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Magazine - Year 1977 - Version 2

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मृत्यु और जीवन पर एक दृष्टि

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कौन जीवित है और मृतक है? इसके उत्तर दो तलों पर ढूंढ़े और दिए जा सकते हैं तथा ढूंढ़े दिए जाते रहे हैं। पहला शारीरिक तल पर, दूसरा आध्यात्मिक तल पर। पहले में शरीर-संचालक शक्तियों की प्रक्रिया तथा स्थिति की जाँच की जाती है, दूसरे में आत्मिक शक्तियों की-यानी चेतना की गति व स्तर को देखा-समझा जाता है। दोनों के निष्कर्षों में लगभग पूर्ण साम्य है।

शारीरिक दृष्टि से मुर्दा कौन है? प्रसिद्ध शरीर विज्ञानी प्रो0 नेगेस्की के अनुसार मृत्यु को चार चरणों में बाँट सकते हैं। पहली स्थिति है-अवरुद्ध होती है श्वास-गति और मन्द होती हृदय-गति। इस स्थिति में यदि इलेक्ट्रो एन्सेफलो ग्राफ (ई॰ ई॰ जी0) यंत्र से पता लगाया जाए, तो मस्तिष्क शिथिल गति से देह-घटकों को सन्देश संप्रेषित कर रहा दिखेगा।

दूसरी स्थिति है ‘क्लीनिकल डेथ’ की है। नाड़ी-गति, हृदय-स्पन्दन, श्वसन-क्रिया रुद्ध। मस्तिष्क गहरी मूर्च्छना में। किन्तु किन्हीं अवयवों में मन्दगति से स्थानीय हलचल चलती रहती है। यदि उत्कृष्ट उपचार सम्भव हो, तो जीवन को अभी भी लौटाया जा सकता है।

चौथी स्थिति वह है जहाँ जीवाणुओं में सड़न शुरू हो जाती है। जीवन की सभी संभावनाएं समाप्त। यही पूर्ण मृत्यु है। इसे ही ‘बायोलॉजिकल डेथ’ कहा जाता है।

श्वसन-क्रिया एवं हृदय-गति का अवरोध, नाड़ी की गति बन्द होना, रक्त संचार की समाप्ति, पुतली पथराना, चमड़ी का श्वेत पड़ जाना, ये सब लक्षण हैं, जिनसे यह ज्ञात होता है कि जीवाणुओं की आन्तरिक संघटना का क्षय तेजी से हो रहा है। इसे उतनी ही तेजी से रोका भी जा सकता है। यदि समुचित चिकित्सा की व्यवस्था हो सके। इस प्रकार मूर्च्छा शास्त्र की खोजों के अनुसार ‘सेन्ट्रल नर्वस सिस्टम’ से संचालित समस्त जीवन क्रियाएं बन्द होने पर भी पूर्ण मृत्यु नहीं घोषित की जा सकती।

मस्तिष्क की क्रिया-शक्ति की समाप्ति के 72 घण्टे बाद तक और साँस चलने की क्रिया समाप्त होने के 24 घण्टे बाद तक कई रोगियों को पुनः जीवित किया जा सका है। जर्मनी के डॉ. बुशर्ट और डॉ. रिट्मेयर इस क्षेत्र में प्रसिद्ध हो चुके हैं।

रूसी वैज्ञानिक प्रो0 एल॰ लोजिन लाजिनस्की ने 1964 में मक्के के कीटों को शून्य से 4 डिग्री ऊपर हीलियम द्रव में जमा दिया और 6.30 घंटे इसी दशा में रखा। फिर ताप देकर क्रमिक चेतना लाई गई तो 20 में से 13 कीट पुनः जीवित हो गए।

एक अन्य सोवियत वैज्ञानिक पी0 कोसरेव ने ‘डाफनिया’ नामक जल-कीट और शेवाल का परीक्षण कर पाया कि उनमें से कुछ 25 हजार वर्ष पुराने थे। 25 हजार वर्ष से सुषुप्त पड़े अनेक ऐसे मृत-वत् जीवों को श्री कोसरेव ने जीवित कर दिया। हिमालय के भालू भी 6-6 महीने बर्फ में दबे पड़े रहते हैं। सूर्य की धूप से उनकी साँस फिर चलने लगती है। हिम प्रदेशों में रीछ ठंड में बर्फ में दब जाते हैं। श्वास गति का पता नहीं चलता। गर्मी में बर्फ पिघलते ही वे भी दबे रीछ पुनः सक्रिय हो जाते हैं।

