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Magazine - Year 1977 - Version 2

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आत्मा साधना का उपयुक्त वातावरण हिमालय की छाया

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First 20 22 Last
श्रीमद्भागवत् के बारहवें स्कन्ध में दूसरे अध्याय के तीसरे श्लोक में हिमालय में दिव्य सिद्ध पुरुषों का निवास बताया गया है और उनके समवेत होने के केन्द्र की कलाप कहा गया है। 10 वें स्कन्ध के 87 वें अध्याय के 5, 6, 7, श्लोकों में भी ऐसा ही वर्णन है। थियोसाथी सम्प्रदाय के क्षेत्र में सिद्ध पुरुषों की पार्लमेन्ट होने और अध्यात्म क्षेत्र के महत्वपूर्ण फैसले होते रहने की बात कही गई है। ओटोवायों आफ योगी ग्रन्थ में ऐसे अनेक प्रसंगों का उल्लेख है जिसमें हिमालय के सिद्ध योगियों के विलक्षण कर्तृत्वों का विवरण है। पाल ब्रिटन और रम्पा जैसे शोधकर्ताओं ने इस क्षेत्र में समर्थ सिद्ध पुरुषों का अस्तित्व पाया है। दो सौ वर्ष जीवित रहने वाले स्वामी कृष्णाश्रय ने हिन्दू विश्वविद्यालय की आधार शिला रखी थी। वे नग्न अवधूत की तरह हिम प्रदेश में निवास निर्वाह करते थे। जिन लोगों को भी ऐसे शरीरधारी और अशरीरी सिद्ध पुरुषों के साक्षात्कार यहाँ होते रहते हैं, जिनके उनके साथ संपर्क सधे है उनमें इन पंक्तियों का लेखक भी एक हैं।

हिमालय में छोटे बड़े जितने देवस्थान है उतने अन्यत्र मिलने कठिन है। अमरनाथ, ज्वालामुखी, हरिद्वार, केदारनाथ, बद्रीनाथ, गंगोत्री, पशुपतिनाथ तो प्रख्यात है ही। इनके समीपवर्ती क्षेत्रों में छोटे छोटे तीर्थों की तो शृंखला ही बिखरी पड़ी है। ऋषिकेश से बद्रीनाथ जाने के मार्ग में ही देव प्रयाग, नन्द प्रयाग, कर्ण प्रयाग आदि कितने ही प्रयाग तथा उत्तरकाशी, गुप्त काशी, दिव्य काशी आदि कितने ही तीर्थ मिलते हैं। शिव और शक्ति के विभिन्न काम रूपों के देवस्थान थोड़ी थोड़ी दूर पर गामों के समीप एवं पर्वतीय घाटियों में सर्वत्र पाये जाते हैं। सती के आत्म विसर्जन का-पार्वती की तप साधना का यही साधन है। शिव ताण्डव भी यही हुआ था। उस अवसर पर प्रयुक्त हुआ त्रिशूल उत्तरकाशी के एक प्राचीन स्थान में स्थापित बताया जाता है। जमदग्नि और परशुराम की तप साधना उत्तरकाशी में संपन्न हुई थी।

आयुर्वेद, रसायन विद्या, अस्त्र संचालन, साहित्य सृजन, योगानुसंधान जैसे महत्वपूर्ण प्रयोग हिमालय क्षेत्र की सुविस्तृत प्रयोगशाला में होते रहे हैं। सप्त ऋषियों के- महामनीषी देव मानवों के कार्यक्षेत्र इसी भूमि में रहे हैं। छात्रों के लिए गुरुकुल और श्रेयार्थियों के लिए आरण्यक यही थे। राजतंत्रों के सूत्र संचालक वशिष्ठ जैसे धर्माध्यक्षों के निवास इसी भूमि में थे। प्रायः सभी महत्वपूर्ण ऋषि कल्प देवात्माओं की विविध विधि गतिविधियाँ हिमालय की सुरम्य घाटियों और कन्दराओँ में सुविकसित होती रही है। उन प्रयोगों से लाभान्वित होकर विशाल भारत के 33 करोड़ निवासी तेतीस कोटी देवता कहलाते रहे हैं। भौतिक और आत्मिक प्रगति की उच्चस्तरीय विभूतियों से भरी पूरी होने के कारण भारत भूमि स्वर्गादपि गरीयसी कहलाती है। गरीयसी न सही स्वर्ग तो वह रही ही है। यह अनुदान हिमालय क्षेत्र से ही अवतरित होता रहा है। जलधारा वाली भागीरथी ही नहीं देव लोक की ज्ञान गंगा का अवतरण एवं प्रवाह भी इसी क्षेत्र से आरम्भ होता रहा है।

