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Magazine - Year 1977 - Version 2

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सहिष्णुता कायरता नहीं शक्ति है।

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जीवन में सभी तरह के अवसर आते हैं। सीधी पगडण्डी भी मिलती है, प्रशस्त राजपथ भी और ऊबड़-खाबड़ चट्टानें भी। नदी-नाले भी मिलते हैं और फूलों से काँटे कुछ अधिक ही पाये जाते हैं। इन सबमें होकर आगे बढ़ते जाने का एक ही उपाय है, कष्ट-कण्टकों को धैर्यपूर्वक सहन करता।

जीवन के किसी भी क्षेत्र में काम करते समय प्रतिकूलताएँ उपस्थित होती ही हैं। बना-बनाया,निष्कंटक राजमार्ग किसी को कभी नहीं मिला। प्रतिकूलताएँ उपस्थित होते ही विक्षुब्ध हो उठने पर चट्टानों से सर टकराने, नहीं में कूद पड़ती है। इससे स्वयं की हानि होती है। लक्ष्य तक पहुँचने में तो कुछ मदद मिलती नहीं।

व्यावहारिक जीवन में सर्वथा भले आदमियों का ही संग मिलना और अनुकूलताएँ ही सामने आना सम्भव नहीं होता। झगड़ालू, कलहकारी, विक्षुब्ध, दुष्ट प्रकृति के लोगों से बचते रहने को कितना भी यत्न किया जाए, पर अधिकार एवं प्रतिष्ठा प्राप्त भी ऐसे कई लोग होते हैं। उनसे नित्य ही सम्बन्ध आता है। उनके दुर्वचनों, अशोभन व्यवहारों के प्रति असहिष्णु हो जाने पर मन की शान्ति निरंतर भंग होती रहती है एवं अशान्त, उद्विग्न मनःस्थिति में कार्य भली-भाँति सम्पन्न नहीं हो पाता। शान्त और सन्तुलित मनःस्थिति बनाये रखने के लिए सहिष्णुता नितान्त आवश्यक होती है। असहिष्णुता से मनः स्थिति अशान्त-उद्वेलित हो उठती है। सम्पूर्ण शरीर थरथराने-सा लगता है। इस विक्षुब्ध मनःस्थिति में क्रोध उभर सकता है और अनुचित कार्य हो सकता है। आवेगों से बचने के लिए सहिष्णुता आवश्यक है।

कई बार प्रतिकूल परिस्थितियों में ही कार्य करते रहना होता है। उनके प्रति असहिष्णु बने रहने से मन में आवेग उद्वेग उठते और चित्त को विचलित करते रहते हैं। इससे कार्य सिद्धि अधिक कठिन हो जाती है। जीवन में प्रतिकूलताओं के बीच भी मानसिक सन्तुलन बनाये रखना आवश्यक होता है। उस हेतु सहिष्णुता एक महत्वपूर्ण साधन है।

असहिष्णुता का जन्म आतुरता में से होता है। हथेली पर सरसों जमी देखना चाहने वाली बाल-बुद्धि में सहिष्णुता और धैर्य कहाँ से आये? प्रतिकूलताओं की चुनौती हमारी योग्यता और श्रमशीलता की परीक्षा के लिए ही उपस्थित होती है। जीवन में जिनने भी विशिष्ठ सफलताएँ अर्जित की है , वे सभी धैर्यवान एवं सहिष्णुता रहे हैं। असहिष्णुता एक क्षुद्रता और उथलापन ही है। सहिष्णुता समुद्र की सी गम्भीरता का नाम है। इसमें बाधाओं, प्रतिकूलताओं की बड़ी-बड़ी चट्टानें भी बिना व्यापक उथल-पुथल उत्पन्न किये समा जाती है। असहिष्णुता की स्थिति में लिए गये निर्णयों में प्रतिक्रिया का भाव विशेष रहता है। यही निर्णय कर सकना सहिष्णुता व्यक्ति के लिए ही सम्भव होता है।

असहिष्णुता असंस्कारिता और नादानी की द्योतक है। सुसंस्कृत व्यक्ति सदा सहिष्णु होता है, क्योंकि वह जानता है कि विश्व -व्यवस्था ऐसी ही है कि यहाँ अनुकूलताओं के साथ ही प्रतिकूलताएँ भले लोगों के साथ ही बुरे लोगों पुष्पों के साथ ही काँटों का भी अस्तित्व है और उनसे हम बचकर नहीं रह सकते।

