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Books - सर्वतोमुखी सहकारिता

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Language: HINDI
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संगठन का मेरुदंड स्वयं बनें

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‘एक की तुलना में दो भारी पड़ते हैं’—इस तथ्य को हर कहीं जांचा-परखा जाता है। अन्धे और पंगे की कहानी प्रसिद्ध है, जिनने मिल-जुलकर नदी पार कर ली थी। दो पहिये की गाड़ी चलती और वजन ढोती है। एक पहिये का वाहन तो सरकस में कौतुक दिखाने के अतिरिक्त और कहीं कदाचित् ही सफल होता है। एक पलड़े की तराजू एक प्रकार से निरर्थक ही होती है।

बात यहीं पर समाप्त नहीं हो जाती। एक मन के भावनाशील यदि मिलते तो अंग विद्या के आधार पर एक और एक आमने-सामने बैठकर ग्यारह की संख्या बनाते हैं। घनिष्ठता सम्पन्न मनुष्यों की स्थिति भी ग्यारह गुनी बन जाती है। पति और पत्नी यदि एक मन हों तो उनके द्वारा बन पड़ने वाले कार्य और सहयोगजन्य आनन्द ग्यारह गुना बन जाता है। राम-लक्ष्मण के, अंगद-हनुमान के, कृष्ण-अर्जुन के, युग्म वह कर सके जो एकाकी रहने की स्थिति में कदाचित ही कर पाते। एक-दूसरे के प्रति वफादार-ईमानदार रहने की स्थिति में मात्र यों भी साहस और पराक्रम के क्षेत्र में ग्यारह गुनी उपलब्धियां अर्जित करते देखे गये हैं। बड़े समूहों का प्रभाव तो और भी बढ़-चढ़कर होता है, पांच पाण्डवों का समूह महाभारत जीतने में सफल हुआ था। संसार के महामानवों द्वारा किये गये महान कार्यों की सफलता के पीछे जहां अनेक अन्य सुयोगों की भूमिका रही है वहां एक बड़ी बात निश्चित रूप से रही है कि वे अपने स्तर के अनेक साथी-सहयोगी जुटाने में भी सफल हुए हैं। संयुक्त शक्ति ने एक दूसरे का साहस बढ़ाया है। लोगों की दृष्टि में उनके प्रामाणिक वजनदार होने का विश्वास जगाया है।

क्षुद्रता का एक बड़ा घातक दुर्गुण यह होता है कि वह एकाकी श्रेय-लाभ के लिए आतुर रहती है। दूसरों के द्वारा दिये गये सहयोग का मूल्यांकन नहीं करती। श्रेय की लालसा जब अति की सीमा तक पहुंचती है तो मण्डली का गुणगान करने की अपेक्षा स्वयं के कौशल का ही बखान करने लगती है। विग्रह यहीं से खड़ा होता है और संगठनों में टूट-फूट हो जाती है—इस खतरे को समझते हुए दूरदर्शी लोगों का दृष्टिकोण यह रहता है कि वे ‘मैं’ के स्थान पर ‘हम’ का ही प्रयोग करते हैं। इससे श्रेय विभाजित होकर प्रकारान्तर से सभी के हिस्से में आ जाता है और अपने को पीछे रखने की स्थिति में साथियों की गौरवान्वित होने की लालसा का पोषण हो जाता है। सत्प्रयोजनों के लिए खड़े किये गये संगठनों के स्थायित्व में यह एक बहुत बड़ा कारण है कि श्रेय के लिए छीना-झपटी का अवसर न आने पाये, वास्तविक संगठक एक कदम पीछे रहें। क्षुद्रता का एक दूसरा पक्ष भी है कि किसी प्रयास का संचालक-संयोजक बनने के लिए आतुरतापूर्वक लालायित होना। जब समूह का हर व्यक्ति अपनी प्रमुखता दिखाने का प्रयत्न करता है तो अन्य साथियों में भी वैसी ही ईर्ष्या जगना स्वाभाविक है। संस्थाओं में पदाधिकारी बनने के प्रश्न पर प्रायः खींचतान-पार्टीबन्दी चल पड़ती है। यही खींचतान आगे चलकर पार्टीबन्दी में, शत्रुता में परिणत हो जाती है और उस उद्देश्य को ही नष्ट करती है जिसके लिए संगठित वा एकत्रित हुये थे।