इतिहास और भूगोल की दृष्टि से स्वर्ग कोई ऐसा स्थान विशेष होना चाहिए जहां लोगों का आना जाना बिना किसी विशेष कठिनाई के होता रहता हो। जहाँ भौतिक समृद्धियों और आत्मिक विभूतियों का बाहुल्य रहता हो। दशरथ, अर्जुन, नारद आदि के ऐसे कितने ही कथानक है जिनमें स्वर्ग जाना और वापिस आना उसी प्रकार बताया गया है जैसे हम सामान्य स्थानों पर बिना अधिक कठिनाई उठाये आते जाते रहते हैं। पाण्डवों के स्वर्गारोहण की तुक इस प्रकार बैठती है कि वे जीवन के अन्तिम दिनों उसी शान्तिमय क्षेत्र में निवास करने के लिए चले गये थे।

पांडवों ने अन्त समय स्वर्ग के लिए प्रयाण किया था। वह स्वर्गारोहण पर्वत अभी भी वसोधरा पठार के आगे विद्यमान है। व्यास जी ने जहां महाभारत लिखा था वह व्यास गुफा वही है उन्हीं के पास लिपिकार गणेश रहते थे। गणेश गुफा भी व्यास गुफा के समीप ही है। यह स्वर्ग क्षेत्र उस प्रदेश में था जिसे बद्रीनाथ और गंगोत्री का मध्यवर्ती भाग कह सकते हैं यही हिमालय का हृदय है।

दिव्यदर्शियों का कथन है कि ब्रह्मांड की सघन अध्यात्म चेतना का धरती पर विशिष्ट अवतरण इसी क्षेत्र में होता है। भौतिक शक्तियों के धरती पर अवतरण का केन्द्रबिन्दु विज्ञान जगत में ध्रुव प्रदेश को माना जाता है। अध्यात्म जगत में वैसी ही मान्यता इस हिमालय के हृदय के सम्बन्ध में है। यह स्वर्ग क्षेत्र ब्रह्माण्ड व्यापी दिव्य चेतनाओँ का अवतरण केन्द्र है जहाँ शोध करते हुए, तप करते हुए, महामनीषी अपने को देव शक्तियों से सुसज्जित करते थे। अभी भी उस क्षेत्र में स्थूल और सूक्ष्म शरीरधारी दिव्य सत्ताओँ के अस्तित्व पाये जाते हैं। वे अपने क्रिया कलाप से समस्त भूमण्डल को प्रभावित करते हैं।

