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Magazine - Year 1977 - Version 2

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स्वतंत्र चिन्तन की गति अवरुद्ध हुई तो सर्वनाश सुनिश्चित है।

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चेतना के उपयोग के लिए प्रकृत सम्पदाओं का उचित उपयोग हो यही औचित्य की मर्यादा है। इससे आगे का अतिक्रमण निश्चित रूप से दुःखदायी है। पदार्थ की सत्ता चेतना पर हावी होने लगे तो फिर खतरा ही खतरा है। घोड़ा अपने मालिक पर चढ़कर चले, नाव को सिर पर लाद कर यात्री लोगों को चलना पड़े, तो यह असमंजस की बात है। आपत्ति काल की बात दूसरी है। सामान्य प्रचलन के रूप में यह स्थिति चिन्तनीय है और अशोभनीय भी।

पदार्थ का आकर्षण जब चेतना को लुभाता और उस पर आधिपत्य जमाता है तो यह विडंबना में चेतना का पराभव अनुभव किया जाता है। तत्वदर्शियों ने लोभ और मोह की निन्दा की है। यह मर्यादा के अतिक्रमण का विरोध है। वस्तु की उचित आवश्यकता की पूर्ति के लिए नीति युक्त उपायों से साधन उपार्जित किये जाय और उनका सीमित उपयोग निर्वाह के लिए करने के उपरान्त जो बचे उसे लोकोपकारी प्रयोजनों में लगा दिया जाय। यही वस्तुओं के-पदार्थों के-धन वैभव के उपार्जन एवं उपयोग की मर्यादाएं है। उतने में निन्दा की कोई बात नहीं, लोभ की भर्त्सना इस कारण की गई है कि उसके कारण अति उपयोग और कृपण संग्रह की ललक उत्पन्न होतीं है। यह लालच जब सिर पर सवार हो जाता है तो उसके लिए अनैतिक और अपराध माने जाने वाले कुकृत्यों को करने में भी संकोच नहीं होता। यह स्थिति व्यक्ति और समाज दोनों के लिए ही अहितकर है। इससे विग्रह उत्पन्न होते और संकट बढ़ते हैं।

मोह की निन्दा इसलिए है कि प्राणियों के बीच पारस्परिक घनिष्ठता इस सीमा तक रहनी चाहिए जिसमें मानवी मर्यादाओं का- न्याय एवं औचित्य का उल्लंघन न होता हो। मैत्री के कारण जब अनावश्यक एवं अवाँछनीय सुविधाएं देने की बात मन में उठती है तो स्वभावतः पक्षपात उठता है और अन्याय पनपता है। जिनमें मोह होता है उन्हें अत्यधिक महत्व मिलता है और उतनी सुविधाएं दी जाती है जो उन्हें अहंकारी आलसी, दुर्व्यसनी, अपव्ययी बनाती चली जाती है। मोह के कारण हम जिन्हें भी अनुचित उपहार देते हैं वे तत्काल तो प्रसन्न होते हैं, पर पीछे प्रखरता नष्ट होते जाने के कारण वे घाटे में ही रहते हैं। मोह समवितरण और स्वम्बद्व क्षेत्र में कर्तव्य पालन कर सकने का मार्ग रोकता है। प्रेम में सद्गुणों के आधार पर मैत्री पनपती और श्रद्धा एवं घनिष्ठता के रूप में विकसित होती है। जबकि मोह के आधार पर अनुचित लाभ देकर पोसे गये व्यक्ति अपने पोषणकर्ता के लिए ही घातक बनते हैं। मोह के कारण चिन्तन, श्रम, साधन थोड़े से कुपात्र लोगों पर थोप दिये जाते हैं और सत्पात्रों को उचित अनुदान पाने से भी वंचित रहना पड़ता है। स्वयं मोहग्रस्त भी तो अनीति पोषक एवं अविवेकी बनता ही है।