किसी भी तरह सफलता पा जाने, तनिक भी झंझट न झेलने पड़ने की कामना से असहिष्णुता पैदा होती है। मात्र अपने दृष्टिकोण को सही मानने, अपना मत, अपना पथ, अपने प्रियजन अपनी विचारधारा ही श्रेष्ठ और दूसरों के मत, पंथ प्रियजन एवं विचारधारा को निकृष्ट मानने की क्षुद्रता एवं मूढ़ता को उभारती है। इससे समालिक विद्वेष की भावना बढ़ती है। असहिष्णुता घृणा को जन्म देती है, दूसरी ओर श्रेष्ठता का दम्भ पनपाती है। दूसरे का विचार, व्यवहार, हीन कोटि का लगने लगता है और उसे मिटा देने की भावना उभरने लगती है। यह क्षुद्र अहं की पराकाष्ठा ही है भिन्न-भिन्न मत वालों की असहिष्णुता व्यापक सामाजिक कलह और संघर्ष का कारण बनती रही है। हिटलर यहूदियों के प्रति इतना अधिक असहिष्णु हो उठा था कि उसने उनका भयंकर उत्पीड़न और नृशंस सामूहिक वध किया। ईसाई एवं मुसलमानों में मध्यकाल में मूर्तिपूजन के प्रति ऐसी असहिष्णुता बढ़ी कि उन्होंने इसके लिए रक्तपात से लेकर लूटपाट तक की क्रूर गतिविधियों को अपनाया।

अन्याय, अनीति को सहना सहिष्णुता नहीं कायरता है। सहिष्णुता तो अपने से भिन्न विचार को सुन सह सकने की उदारता का तथा कठिनाइयों को झेलकर लक्ष्य पथ पर बढ़ते जाने की दृढ़ता एवं विशालता का नाम है। सहिष्णुता भी क्रोध, घृणा, प्रेम आदि की तरह संप्रेषण मनोवेग है। जिसके प्रति हम असहिष्णु होंगे, उसे हमारा भी अस्तित्व सहन न होगा और परिणाम में कलह-संघर्ष तथा विनाश की स्थिति उत्पन्न होगी। इससे विपरीत जिसके प्रति हम उदार सहिष्णुता का रुख रखेंगे, वह अधिक समय तक उपेक्षा-भाव नहीं बनाये रख सकेगा और हमारी स्थिति भी समझने का प्रयास करने को प्रेरित होगा।

सहिष्णुता का व्यापक पैमाने पर प्रयोग महात्मा गाँधी ने किया और उसके चमत्कारी परिणाम विश्व के समक्ष आये। उनकी सहिष्णुता का प्रभाव ब्रिटिश शासकों पर भी पड़ा और अनेकों प्रबुद्ध अंग्रेज उनके मित्र, प्रशंसक, सहयोगी, अनुयायी और भक्त बन गए।

सभ्य, सुसंस्कृत जातियों में सहिष्णुता का तत्व अनिवार्य रूप से विद्यमान रहता है। वार्तालाप, तर्क-वितर्क, बहस के दौरान असहिष्णु हो उठने वाले व्यक्ति को निन्दा का ही पात्र बनना पड़ता है।

कई लोग किसी सार्वजनिक विषय पर वार्तालाप करते-करते निजी प्रसंगों पर आ जाते हैं और फिर असहिष्णु होकर परस्पर कटु आक्षेप करने लगते हैं और व्यक्तिगत बुराई पर उतर आते हैं। यह असहिष्णुता मन-बुद्धि की दुर्बलता ही मानी जायगी। इसके द्वारा सार्थक बातचीत एवं बहस कर पाना तथा सत्य तक पहुँच पाना सम्भव नहीं होता और अपने ही संकीर्ण दायरे में बन्द रहे जाना पड़ता है।

कई लोग अपनी मर्जी के खिलाफ जरा सी बात सुन कर भड़क उठते हैं और थोड़ी भी प्रतिकूल स्थिति से उत्तेजित हो उठते हैं। ऐसे व्यक्ति न तो लोगों की प्रशंसा एवं सम्मान अर्जित कर पाते हैं और न ही अपना प्रयोजन साध पाते हैं।

यह असहिष्णुता यदि बहिर्मुखी न रहकर अन्तर्मुखी हो जाए, तब तो लाभ निश्चित है। अपनी त्रुटियों, कमजोरियों के प्रति असहिष्णु रहना स्वयं के विकास का सुनिश्चित मार्ग है। यद्यपि उसमें भी यदि अधिक उतावली का योग हो जाय और तत्काल ही परिणाम की अपेक्षा की जाने लगे, तो सफलता तो मिलने से रही, कई-नई मानसिक जटिलताएं अवश्य उठ खड़ी होंगी। लम्बे समय से यदि कोई कमजोरी या त्रुटि स्वभाव में रूढ़ हो गई है, तो प्रचंड संकल्प के बाद भी उसके दूर होने में कुछ समय लगता है। उस बीच बहुत ही अधिक व्यग्र, अधीर हो उठने से उद्वेग ही बढ़ेगा। यही बात सामाजिक क्षेत्र में भी लागू होती है। सामाजिक बुराइयों के प्रति तो असहिष्णु रहना आवश्यक है, किंतु बुरे व्यक्ति के प्रति असहिष्णु हो उठने से बात बनती नहीं और उस पर उल्टी ही प्रक्रिया होती है। बुरे व्यक्ति में भी अच्छाई के अंश तो रहते ही हैं। सहिष्णु व्यक्ति ही संयत ढंग से उनकी बुराइयों को समझा-बुझाकर और आवश्यक असहयोग-विरोध कर दूर कर सकता है। असहिष्णुता की प्रतिक्रिया में तो व्यक्ति और अधिक उद्धत ही बनता जाता है।