इन्द्र देवता की सहायता के लिए दशरथ जी अपना रथ लेकर गये थे। पहिया गड़बड़ाने लगा तो कैकेयी ने अपनी उंगली लगाकर उस विपत्ति का समाधान किया था। ठीक इसी प्रकार का एक और वर्णन यह मिलता है कि अर्जुन इन्द्र की सहायता करने गये थे, प्रसन्न होकर इन्द्र ने अर्जुन को रूपसी, उर्वशी का उपहार दिया था जिसे उसने अस्वीकार कर दिया था। जहाँ मनुष्यों का आवागमन सम्भव हो सके ऐसा स्वर्ग धरती पर ही हो सकता है। इन्द्र और चन्द्र देवताओं का गौतम ऋषि की पत्नी अहिल्या से छल करना धरती पर ही सम्भव है। दधीचि ने अपनी अस्थियाँ याचक देवताओं को प्रदान की थी। आदि आदि अगणित उपाख्यान ऐसे है जिसमें देवताओं और मनुष्यों के पारस्परिक घनिष्ठ सहयोग की चर्चा है। इन पर विवेचनात्मक दृष्टि से विचार करे तो उसी निष्कर्ष पर पहुंचना पड़ता है कि स्वर्ग कही भूमि पर ही होना चाहिए और देवता , मनुष्यों का कोई वर्ग विशेष ही होना चाहिए। इसका समाधान उत्तराखण्ड को देव भूमि स्वर्ग मान लेने से ही हो सकता है। देवर्षि नारद का बार बार विष्णुलोक में जाना और वहाँ के अधिपति विष्णु से साँसारिक समस्याओं पर विचार विनिमय करना तभी सही सिद्ध होगा जब हम उस पुण्यभूमि को स्वर्ग के रूप में मान्यता दे। उस क्षेत्र में अभी भी भ्रमण करके ऐसे अनेकानेक प्रमाण उपलब्ध किये जा सकते हैं जिनके आधार पर पौराणिक स्वर्ग की संगति इस क्षेत्र के साथ बिठाई जा सके।

प्राचीन काल में देव मानव इसी क्षेत्र में निवास करते रहे हैं। भौतिक और आध्यात्मिक वातावरण उन्हें हर दृष्टि से उपयुक्त लगा होगा और वे यही निवास करने लगे होगे। यहाँ रहकर वे शान्त चित्त से धर्म तन्त्र की उपलब्धियों से समस्त विश्व को लाभान्वित बनाने की विविध विधि योजनाएं बनाते थे, तैयारियाँ करते थे और साधन जुटाते थे। इन कष्टसाध्य महा प्रयासों का नाम ही तप था। तपस्वी देवता एक प्रकार के अध्यात्म विज्ञान के शोधकर्ता और विभूति उत्पादक कहे जा सकते हैं। यह क्षेत्र ऐसी वैज्ञानिक प्रयोगशालाओं से भरा पड़ा था जिनमें शरीर यन्त्र और मनःतन्त्र के भीतर छिपे हुए शक्तिशाली रहस्यों का अधिकाधिक अनावरण सम्भव हो सके। शास्त्रों का सृजन ,योगाभ्यास की उपलब्धियाँ अध्यात्म दर्शन का विकास, स्वास्थ्य , चिकित्सा शिक्षा, शास्त्र, रसायन, शिल्पकला आदि की भौतिक और आध्यात्मिक उपलब्धियाँ इसी क्षेत्र से निकल कर आती थी ओर उनसे लाभान्वित होने वाले उसे स्वर्ग निवासी देवताओं का वरदान कहकर अपनी श्रद्धा व्यक्त करते थे।

देवार्चन हर मनुष्य का कर्तव्य था ताकि उस क्षेत्र में किसी प्रकार का अभाव अनुभव न हो। गीता में यज्ञ से देवताओं की पुष्टि की बात कही गई है, इसे सर्वसाधारण द्वारा देव प्रयोजनों के लिए विविध विधि अनुदान प्रस्तुत करना ही समझा जाना चाहिए। यज्ञ का सीधा अर्थ दान एवं त्याग, बलिदान है। देव प्रयोजनों के लिए श्रम,समय, मन, धन आदि से सहयोग करते रहना है। यज्ञ से पूजित देवता मनुष्यों पर सुख शान्ति बरसाते हैं। और यज्ञ न करने वाले विपत्ति में फंसते हैं। इस गीता वचन में सामान्य प्रयोजनों को देव वर्ग को देव कर्म को, समुचित सहयोग प्रदान करते रहने की अनिवार्य आवश्यकता का उद्बोधन कराता है। यह देवता और कोई नहीं- उस समय स्वर्ग क्षेत्र में निवास करके धर्म प्रेरणा के-भावनात्मक परिष्कार के विविध विधि आधारों का निर्माण करने वाले महामानव ही थे। समस्त धरती पर स्वर्गीय परिस्थितियों का निर्माण करने के लिए उनका महा प्रयास, जन साधारण को देव वन्दन एवं देव पूजन के लिए अनायास ही प्रेरित करता था

