सच्चिदानन्द-परब्रह्म-परमात्मा
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ब्रह्मा को सत् आनन्द कहा गया है। सत् एग्जिस्टैन्स-स्थायित्व चित्-कान्शसनैस-चेतन। आनन्द ब्लिस एब्सौल्यूट-अन्त उल्लास। ईश्वर इन्हीं विशेषताओं से सम्पन्न है। जब जीवात्मा को अपने सम्बन्ध में भी ऐसी ही अनुभूति होने लगे तो समझना चाहिए कि ब्रह्म और जीवन की एकता बन रही है। आत्मा में परमात्मा का अवतरण हो रहा है।
सामान्यतया जीव पर शरीराध्यास ही छाया रहता है। पंच तत्वों से बनी काया में रमा होने के कारण वह अपने आपको नश्वर शरीर ही मानता है। उसके सुखों दुःखों को अपना सुख -दुःख समझता है। पदार्थों की लाभ-हानि ही उसे अपनी लाभ-हानि दीखती है। शरीर के सम्बन्धी ही उसे अपने सम्बन्धी लगते हैं। पदार्थ नश्वर है इसलिए वह अपने को पार्थिव होने के कारण मरण धर्म मानता है। मरने पर दुःखी होता है और जन्म -दिन पर खुशी मनाता है। यह प्रकृति -परायण मायाबद्ध जीव की स्थिति है। आत्म-ज्ञान द्वारा जब इस स्थिति का अन्त हो जाता है और अपनी सत्ता ‘सत्ता’अविनाशी दिखाई पड़ने लगती है तो शरीर और आत्मा के भेद पर विश्वास जमता है। तब भौतिक लाभ-हानि अपनी नहीं शरीर की-पराई प्रतीत होती है और अपने हित अनहित को आत्म-कल्याण में-आत्म सन्तोष में ढूंढ़ने लगता है जिसकी मनःस्थिति इस दिशा में चलने ढलने लगे समझना चाहिए उसने ईश्वर के एक तृतीयांश से संपर्क साध लिया।
ब्रह्मा का दूसरा गुण है-चित्त। ईश्वर व्यक्ति नहीं चेतन शक्ति है। विचारों एवं भावों की उत्कृष्टता में पवित्रता में ब्राह्मी सत्ता ज्योतिर्मय होती है। सौंदर्य वस्तुओं में नहीं भाव में दीखने लगें रस इन्द्रियों के माध्यम से नहीं भाव सम्वेदनाओं के रूप में मिलने लगें चिन्तन के क्षेत्र में आदर्शवादी उत्कृष्टता ही छाई रहे तो समझना चाहिए कि लोभ और भय के कारण दुष्कर्म बन पड़ने और दुर्भाव उठाने का आधार ही नष्ट हो गया। ब्रह्मचेतना में सदाशयता एवं सज्जनता के ही तत्व भरे रहते हैं। जिसका भाव संस्थान इस प्रकार की कोमलता जितनी संचय कर सके समझना चाहिए उसे उतने ही अनुपात में ब्रह्म सान्निध्य उपलब्ध हो चला।
ब्रह्मा की तीसरी धारा आनन्द है। आत्म-ज्ञानी उत्कृष्टता अपनाने वाला आन्तरिक दृष्टि से निरन्तर संतुष्ट प्रसन्न रहेगा दिव्य चिन्तन और दिव्य कर्त्तव्य में असाधारण रस है। प्रेम को परमेश्वर कहा गया है। प्रेम किसी व्यक्ति या वस्तु के प्रति असाधारण आसक्ति को समझा जाता है पर वस्तुतः वह वैसा है नहीं। प्रेम में उदारता,आत्मीयता का गहरा पुट रहने से उसका व्यावहारिक स्वरूप निस्वार्थ सेवा भावना बन जाता है। प्रेमी को अपने प्रेम पात्र के प्रति इसी प्रकार का दृष्टिकोण अपनाना और व्यवहार करना पड़ता है। सीमित क्षेत्र में भी ऐसी बुद्धि रहे तो प्रसन्नता होगी, आत्म-सन्तोष रहेगा। यदि यह आत्मीयता का क्षेत्र व्यापक हो तो आनंद की कमी नहीं रहेगी। कर्त्तव्य-पालन की प्रकृति हो तो परिणाम की प्रतीक्षा नहीं करनी पड़ती वरन् चिन्तन एवं कर्म ही आनन्द का स्रोत बन जाता है और पग-पग पर अन्तः उल्लास की अनुभूति होती रहेगी। जो हँसता-हँसाता दिखाई पड़े, जो हलकी फुलकी जिन्दगी जी रहा हो, जिसकी आँखों में आशा और उमंग चमकती हो, जिस पर आदर्शों की खुमारी छाई हो समझलो इस आनन्दी जीव ने आनन्द-कन्द परमेश्वर की समीपता का लाभ लेना आरम्भ कर दिया।
ईश्वरीय सान्निध्य की अनुभूतियाँ गोपनीय नहीं स्पष्ट होती हैं। वे भावमय-इमोशनल, स्फूर्तिवर्धक-इन्स्पायरिंग की नहीं स्पर्शनीय-ट्रेन्जिब्ल भी होती है। उसमें है। आदर्शों को कर्म में छलकता हुआ, चिन्तन को व्यवहार में क्रियान्वित होते हुए सहज ही देखा जा सकता है।