सार्वजनिक जीवन में प्रवेश करने वालों को तीन ऐषणाओं से बचे रहने का भरसक प्रयत्न करना चाहिये—पुत्रेषणा, वित्तेषणा और लोकेषणा। पुत्रेषणा का अर्थ है—संतान की संख्या अधिक बढ़ा लेना और उन्हीं को सुसम्पन्न बनाने का ताना-बाना बुनते रहना। मोह इसी स्थिति का नाम है। दूसरा दुर्गुण है—वित्तेषणा धन-वैभव की लिप्सा। इस कारण लोकसेवी का चरित्र गिरता है, विश्वास उठता है और आत्मबल में कमी आती है। लोकसेवा के क्षेत्र में प्रवेश करने वालों को औसत नागरिक स्तर का ही निर्वाह अपनाना चाहिये अन्यथा लोग अनुमान लगाते हैं कि सार्वजनिक क्षेत्र से ही कुछ कमाया और जमा किया गया है। इस प्रकार के सन्देह की गुंजाइश न रहे, इसी में सेवा-संगठनों में काम करने वालों की शान है। तीसरा सबसे भयंकर है—लोकेषणा। यश, लालसा, बड़प्पन सिद्ध करने के लिये रचे गये प्रपंच। अपने को समुदाय का वरिष्ठ सिद्ध करने के लिए अपनी ओर से किया गया प्रयास इसी श्रेणी में आता है, उससे लाभ के स्थान पर हानि होती है। लोग इस दुर्बलता को सहज भांप लेते हैं और किये गये सेवा कार्यों को भी विज्ञापनबाजी कहकर व्यंग-उपहास करने लगते हैं। श्रद्धा चली जाती है और सम्मान तथा विश्वास घट जाता है, सेवा कार्यों के लिये जो समयदान-अंशदान आदि किया गया था, उसके बदले श्रेय लूट लेने पर लोग आरोप लगाते और आक्षेप लगाने लगते हैं। इसीलिये दूरदर्शी लोग अपना सम्मान बनाये रखने के लिए दूसरों को यश देने और स्वयं पीछे रहने की नीति अपनाते हैं।

समूहों को स्वरूप प्रकारान्तर से संगठन जैसा बन जाता है। उसमें कार्य संचालन के लिये पैसा भी किसी न किसी प्रयोजन के लिए जमा होता है। इसका हिसाब-किताब ऐसा रखा जाय जिसमें किसी शंकाशील को भी अंगुली उठाने का अवसर न मिले। यदि अपना कुछ वास्ता हिसाब से हो तो उस आय-व्यय को बिना पूछे ही इस प्रकार बताते रहना चाहिये, जिससे चर्चा का विषय बनने से पूर्व ही स्थिति का समाधान होता रहे। किसी के द्वारा किया गया सेवा कार्य कितना ही बड़ा क्यों न हो, पर यदि यश, लिप्सा और पैसे के घोटाले सम्बन्धी आक्षेप लगने लगे तो अपनी और संगठन दोनों की ही प्रकारान्तर से क्षति होती है—इस सन्दर्भ में जितना अधिक पाक-साफ रहा जाय उतना ही अच्छा है।

