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Magazine - Year 1977 - Version 2

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स्वास्थ्य रक्षा के नियमों में सभी सरल और स्वाभाविक हैं। उनमें न कोई कठोर हैं और न कष्टसाध्य। कठिन तो दुष्कर्म होते हैं। चोरी , उठाईगीरी , छल आदि दुष्कर्म करने के लिए असाधारण चतुरता और कुशलता की आवश्यकता पड़ती है किन्तु सचाई, ईमानदारी की राह पर चलना किसी अल्प बुद्धि वाले के लिए भी सरल है। इसी प्रकार प्रकृति प्रेरणा के अनुरूप जीवनयापन पशु पक्षी भी कर लेते हैं और आजीवन निरोग बने रहते हैं। सृष्टि के सभी जीवधारी जन्मते, बढ़ते ,वृद्ध पशु पक्षियों में कदाचित ही कभी कोई रोगी देखा गया हो। संसार में एक ही मूर्ख प्राणी है जो आये दिन बीमार पड़ता है, वह है-मनुष्य उसके चंगुल में फंसे हुए पालतू पशु भी बीमार होते पाये जाते हैं। मनुष्य ही है जो स्वयं बीमार पड़ता है ओर अपने संपर्क अधिकार के अन्य प्राणियों को बीमार करता है। यह अभिशाप असंयम का-प्रकृति प्रेरणा के विपरीत आचरण करने का है यदि कुचाल चलने की मूर्खता को छोड़ दिया जाय तो सृष्टि अन्य प्राणियों की तरह मनुष्य के लिए भी सक्षम और निरोग जीवनयापन नितान्त सरल एवं सम्भव हो सकता है।

प्रकृति प्रेरणा का अनुगमन करके सभी जीवधारियों ने अपने शरीरों को निरोग बनाये रहने का वरदान पाया है। मनुष्य के लिए भी एकमात्र रास्ता यही है। प्रकृति के नियमों को झुठलाया नहीं जा सकता। उसके उल्लंघन की क्षमता मनुष्य में नहीं है। यहाँ बरती गई चतुरता में लाभ नहीं, हानि ही हानि है। प्रकृति से लड़कर नहीं हम उसका अनुगमन करके ही चैन से रह सकते हैं। यह तथ्य यदि हृदयंगम किया जा सके तो मनुष्य जाति के सामने खड़ी स्वास्थ्य संकट की विषम विभीषिका से सहज ही छुटकारा पाया जा सकता है। यदि सही राह पर चलने का साहस जुटाया जा सके-विकृत जीवन क्रम अपनाये रहने का दुराग्रह छोड़ा जा सके तो आरोग्य रक्षा, निरोगता एवं दीर्घजीवन की समस्या का सहज ही समाधान हो सकता है। कुछ थोड़े से नियम अनुशासन ही ऐसे है जिन्हें यदि दृढ़तापूर्वक अपनाया और स्वभाव का अंग बनाया जा सकें तो न केवल बिगड़े हुए स्वास्थ्य को ही सुधारा जा सकता है, वरन् संयम साधना के फलस्वरूप मिलने वाली बलिष्ठता एवं दीर्घजीवन का वरदान भी पाया जा सकता है। इस प्रकार के नियमों में सात प्रमुख माने गये है। इन्हें आरोग्य सूर्य की सप्त वर्ण, सप्त किरणें भी कहा जा सकता है।

(1) कड़ी भूख लगने पर ही खाया जाय। जब तक पेट की तीव्र माँग न हो तब तक मुंह में कुछ भी न डाला जाय। जब खाना हो तब आधा पेट आहार से भरा जाय। चौथाई पानी के लिए और चौथाई हवा के लिए खाली रखा जाय। ठूंस ठूंसकर इतना न खाया जाय कि आलस्य आने लगे और काम करना कठिन हो जाय। मुख के ग्रास को इतना चबाया जाय कि वह पतला होकर सहज ही गले से नीचे उतर जाय। दिन में दो बार खाना पर्याप्त है। बीच बीच में बकरी की तरह कुछ कुछ खाते रहने का स्वभाव न बनाया जाय। प्रातः जलपान में भारी चीजें न ली जायें। दूध, छाछ, फलों का रस , शाक का सूप जैसे पतले पदार्थ ही जलपान के लिए पर्याप्त समझे जाय। तीसरे प्रहर जरूरत पड़े तो ऐसे ही तरल पदार्थ लिए जा सकते हैं।