असहिष्णुता, अद्वितीय-वीरता नहीं, अहंकार मात्र है। अपने अतिरिक्त अन्यों के विचार एवं कार्य को न सह पाना संकीर्ण अहं के सिवाय और कुछ नहीं। असहिष्णु व्यक्ति के व्यवहार से लोगों से यह भावना घर कर जाती है कि यह अपने को बढ़-चढ़कर देखता तथा स्वयं की श्रेष्ठता के समक्ष हमारा निरादर करना चाहता है। मनुष्य की प्रवृत्ति प्रायः प्रतिशोधगामिनी होती है। असहिष्णु व्यवहार से दुःखी हो वह उस व्यक्ति के साथी भी वैसा ही दुःखद व्यवहार कर बदला लेने की योजना बनाने लगता है। प्रतिक्रिया में असहिष्णुता-जन्य उद्वेग बढ़ता जाता है तथा विद्वेष की कष्टकारक, हानिमूलक परम्परा बढ़ने लगती है। परिणाम में सन्ताप और अशान्ति ही प्राप्त होती है।

रावण की विद्वता संसार-प्रसिद्ध है। उसके बल की तो थाह नहीं ही थी, वह एक महान बुद्धिमान, विचारक व्यक्ति भी था। किन्तु अपने अतिरिक्त औरों की विचार-धारा तथा रहन-सहन की पद्धति के प्रति उसमें सहिष्णुता नहीं थी। किसी और की विचार-शैली और जीवन-पद्धति उसकी दृष्टि में सही नहीं हो सकती थी। ऋषियों का उत्पीड़न उसने इस असहिष्णुता के कारण ही किया था। इससे चारों ओर उसके प्रति असम्मान-तिरस्कार घृणा की भावना ही दृढ़ होती गई। यह अहंकार उसके विनाश का कारण बना। असहिष्णुता का पर्यवसान अहंकार में ही होता है। असहिष्णु यदि निर्बल हुआ तो मन ही मन जलता-भुनता, क्षुब्ध होता रहता है। वह प्रत्येक क्षण अशान्त बना रहता है और तरह-तरह की मानसिक विकृतियों का शिकार बनता जाता है। विश्व में किसी एक व्यक्ति की ही इच्छा कभी भी नहीं चल सकती और न ही एक ही विचार की सर्वव्यापी स्वीकृति सम्भव है। अपने से भिन्न विचार और अपने से भिन्न इच्छा एवं व्यवहार को सहने की यदि मनःस्थिति न रही तो प्रत्येक क्षण क्लेश, अशान्ति, कटुता ही मन को बेधती-मथती रहेगी।

निजी जीवन में असहिष्णु व्यक्ति को सदैव अशान्त बना रहना पड़ता है। पारिवारिक जीवन तो सहिष्णुता के बिना चल ही नहीं सकता। परिवार में भिन्न-भिन्न सदस्यों की प्रवृत्तियों में विभिन्नता स्वाभाविक है। किसी एक को क्रीड़ा में विशेष रुचि है, तो दूसरे को संगीत ही जीवन का सार और आनन्द का स्रोत मालूम पड़ता है, तीसरे को साहित्य पुस्तकें ही सच्ची सहयोगिनी और जीवनाधार दिखाई पड़ती हैं, चौथे के लिए जीवन का अर्थ है गम्भीर वैज्ञानिक अध्ययन-अनुसंधान, पाँचवें के लिए दार्शनिक ऊहापोह का रस ही आनन्द का स्रोत है, छठवें को अनेक विषयों में समान रुचि है। एक ही विषय क्षेत्र में भी कम भिन्नता नहीं होती। कइयों को क्रिकेट में अत्यधिक रुचि होती है, तो दूसरे क्रिकेट के नाम से चिढ़ते हैं और हाकी-जिम्नास्टिक आदि में रस मग्न रहते हैं। तो भी परिवार में इन रुचि-भिन्नताओं के कारण कलह उत्पन्न नहीं होती। सहिष्णुता और पारस्परिक स्नेह, सम्मान की भावना ही पारिवारिक सुव्यवस्था को बनाए रखती है।

समाज तो सहिष्णुता के बिना चल ही नहीं सकता। सहिष्णुता न हो तो मैत्री का भी निर्वाह नहीं हो सकता। मित्र एक दूसरे की खूबियों, अच्छाई में ही सहयोगी नहीं होते, कमजोरियों के प्रति भी सहिष्णु रहते हैं। यह सहिष्णुता दोष-दुर्बलता से समझौते के लिए नहीं होती, अपितु उसके दूर हो सकने के विश्वास के कारण होती है।

इस प्रकार सहिष्णुता, दुर्बलता या कायरता नहीं है। वह उदात्त मनोभूमि और शक्तिशाली व्यक्तित्व का अभिन्न अंग है। जिसमें मानवीय रुचियों, इच्छाओं एवं प्रयोजनों की विविधता की स्वीकृति

तथा शिवत्व के प्रति अविचल आस्था का समावेश रहता है।

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