मोटी जाँच-पड़ताल के आधार पर घोषित की गई मृत्यु के उपरान्त कितने ही व्यक्तियों ने फिर जी पड़ने के उदाहरणों की कमी नहीं है। नाड़ी की, हृदय की धड़कन बन्द हो जाने, सास रुक जाने, पुतली थम जाने, हाथ पैर अकड़ जाने जैसे लक्षणों को देखकर यह मान लिया जाता है कि मनुष्य कर गया। इसके बाद अंत्येष्टि की तैयारी आरम्भ कर दी जाती है, पर देखा गया है कि श्मशान घाट पहुँचते-पहुँचते जान वापिस लौट आई और मुर्दा फिर से जिन्दा हो गया। ऐसी घटनाएँ न केवल गाँव, घरों में ही होती हैं, वरन् साधन सम्पन्न अस्पतालों में विधिवत् परीक्षा के बाद घोषित की गई मृत्यु के उपरान्त भी मुर्दाघर से जिन्दा होकर वापिस लौट आने वालों के भी रिकार्ड मौजूद हैं।

इससे यह स्पष्ट होता है कि श्वसन क्रिया एवं हृदय-गति अवरुद्ध होने से ही मृत्यु नहीं हो जाती, क्योंकि मस्तिष्क तब भी क्रियाशील रहता है। पूर्ण मृत्यु तो मस्तिष्कीय कोशों के निष्कृष्ट हो जाने पर ही होती है। हृदयगति रुकने पर मस्तिष्क को शुद्ध रक्त नहीं मिल पाने से वह शर्करा नहीं प्रज्वलित कर पाता और शक्ति खोता जाता है। पर 6 मिनट तक मस्तिष्क बिना रक्त भी जीवित रह सकता है। यदि आर्गनिक पदार्थों के संश्लेषण से मस्तिष्क को जीवित रखने की विधि निकल आई तो दीर्घकाल तक सुषुप्ति सम्भव होगी। शारीरिक दृष्टि से यह योगियों की समाधि जैसी स्थिति होगी।

वैज्ञानिकों के लिए मृत्यु अभी रहस्य बनी हुई होने का कारण यही है कि मस्तिष्कीय-प्रणाली की अभी तक वैज्ञानिक अत्यल्प जानकारी रखते हैं। बाह्य-मस्तिष्क की अभी 17 प्रतिशत ही जानकारी उपलब्ध हो सकी है और मध्य-मस्तिष्क (मिडिल ब्रेन)की तो मात्र 3 प्रतिशत ही। शरीर का पूर्ण अधिपति है-मस्तिष्क। मस्तिष्कीय कोशों में किंचितमात्र प्राण-शक्ति शेष हो,तो चेतना का पुनः प्रस्फुरण सम्भव है। तब तक,जब तक कि शारीरिक अवयव सड़ना न शुरू हो गये हों।

नोबुल-पुरस्कार विजेता शीर्षस्थ रूसी वैज्ञानिकों में से एक प्रा0 लेव्हलैडो 1962 में एक मोटर दुर्घटना में अत्यधिक आहत हो गये। तीन माह वे अचेत रहे। चार बार उनकी हृदयगति कई -कई घन्टों बन्द रही। चारों बार ‘क्लीनिकल डेथ’ घोषित कर दी गई। पर चेतना शेष थी। अन्तिम बार उनकी धर्मपत्नी ने जब प्रेम से उनके सिर पर हाथ फेरकर कहा-”प्रियतम! यदि तुम मुझे पहचानते हो और सुन सकते हो, पर वाणी रुद्ध है, तो चार बार पलकें झपकाओ।” प्रो0 लेव्हलैडो ने चार बार पलकें झपकाई। डाक्टरों ने जान लिया कि चेतन शेष है। उपचार जारी रहे। वे स्वस्थ हो गए और अगले छह वर्ष यानी 1968 तक सहज जीवन जिया।