उपरोक्त पंक्तियों में व्यवहार दर्शन की नहीं इस तथ्य की चर्चा है कि चेतना का अस्तित्व सर्वोपरि है। शरीर समेत समस्त वस्तुएं उसी की सुविधा एवं प्रसन्नता के लिए है। किन्तु जब वे ही उल्टे चेतना पर हावी हो जाते हैं और उन्हीं का आकर्षण जीवात्मा को अपने मूलभूत वर्चस्व को गवाँ बैठने तक के लिए बाध्य करता है तो यह बहुत ही महंगा सौदा सिद्ध होता है। इसमें पाने के स्थान पर खोना ही अधिक पड़ता है। इस विश्व उद्यान में जो आनन्द मिल सकता था वह तो न जाने कहाँ चला जाता है उल्टे शोक सन्ताप से अहिर्निशि जलते कुपते रहना पड़ता है। लोभ और मोह का अर्थ आत्मा की मौलिक विशेषताओं को गवाँ बैठना और प्रकृति का पदार्थ का उस पर आधिपत्य स्थापित हो जाना ही है। चेतना की प्रज्ञा इतनी प्रखर रहनी चाहिए कि वह प्रकृत पदार्थों और परिस्थितियों का सही उपयोग कर सकने की अपनी दूरदर्शिता एवं विवेकशीलता को अक्षुण्ण बनाये रह सके। उस पर कोई भी भौतिक दबाव हावी न हो सके तो ही यह कहा जा सकेगा कि प्राणी स्वतन्त्र होकर जी रहा है, उसे भव-बन्धनों से मुक्ति मिली हुई है। कर्तव्यपरायण मर्यादा पालन का स्वेच्छा अनुशासन तो चेतना की तात्विक स्वतन्त्रता का चिन्ह माना जाता है।

मनुष्य जाति के दुर्भाग्य के एक भयंकर अभिशाप यह रहा है कि उसकी दिव्य चेतना पर प्रकृति के आकर्षण वे हिसाब छाये रहे और वह लोभ, मोह के कुचल में फँसकर अपने वर्चस्व को प्रखर करने और लक्ष्य को पाने में असमर्थ रहा। अधिकाँश लोग सड़ा-गला जीवन ही जी पाते हैं, महानता की गरिमा प्राप्त करके तो कोई विरले ही जीवन संग्राम के विजेता बनकर परमेश्वर के दरबार से वापिस लौटते हैं।

आकर्षणजन्य चिर प्राचीन बन्धनों में एक नई कड़ी जो न जाने अभिशाप बनकर मानव समाज की दुर्गति करती चली आई है यह तो अपने स्थान पर जमी हुई भी है और बढ़ती पनपती भी जा रही है। उसके हटने, मिटने की परिस्थितियाँ तो बन रही थी, उलटे एक और नया दुर्भाग्य विज्ञान की नवीनतम देन के रूप में और आ धमका। यह संकट इतना बड़ा है कि यदि उसे विकसित होने का अवसर मिल गया तो समझना चाहिए कि चेतना की आत्मिक स्थिति को भौतिकता ने पूरी तरह निगल लिया। चिन्तन तत्व की इतिश्री हुई और व्यक्ति उसी तरह विज्ञान की अधिपति सत्ता के आधीन हो गया जिस तरह पालतू पशुओं का भला बुरा उपयोग उनके स्वामी कहलाने वाले मनुष्यों द्वारा होता है।

वैज्ञानिक खोज ने ऐसे सूत्र प्राप्त कर लिए है जिनके आधार पर मस्तिष्क पर जड़ शक्तियों के सहारे अधिकार मिल जाता है और किसी की भी विचारधारा को उसकी स्वतन्त्र चेतना के विरुद्ध सोचने और मानने के लिए विवश किया जा सकता है। पशु के शरीर पर जैसा अधिकार उसके स्वामी का होता है उसी प्रकार मस्तिष्क को विज्ञान के सत्ताधीशों के सामने स्वेच्छया समर्पण करने के लिए विवश होना पड़ेगा। शरीर के बलपूर्वक उपयोग करने पर प्राणी की स्वतन्त्र चेतना कम से कम असहमत या विरुद्ध तो बनी रहती और भीतर ही भीतर उस स्थिति से छूटने की चेष्टा एवं इच्छा तो बनाये रहती है, पर विज्ञान सम्मोहित व्यक्ति तो वैसा भी कुछ न कर सकेगा। स्वेच्छया समर्पण के लिए बाधित किया गया व्यक्ति यही समझता रहेगा कि स्वेच्छा से ही सब कुछ कर रहा है, वस्तुतः उसकी निजी मौलिकता, चेतना, इच्छा, प्रकृति एवं आस्था पूरी तरह मूर्छाग्रस्त होकर मृतप्राय स्थिति में पड़ी होगी और उसके चिन्तन को दूसरे लोग कठपुतली की तरह संचलित कर रहे होंगे और वह मदारी की रस्सी के इशारे पर उछल कूद करने वाले बन्दर के अतिरिक्त और कुछ शेष ही नहीं रह गया होगा।