हिमालय की शोभा का वर्णन करते हुए तत्वज्ञानी कवि कहता है-

देव सेव्य च तत्स्थानं दैवत नाँ च दुर्लभम महा पुण्य महोपुण्य पूरषैरव लौकितम नैतत केवल मक्षाणाँ सदैवहादक मुनें सर्व पुण्य महातीर्थ मूर्द्व भूषेत विद्वितम

यह स्थान देवताओं द्वारा सेवनीय परम दुर्लभ और महान पुण्यप्रद है। इसका पुण्यात्मा लोग ही अवलोकन करते हैं। हे नारद ! यह स्थान केवल इन्द्रियों को सुख प्रदान करने वाला ही नहीं, किन्तु उसे समस्त महान तीर्थों का शिरोमणि जानों।

तथाहिन कलधौताभैः सायंच कनक प्रभैः प्रहर्षयति या चित्त पर्वताग्रेर लौकिके किमयं तपनीयादिं्र किवा रजत पर्वत इति सदेंहा तो यत्र बाढ़ मुहयन्ति मानवः

दिन में चांदी के प्रकाश वाले और सायं सुवर्ण के प्रकाश वाले दिव्य पर्वत शिखरों से चित्त को अत्यन्त आह्लाद प्राप्त होता है। मनुष्य संदेहग्रस्त होकर सोचता है कि क्या यह सोने का पर्वत है? क्या यह चांदी का पर्वत है?

सौंदर्य बह्मणों रूप प्रकृत्या मनु वर्तते प्रकृतेर्नास्ति सौंदर्य स्वस्वरुपात्मको गुणा तादृशास्तादृशो स्थाने ब्रहा सौंदर्य दीपिते। ब्रह्मसम्पति मायान्ति भावाविष्टधियोबलात

सौंदर्य ब्रह्म का ही स्वरूप है। प्रकृति स्वयं सुन्दर नहीं है वह ब्रह्म के प्रकाश से ही सौंदर्यवान होती है।

ब्रह्म सौंदर्य से संपन्न ऐसे पुण्य स्थानों में ब्रह्मवित् लोग भावाविष्ट होकर स्वयमेव ब्रह्म समाधि को प्राप्त हो जाते हैं।

कैलाश ओर मानसरोवर भारतीय हिमालय क्षेत्र में ही थे और अभी भी है। कैलाश वासी शंकर जी के सिर से गंगा प्रवाहित होती है। इसकी संगति तिब्बत में स्थिति कैलाश पर्वत से नहीं मिलती। क्योंकि वहाँ से गंगा का गोमुख तक आना भौगोलिक स्थिति के कारण किसी भी प्रकार सम्भव नहीं है। गंगोत्री से जेलूखागा घाटी होकर कैलाश करीब 300 मील है फिर बीच में कई आड़े पहाड़ आये है जिसके कारण भी कोई जलधारा या हिमधारा वहाँ तक नहीं आ सकती। असली शिव लोक इस धरती के स्वर्ग में ही हो सकता है। गंगा ग्लेशियर शिवलिंग के समीप है। स्वर्ग गंगा भी वही है। गौरी सरोवर वहाँ मौजूद ही है। इस प्रकार गंगा धारण करने वाले शिव का कैलाश यह हिमालय का हृदय ही हो सकता है। यदि प्राचीन कैलाश यहां न रहा होता तो भागीरथजी यहाँ तप क्यों करते? वे तिब्बत वाले कैलाश पर ही शिव के समीप क्यों न जाते? इस पुण्य प्रदेश में शिवलिंग , केदार शिखर ओर नीलकण्ठ शिखर यह तीनों ही शिवजी के निवास है मानसरोवर का भी इस देवभूमि में होना स्वाभाविक है। सुरालय, हिमधारा, सत्पथ हिमधारा तथा वरुण वन नामों से भी इसी प्रदेश का देवभूमि होना सिद्ध है अष्ट वसुओं ने जिस स्थान को अपना निवास बनाया वह वसुंधरा भी अलकापुरी के पास ही है। इन सब बातों पर विचार करने से वास्तविक कैलाश और मानसरोवर इसी प्रदेश में अवस्थित सिद्ध होते हैं।