स्पष्ट है कि जहाँ चेतना का अंश शेष है, वहाँ नव जीवन संचार सम्भव है। मृत्यु वस्तुतः आन्तरिक शक्तियों का क्रमशः ह्रास है। जिससे भारी थकान और गहन मूर्च्छा आती है और इसी की चरम परिणति मृत्यु है।

दुर्घटनाओं में आन्तरिक शक्तियों को आकस्मिक प्रचण्ड आघात लगता है। उनका क्षय तेजी से होता है। जबकि वृद्धावस्था में होने वाली मृत्यु मन्द गति से क्रमशः घटित होती है। जीव-कोषों का धीरे धीरे क्षय होता है। अतः उनमें नव-जीवन संचार अत्यन्त कठिन होता है। वैज्ञानिक प्रयास कर रहे हैं कि जर्जरित शरीर में नये सिरे से ताजगी लाई जा सके।

वैज्ञानिक यह प्रयास भी कर रहे हैं कि मृत व्यक्ति को एक दीर्घकाल तक विश्राम करने दिया जाए। 25 वर्ष बाद उन्हें पुनः जीवित करने का प्रयास किया जाए। इसी बीच श्रम से शिथिल और क्षरित शरीर कोशिकाएं, विश्राम से नवस्फूर्ति पा जाएंगी। मृत्यु के बाद देह स्थित जीवाणुओं में विघटन प्रारम्भ हो जाता है, जिसका परिणाम होता है सड़न। शरीर को वायु और गर्मी से सुरक्षित रखते हुए शून्य से नीचे के तापमान पर रखने पर उसमें विकृति नहीं आती। अमेरिका में मनोविज्ञान के प्राध्यापक डॉ. जेम्स वेडफोर्ड ने अपनी वसीयत में ही यह इच्छा व्यक्त की थी कि उनके शरीर पर यह प्रयोग किया जाए। इस हेतु उन्होंने पर्याप्त धनराशि भी छोड़ी थी। तद्नुसार यह व्यवस्था की गई है। जनवरी 67 में मृत्यु के बाद उनकी देय सुरक्षित रख दी गई। 11 अन्य अमेरिकियों के शव भी इसी भाँति रखे गये हैं। इन शरीरों से मलादि निकालकर उन पर चाँदी की पतली पर्त लपेटी गई है और फिर दो परत वाले ताबूत में भीतरी पर्त में उन्हें बन्द कर वहाँ हवा न पहुँच पाए, ऐसी व्यवस्था की गई है। बाहरी परत में पर्याप्त नाइट्रोजन द्रव भरा गया है, ताकि आवश्यक शीतलता का तापक्रम बना रहे। यह द्रव हर छः महीने बाद पलट दिया जाता है। 25 वर्ष बाद यानी 1992 तक वैज्ञानिक उन शरीरों को पुनर्जीवित करने का प्रयास करेंगे। प्रयोग सफल हो सका, तो इसी देय में पुनर्जन्म सम्भव हो सकेगा।

इस सम्भावना को आशा मय दृष्टि से इसलिए देखा जा रहा है कि जीवन के समय वैसे तो विघटन एवं निर्माण की दोनों प्रक्रियाएँ होती रहती हैं। किन्तु मृत्यु के समय निर्माण प्रक्रिया प्रायः बन्द होने को होती है और विघटन प्रक्रिया अधिक तीव्रगति से प्रारम्भ हो जाती है। यदि मृत्यु के पूर्व ही निर्माण प्रक्रिया का बन्द होना रोका जा सके तो जीवित रहना सम्भव है। वैज्ञानिकों का विश्वास है कि यदि एनाबोजिल्म (कोशों की पुनर्रचना) तथा मेटाबोलिज्म (रस प्रक्रिया) का क्रम निरन्तर रखा जा सके तो 21 वीं सदी के पूर्व या 20 वीं सदी के अन्त तक मृतक को कुछ समय विश्राम देकर उसे पुनर्जीवित किया जा सकेगा।

आहार-विहार, रहन-सहन संयम, मानसिक सन्तुलन, दिनचर्या जैसी छोटी समझी जाने वली बातों पर यदि सतर्कतापूर्वक ध्यान रखा जा सके और अवाँछनीय गतिविधियों को रोका जा सके तो सहज ही दुर्बलता और रुग्णता की समस्या का समाधान निकल सकता है।

