंजी वाले ठहर नहीं पाते। ऐसी दशा में अनेकों को काम या लाभ मिलने का द्वार रुकता है और एकाधिकार पनपता है। इस कुप्रचलन को रोकने के लिए आवश्यक है कि वस्तुओं की खरीद, बिक्री, ढुलाई, भण्डारण जैसे सभी कार्यों में सहकारिता का समावेश हो, यह उपभोक्ता के हित में है सीमित मुनाफा, सही चीज और ढुलाई व्यवसाय में साझेदारी की प्रवृत्ति का बढ़ना हर किसी के हित में है। ऐसे प्रयोजनों के लिए मिल-जुलकर पूंजी का एकत्रीकरण भी कठिन नहीं रहता। सहकारी संगठनों को सरकारी ऋण भी सरलतापूर्वक मिल जाता है। इस प्रकार एकाधिकार का विकेन्द्रीकरण होना एक अच्छी परम्परा की शुरुआत है। भारत में पशुधन की कमी नहीं, पर बैल, भैंसों, घोड़ों, ऊंटों को खेती में कम समय का काम मिलने से वे शेष समय में बेकार बैठे रहते हैं। खर्च न पुसाने से उनकी उपयोगिता घटती है और कसाईखानों की गोटी लाल होती है। पशुधन की संख्या तथा उपयोगिता बढ़ी रहने से गोबर की जो बहुमूल्य सम्पदा हस्तगत होती है उससे भूमि की उर्वरता बढ़ती है। यदि वे घटेंगे तो ट्रक, ट्रैक्टर जैसे महंगे वाहनों के आधार पर ढुलाई करानी पड़ेगी, जो देहाती क्षेत्र के लिए तो और भी अधिक महंगी होती है। कई बार तो कच्चे रास्ते होने के कारण थोड़ा काम होने पर वे खर्चीले वाहन उपलब्ध भी नहीं होते। इन सभी कठिनाइयों का निराकरण यही है कि पशु वाहनों के माध्यम से ढुलाई कराई जाय। यह एक स्वतन्त्र एवं सुविस्तृत उद्योग है, जो व्यक्ति विशेष के हाथों में न रहकर सहकारी विधा से चलने में अधिक विस्तार होने तथा प्रामाणिकता बनी रहने की सम्भावना है। पशुपालन भी इस आधार पर अधिक सुनिश्चित होगा और उसके द्वारा उपलब्ध होने वाला खाद उर्वरता की अभिवृद्धि में सहायक होने पर राष्ट्र की अर्थ-व्यवस्था में बढ़-चढ़कर योगदान ही दे सकेगा।
सरकारी निर्माण कार्य हर साल बड़े पैमाने पर होते हैं। इनके ठेके बड़े साधन वाले अमीरों को मिलते हैं। मोटा लाभ भी वे कमाते हैं। इस प्रचलन में रिश्वत की भी पूरी गुंजाइश रहती है, खराब माल लगाने और कमजोर निर्माण बन पड़ने की भी। इसके स्थान पर यह कहीं अच्छा है कि स्थानीय या क्षेत्रीय सहकारी समितियां अपने-अपने इलाके के निर्माण कार्यों के ठेके स्वयं ही लें और स्वयं ही मिल-जुलकर उन्हें सम्पन्न करें। ऐसी दशा में दुर्बलों महिलाओं और वृद्धों को भी उनकी शक्ति के अनुसार थोड़ा-थोड़ा काम मिल सकता है। प्रतिभा और प्रामाणिकता की प्रतिस्पर्धा सभी सहकारी समितियों के बीच ठनी रहने से काम किफायत से भी होगा और काम भी अधिक लोगों को मिलेगा, जब कि आमतौर से किसानों और मजदूरों के पास कुछ महीने ही पूरा काम मिलने के रहते हैं। शेष समय ठाले-बैठे गंवाना पड़ता है। यदि सरकारी निर्माण कार्य भर सहकारी समितियों के द्वारा किया जाने लगे, तो देहाती क्षेत्र की गरीबी और बेकारी के निराकरण में असाधारण योगदान मिल सकता है। यहां तक कि ट्रकों की प्रतिस्पर्द्धा में ग्रामीण बैलगाड़ियों का धन्धा भी चल निकलने में उपार्जन एवं सुविधाओं के कितने ही नये स्रोत खुल सकते हैं।
