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Magazine - Year 1977 - Version 2

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तपश्चर्या से प्रसुप्त शक्तियों का जागरण

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First 19 21 Last
प्रसुप्त स्थिति में हमारी क्षमताएं मूर्छित पड़ती है और लगता है कि हम साधन हीन दीन दरिद्र स्थिति में पड़े हुए है। मूर्छित स्थिति में ऐसी दुर्गति का होना स्वाभाविक है। कुम्भकरण की सामर्थ्य अकूत थी, पर वह छह महीने सोते रहने के कारण निर्जीव जैसी स्थिति में पड़ा रहता था। जिस दिन जागता था उसी दिन इतना पुरुषार्थ करता था कि आश्चर्यचकित रह जाना पड़े।हम सब एक प्रकार के कुम्भकरण ही है। अपनी सामर्थ्यों को न पहचान पाने और उनके जागरण एवं उपयोग पर ध्यान न देने के कारण ही हेय स्थिति में रहना पड़ रहा है। सुषुप्ति में पड़ा हुआ व्यक्ति मृतक तुल्य होता है। किन्तु जब वह जागृत होता है तो प्रबल पराक्रम का परिचय देता है।

आत्म विस्मृति की निद्रा से ग्रसित स्थिति में हम यह नहीं समझा पा रहे कि परमेश्वर का जेष्ठ पुत्र शक्ति और सामर्थ्य का पुंज है, सौरमंडल की समग्र सत्ता छोटे परमाणु में विद्यमान है। पुरे मनुष्य की सत्ता छोटे से शुक्राणु में सन्निहित रहती है। पूरे वृक्ष की सत्ता छोटे से बीज में भरी रहती है। प्रश्न जागृति का है। अणु परमाणुओं की नगण्य सी सत्ता तुच्छ और उपहासास्पद है, पर जब उनमें से एक कण भी जागृत स्थिति में पहुँच सके तो उसके विस्फोट से प्रलय का छोटा रूप उपस्थित हो जाता है। जागृति और सुषुप्ति का अन्तर स्पष्ट है।

व्यक्ति की चेतना को जागृत करने के लिए उसे तपाने, गरमाने की आवश्यकता पड़ती है। सूर्य की गर्मी से पौधे बढ़ते और फलते फूलते हैं। शीत की अधिकता से तो वृक्षों के पत्ते तक झड़ जाते हैं। जिन दिनों सूर्य की गर्मी न्यून रहती है उन दिनों वनस्पतियों का विकास रुक जाता है। सर्दी से ठिठुरे हुए हाथ कुछ अधिक काम नहीं कर पाते। गर्मी पाते ही हाथ पैर खुलते है-काम करने को जी चाहता है ओर कुछ करते धरते ही बन पड़ता है। सर्दी में तो साँप, रीछ जैसे कितने ही प्राणी गहरी नींद में चले जाते हैं और निष्क्रिय स्थिति में पड़े रहते हैं।

भोजन पकाने के लिए चूल्हा गरम करना पड़ता है। उसकी सुविधा न हो तो खाया पदार्थ प्रचुर परिणाम में होते हुए भी वे खाने और पचने योग्य न बन सकेंगे। कल कारखानों की दैत्याकार मशीनें बहुमूल्य एवं प्रचुर उत्पादन करती है, पर उनकी कार्य क्षमता ईंधन के आधार पर ही गतिशील होती है। भाप, कोयला, तेल, बिजली जैसे ईंधन न मिले तो मशीनें ठप्प पड़ी रहेगी और उनसे कुछ भी लाभ न उठाया जा सकेगा। अग्नि की गर्मी की आवश्यकता हर क्षेत्र में पग पग की अनुभव की जाती है।

