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Magazine - Year 1977 - Version 2

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सूक्ष्म जीवों की दुनिया में प्रवेश को मानवी प्रयत्न

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बड़ी आकृति वाले थलचर प्राणियों से ही हमारा परिचय है। इससे आगे भी कहीं जीवधारियों का अस्तित्व है और उनकी भी कोई अपनी दुनिया है इस तथ्य की बहुत कम लोगों को जानकारी होती है। पृथ्वी पर रेंगने वाले प्राणियों की कितनी अधिक जातियाँ और उप-जातियाँ हैं-उनकी आकृति-प्रकृति क्या है? उनके सोचने और करने का उपक्रम क्या है? उन्हें किन साधनों से गुजारा करना पड़ता है और किन परिस्थितियों में रहना पड़ता है, इसकी जानकारी रखना तो दूर ठीक तरह कलपना कर सकना भी हमारे लिए सम्भव नहीं।

हमारी चेतना मानवी मस्तिष्क-परिस्थिति एवं साधनों के अनुरूप ढली है, अस्तु उसे जो सीमित दृष्टिकोण एवं ज्ञान मिला है उसी को लेकर काम चलाना पड़ता है फिर अन्य प्राणियों की विलक्षण दुनिया के बारे में सही कल्पना कर सकना कैसे सम्भव हो। यही बात जानकारियों के सम्बन्ध में भी है। आँखों से देखे जा सकने वाले जल जीवों की जानकारी-उतनों तक ही सीमित है जो आँखों के सामने आते और अपना परिचय देते रहते हैं समुद्र तल में ही निर्वाह करने वाले जल जीवों की नगण्य जितनी जानकारियाँ ही है। उनकी प्रकृति और परिस्थितियों का पता लगाने के लिए जैसा चिन्तन चाहिए-जैसे उपकरणों और साधनों की आवश्यकता है उन्हें जुटाना अन्तरिक्ष यंत्रों से भी कठिन सिद्ध होगा। इतने पर भी यह तथ्य है कि अपनी धरती की ‘दुनिया’ उतनी छोटी नहीं है जितनी कि मनुष्यों द्वारा सोची और जानी गयी है। इसी धरती पर असंख्य जाति के जीवधारी निवास करते हैं। उनकी संख्या भी इतनी बड़ी है कि तुलनात्मक दृष्टि से 400 करोड़ मनुष्यों का संख्या बल बहुत ही नगण्य एवं उपहासास्पद प्रतीत होगा। संख्या बल के अतिरिक्त उनकी प्रकृति, आवश्यकता, पारस्परिक सहयोग व्यवस्था, निर्वाह, विनोद, वंशवृद्धि, प्रसन्नता, आयुष्य आदि की परिस्थितियाँ इतनी विचित्र मिलेंगी जिन्हें देखते हुए उन्हें मनुष्यों की ‘दुनिया’ से सर्वथा भिन्न एवं विलक्षण स्तर की कहा जा सकता है। प्राणियों की, असंख्य स्तर की चित्र-विचित्र दुनिया बसी हुई है। असंख्य सभ्यताएँ फल-फूल रही हैं। असंख्य जीवन विधाओं का कार्यान्वयन हो रहा है किन्तु हम अपनी ही दुनिया तक सीमित हैं और उस सीमित क्षेत्र को ही सब कुछ मानकर मूर्खों की दुनिया में रहने की उक्ति चरितार्थ कर रहे हैं।

सत्रहवीं सदी के उत्तरार्ध में वैज्ञानिक ऑनोफाल्यूवेनाक ने सूक्ष्म जीवों को स्वनिर्मित लैन्सों से देखा। उन्नीसवीं शताब्दी में लुई पास्टर ने सूक्ष्म जीवों की दुनिया की जानकारी प्राप्त कर उनकी भूमिका को प्रयोग द्वारा दिखाया। फिर यह सिलसिला बढ़ता ही गया। कोरव, मैक्निरवोव, फिनले, फ्लेमिंग द्वारा विकसित सूक्ष्म जीव विज्ञान आज विशाल अध्ययन-अन्वेषण का क्षेत्र बना है।

सूक्ष्म जीव इतने छोटे होते हैं कि आँखों से उन्हें नहीं देखा जा सकता। पास-पास रखने पर साधारणतः 25 हजार सूक्ष्म जीव एक इंच की जगह में समा जाएंगे। इनकी आकृति और वजन दोनों के आधार पर कई जातियां हैं। सामान्यतः बीज अरब सूक्ष्म जीवियों का वजन एक खस-खस के दाने के बराबर होता है।