बड़ी जोतो की बात दूसरी है, पर जिनके पास थोड़ी-थोड़ी जमीन है, उतने भर के लिए जो हल, बैल एवं सिंचाई के साधन नहीं जुटा सकते, उनके लिए सुविधा इसी में है कि मिल-जुलकर अपना काम चलायें बारी-बारी से बैलों तथा सिंचाई के साधनों का उपयोग करते हुए वे अधिक सुविधा एवं अधिक उत्पादन का लाभ उठा सकते हैं। सहकारी क्षेत्रों में आर्थिक लाभ के कितने ही काम चल पड़ने संभव हैं। अब कपड़ा खरीदकर उसे मन मर्जी के डिजाइन का सिलवाना केवल अमीर लोगों या मनचलों के लिए ही सम्भव रह गया है। गरीबों को उन अनुकरण में काफी झंझट खड़ा रहता है। ‘रेडीमेड’ कपड़े ही सस्ते पड़ते हैं। बजाज की, दर्जी की दुकानों पर चक्कर लगाते रहने की अपेक्षा आवश्यक वस्तुयें हाथों-हाथ खरीदी जा सकती हैं। रेडीमेड कपड़ों के फर्मे कटे हुए होने पर सामान्य घरों की महिलायें भी उनकी सिलाई करती रह सकती हैं। इस प्रकार यह सहकारी उद्योग सस्ते मोल में बिना समय गंवाये आवश्यक वस्तुयें उपलब्ध करा सकता है और सिलाई का धन्धा भी घर-घर आजीविका देने में सफल हो सकता है। ऊपर कुछ एक वस्तुओं एवं व्यवसायों की ओर ही संकेत किया गया है यदि बारीकी से दृष्टि पसारकर इस संदर्भ में विचार किया जाय, तो प्रतीत होगा कि ऐसे अनेकों काम हैं, जिन्हें सहकारी क्षेत्र में लिया, बढ़ाया या सम्मिलित किया जा सकता है। इन दिनों तो सम्पत्तिवानों और चतुर विद्वानों से ही आर्थिक लाभ उठाते बन पड़ता है और थोड़ों को समृद्धि मिलने भर से सन्तुष्ट होना पड़ता है। सहकारिता, काम का विस्तार और वितरण का दुहरा लाभ दे सकती है।
सबसे बड़ी बात मिल-जुलकर काम करने की प्रवृत्ति का उभरना है। इस दिशा में बढ़ा हुआ उत्साह न केवल आर्थिक लाभ का द्वार खोलता है, वरन् पारस्परिक घनिष्ठता, सद्भावना बढ़ाने की दिशा में भी कारगर सिद्ध होता है। व्यक्तिवाद के स्थान पर समूहवाद की प्रतिष्ठापना करने में ही सब का सब प्रकार कल्याण है। स्वस्थ समाज की संरचना इसी आधार पर हो सकती है। उसके लिए आरम्भ में मिल-जुलकर आर्थिक सुविधा सम्पादन को प्रमुखता दी जाय, तो आगे अन्यान्य क्षेत्रों में भी प्रगतिशीलता के बढ़े कदम उठ सकते हैं। कहना न होगा कि मिल-जुलकर काम करने और हिल-मिलकर बांट खाने में ही सर्वतोमुखी प्रगति का रहस्य छिपा पड़ा है।
अध्यापक, विचारक, साहित्य-सृजेता, उपदेशक, समाज-सेवी, सत्प्रवृत्ति संवर्धन में निरत स्तर के लोग ब्राह्मण कहे जाते हैं। वे यों एकाकी रहकर भी कुछ न कुछ तो करते ही रह सकते हैं, पर यदि उनका सुव्यवस्थित समूह-संगठन हो, तो एक-दूसरे के सहयोग एवं आदान-प्रदान से उनकी विधा और भी अधिक समुन्नत हो सकती है। घर का वातावरण उसी स्तर का बने, तो बच्चे को भी उस पैतृक परम्परा का लाभ अनायास ही मिल सकता है। एक के बाद दूसरी पीढ़ी को भी अधिक प्रगति का अवसर मिल सकता है। संभवतः इसी आधार पर ब्राह्मण वर्ग के बीच घनिष्ठता और अधिक सान्निध्य रखने को ध्यान में रखते हुए वह वर्ग बना होगा।
यही बात क्षत्रिय, वैश्य, श्रमजीवी आदि के सम्बन्ध में भी लागू होती है। कई जातियां फौज और पुलिस में रहकर अपना कौशल जितनी अच्छी तरह दिखा पाती हैं, उतनी अन्य कार्यों में सफल नहीं होतीं। व्यवसाय क्षेत्र में सफलता प्राप्त करने वालों में मारवाड़ी, पंजाबी अधिक सफल देखे गये हैं। इसी प्रकार कारीगर वर्ग के परिवारों में वह कौशल आरम्भ से ही सीखने को मिलता है इसलिए अधिक सफल होने की गुंजाइश उनमें रहती है।