मानवी विकास के लिए तप साधना का अत्यधिक महत्व है। इस गर्मी को उत्पन्न किये बिना व्यक्ति मूर्छित स्थिति में पड़ा रहता है। उसकी ईश्वर प्रदत्त क्षमता निरर्थक, निर्जीव एवं अविज्ञात रूप में पड़ी रहती है। किसी भी क्षेत्र में प्रगति की जाय उसके लिए गतिशीलता की अनिवार्य आवश्यकता पड़ेगी। इसके लिए ऊर्जा जुटानी ही पड़ेगी। उसका उत्पादन गरमी लाने से ही सम्भव होता है। पैट्रोल, डीजल, मिट्टी का तेल तभी अपनी शक्ति का परिचय देते हैं, जब उनके साथ अग्नि का संयोग होता है। कोयला और पानी दोनों रहने पर भी तब तक भाप नहीं बन सकती जब तक कि आग का संयोग न हो। चूल्हा हो या दीपक उन्हें प्रज्वलित करने के लिये आग की चिनगारी तो चाहिए ही। यही ऊर्जा उत्पादन मानवी क्षमताओं को विकसित करने के लिए भी आवश्यक होता है। शरीर और मन को इसी आधार पर सक्षम समुन्नत बनाना पड़ता है।

लौकिक जीवन में भौतिक उपलब्धियों के लिए व्यक्ति की प्रखरता उभारनी पड़ती है। शरीर से श्रम करने पर उसकी पुष्टि अक्षुण्ण रहती है और आवश्यक उपार्जन भी सम्भव होता है। श्रमिक, कृषक आदि को शरीर का और साहित्यकार वैज्ञानिक आदि को मस्तिष्क का श्रम करना पड़ता है। क्षमता अभिवर्धन और अभीष्ट उत्पादन के लिए परिश्रम पुरुषार्थ किये बिना काम चल ही नहीं सकता। निष्क्रिय पड़े रहने पर तो ईश्वर प्रदत्त क्षमताएं चाहे कितनी ही बढ़ी चढ़ी क्यों न हो वे निर्जीव स्थिति में ही पड़ी रहेगी। संसार में जितने भी प्रगतिशील मनुष्य हुए हैं उनमें से प्रत्येक को अपने अपने क्षेत्र में, अपने अपने ढंग का कठोर श्रम करना पड़ा है। जिसने इस संदर्भ में उपेक्षा बरती वह अविकसित, हेय ओर गई गुजरी, दीन दरिद्र स्थिति में ही जीवन गुजारता रहा है। परिश्रम ही धन है। प्रगति की प्रत्येक सम्भावना उसी के आधार पर बनती है। इस तथ्य को जो जानते हैं वे आरम्भ से ही अपनी अभिरुचि कठोर श्रम करने में जुटाये रहते हैं। अनिवार्य विश्राम के अतिरिक्त उन्हें आलसियों जैसा आराम सचमुच ही हराम लगता है। प्रगतिशीलता श्रम निष्ठा पर निर्भर है। परिश्रम और पुरुषार्थ की प्रवृत्ति को सामान्य जीवन की तपश्चर्या ही कहा जाता है। जीवन देवता को परिश्रम और मनोयोग की साधना द्वारा जिसने प्रसन्न किया है उन्होंने संसार में एक से एक बढ़ी चढ़ी सफलताएं प्राप्त की हैं।

आध्यात्मिक जीवन में भी यही तथ्य काम करता है। मानवी अन्तराल में एक से एक बढ़ी चढ़ी विभूतियाँ विद्यमान है। पर वे सभी प्रायः प्रस्तुत स्थिति में पड़ी रहती है। यदि उनकी ओर ध्यान चला जाय-उनका महत्व समझा जाय और जीवन्त बनाने के लिए साहस जुटाया जाय तो गई गुजरी स्थिति में पड़ी चेतन सत्ता का असाधारण विकास हो सकता है। विकसित व्यक्तित्व साधन विहीन परिस्थितियों में भी ऊंचा उठता है। प्रतिकूलताओं को अनुकूलता में बदल लेना सुसंस्कृत लोगों के लिए कुछ भी कठिन नहीं होता। वे अपनी प्रामाणिकता एवं उत्कृष्टता के आधार पर दूसरों को अत्यधिक प्रभावित करते हैं। आदर्शों के प्रति प्रगाढ़ श्रद्धा, विश्वास रखने वाले और उसी रीति नीति को अपनाकर जीवन जीने वाले व्यक्ति सहज ही लोकश्रद्धा का सम्पादन कर लेते हैं। उन पर सर्वत्र विश्वास किया जाता है। फलतः सहयोग की आयाचित वर्षा होने लगती है। जिनने ऐसी स्थिति प्राप्त कर ली उनके लिए प्रगति का पथ सहज ही प्रशस्त होता चला जाता है।