सूक्ष्मजीवी प्रत्येक जगह पर मिलते हैं। यहाँ तक कि ये ऐसे स्थानों पर भी पाए गए हैं, जहाँ जीवन की कोई सम्भावना नहीं मानी गई थी। पृथ्वी के वायुमण्डल की ऊपरी तह में, दक्षिणी ध्रुवों की बर्फ में, गर्म स्रोतों के खौलते प्रवाह में, नाभिकीय रिएक्टरों की शीतलन प्रणालियों में भी इन्हें पाया गया है।

‘मृत सागर’ से साफ पानी तक, स्तनपाइयों की आँतों से लोहे के जमींनदोज नलों की सतहों तक इनका बोलबाला है। प्रतिदिन अनेक सूक्ष्मजीवी हमारे शरीर के भीतर नाक और मुँह के रास्ते घुसते हैं। वे हमारी त्वचा पर भी विहार करते हैं।

इन सूक्ष्म जीवियों की असंख्य जातियाँ हैं। कुछ सूक्ष्मजीवी अम्लीय माध्यम में रहते हैं, तो कुछ क्षारीय। कुछ ऊँचे तापक्रम पर, तो कुछ नीचे तापक्रम पर। कुछ हवा के बिना नहीं जी सकते, तो कुछ हवा में ही नहीं जी सकते, बिना हवा के मजे में रह लेते हैं। यह माध्यम क्या है? जीवाणु जिस वस्तु में जन्म लेते, पलते-पनपते हैं, वही उनका माध्यम है। ये छोटे इतने होते हैं कि किसी भी द्रव माध्यम के एक धन सेन्टीमीटर में लगभग 1 करोड़ जीवाणु आराम से रह लेते हैं। जिस माध्यम में ये जीवाणु रहते हैं,उसी से आहार प्राप्त करते हैं। उसी माध्यम में ये बढ़ते, बच्चे पैदा करते और बलवान बनते हैं।

इनके बढ़ने और बच्चे पैदा करने का ढंग दिलचस्प है। प्रत्येक जीवाणु एक कोशिका भी है और एक जीव भी। इसीलिए यह कोशिकीय जीव कहलाता है। एक सूक्ष्मजीवी थोड़ा-सा लम्बा होकर स्वयं दो भागों में विभक्त हो जाता है। ये दोनों ही भाग मूल कोशिका के ही समान दो पृथक् सूक्ष्मजीवी बन जाते हैं। इनकी बढ़ने की रफ्तार भी गजब की होती है। एक सूक्ष्मजीव चौबीस घण्टे में 70 पीढ़ियां पैदा कर सकता है। पिषूचिका का एक सूक्ष्मजीवी एक दिन में 4 अरब 80 करोड़ की संख्या में हो जाता है। तभी तो इस रोग के अधिकाँश रागी देर होने पर बच नहीं पाते। पोपक माध्यम की कुछ ही बूँदों में सूक्ष्मजीवियों की 7 अरब आबादी का आवास सम्भावित होता है। एक सूक्ष्मजीवी द्वारा स्वयं को दो भागों में बाँटकर फिर पृथक्-पृथक् यही क्रम अपनाते हुए बढ़ते जाने के कारण इनकी वंश वृद्धि की क्रिया को ‘विखण्डन-क्रिया द्वारा वंश-वृद्धि’ कहा जाता है।

सूक्ष्मजीवियों की विविध जातियाँ हैं। सूक्ष्मजीवियों की ही तरह सरलतम जीवधारी ‘वायरस’ (विषाणु) होता है। वायरस अपने आप में एक कोशिका नहीं होता। इसमें केवल कभी आर॰ एन॰ ए॰। वायरस भी अपने से अपने जैसी अनन्त प्रतिकृतियाँ पैदा कर सकते हैं, पर वे यह कार्य परपोषी केशिका के अन्दर ही कर सकते हैं जीवाणुओं की किस्मों की विविधताओं तथा व्यवहार की भिन्नताओं के कारण ही सूक्ष्म जीव विज्ञान की आत अनेक शाखाएँ है। ‘वायरालाजी’ संक्रामक रोगों के जीवाणुओं का अध्ययन करती है। निराग विज्ञान के अंतर्गत संक्रामक राग के जीवाणु जिन जीवों पर आक्रमण करते हैं, उनकी प्रतिक्रिया का अध्ययन किया जाता है, जानपदिक रोग विज्ञान के अंतर्गत रोगोत्पादक सूक्ष्मजीवों के जीवन, विकास, विस्तार और बिहार तथा इनके चेभोथेरेपी में सूक्ष्मजीवों के विनाश के साधनों का अध्ययन होता है। आदि आदि।