फ्राँसीसी वैज्ञानिक प्रो0 देल्गादो ने बताया है कि नसों में रक्त चढ़ाने जैसा ही सहज कार्य मस्तिष्क में इच्छानुकूल आदतों का प्रवेश करा सकना भी है और अगले ही दिनों यह सहज सम्भव होगा कि प्रवृत्तियों और अभ्यासों की वैसी ही काट−छांट की जा सके, जैसे अभी फोड़े फुन्सियों की होती है।

यह जानने की दिशा में तेजी से कार्य हो रहा है कि मस्तिष्क में किस स्थान पर-किस प्रकार की क्षमता के संचालक, नियामक केन्द्र है। मस्तिष्क में गहरी दबी पड़ी विस्मृतियों को बिजली के झटके देकर ताजी बनाया जा सकता है, जिससे लगने लगे कि सम्बन्धित घटना अभी अभी घटित हुई है। कनाडा के मनोवैज्ञानिक डॉ. डब्ल्यू0 जी0 पेनफील्ड ऐसे इलेक्ट्रोड खोजने में सफल हुए है, जिनका स्थान विशेष की कुछ कोशिकाओं से सम्बन्ध जोड़ने पर मनुष्य अतीत की घटनाएं अपने सामने पुनः घटित हो रही सी ही ताजी, अनुभव कर सकता है। विगत संवादों विवादों, चर्चाओं आदि को भी तत्काल संपन्न अनुभव कर सकता है।

स्नायु विज्ञानी कार्ल लैसले ने खोज की है कि मस्तिष्क के किस स्तर पर किस शक्ति से कितना विद्युत प्रवाह किये जाने नर किस काल खण्ड की (पुरानी से पुरानी) किस किस्म की स्मृतियाँ ताजी हो सकती है। मैकमिल विश्व विद्यालय, मान्ट्रील (कनाडा) के डॉ. विल्डर पेनफील्ड ने विचार, ध्वनि और दृश्य का सम्बन्ध स्थापित करते हुए उस दिशा में प्रगति की सम्भावना व्यक्त की है, जहाँ लोगों के मस्तिष्क निर्दिष्ट चिन्तन के लिए ही प्रेरित प्रशिक्षित किये जा सकेंगे। कैलीफोर्निया इन्स्टीट्यूट आफ टेक्नोलॉजी के डॉ. रोगरस्परी ने सुदीर्घकाल से संचित आदतों अभ्यासों से मुक्त होने तथा सर्वथा नये अभ्यासों को गहराई से अपना प्रयोगों में सफलता प्राप्त की है।

स्वीडन के डॉ. हाल्गर हाइडन ने अपने प्रयोगों द्वारा पाया है कि मस्तिष्क चेतना के आधार स्तम्भ रिवोन्यूक्लिक एसिड (आर॰ एन॰ ए0) नामक रसायन की मात्रा को चेतना की विधि एवं दिशा में परिवर्तन सम्भव है।

जीवन शास्त्री जेम्स ओल्डस ने चूहों के मस्तिष्क पर आँशिक नियन्त्रण की प्रक्रिया खोज निकाली और उनके मस्तिष्क से बिल्लियों के प्रति भय का भाव निकाल दिया। परिणाम यह हुआ कि वे चूहे बिल्लियों की पीठ पर बेझिझक चढ़ने दौड़ने लगे। उनके प्रति भय का भाव ही विदा हो गया और वे बिल्लियों को अपने हितैषी वर्ग का मानने लगे।

डॉ. डी0 एलवर्ट ने भी चूहों पर ही प्रयोग किया और उनकी एक ऐसी जाति पैदा की, जो रूपाकार में तो वैसी ही है, पर कार्य विधि एवं चिन्तन विधि में सर्वथा नयी है। डॉ. जे0 वी0 ल्यूको ने यही प्रयोग तिलचट्टों के साथ किया। डॉ. राबर्ट थामसन ने यही प्रयोग प्लेरियन नामक कीड़े पर किये है। यह आध इंच आकार का जलचर कीड़ा है, इसे रेडियो संकेतों के सहारे कुछ भी करने के लिए विवश करना पूरी तरह सम्भव हो गया है।