चेतना पर पशु प्रवृत्तियों के कुसंस्कारों की परतें चढ़ी रहती है। निम्न योनियों में से क्रमिक प्रगति करते करते जीव को मनुष्य योनी प्राप्त होती है। फिर भी पिछली निकृष्टता की छाया चेतना पर न्यूनाधिक मात्रा में छाई ही रहती है। इसका परिष्कार किये बिना जीवन का स्वरूप नर कीटकों नर पशुओं नर वानरों जैसा बना रहता है। स्पष्ट है कि मनःस्थिति के अनुरूप परिस्थितियाँ उपलब्ध होती है। भीतरी चुम्बकत्व हर अपने स्तर का वातावरण स्वयं ही बुनता विनिर्मित करता है। संपर्क क्षेत्र अपनी आन्तरिक स्थिति के अनुरूप बनता है और साधन भी प्रायः वैसे ही मिलते हैं। परामर्श और सहयोग भी वैसा ही मिलेगा जैसा कि अन्तःस्थिति ने अपना स्वरूप बना रखा है। आन्तरिक निकृष्टता ही आमतौर से हेय परिस्थितियों , दुर्गतियों और विपत्तियों का कारण होती है।

समुन्नत स्थिति प्राप्त करने के लिए सबसे पहला कदम अपनी भीतरी स्थिति को सुधारने से आरम्भ करना होता है। इस क्षेत्र में सुधार न किया जाय और सुखद परिस्थितियों की आकाँक्षा करते हुए साधन जुटाने के लिए भाग दौड़ की जाय तो उसमें कदाचित ही किसी को स्थायी सफलता मिलेगी। व्यक्तित्व हेय बनाये रखने वाले-निकृष्ट साधनोँ से धूर्ततापूर्वक सुखद परिस्थितियाँ पाने का ताना बाना बुनते हैं। प्रपंची और अपराधी व्यक्ति प्रायः इसी नीति को अपनाते हैं। पोल न खुलने तक उन्हें कुछ लाभ भी मिल सकता है, पर वास्तविकता प्रकट होने पर वे दूध में से मक्खी की तरह निकाल फेंके जाते हैं और सामान्य से थोड़ा लाभ प्राप्त करते रहने की स्थिति को भी गँवा बैठते हैं।

उच्चस्तरीय स्थिति प्राप्त करने की महत्वाकाँक्षा पूरी करने का एक ही उपाय है कि अपनी अन्तः चेतना को परिष्कृत किया जाय। उस पर चढ़े कुसंस्कारों को निरस्त किया जाय और जिन मानवोचित सत्प्रवृत्तियों की न्यूनता है उन्हें पूरा करने के लिए प्रबल प्रयत्न किया जाय। इस परिवर्तन में-उखाड़ पछाड़ में अपने आपे के साथ कठिन संघर्ष करना पड़ता है। इस संघर्ष को सफलतापूर्वक लड़ सकने योग्य आत्मबल प्रचण्ड संकल्प शक्ति से ही सम्पादित किया जाता है। यह संकल्प शक्ति ही वह साधना है जिसके सहारे आत्म परिष्कार का उद्देश्य पूरा हो सकता है। इस सामर्थ्य को उपार्जित करने के लिए जो साधन काम में लाने पड़ते हैं उन्हें तप कहते हैं। आत्मिक प्रगति के लिए तप तितीक्षा की साधना करनी अनिवार्य रूप से आवश्यक होती है।