प्रयोगशाला में सूक्ष्मजीवियों की विभिन्न नस्लें जिस पदार्थ में पैदा की जाती है, उस पदार्थ को ‘सम्वर्धन-माध्यम’ कहा जाता है। इन सम्वर्धन-माध्यमों में सहभागी जीवाणु-समूह पैदा कर जीव रासायनिक प्रतिक्रियाओं का अध्ययन होता है। जीवाणु खाद्य के रूप में जिस पदार्थ का उपयोग करत हैं,वह पचकर रूपांतरित हो जाता है, इसे ही ‘चयापचित’ होना कहते हैं।

जीवाणुओं की प्रत्येक नस्ल एक दूसरे से भिन्न होती है। इस भिन्नता का कारण जिस खाद्य का जीवाणु प्रयोग करते हैं,जिन पदार्थों का वे विच्छेदन करने में समर्थ होते हैं और रासायनिक ऊर्जा स्रोत अथवा सूर्य से वे जो ऊर्जा प्राप्त करते हैं, उनकी मात्राओं की भिन्नताएँ होती है। क्यों कि खाद्य-पदार्थ वह ऊर्जा की मात्रा संयोग हर बार भिन्न-भिन्न सम्भव है,इसीलिए जीवाणुओं की नस्लें भी परस्पर भिन्न होती है।

दाल, रोटी, साग आदि का स्वाद बिगड़ जाना, दूध का खराब हो जाना, रोटी में फफूँदी आ जाना, अचार वगैरह में फफूँदी लग जाना इन सबका कारण सूक्ष्मजीव ही होते हैं। ताजे सन्तरे का रस निकाल कर खुली हवा में रख दें, तो दो दिन में खराब हो जाएगा। कृपा इन्हीं सूक्ष्मजीवियों की। यदि वही रस बोतल में इस युक्ति के साथ रख दिया जाए, कि वहाँ सूक्ष्मजीवी हवा के साथ पहुंच न पाएँ, तो वह महीनों बाद भी वैसा ही ताजा निकलेगा अब तक मनुष्य के सहायकों में श्रम, दूध बाल, चर्म माँस आदि देने वाले प्राणियों की गणना होती थी और वनस्पति वर्ग को छाया, अन्न शाक, फल, फल, लकड़ी आदि देने वाले सहायकों में गिना जाता था। प्राणियों और वनस्पतियों के सहारे ही मानव जीवन की गाड़ी घिसटती दिखाई देती थी, अब सहायकों के वर्ग में सूक्ष्मजीवों की एक नई जाति सम्मिलित हुई है। विज्ञान ने धरातल की दूरी को ही समीपता में नहीं बदला है,वरन् प्राणियों के बीच की दूरी को भी घसीट कर एकता में परिणत कर दिया है। अब सूक्ष्म जीव हमारे लिए पशु और वृक्ष वनस्पतियों से भी अधिक उपयोगी एवं सहायक सिद्ध होने जा रहे हैं।

सतर्कता तो मित्रो से रखनी पड़ती है। अनियंत्रित और अव्यवस्थित छोड़ देने पर तो सुई भी काँटे का काम करेगी और संकट में फँसा देगी। संक्रामक रोग कीटकों की हानि को ध्यान में रखते हुए उनसे सुरक्षा का प्रबन्ध भी करना होता है और उनके मारण निवारण का सरंजाम भी जुटाना होता है। इतने पर भी समूची सूक्ष्म जीवों की दुनिया हमारे लिए शत्रु का नहीं मित्र का ही काम करती है और निकट भविष्य में उनकी सहायता से भारी हित साधना हो सकने की अपेक्षा है।