मस्तिष्क का बहिरंग और अंतरंग संरचना के सम्बन्ध में अब पहले की अपेक्षा बहुत अधिक जान लिया गया है। एक समय था जब मस्तिष्क के भीतर भरी वसा कोशिकाएं, तन्त्रिकाएं ही चिन्तन की आधारशिला मानी जाती रही और समझा जाता रहा कि जिसका मस्तिष्क जितना भारी और बड़ा होगा वह उतना ही बुद्धिमान होगा। इस मान्यता के कारण मस्तिष्क के स्वरूप का विकास करने के लिए ऐसी औषधियों और खाद्य पदार्थों का सरंजाम जुटाया जाता रहा जो उस अवयव को परिपुष्ट बनाने में सहायक सिद्ध हो सके। अब वह अध्याय समाप्त होते जा रहा है और समझा जा रहा है कि इस संस्थान के अंतरंग क्षेत्र में काम करने वाली विद्युत शक्ति ही विचार शक्ति बनती है। इस विद्युत को लगभग उसी स्तर की भौतिक विद्युत द्वारा प्रभावित किया जा सकता है और चिन्तन के बाहरी दबाव से उभारा या दबाया जा सकता है।

खोजो से स्पष्ट हुआ है कि मस्तिष्क आकृति व भार से मस्तिष्कीय सक्रियता व शक्ति का सीधा सम्बन्ध नहीं हैं। ह्वेल का मस्तिष्क 7 हजार ग्राम, हाथी का 5 हजार दो सौ, डाल्फिन का 1 हजार 8 सौ, घोड़े का साढ़े छह सो, गेंडे का छह सौ, गोरिल्ला का 5 सौ, कुत्ते का 130 ओर बिल्ली का मस्तिष्क 30 ग्राम वजनी होता है। पर इसी हिसाब से इनके मस्तिष्कीय सामर्थ्य को नहीं परखा जा सकता।

आदमी के मस्तिष्क का वजन सामान्यतः 1 हजार 350 ग्राम होता है। लेकिन समझदारी का सम्बन्ध वजन से नहीं है कपाल के भीतर भरी मज्जा के अंतर्गत सूक्ष्म घटक, जो न्यूरान कहलाते हैं। जितने अधिक सूक्ष्म व सक्षम होते हैं, बुद्धिमता का विकास उसी अनुपात से होता है। ये घटक अगणित वर्ग के है और इन्हीं वर्गों के विकास पर मानसिक गतिविधियों का निर्धारण , निर्देशन होता है समझदारी का सम्बन्ध इस बात से है कि ये सूक्ष्म घटक “न्यूरान कितने है और परस्पर कितनी सघनता से संबद्ध है।

मानव मस्तिष्क में प्रायः। 1 खरब 40 अरब न्यूरान होते हैं। प्रत्येक न्यूरान स्वयं का काम तो करता ही है, दूसरे न्यूरानों के कार्य में भी भारी योगदान करता है।

मनुष्य की बुद्धिमता पिछले दस हजार वर्षों में लगातार बढ़ी है। किन्तु उसके मस्तिष्क के आकार और भार में कोई खास फर्क नहीं आया है। यदि वजन और विस्तार के अनुसार बुद्धिमता होती, तब तो अब तक मस्तिष्क आदमी के शरीर का बहुत बड़ा हिस्सा बन गया होता।

मस्तिष्कीय कणों का मध्यवर्ती न्यूक्लिक एसिड रासायनिक बैटरी का काम करता है तथा मस्तिष्क में विभिन्न प्रकार के, विभिन्न स्तरों के संवेग और सम्वेदनाएं एक विद्युत संवेग के रूप में उत्पन्न करता एवं उस विद्युत संवेग को नियन्त्रित भी करता है। इस न्यूक्लिक अम्ल के समुचित उत्पादन के लिए मैग्नेशियम पेन्सिलीन खोजी गई है। केन्सास विश्व विद्यालय के रसायनवेत्ताओं ने कुछ प्रोटीन एटम्स भी इसी हेतु ढूंढ़े है।

मस्तिष्कीय कोशिकाओं के आपसी सम्बन्ध सूत्रों को जोड़ता है एक विद्युत प्रवाह। यह प्रवाह मनश्चेतना की इच्छानुसार मस्तिष्क की विभिन्न परतों में तीव्रगति से कौंधता है और अरबों कोशिकाओं में बिखरी पड़ी क्षमताओं और स्मृतियों में से अमुक क्षण विशेष में आवश्यक तथ्य ढूंढ़ लाता है। यह विद्युत प्रवाह जितना ही सुव्यवस्थित, द्रुतगामी एवं संवेदनशील होगा, मनुष्य उतना ही कुशल व बुद्धिमान होगा। यह प्रवाह धीमा रुका सा चले तो मनुष्य अस्त व्यस्त, भुलक्कड़, मन्द बुद्धि बन जाएगा। मस्तिष्क को मेरुदण्ड से जोड़ने वाले रेक्टिक्युलर फार्मेशन की गतिविधियों को जितनी अधिक मात्रा में समझा और प्रभावित किया जा सकेगा, उतनी ही मानवीय संवेदनाएं नियन्त्रित हो सकेगी। बिना किसी घटना या उपलब्धि के भी इस नियंत्रण द्वारा हर्ष, शोक आदि की अनुभूतियों की तरंगें दौड़ाई, अनुभव कराई जा सकती है।