आत्मोत्कर्ष की साधना में-तप तितीक्षा का प्रमुख स्थान हैं। पूजा उपासना के विधि विधान एवं कर्मकाण्डों को ही सब कुछ मान बैठना पर्याप्त नहीं। जप, ध्यान आदि के क्रिया कलाप अति सरल है। उनमें न शारीरिक कष्ट उठाने पड़ते हैं और न मनोनिग्रह की आवश्यकता पड़ती है। मुख से कुछ शब्दों का उच्चारण और कर्मकाण्ड में प्रयुक्त होने वाले सस्ते उपकरणों के साथ साथ हाथों की थोड़ी सी हेरा फेरा इतनी महत्वपूर्ण एवं प्रभावशाली नहीं हो सकती कि उतने भर से दिव्य शक्तियों का अनुदान वरदान प्राप्त कर सकना सम्भव हो सके। इसके साथ साथ चेतना को गरम करने वाली तपश्चर्या का जुड़ा रहना नितान्त आवश्यक है। विलासी और शौक मौज का जीवन इंद्रियों को प्रसन्नता देता है, पर उसने अन्तरात्मा पर थकान चढ़ती है। सुविधा संपन्न जीवन क्रम अपनाने वाले व्यक्ति कदाचित ही आत्मिक प्रगति के मार्ग पर कुछ दूर चल पाते हों। तर्क की दृष्टि से शरीर सुविधा का समर्थन किया जा सकता है और आराम के अधिक साधन रहने पर कम थकान चढ़ने और अधिक काम होने का प्रतिपादन किया जा सकता है। किन्तु वस्तुस्थिति दूसरी ही है-स्वेच्छापूर्वक सदुद्देश्य के लिए अपनाई गई आमन्त्रित की गई कठिनाइयाँ अन्त क्षेत्र में अद्भुत तेजस्विता भरती है। यदि ऐसा न होता तो साधु और ब्राह्मणों को अपरिग्रही, तपस्वी, कष्टसाध्य, जीवन जीने की आवश्यकता न पड़ती। तब वे लोग भी अधिक सुविधा मिलने पर अधिक सेवा कार्य बन पड़ने के तर्क उपस्थित करते। ऐसी दशा में उनके संपन्न शिष्य अनुयायी उनकी सुविधा के लिए अपने से भी अधिक साधन जुटा देते।

तपस्वी और विलासी जीवन के अन्तर स्पष्ट है। तप साधना से आत्मिक प्रखरता उभरती है जब कि विलासिता अपनाने पर वह दिन दिन क्षीण और कुण्ठित होती चली जाती है। साधना अनुष्ठान की प्रखरता एवं सफलता इस बात पर निर्भर है कि साधक ने उस अवधि में अपने को कितना तपाया-कितना गरम किया। साधना औजार है और तपस्या उसे चलाने वाली शक्ति ऊर्जा। तपश्चर्या से कतराने वाले-विलासिता अपनाये रहकर ज्यों ज्यों भजन पूजन करते रहने वाले-कुछ तो पाते भी है, पर वह होता अत्यन्त स्वल्प है।

कच्चा मिट्टी मिला लोहा भट्टी में तपाये जाने पर ही शुद्ध लोहा बनता है। खदान से निकली प्रायः सभी धातुएं ऐसे ही मिट्टी मिश्रित होती हैं उन्हें शुद्ध करने का एकमात्र तरीका भट्टी में तपना ही है। अधिक अग्नि संस्कार करने पर ही धातुओं की भस्में बनती है ओर वे बहुमूल्य रसायन का काम देती है। सोने के खरे खोटे होने की परीक्षा तो अग्नि में तपाने से ही सम्भव होती है। दूध को तपाने से मलाई और घी निकलते हैं।कच्ची मिट्टी के बरतनों और ईंटों को तपाने से भी उनमें मजबूती आती है। पानी को गरम करने से भाप की शक्ति उत्पन्न होती है। सूर्य ताप से हिमाच्छादित चोटियाँ पिघल कर नदी के रूप में बहती है और उन नदियों से शोभा, सुविधा उपलब्ध होती है। समुद्र मंथन में देवता और दैत्यों ने मिलकर समुद्र जल को गरम किया था और उसमें से 14 बहुमूल्य रत्न निकाले थे।

तपश्चर्या की उपलब्धियों का वर्णन विवेचन करते हुए शास्त्रकारों ने कहा है कि ईश्वर भी तप के प्रभाव से ही इस सृष्टि की रचना में समर्थ हुआ है। मनुष्य के लिए तो अभीष्ट उपलब्धियों के लिए भी तप ही एकमात्र मार्ग है-

यः पूर्व तपसो जातमदभ्यः पूर्वमजायत गुहा प्रविश्य तिष्ठान्त यों भूतेभिर्व्यपश्चता एतद्वैतत्

उस परमेश्वर ने सर्व प्रथम तप किया। उस तप के श्रम स्वेद से जल उत्पन्न हुआ।

सोडकामत। बहुस्याँ प्रजायेयेति। स तपोडतप्यत। स तपस्वप्त्वा इद सर्वमसृजत यदि कि च सत्सृष्टवा तदेवानुप्राविशित -तैत्तिरीय ब्रह्मावल्ली