संक्रामक रोगों की भयानकता प्रसिद्ध है। तपेदिक, प्लेग, मोतीझरा, हैजा, इन्फ्लुएंजा, चेचक, डिप्थीरिया, कुकरखाँसी, टेट्नस, अधरड आदि अनेक संक्रामक यानी छूत के रोग है संक्रामक रोगियों से दूर रहन की सलाह इसी आधार पर दी जाती है। छोटे-छोटे कृमि होते हैं। इन्हें बैक्टीरिया या सूक्ष्मजीव अथवा जीवाणु कहते हैं। विषाणुओं से डरना और सतर्क रहना उचित है, पर यह भी ध्यान में रखा जाना है कि सूक्ष्म जीवियों की अधिकाँश जातियाँ हमारी शत्रु नहीं मित्र है। वे अनायास ही हमें बहुत लाभ पहुँचाती हैं, पर जब उनका सहयोग विधिवत् आमन्त्रित किया जायगा तब तो वे अपनी मित्रता का उससे भी बड़ा परिचय देंगी जैसा कि अब तक उपयोगी प्राणियों और वनस्पतियों का मिलता रहा है।

गठिया तथा अन्य सूजन वाले रोगों के इलाज के लिए उड्रेनल हारमोन की जरूरत पड़ती है। वृद्धावस्था में विशेषकर और विशिष्ट जरिस्थितियों में किसी भी उम्र में, प्रतिस्थापन-चिकित्सा में पुरुष तथा स्त्री को नव-शक्ति देने के लिए हारमोन जरूरी होते हैं।

मनुष्यों तथा पशुओं में शारीरिक ऊतकों के विकास के लिए भी हारमोन जरूरी होता है। शल्य-चिकित्सा के समय ऊतकों को जो क्षति पहुँचती है, उन्हें पुनर्लाभ के लिए प्रेरित करने हेतु मनुष्य को इन हारमोनों की वृद्धि हेतु हारमोन दिये जाते हैं। परिवार नियोजन हेतु निरोधक गोलियाँ बनने के लिए हारमोन जरूरी होते हैं।

इन हारमोनों का प्राप्त करना अब तक बहुत ही कठिन था। हाल ही में सूक्ष्म जीव विज्ञान के क्षेत्र में हुई खोज ने इसे सरल बना दिया है। एक ऐसे जीवाणु-समूह तथा रासायनिक की खोज की गई है, जिनके गुणों के कारण एन्ड्रोस्टान नामक पदार्थ का उत्पादन सम्भव हो सका है। इस एन्ड्रोस्टान को आसानी से रुढ हारमोनों में बदला जा सकता है। इस प्रक्रिया के औद्योगीकरण से ऊपर लिखे सभी हारमोन सुलभ हो सकेंगे।

इसी तरह अभी तक भेड़ की ऊन की यसा में से कोलेस्टरोल नामक एक पदार्थ प्राप्त कर उसे रुढ हारमोनों में बदला जाता था। पर परम्परागत रासायनिक विधियों से इस कोलेस्टरोल को हारमोनों में बदलना बहुत कठिन होता था। कुछ समय पूर्व ऐसे सूक्ष्मजीवी खोज निकाले गये है, जो कोलेस्टरोल को हारमोनों में बदलने में मददगार सिद्ध होंगे।

इससे एक बड़ा फायदा होगा परिवार नियोजन की निरोधक गोलियों के सुलभ होने तथा उनकी अंधाधुंध मूल्य-वृद्धि रुकने का। ये गोलियाँ मैक्सिको तथा मध्य अमरीका के पहाड़ी इलाकों में उगने वाली अरबी से निकाले जाने वाले एक रासायनिक पदार्थ से बनने वाले दो रूढ़ हारमोनों से बनती हैं। इस पदार्थ का वार्षिक उत्पादन लगभग 700 टन प्रतिवर्ष होता है, किन्तु जिन जंगली पौधों से ये निकाला जाता है, वे बड़ी मात्रा में चुन लिए गये हैं, जब उनकी पैदावार देर से तथा कठिनाई से होती है। इससे इनका मूल्य लगातार बढ़ रहा था। अब कोलेस्टरोल के रासायनिक परिवर्तन हेतु सहायक सूक्ष्म जीवियों की खोज से यह समस्या सुलझी है।

