कौन सुखी कौन दुखी
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कौन सुखी? कौन दुखी? इसका निर्णय किसी की मनःस्थिति के आधार पर किया जा सकता है, परिस्थिति देखकर नहीं। दार्शनिक वर्ट्रेन्ड रसेल ने अपनी पुस्तक ‘कान्स्वेस्ट आव हैप्पीनैस’ में सुख और दुख की विवेचना करते हुए तथ्यों पर सुविस्तृत प्रकाश डाला है। वे कहते हैं आत्मा केन्द्रित बैठे ठाले और खाली मस्तिष्क वाले लोग ही निषेधात्मक कल्पनाओं में डूबे रहने का अवसर अधिक पाते हैं। फलतः छोटी-छोटी कमियों, कठिनाइयों एवं घटनाओं के कारण आगत कठिनाइयों को बढ़ा-चढ़ाकर सोचते हैं और दुःखी रहते हैं। भविष्य में दुर्घटनाएं घटित होने-बुरे दिन और असफलता मिलने की बात सो-सोचकर भी कितने ही लोग विक्षुब्ध रहते पाये जाते हैं। उनके दुःख काल्पनिक होते हैं। हर मनुष्य के जीवन में कुछ न कुछ प्रतिकूलताएं रहती हैं। इच्छित सुविधाएं कदाचित् ही कोई पा सका होगा। सामान्य-सी प्रतिकूलताओं की भयानक प्रतिक्रिया सोचते रहना ही संसार के तीन चौथाई दुःखों का कारण है। यदि लोग शरीर और मन को व्यस्त रखना सीखें, वर्तमान को अधिक व्यवस्थित बनाने पर ध्यान केन्द्रित करें, भूतकाल की अप्रिय स्मृतियों और भविष्य की भयानक सम्भावनाओं को सोचते रहने से हाथ खींच लिया जाए तो दुःखी रहने वाले व्यक्ति भी देखेंगे कि वे भी ऐसा सामान्य जीवन जी रहे हैं जिसमें हँसी-खुशी के दिन गुजारने में कोई कठिनाई नहीं।
दार्शनिक विलियम जेम्स ने सुख-दुःख का गणितीय ढंग से समाधान प्रस्तुत किया है वे कहते हैं कामना में कम दर्जे की परिस्थिति रहने पर मनुष्य दुःखी देखा जाता है। इसके विपरीत जिसकी अभिलाषाएं कम हैं वह स्वल्प साधनों और सामान्य परिस्थितियों में भी प्रसन्न बना रहता है। जिन परिस्थितियों को एक व्यक्ति अपने लिए संतोष और सौभाग्य का कारण मानता है उसी में दूसरा व्यक्ति अपने को दीन-दरिद्र मानता रहता है। ऐसी दशा में सुख और दुःख का कोई मापदंड नहीं बन सकता। दरिद्रता और सम्पन्नता की भी सीमा नहीं बाँधी जा सकती। फिर किसी को सुखी या दुःखी किस आधार पर कहा जाए? वस्तुतः व्यक्ति की मनःस्थिति और तुलना शैली पर ही सब कुछ निर्भर है। यदि ऐसा न होता तो सभी सम्पन्नों को सुखी और सभी विपन्नों को दुःखी पाया जाता। पर बहुधा देखा इसके विपरीत ही जाता है। सम्पन्न लोग अधिक की अपेक्षा करते और अधिक उद्विग्न रहते हैं जबकि सामान्य स्थिति में निर्वाह करने वाले सन्तोषपूर्वक जीवन का आनंद लेते और प्रसन्नता भरे दिन काटते देखे जाते हैं।
विचारक शोपनहार का कथन है कि मनुष्य की चिन्तन शैली का नाम ही नरक और स्वर्ग है। प्रतिगामी चिन्तन के अभ्यास अपने चारों ओर कष्टकर परिस्थितियों और विद्वेषी व्यक्तियों का घेरा खड़ा करते हैं। यह उनकी विकृत कल्पना शक्ति का सृजन होता है। वस्तुतः वे दूसरे असंख्यों की तरह सामान्य स्थिति में ही रह रहे होते हैं। अपनी विषेधात्मक मान्यताएँ और आशंकाएँ ही डरावनी प्रतिक्रिया बनाती और डरावनी प्रतीत होती हैं।
महाकवि कीट्स ने विपत्ति को कुकल्पना की झाड़ी पर फलने वाले कुरूप पुष्प कहा है। वे कहते हैं कि इस संसार में आनन्द और सौंदर्य इतना अधिक है कि यदि उसका चिन्तन भर करते रहा जा सके तो आनन्द की सभी भी कमी नहीं रहेगी। दुःखद सम्भावनाएं तो यहाँ इतनी स्वल्प हैं कि उन्हें हँसकर भी टाला जा सकता है।
कबीर ने दृष्टि पसार कर देखा तो सर्वत्र दुःखियों की ही भीड़ देखी। इसका कारण ढूँढ़ने पर उनमें मानसिक दुर्बलता की निमित्त पाई। सुखियों में जिनकी गणना की जा सकती है वे उतने ही हैं जितनों में अपने चिन्तन की शैली बदल ली। कबीर कहते हैं -
धूत दुःखी, अवधूल दुःख है, रंक दुःखी धन रीता रे।
कहें कबीर वही नर सुखिया, जिसने मन को जीता रे ॥