मात्र विद्युत शक्ति से रेडियो ऊर्जा से ही नहीं, यह कार्य रासायनिक पदार्थों, औषधियों के सहारे भी एक सीमा तक सम्भव हो सकता है। नशे का प्रभाव बहुत पहले से विदित है अब रासायनिक पदार्थों से चिन्तन को मोड़ने, मरोड़ने और इच्छित प्रयोजन की दिशा में घसीट ले जाने में भी सफल बनाया जा सकता है।

रूसी वैज्ञानिक प्रो0 एनोखोव ने एमीनाजाइन नामक एक दवा तैयार की है, जो रेक्टिक्युलर फार्मेशन में स्थित पीड़ा संवेदन केन्द्र को जकड़ लेती है। इससे पीड़ित अंगों में होने वाले दर्द की, रोगी को अनुभूति नहीं होती। भले ही कोई शरीर का मांस काट डाले, तो भी दर्द न होगा। इसके लिए निद्रा लानी आवश्यक नहीं। यह एड्रेनेलीन साइटिका, तीव्र उदरशूल, सिरदर्द आदि रहते हुए भी आदमी को कोई कष्ट न अनुभव होगा और वह अपना काम निपटाता रहेगा। जब आपरेशन आदि की जरूरत पड़ी भी, तो वह भी बिना किसी कष्ट के सरलता से संपन्न हो सकेगा। चीर फाड़, प्लास्टिक सर्जरी, अंगों का प्रत्यारोपण, विकिरण आदि के क्षेत्र में जिस प्रकार प्रगति होती रही है, उसी तरह मनोरोगों, मनोव्यथाओं से मुक्ति की दिशा में बहाया जा सके, इसके प्रयोग भी प्रगति पर है।

इन प्रयोगों से निश्चय ही पीड़ित मानवता को लाभ होगा। लेकिन तभी जब इन्हें मस्तिष्कीय दुर्बलता और रुग्णता दूर करने तक ही सीमित रखा जाए। यदि चिन्तन की दिशा भी इसके द्वारा प्रतिबन्धित कर दी गई और महत्वाकांक्षी अधिनायक, जन समूह का उपयोग मक्खी, मच्छरों, भेड़ बकरियों की तरह करने लगे तो मानव जाति भयंकरतम विभीषिका में फंस जाएगी। यह अणुबमों के प्रयोग से भी अधिक भयानक विभीषिका होगी। सम्पूर्ण बौद्धिक दासता का एक निरंकुश साम्राज्य स्थापित हो जाएगा। सिर्फ सत्ताधारी समर्थ जन इस दासता से मुक्त होंगे और वे ही मनुष्य जाति के सार्वभौम स्वामी होगे, तब प्रगति की दिशाएं भी रुद्ध और बद्ध हो जायेगी। मानवीय प्रगति का आधार स्वतन्त्र चिन्तन ही है। यों भी उसे प्रभावित करने के सभी सम्भव हथकंडे सत्ताधारी अपनाते रहे हैं। धर्म कला, साहित्य, भाषण एवं दृश्य श्रव्य माध्यमों से मानवर मेधा को मोहित और मृतप्राय बनाने की चेष्टाएं पहले से ही होती रही है। अब विज्ञान का सहारा लेकर उस कार्य को अभूतपूर्व तत्परता और शक्ति के साथ पूरा किया जा सकेगा। इस भयानक अमानवीय षडयन्त्र के विरुद्ध विश्व व्यापी जनमत जागृत किया जाना चाहिए। यदि इस क्षेत्र में विज्ञान के सत्ताधारियों ने सफलता प्राप्त करली तो समझना चाहिए मानवी स्वतन्त्र चेतना का अन्त ही हो गया। ऐसा हुआ तो समझना चाहिए मनुष्य को सर्वदा के लिए प्रतिबन्धित कर दिया। इस दुर्भाग्य से बढ़कर मनुष्य जाति के लिए ओर किसी दुर्भाग्य की कल्पना भी नहीं की जा सकती। समय रहते हम आत्मा रक्षा के लिए सुरक्षात्मक उपाय कर सके तो ही इस संकट से बचा जा सकता है।

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