पिछले दिनों जब समाज की संगठना व्यवसायों के आधार पर संगठित होने की थी, तब वर्णाश्रम धर्म का सहज प्रचलन था, पर अब स्थिति बदल गयी है। पिता का—पूर्वजों का व्यवसाय उसके वंशज करें ही, यह अनिवार्य नहीं रहा। अब इच्छानुसार व्यवसाय अपनाने की छूट है। ऐसी दशा में जन्म-जाति की भी कोई तुक नहीं रह गयी, फिर भी कर्म-कौशल में यह तथ्य यथावत है कि यदि एक प्रकृति या प्रवृत्ति के लोग अधिक घनिष्ठ होकर रहें, तो उन्हें सुविधा भी अधिक रहेगी और सफलता भी अधिक मिलेगी। इन दिनों जन्म के आधार पर तो नहीं, पर वर्ण का मूल आधार ‘व्यवसाय’ अब भी यह अपेक्षा रखता है कि उस वर्ग के लिए पारस्परिक घनिष्ठता का अनुपात अधिक रखें। इससे उनका कौशल भी निखरता है और हितों के संरक्षण का भी अधिक सुयोग बनता है। अब प्रायः सभी प्रगतिशील क्षेत्रों में वर्गों के आधार पर सभायें, समितियां, यूनियनें तो प्रसिद्ध हैं ही। व्यापारी भी अपने-अपने व्यवसाय के दायरे में सभा-समितियां बनाते हैं।
धार्मिक मान्यताओं के अनुरूप सम्प्रदाय बने हैं। विद्वानों के विद्वत्-परिषदों का गठन होता रहता है। कलाकार भी अपने वर्ग गठन करते हैं। विकृतियां तो हर क्षेत्र में प्रवेश करतीं और सुधरती रहती हैं। इस दृष्टि से इन संगठनों में भी कुछ न कुछ, कहीं न कहीं गड़बड़ियां देखी जा सकती हैं। उनके बीच पारस्परिक विग्रह भी स्वार्थ को लेकर होता रहता है। इतने पर भी संगठन की उपयोगिता कम नहीं होती। उनका प्रचलन बढ़ता ही जा रहा है। यदि उनमें टकराव की विसंगतियां न हों, तो उनसे लाभ भी है। मिल-जुल कर सोचने, काम करने और प्रचलन में सुधार-परिवर्तन करने से अन्ततः प्रगति की संभावनायें ही बढ़ती हैं। यह तथ्य बताते हैं कि सामाजिक प्रगति में, कौशल की अभिवृद्धि के क्षेत्र में संगठन की कितनी भूमिका हो सकती है। इस तथ्य को एक प्रकार से सार्वभौम मान्यता मिल चुकी है, मिलती जा रही है।
शासन क्या है? एक प्रकार से प्रजाजनों की बहुमुखी व्यवस्था बनाने का संगठन ही है। समाज क्या है? एक क्षेत्र में रहने वाले एक प्रकार की मान्यता वालों का एकत्रीकरण ही है। यह विधा अब सार्वभौम रूप धारण कर चुकी है। राष्ट्रसंघ की संगठना यही है। भविष्य की कल्पनाओं में यह मान्यता सम्मिलित होती जाती है कि समस्त विश्व अगले दिनों एकता और समता के केन्द्र पर केन्द्रित होकर रहेगा।
एक क्षेत्र में किसी वस्तु का उत्पादन बड़ी मात्रा में होता है, किन्तु दूसरे क्षेत्र में उसका अभाव रहने से बाहर से मंगाने की आवश्यकता पड़ती है। यह परिवहन क्रम प्रायः हर क्षेत्र में छोटे-बड़े रूप में चलता ही रहता है। इसके लिए ढुलाई का सरंजाम भी जुटाना पड़ता है। यह कार्य इन दिनों व्यक्तिगत रूप से ही सम्पन्न होता है। व्यक्तिगत स्वार्थ की जहां भी प्रमुखता रहती है, वहां अधिक मुनाफा कमाने की प्रवृत्ति ही सहज पनपती है। आवागमन के सिलसिले में नकली चीजों की