मृत्यु एक दिन तो सभी की होनी है। जन्म लेने वाले को मरना पड़ता है इस शाश्वत सत्य को झुठला सकने का दावा किसी के लिए भी कर सकना सम्भव नहीं, पर इसमें सन्देह नहीं है कि मृत्यु को काफी पीछे धकेला जा सकता है। जितने दिन जीने की सम्भावना दीखती थी उसकी तुलना में काफी अधिक समय तक जीवन का आनन्द लिया जा सकता है। शर्त एक ही है कि शक्तियों के क्षरण करने वाली उन भूलों को तत्परतापूर्वक सुधार लिया जाए जो हमारे स्वभाव का अंग बन गई हैं और आए दिन होती रहती हैं।

अमेरिकन मेडिकल एसोसिएशन तथा जेरियाट्रिक्स सोसायटी के भूतपूर्व अध्यक्ष डॉ. एडवर्ड बोर्ड का निष्कर्ष है कि आचार-व्यवहार में सामान्य सतर्कता बरतने से ही मनुष्य सौ वर्ष तक सहजता से जी सकता है। अल्पायु में निधन का कारण 7 त्रुटियाँ हैं-(1) आहार में लापरवाही (2) अस्त-व्यस्त दिनचर्या (3) बहुत अधिक या बहुत कम परिश्रम (4) कामवासना की अति (5) नशेबाजी (6) अनावश्यक मानसिक तनाव (7) स्वच्छता के नियमों का पालन न करना। इनसे बचे रहने पर स्वस्थ शत वर्षीय जीवन सहज सम्भव है।

रूस के शरीर शास्त्रविद् इवान मेचनिकाव एवं ए0 बोगोपीलत्स की खोजों के अनुसार मानव शरीर की सहज संरचना ही ऐसी है कि 125-150 वर्षों तक सरलता से जिया जा सकता है। रूस के 162 वर्षीय वृद्ध युवा शेराली और उनकी 94 वर्षीय पत्नी अपने आधि-व्याधि रहित दीर्घायुष्य का रहस्य मात्र निश्चिन्त मनःस्थिति व सरल दिनचर्या बताते हैं।

इसी दृष्टि से अमेरिका में एक छोटी बालिका का पालन-पोषण वैज्ञानिक ढंग से किया जा रहा है जिससे पता लगाया जा सके कि क्या अमरत्व या दीर्घजीवन को प्राप्त किया जाना सम्भव है या नहीं। बुरे विचार एवं असंयम ही बीमारियों के प्रधान कारण हैं। इनसे मुक्त रहने पर रोग मुक्ति सहज सम्भव है। इसी आधार पर उस लड़की का पालन-पोषण किया जा रहा है। उसे अच्छी जलवायु वाले ‘लाज’ नामक टापू में एक भव्य भवन में रखा जा रहा है। वहाँ जीवन से सम्बन्धित सारी सुविधाएं उपलब्ध कराई गई हैं। इस प्रयोग में ‘रायल फ्रेटरनिटी आफ मास्टर मेटाफिजिशियन्स’ नामक संस्था के अध्यक्ष जेम्स वी0 शेफर अधिक रुचि ले रहे हैं। उस लड़की की शारीरिक, मानसिक स्थितियों एवं व्यवस्था की देख-रेख के लिए एक हजार विशेषज्ञों का दल नियुक्त किया गया है।

दीर्घ जीवन के दो प्रमुख आधार हैं-श्वास धीरे 2 लेना और शीत वातावरण में रहना। इसीलिए योगी लोग प्राणायाम क्रिया करते और हिमालय की मन्दराओं में रहते हैं। शीत ऋतु में रीछ, सर्प, कछुए, मेंढक आदि अपने आपको इसलिए सिकोड़कर बैठ जाते हैं कि ताप की तीव्रता के कारण शक्ति का जो क्षरण हुआ है, वह बचाया जा सके।