इसी तरह विश्व-खाद्य समस्या के समाधान में भी सूक्ष्मजीवी सहायक सिद्ध हो सकते हैं। प्रतिवर्ष बढ़ने वाली 7 करोड़ की आबादी को 20 लाख टन अतिरिक्त प्रोटीन चाहिए। इसके लिए 4 करोड़ हेक्टेयर अतिरिक्त जमीन पर सोयाबीन की खेती की जरूरत पड़ेगी। जबकि एक कोशिकीय प्रोटीन के व्यापार पैमाने पर उपयोग करने पर 200 घन मीटर धारिता वाले दो हजार टैंक बीस लाख इन अतिरिक्त प्रोटीन सूक्ष्मजीवियों की सहायता से तैयार करने के लिए काफी होंगे। इस विधि से इस 20 लाख टन पर्याप्त होगी। सोयाबीन उत्पादन की वर्तमान विधि द्वारा इतने ही प्रोटीन के उत्पादन हेतु वाँछित भूमि का यह चार करोड़वां हिस्सा है।

इसी तरह औद्योगिक प्रक्रिया से काफी मात्रा में बनने वाले कूड़े का उपयोग प्रोटीन बनाने तथा बढ़ाने में किया जा सकता है-सूक्ष्मजीवियों की सहायता से। यदि विश्व के वर्तमान तेल उत्पादन से उपलब्ध संपूर्ण पैराफिन को प्रोटीन में बदल दिया जाए, तो लगभग 70 करोड़ टन प्रतिवर्ष का उत्पादन होगा।

दुनिया का 10 प्रतिशत दूध प्रतिवर्ष पनीर बनाने के काम आता है। इस प्रक्रिया में प्रोटीन जमाने के लिए दुधमुँहे बछड़े के पेट से प्राप्त होने वाले एक किण्वाणुओं को जिसका नाम है-रेन्नेट, मिलाना जरूरी होता है।

इस रेन्नेट के लिए पहले प्रतिवर्ष 4 करोड़ बछड़ों का वध किया जाता था। पिछले 15 वर्षों में तो पनीर उत्पादन खूब बढ़ा। फिर रेन्नेट की कमी का सामना करना पड़ गया। सूक्ष्म जीव विज्ञानियों ने फफूँदी के विलगन से रेन्नेट की तरह के किण्वाणुओं के उत्पादन की विधि खोजी। इससे केवल एक ग्राम तैयार पदार्थ, 700 किलोग्राम पनीर बनाने को पर्याप्त होता है। एक सूक्ष्मजीवी ने डेयरी-उद्योग को इस तरह सहायता दी है।

विभिन्न प्रकार के दूषणों के लिए सूक्ष्मजीवी जिम्मेदार माने जाते रहे हैं किन पर्यावरण की सफाई में भी सूक्ष्मजीवों की उतनी ही प्रमुख भूमिका है। गन्दे द्रव की सफाई की मोटे तौर पर तीन विधियाँ है-क्रियाशील, कीचड़-विधि, निस्पन्दन तथा किण्वीकरण। तीसरी विधि में सूक्ष्मजीवियों की भूमिका प्रमुख है। तीसरी विधि मौथेन-किण्वीकरण में एक विशेष प्रकार के जीवाणु कार्बोनिक गन्दगी को कार्बोनिक अम्लों में बदल देते हैं। उसके बाद मीथेन-जीवाणु कार्बोनिक अम्लों को मीथेन तथा कार्बनडाइ-आक्साइड में बदल देते हैं। इस विधि में गति मन्द होती है। पर लाभ यह है कि गन्दगी की ऊर्जा का 80 प्रतिशत अधिक मीथेन के रूप में मिल सकता है। इस तरह सूक्ष्मजीव दुनिया की एक और बड़ी समस्या के समाधान में सहायक हो सकते हैं।

लाइसीन उन तीन अनिवार्य अमीनो अम्लों में से एक है, जो अनाज में नहीं होते। गेहूँ या मक्का में मात्र 1/4 यानी 0.25 प्रतिशत लाइसीन मिलाने पर आटे का जैवीयमान बढ़कर दूध के बराबर हो जाता है। पशुओं को भी चारे के साथ दिये जाने पर जाइसीन बहुत लाभ पहुँचाता है।

सूक्ष्म जीवों की सहायता से अनाज के खाद्यान्न को भी बढ़ाया जा सकता है। मनुष्य के लिए 20 में से 9 अमीनो अम्ल आवश्यक हैं। अन्न प्रोटीन पशु प्रोटीनों से घटिया होते हैं, अतः इनमें कुछ अमीनो-अम्लों की कमी होती है।