मिलावट कर लेना भी सरल पड़ता है। इन गड़बड़ियों को रोकने के लिए सामूहिकता का क्रियान्वयन सरल पड़ता है। मिल-जुलकर चोरी, बेईमानी करने में कम गुंजाइश रहती है। भेद जल्दी-फूटता है, जबकि एकाकी व्यवसाय में निरत एकाकी व्यक्ति अपनी चालाकी छिपाये भी रह सकता है। साथ ही लागत मूल्य की जानकारी न रहने पर कीमतें भी खरीदारों से मनमानी वसूल की जा सकती हैं। उपभोक्ताओं पर यह दुहरी मार न पड़े, इसके लिए आवश्यक है कि परिवहन व्यवसाय में सामूहिकता का समावेश किया जाय, उसे सहकारिता के सहारे चलाया जाय। तब यदि कुछ लाभांश रहता होगा, तो वह उस सहकारी समूह में बंट जाया करेगा और एक के स्थान पर अनेक लोग लाभान्वित होंगे। सही दाम पर सही चीज मिलने की सम्भावना तो निश्चित रूप से रहेगी ही।
देखा गया है कि बड़ी पूंजी वाले किसी व्यवसाय पर अपना अधिकार जमा लेते हैं। उनकी प्रतिस्पर्द्धा में छोटी पूंजी वाले ठहर नहीं पाते। ऐसी दशा में अनेकों को काम या लाभ मिलने का द्वार रुकता है और एकाधिकार पनपता है। इस कुप्रचलन को रोकने के लिए आवश्यक है कि वस्तुओं की खरीद, बिक्री, ढुलाई, भण्डारण जैसे सभी कार्यों में सहकारिता का समावेश हो, यह उपभोक्ता के हित में है सीमित मुनाफा, सही चीज और ढुलाई व्यवसाय में साझेदारी की प्रवृत्ति का बढ़ना हर किसी के हित में है। ऐसे प्रयोजनों के लिए मिल-जुलकर पूंजी का एकत्रीकरण भी कठिन नहीं रहता। सहकारी संगठनों को सरकारी ऋण भी सरलतापूर्वक मिल जाता है। इस प्रकार एकाधिकार का विकेन्द्रीकरण होना एक अच्छी परम्परा की शुरुआत है। भारत में पशुधन की कमी नहीं, पर बैल, भैंसों, घोड़ों, ऊंटों को खेती में कम समय का काम मिलने से वे शेष समय में बेकार बैठे रहते हैं। खर्च न पुसाने से उनकी उपयोगिता घटती है और कसाईखानों की गोटी लाल होती है। पशुधन की संख्या तथा उपयोगिता बढ़ी रहने से गोबर की जो बहुमूल्य सम्पदा हस्तगत होती है उससे भूमि की उर्वरता बढ़ती है। यदि वे घटेंगे तो ट्रक, ट्रैक्टर जैसे महंगे वाहनों के आधार पर ढुलाई करानी पड़ेगी, जो देहाती क्षेत्र के लिए तो और भी अधिक महंगी होती है। कई बार तो कच्चे रास्ते होने के कारण थोड़ा काम होने पर वे खर्चीले वाहन उपलब्ध भी नहीं होते। इन सभी कठिनाइयों का निराकरण यही है कि पशु वाहनों के माध्यम से ढुलाई कराई जाय। यह एक स्वतन्त्र एवं सुविस्तृत उद्योग है, जो व्यक्ति विशेष के हाथों में न रहकर सहकारी विधा से चलने में अधिक विस्तार होने तथा प्रामाणिकता बनी रहने की सम्भावना है। पशुपालन भी इस आधार पर अधिक सुनिश्चित होगा और उसके द्वारा उपलब्ध होने वाला खाद उर्वरता की अभिवृद्धि में सहायक होने पर राष्ट्र की अर्थ-व्यवस्था में बढ़-चढ़कर योगदान ही दे सकेगा।