रेफ्रिजरेटरों में रखकर फलों को अधिक दिनों तक ताजे रखा जा सकता है। बर्फ में दबी लाशें कई दिनों बाद निकालने पर ज्यों की त्यों निकलती हैं। इसी प्रकार दूरवर्ती ग्रहों पर मनुष्य को कृत्रिम शीत वातावरण में रखकर ही भेजा जा सकेगा। वहाँ पहुँचने पर पृथ्वी में रखकर ही भेजा जा सकेगा। वहाँ पहुँचने पर पृथ्वी के नियंत्रण कक्ष से ही धीरे 2 गरम वातावरण देकर मनुष्य को सक्रिय कर लिया जावेगा। क्योंकि उन ग्रहों पर पहुँचने के लिए हजार वर्ष तक लग सकते हैं। मनुष्य को फ्रिजकर देने पर उसकी शक्ति का क्षरण बन्द हो जावेगा। गरम होने पर पुनः उसी शक्ति एवं आयु के साथ जीवित हो जावेंगे।

औसत आयु में वृद्धि होने के कारण संक्रामक रोगों पर अधिकार पाना भी है। हैजा, प्लेग, इन्फ्ल्यूऐन्जा, मलेरिया आदि के टीके लगाकर पूर्व में ही हजारों लोगों को इन बीमारियों से बचा लिया जाता है। लोगों का रहन-सहन ऊँचा उठाने हेतु भी रूस में अधिक प्रयत्न हुए हैं। लाखों नये घर बनाकर लोगों को सुविधाजनक एवं स्वास्थ्यप्रद परिस्थितियों में रखा गया है।

रूस में 100 वर्ष पूर्व मनुष्यों की मृत्यु 40-50 वर्ष की उम्र में हो जाती थी किन्तु अब मृत्यु 70-80 वर्ष की उम्र में होती है। वहाँ 60 से 70 वर्ष तक व्यक्ति को अधिक क्रियाशील माना जाता है। आध्यात्मवादी भी जानते हैं कि चेतना का एक अंश भी शेष हो, तो नव-जीवन का संचार सम्भव है। मूर्च्छा जितनी गहरी हो उपचार भी उतना ही प्रखर आवश्यक है। मन पर पड़ने वाले आघात मस्तिष्क और हृदय की जाग्रति पर प्रहार करते हैं और व्यक्ति में स्फूर्तिहीनता, नैराश्य आदि की भावना बढ़ती है। गलत जीवन यापन से भी अन्तर्ज्योति मन्द पड़ती है।जीवन का सही दृष्टिकोण अपनाकर प्रबल पुरुषार्थ करने पर शरीर, मन, मस्तिष्क की शक्तियाँ क्रमशः विकसित ही होती जाती हैं। जिनकी ये शक्तियाँ शिथिल हैं, वे शारीरिक दृष्टि से जीवित रहते हुए भी गहरी मूर्च्छा में पड़े हुए हैं और मुर्दों जैसे ही हैं। आत्म-बोध, आत्मचिंतन तथा प्रखर प्रोत्साहन से यह मूर्च्छा हट सकती है और तेजस्विता बढ़ सकती है। मन्द चेतना क्रमशः समग्र जागरुकता के रूप में विकसित हो सकती है।

भार भूत जीवन जीने वाले साँस चलते रहने पर भी मृतक ही कहे जायेंगे इसके विपरीत जो शरीर से मर गए पर अपना यश शरीर धरती पर छोड़ गए हैं उन्हें सदा अमर रहने वाले देवताओं की श्रेणी में ही गिना जा सकता है। वैज्ञानिक मृत्यु की परिभाषा अब शारीरिक अवयवों के निष्क्रिय हो जाने के आधार पर नहीं मस्तिष्कीय चेतना का दीप बुझ जाने पर घोषित करते हैं। वस्तुतः शरीर नहीं मन ही प्रधान है। मन को जीवन्त रखकर हमारी प्रस्तुत आयुष्य भी बड़ी सुखद बन सकती है। उतने भर में ही हम असाधारण लाभ ले सकते हैं किन्तु यदि थका हारा, टूटा, निराश, नीरस रहते हुए दिन गुजारे जायें, लक्ष्य विहीन गतिविधियाँ अपनाये रहकर नर-पशुओं जैसा समय गुजारा जाए तो समझना चाहिए कि जीवित एमरु जाते रहने पर भी मृतकों की श्रेणी में रहकर किसी प्रकार जिन्दगी की लाश ढोते रहा गया है।

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