(2) खाद्य पदार्थों को न्यूनतम अग्नि संस्कारित किया जाय। तेल, घी में तलने भूनने की रीति अपनाकर उनका जीवन तत्व समाप्त न किया जाय। सब्जियों को उबाल लेना पर्याप्त है। जहाँ तक हो सके अन्न, फल, शाक, छिलके समेत ही लिया जाय। छिलके वाले भाग में आहार का अधिक महत्वपूर्ण तत्व रहता है। दालें साबुत ही पकाई जाय। तेज आग पर पकाने से खाद्य पदार्थों के जीवन तत्व जल जाते हैं इसलिए उन्हें मन्दी आग पर पकाया जाय। अच्छा तो भाप से पकाना है। इसके लिए स्टीम कुकर का उपयोग किया जा सके तो उत्तम है मौसमीफल कच्चे शाकों का सलाद, कच्चे अन्न,अंकुरित धान्य ,दूध, दही जैसे सात्विक एवं पौष्टिक पदार्थ ही उपयोग में लाये जायें। मिष्ठान, पकवान, गरिष्ठ, अधिक चिकनाई एवं मसाले पड़े भोजन से बचा जाय। आचार, चटनी जैसे उत्तेजक पदार्थों से बचा जाय। थाली में अधिक संख्या वस्तुएं न रहे। उनकी संख्या जितनी कम रहे उतनी ही पाचन में सुविधा रहेगी।

(3) शारीरिक श्रम इतना किया जाय जिससे थक कर गहरी निद्रा का आनन्द लिया जा सके। शरीर से कम और मस्तिष्क से अधिक काम लेने वाले अक्सर बीमार पड़ते हैं पशु पक्षी सारे दिन आहार की तलाश में दिन भर भागते दौड़ते, उड़ते उछलते रहते हैं इसलिए उनके शरीर निरोग एवं बलिष्ठ बने रहते हैं। हमारी जीवनचर्या में भी शारीरिक श्रम के लिए समुचित स्थान होना चाहिए। व्यायाम में स्वास्थ्य सम्वर्धन साधना का मनोयोग जुड़ा रहता है इसलिए उससे दुहरा लाभ है। शरीर की स्थिति के अनुरूप हलके भारी थोड़े बहुत व्यायाम का क्रम भी दिनचर्या में जोड़ कर रखा जाय। घर के कामकाज में हाथ बंटाना, टूट फूट की मरम्मत, सफाई, घरेलू शाक वाटिका, गृह उद्योग, चक्की पीसना जैसे कामों में परिवार के सभी लोग भाग लेते रहे तो शारीरिक श्रम के अतिरिक्त सुव्यवस्था, आर्थिक लाभ भी मिलेगा और सुरुचि, सुसज्जा का वातावरण दृष्टिगोचर होगा। रुग्ण दुर्बल व्यक्ति भी चारपाई पर पड़े पड़े अंग संचालन व्यायाम करते रह सकते हैं। मालिश से भी इस प्रयोजन की पूर्ति होतीं है। श्रम शारीरिक स्थिति के अनुरूप हो। लोभ या दबाव से वह इतना अधिक न हो जाय कि अत्यधिक शक्ति नष्ट होने से थकान चढ़ी रहे और जीवन संकट उत्पन्न होने लगे। श्रम और विश्राम का सन्तुलन मिलाकर चला जाय तो ही बात बनती है।

(4) स्वच्छता से शारीरिक और मानसिक स्वास्थ्य की व्यवस्था बनी रहती है।घर, आंगन, कपड़े, बिस्तर, बर्तन , खाद्य पदार्थ, पानी आदि में गन्दगी न रहने पाये इसके लिए सतत् सतर्कता बरतने और उन्हें स्वच्छ रखने के उपाय बरतने की आवश्यकता होती है। खुली धूप और हवा का घरों में प्रवेश रहना चाहिए। सीलन , घुटन के वातावरण में रहने से रुग्णता आ घेरती है। वृक्ष, पौधे, बेलें, फूल, तुलसी आदि की हरियाली घर, आंगन में रहे तो उससे सुन्दरता सुसज्जा के अतिरिक्त स्वच्छ वायु का लाभ भी मिलता है। टट्टी, पेशाब, स्नान, घर, नाली, कूड़ेदान, बरतन मांजने का स्थान, रसोई घर आदि की सफाई पर विशेष रूप से ध्यान रखा जाय। प्रायः इन्हीं स्थानों पर गन्दगी जमती और रुग्णता पलती है। मक्खी, मच्छर, खटमल, पिस्सू मकड़ी, जुए आदि बढ़ने पलने न पाये, इसकी सतर्कता रखी जाए। फिनायल, चूना, साबुन, डिटोल आदि का समय समय पर उपयोग करते रहा जाय। बुहारी और झाड़न जल्दी ओर बार बार काम में लाये जाय। गरम पानी और धूप का उपयोग सफाई में सहायक सिद्ध होता है। स्नान तौलिये से रगड़ कर इस प्रकार किया जाय कि किसी भी अवयव पर मैल की परत जमा न रहने पाये। दाँत, मुख एवं अन्य छिद्रों की सफाई पर विशेष ध्यान रखा जाय।