सरकारी निर्माण कार्य हर साल बड़े पैमाने पर होते हैं। इनके ठेके बड़े साधन वाले अमीरों को मिलते हैं। मोटा लाभ भी वे कमाते हैं। इस प्रचलन में रिश्वत की भी पूरी गुंजाइश रहती है, खराब माल लगाने और कमजोर निर्माण बन पड़ने की भी। इसके स्थान पर यह कहीं अच्छा है कि स्थानीय या क्षेत्रीय सहकारी समितियां अपने-अपने इलाके के निर्माण कार्यों के ठेके स्वयं ही लें और स्वयं ही मिल-जुलकर उन्हें सम्पन्न करें। ऐसी दशा में दुर्बलों महिलाओं और वृद्धों को भी उनकी शक्ति के अनुसार थोड़ा-थोड़ा काम मिल सकता है। प्रतिभा और प्रामाणिकता की प्रतिस्पर्धा सभी सहकारी समितियों के बीच ठनी रहने से काम किफायत से भी होगा और काम भी अधिक लोगों को मिलेगा, जब कि आमतौर से किसानों और मजदूरों के पास कुछ महीने ही पूरा काम मिलने के रहते हैं। शेष समय ठाले-बैठे गंवाना पड़ता है। यदि सरकारी निर्माण कार्य भर सहकारी समितियों के द्वारा किया जाने लगे, तो देहाती क्षेत्र की गरीबी और बेकारी के निराकरण में असाधारण योगदान मिल सकता है। यहां तक कि ट्रकों की प्रतिस्पर्द्धा में ग्रामीण बैलगाड़ियों का धन्धा भी चल निकलने में उपार्जन एवं सुविधाओं के कितने ही नये स्रोत खुल सकते हैं।
बड़ी जोतो की बात दूसरी है, पर जिनके पास थोड़ी-थोड़ी जमीन है, उतने भर के लिए जो हल, बैल एवं सिंचाई के साधन नहीं जुटा सकते, उनके लिए सुविधा इसी में है कि मिल-जुलकर अपना काम चलायें बारी-बारी से बैलों तथा सिंचाई के साधनों का उपयोग करते हुए वे अधिक सुविधा एवं अधिक उत्पादन का लाभ उठा सकते हैं। सहकारी क्षेत्रों में आर्थिक लाभ के कितने ही काम चल पड़ने संभव हैं। अब कपड़ा खरीदकर उसे मन मर्जी के डिजाइन का सिलवाना केवल अमीर लोगों या मनचलों के लिए ही सम्भव रह गया है। गरीबों को उन अनुकरण में काफी झंझट खड़ा रहता है। ‘रेडीमेड’ कपड़े ही सस्ते पड़ते हैं। बजाज की, दर्जी की दुकानों पर चक्कर लगाते रहने की अपेक्षा आवश्यक वस्तुयें हाथों-हाथ खरीदी जा सकती हैं। रेडीमेड कपड़ों के फर्मे कटे हुए होने पर सामान्य घरों की महिलायें भी उनकी सिलाई करती रह सकती हैं। इस प्रकार यह सहकारी उद्योग सस्ते मोल में बिना समय गंवाये आवश्यक वस्तुयें उपलब्ध करा सकता है और सिलाई का धन्धा भी घर-घर आजीविका देने में सफल हो सकता है। ऊपर कुछ एक वस्तुओं एवं व्यवसायों की ओर ही संकेत किया गया है यदि बारीकी से दृष्टि पसारकर इस संदर्भ में विचार किया जाय, तो प्रतीत होगा कि ऐसे अनेकों काम हैं, जिन्हें सहकारी क्षेत्र में लिया, बढ़ाया या सम्मिलित किया जा सकता है। इन दिनों तो सम्पत्तिवानों और चतुर विद्वानों से ही आर्थिक लाभ उठाते बन पड़ता है और थोड़ों को समृद्धि मिलने भर से सन्तुष्ट होना पड़ता है। सहकारिता, काम का विस्तार और वितरण का दुहरा लाभ दे सकती है।
सबसे बड़ी बात मिल-जुलकर काम करने की प्रवृत्ति का उभरना है। इस दिशा में बढ़ा हुआ उत्साह न केवल आर्थिक लाभ का द्वार खोलता है, वरन् पारस्परिक घनिष्ठता, सद्भावना बढ़ाने की दिशा में भी कारगर सिद्ध होता है। व्यक्तिवाद के स्थान पर समूहवाद की प्रतिष्ठापना करने में ही सब का सब प्रकार कल्याण है। स्वस्थ समाज की संरचना इसी आधार पर हो सकती है। उसके लिए आरम्भ में मिल-जुलकर आर्थिक सुविधा सम्पादन को प्रमुखता दी जाय, तो आगे अन्यान्य क्षेत्रों में भी प्रगतिशीलता के बढ़े कदम उठ सकते हैं। कहना न होगा कि मिल-जुलकर काम करने और हिल-मिलकर बांट खाने में ही सर्वतोमुखी प्रगति का रहस्य छिपा पड़ा है।