उस परमात्मा ने प्रकट होने की इच्छा की। इसके लिए तप किया। तप की शक्ति से जगत रचा और फिर उसी में प्रविष्ट हो गया।

अवीहि भगवों ब्रह्रोति। त होवाच ब्रह्म विजिज्ञासस्व तपो ब्रहयेति स तपोडतप्त्वा -तैत्तिरीय भृगुवल्ली

भृगु ने कहा- ब्रह्म का ज्ञान कराइए। तब वरुण बोले- तप के द्वारा ब्रह्म को जानो। तप ही ब्रह्म है। यह सुनकर भृगु तप करने चले गये।

तपश्चचार प्रथमममराणाँ पितामहः आवर्भूतास्ततो वेदाः साडोंगपाँगपदक्रमाः -मत्स्य पुराण।

देवों के पितामह ने सबसे प्रथम तो तपश्चर्या की थी। इसके अनन्तर सब वेदों का आविर्भाव हुआ था जो अपने अंग शास्त्र उपांग तथा पद एवं क्रम से संयुक्त थे।

तपामूलमिद सर्व यन्मा पृच्छसि क्षत्रिय। तपसा वेदविद्वासः पर त्वमृतमाप्नुयु। -महाभारत

राजन! तुम जिस तपस्या के विषय में मुझसे पूछ रहे हो, तपस्या ही सारे जगत का मूल है, वेदवेत्ता विद्वान इस तप से ही परम अमृत मोक्ष को प्राप्त होते हैं।

न विद्यया केवलया तपसा चाडपि पात्रता यत्र वृत्तमिमे चोभे तद्वि पात्रम्प्रचक्षते -स्कन्द

केवल विद्या से और न केवल तपश्चर्या से पात्रता हुआ करती है। जहाँ पर सच्चरित्रता है और ये दोनों (विद्या और तप) भी विद्यमान है वह ही वस्तुतः पात्र कहा जाया करता है।

अद्विर्गात्राणि शुद्वयन्ति, मनः सत्येन शुद्ध यति विद्यातपोभ्यों भतात्मा , बुँद्विर्ज्ञानेन शुद्ध यति। -मनु

शरीर जल से शुद्ध होता है। मन सत्य से। आत्मा विद्या और तप से तथा बुद्धि, ज्ञान से शुद्ध होतीं है।

जिह्म ज्या भवति कुल्मलं वाड, नाडिका दन्ता स्त्पसाभिदिग्धाः तेभिर्ब्रह्म विध्यति देवपीयून हदबर्लर्धनुभिर्देवजूतैः।

देव भावनाओं से भरा ब्राह्मण का आत्म बल ही धनुष है। उसकी वाणी प्रत्यंचा है। उसका तप बाण है इस अचूक ब्रह्मास्त्र से सुसज्जित ब्राह्मण तो असुरता को बेध कर रख देता है।

तपसा स्वर्ग भवाव्नोति -अत्रि

तप से ही स्वर्ग मिल सकता है। तपस्विनः पूजनीयाः -याज्ञवल्क्य

पूजनीय केवल तपस्वी होते हैं।

अपने गुण, कर्म, स्वभाव को परिष्कृत करने के लिए चिन्तन एवं क्रिया कलाप में घुसी हुई निकृष्टता का उन्मूलन करने के लिए अपने आप से हर घड़ी जूझना पड़ता है वह निरन्तर चलने वाला तप है। आदर्शों को अपनाने में संचित कुसंस्कार भारी अवरोध उत्पन्न करते हैं उन्हें अभ्यस्त और सहमत करने के लिए भी संकल्पपूर्वक अपने सुधार का उपक्रम बनाना पड़ता है। इन प्रयत्नों को तपश्चर्या कहा जा सकता है। इनका अभ्यास करने के लिए शरीर और मन को तितीक्षा के आधार पर प्रशिक्षित करना पड़ता है। स्वेच्छापूर्वक सदुद्देश्यों के लिए किया गया कष्ट सहन साधना विज्ञान का महत्वपूर्ण अंग है। इसे तितीक्षा कहते हैं। तपश्चर्या के तत्व दर्शन को तितीक्षा द्वारा ही कार्य रूप में परिणित किया जाता है।

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