सेवा मार्ग में एक और पक्ष भी ध्यान रखने योग्य है, वह यह कि सत्प्रवृत्ति संवर्धन जैसे पुनीत कार्य में भी किसी न किसी प्रकार दुष्प्रवृत्ति उन्मूलन जुड़ जाता है। इसमें निहित स्वार्थों की प्रत्यक्ष या परोक्ष रूप से हानि होती है, हानि के बदले प्रत्याक्रमण होने लगना कुछ अप्रत्याशित नहीं है। इसलिए यह मानकर चलना चाहिए कि सज्जनों के संगठन भी अनीति पक्ष को रुष्ट या क्रुद्ध किये बिना नहीं रहते। यदि वे हानि पहुंचाने पर उतारू दीख पड़ें तो उसे स्वाभाविक ही मानना चाहिए। देवताओं पर भी असुर किसी न किसी प्रकार प्रत्यक्ष-परोक्ष आक्रमण करते रहे हैं, अपने ऊपर भी ऐसा हो सकता है।

देखा गया है कि जब तक सेवा-संगठन मजबूत या प्रभावशाली नहीं होते तब तक उनकी उपेक्षा होती रहती है—कोई चर्चा तक नहीं करता। जब जड़ जमने लगती हैं और सत्प्रयासों का प्रयत्न दीख पड़ने लगता है तो मनोबल तोड़ने के लिए विरोधियों द्वारा उपहास उड़ाये जाने का सिलसिला चल पड़ता है। बात और भी आगे बढ़े और अनीति पर सीधी चोट पहुंचे एवं चरित्र हनन जैसे परोक्ष अथवा आक्रमणों जैसे प्रत्यक्ष प्रतिशोध क्रियान्वित होने लगते हैं, इन्हें अग्नि परीक्षा ही समझा जाना चाहिए। साहस और उत्साह में कमी आते देखकर प्रकारान्तर में अपनी दुर्बलता या पराजय स्वीकार नहीं करना चाहिए। साथियों के छूटने या टूटने पर भी एकाकी चलते रहने की धीर-वीर, गम्भीर स्तर की बलिष्ठता का परिचय देना चाहिए। अन्त में सत्य की ही विजय होती है। एक दिन वह भी आता है जब सत्य-निष्ठा के साथ विरोधी भी नत-मस्तक होते हैं। निन्दा के स्थान पर प्रशंसा करने और विरोध छोड़कर सहयोग करने लगते हैं।

दूसरे आगे चलें तब हम अनुकरण करें—इस प्रतीक्षा में बैठे रहने वालों के लिए वैसा सुयोग कदाचित् ही कभी आता है, कारण कि हेय मार्ग पर चलने वाले ही प्रायः अपने कुसंस्कारों को दृढ़तापूर्वक देर तक अपनाते देखे गये हैं। आदर्शवादियों का उत्साह अल्प समय टिकता है, कारण कि उन्हें न तो सच्चे मन से परामर्श देने वाले ही मिलते हैं और न ऐसे लोगों का बाहुल्य दीख पड़ता है जिनके कदम से कदम मिलाकर चलना बन पड़े। निजी आत्मबल के अभाव में प्रायः लोग दूसरों का सहारा ही ताकते देखे जाते हैं। वह ऐसा कहीं मिल नहीं पाता जो स्थिरता और दृढ़ता लिए हुए हों। ऐसी दशा में जिन्हें सज्जनों का संगठन विकसित होते देखना है उन्हें उस कार्य में स्वयं ही अग्रगामी बनना और दृढ़ता के प्रतीक रूप में अपना साहस विकसित करना होता है। यह कार्य किसी और को न सौंपकर भावनाशीलों को स्वयं ही अपने कन्धों पर उठाना चाहिए।

चुम्बक अपनी समर्थता बनाये रहता है और इर्द-गिर्द बिखरे छोटे लौह कणों को खींचने की प्रक्रिया में सतत् संलग्न रहकर अपना समुदाय बढ़ाता रहता है। शहद के छत्ते में बैठी हुई रानी मक्खी अपना समुदाय बनाती-बढ़ाती और अनुशासन पालन के लिए प्रशिक्षित करती रहती है। सज्जनों का संगठन बनाने के इच्छुकों को भी यही रीति-नीति अपनानी चाहिए।
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