व्यावसायिक पैमाने पर सूक्ष्मजीवों की सहायता से अमीनो अम्लों को उत्पादन किया जा रहा है। साथ ही जापानी सूक्ष्मजीव विज्ञानियों ने ग्लूनेटिक अम्ल तैयार करने वाला जीवाणु ढूंढ़ निकाला है। प्रदीपन से यही जीवाणु एक उत्परिवर्ती पैदा करता है, जो लाइसीन नामक पदार्थ के बड़े पैमाने पर उत्पादन में सहायक होते हैं।

ऐसे स्वादहीन विभिन्न खाद्य पदार्थ जो विश्व में उपलब्ध है, पर अभी खाद्य प्रयोग में नहीं आते, उन्हें स्वादिष्ट बनाने में भी सूक्ष्मजीवियों की मदद जरूरी है।

इस तरह पर्यावरण-प्रदूषण की समस्या और विश्व खाद्य समस्या, विश्व की इन दो सबसे बड़ी समस्याओं के समाधान में सूक्ष्मजीवियों की महत्वपूर्ण भूमिका है। आबादी की सर्वाधिक महत्वपूर्ण समस्या के क्षेत्र में भी परिवार नियोजन-निरोधक गोलियों के निर्माण में इनके विशिष्ट योगदान है। मनुष्य को निरोगी बनाने हेतु उपचारों- औषधियों के निर्माण में भी इनकी अनिवार्यता है। ऊर्जा की समस्या में भी उनकी सहायता समाधान कारक सिद्ध होगी।

विकास तथा प्रौद्योगिक प्रगति में प्रायोगिक सूक्ष्म जीव विज्ञान की विशिष्ट भूमिका है। कृषि, कोशिकीय, आग्विक, आनुवंशिक तथा विकिरण जीव वैज्ञानिक अनुसन्धान इसकी शाखाएँ हैं। उद्योग, अभियान्त्रिकी एवं औषध क्षेत्रों में इसके प्रभावी परिणाम, सामने आये है।

एक पूर्ण-पोषित मनुष्य अपने जीवन में पानी और आक्सीजन के साथ-साथ बड़ी तादाद में कार्बोहाइड्रेट और प्रोटीन ग्रहण करता है। इनका उत्पादन सूक्ष्मजीवों पर ही निर्भर करता है। पानी को प्राकृतिक रूप से शुद्ध कौन करता? सूक्ष्मजीव।

जन्तु और पौधों के मरने के बाद सूक्ष्मजीव इन्हें अपघटित करते हैं। अन्यथा पर्यावरण में दूषण ही फैले। एक आदमी अपने सम्पूर्ण जीवन में जितना कूड़ा बनाता है, उसी से एक पहाड़ बन जाए, यदि सूक्ष्मजीव उन्हें अपघटित करके प्रकृति-चक्र में दुबारा न डाल दें।

इसके साथ ही सूक्ष्म जीव विज्ञान नाइट्रोजन में बदलने की क्षमता के विकास की भी कोशिश कर रहे हैं। जिससे गन्दे पानी के पौधों और खेती के नाइट्रेट द्वारा नदियों-झीलों में फैल रही सड़न समाप्त की जा सकेगी।

यह आशा भी है कि कई सूक्ष्मजीवों का उच्च जीवों में आनुवंशिक रूपांतरण सम्भव होगा, इससे कुछ मानवीय किण्वाणु कमियाँ पूरी की जा सकेंगी। दालों की जड़ों में रहने वाला नाइट्रोजन-उत्पादन सूक्ष्मजीवों को यदि सामान्य अनाज की जड़ों में संयुक्त किया जा सका तो इससे भी आर्थिक एवं सामाजिक लाभ होगा, क्योंकि इन अनाजों का खाद्यामान इससे बढ़ जाएगा।

इस तरह विज्ञान आज सिर्फ बाह्य अन्तरिक्ष की चुनौतियों में ही नहीं उलझा है, बल्कि वह आन्तरिक अन्तरिक्ष की इन चुनौतियों से भी जूझ रहा है, जहाँ हमारे सम्पूर्ण जीवन को प्रभावित करने वाले अदृश्य रूपाकृति वाले अनन्त सूक्ष्मजीवों और सूक्ष्मतर हलचलों का विराट संसार है, महाकदि गेटे के शब्दों में कहें तो इस अंतरिक्ष को सिर्फ “देखना” पर्याप्त नहीं उसे “जानना” भी जरूरी है।

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