(5) नियमितता का सदा ध्यान रखा जाय। यथासम्भव दिनचर्या नियत निर्धारित रखी जाय। जिनकी नौकरी में ड्यूटी बदलती रहती है या दिन रात भाग दौड़ करनी पड़ती है उन्हें भी स्थिति के अनुरूप अपनी दैनिक समय व्यवस्था बनाते और बदलते रहना चाहिए। जिनकी कार्य पद्धति नियत निर्धारित है उन्हें तो समय का विभाजन करने और दृढ़तापूर्वक पालन करने की बात ध्यान में रखनी ही चाहिए। जल्दी सोना और जल्दी उठना बहुत अच्छी आदत है। प्रातःकाल का समय जिन कार्यों के लिए प्रयुक्त किया जाता है। उनमें अधिक सफलता मिलती है। सवेरे जल्दी उठना उन्हीं के लिए सम्भव है जो रात को जल्दी सोते हैं। अन्यथा निद्रा पूरी न हो सकेगी। इंद्रियों से सीमित काम लिया जाय। रात्रि को तेज प्रकाश में आँखों पर दबाव डालने वाले काम न किये जायं। ब्रह्मचर्य का अधिक पालन किया जायं समय विभाजन में नित्यकर्म, आजीविका विश्राम, मनोरंजन, परिवार व्यवस्था, स्वाध्याय, उपासना लोक सेवा के सभी पक्षों का समावेश रखा जाय। उपार्जन में ही पूरा समय न खपा दिया जाय।

(6) चित्त को हर घड़ी प्रसन्न रखा जाय। जिन्दगी को खेल की तरह जिया जाय। हर काम उत्साह और मनोयोग के साथ किया जाय, पर सफलता असफलता से अत्यधिक उद्विग्न न बना जाय। तैयारी बड़ी से बड़ी की किन्तु असफलता हाथ लगने पर सन्तुलन बनाये रहने की मनःस्थिति भी रखे रहे मन पर छाये रहने वाले निराशा भय, आशंका, भीरुता, आत्म हीनता, संकोच जैसे अवसाद और क्रोध ईर्ष्या, द्वेष, प्रतिशोध, चिन्ता, उद्विग्नता, कामुकता जैसे आवेश केवल हानि ही हानि करते हैं। ज्वार भाटों की तरह मन को उछलने, गिरने न देना चाहिए। इसमें बहुमूल्य मनःस्थिति का दुरुपयोग होता है और प्रगति के लिए रचनात्मक चिन्तन करने की क्षमता ही नष्ट हो जाती है। मनोविकारों से उत्तेजित मस्तिष्क से अगणित शारीरिक और मानसिक रोग उत्पन्न होते हैं। वासना, तृष्णा ओर अहंता की मात्रा जितनी बढ़ी चढ़ी होगी मस्तिष्क में इतनी ही आग जलेगी और उतनी ही अशान्ति रहेगी। जो है। उस पर प्रसन्न रहा जाय, अधिक पाने के लिए उत्साहपूर्वक प्रयत्न किया जाय किन्तु अभीष्ट लाभ न मिलने पर खिन्न होने की आदत न डाली जाय। सादगी, सचाई, ईमानदारी, सज्जनता, सहृदयता, प्रसन्नता भरा स्वभाव बना लेना और मानसिक सन्तुलन बनाये रहना बहुत बड़ा गुण है जिसके आधार पर जीवन को सफलतापूर्वक जिया जा सकता है और आनन्दित रहा जा सकता है। ऐसी स्थिति रहने पर शारीरिक और मानसिक दोनों ही स्वास्थ्य दृष्टि से अक्षुण्ण बना रहता है। महत्वाकाँक्षा, जिम्मेदारी एवं आवश्यकताएं उतनी ही बढ़ाई जाय जितनी वर्तमान स्थिति के अनुरूप हो। अधिक बच्चे पैदा करने और इतनी अधिक लम्बी चौड़ी योजना बनाना जिनका ताल मेल वर्तमान स्थिति के साथ न बैठना हो, जीवन क्रम में नरक घोलने एवं स्वास्थ्य को नष्ट करने काक मार्ग ही कहा जा सकता है। हलकी फुलकी, हंसती हंसाती, प्रसन्न, सन्तुष्ट, उत्साहित, आनन्दित और आशान्वित जिन्दगी जीने की रीति नीति अपनाई जाय तो गरीबी ओर कठिनाइयों के रहते हुए भी आनन्द, उल्लास भरा निरोग जीवन जिया जा सकता है।

(7) स्वास्थ्य संरक्षण के लिए नैतिक और सामाजिक मर्यादाओं का पालन आवश्यक हैं। दुष्टता, अनीति और उच्छृंखलता अपनाने वाले व्यक्ति भरपूर सुख सुविधाओं के रहते हुए भी आत्म प्रताड़ना सहते रहते हैं और शोक सन्ताप भरा जीवन जीते हैं। आहार बिहार से स्थूल शरीर का-सन्तुलन और सत चिन्तन से सूक्ष्म शरीर का-एवं सौजन्य सद्भाव से कारण शरीर का स्वास्थ्य संरक्षण होता है। मात्र हाड़ मांस का शरीर ही सम्पूर्ण आरोग्य का केन्द्र नहीं

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