आजकल का तिब्बत प्रदेश वाला कैलाश अब विदेशी प्रतिबंधों के कारण यात्रा की दृष्टि से दिन दिन असुविधाजनक हो रहा है। वहाँ डाकुओं का भी भय सदा रहता है। दूरी भी बहुत है उस प्रदेश में भारतीय वातावरण भी नहीं है।, न अपनी भाषा न संस्कृति। वहाँ जाकर विदेश सा अनुभव होता है। जिस समय भारत की संस्कृति का वहाँ तक विस्तार रहा था उस समय वह तीर्थ उपयुक्त रहा होगा, पर शिव का वास्तविक निवास, गंगा का वास्तविक उद्गम और सच्ची आध्यात्मिक मानसरोवर का दर्शन करना हो तो हमें इस हिमालय के हृदय धरती के स्वर्ग में वास्तविक कैलाश की खोज करनी पड़ेगी। परीक्षा के लिए व्यक्ति तिब्बत वाले कैलाश और इस हिमालय के हृदय वाले कैलाश की यात्रा करके देखे, वह स्वयं अनुभव करेगा कि धरती के स्वर्ग प्रदेश वाला कैलाश कितना शान्तिप्रद एवं कितने दिव्य वातावरण से परिपूर्ण है। वस्तुतः असली कैलाश ओर मानसरोवर इसी क्षेत्र में है। उस पर किसी विदेशी की छाया भी नहीं पड़ सकती।

हिमालय को भारतीय संस्कृति का प्रत्यक्ष उद्गम स्रोत कहा जाय, तो इसमें कुछ भी अत्युक्ति न होगी। इतिहासकारों के अनुसार आर्य लोग मध्य एशिया से आकर हिमालय क्षेत्र में बसे और इसके उपरांत भारत के मैदानी प्रदेश में उतरे थे।

स्वर्ग का वर्णन पुराणों में आता है। उसकी प्रायः सूक्ष्म व्याख्या में उदात्त दृष्टिकोण और उत्कृष्ट भाव अभिव्यंजना के रूप में व्याख्या होती है। जो उचित भी हैं पर यदि उसका भौगोलिक स्वरूप ढूंढ़ना हो, और सौंदर्य वातावरण को परखना हो तो वह किसी ग्रह नक्षत्र में नहीं वरन् अपनी धरती पर ही परिलक्षित होता है। उपाख्यानों के आधार पर हिमालय को धरती का स्वर्ग कहा जा सकता है।

महाभारत की एक आख्यायिका है कि अर्जुन द्रौपदी से कोई उपहार मांगने का हठ करते है, उत्तर में संकोच पूर्वक द्रौपदी याचना करती है कि - मेरे लिए नन्दन वन के पारिजात पुष्प ला दे, जो जल में नहीं पत्थरों में पैदा होते है। जिनका सौंदर्य दिव्य सौंदर्य की अनुभूति करा देता है। अर्जुन हिमालय जाते हैं। नन्दन वन पहुंचते हैं। रक्षक से युद्ध करते हैं और वहाँ से एक पारिजात पुष्प द्रौपदी के लिए लाते हैं।

नन्दन वन हिमालय क्षेत्र के पुष्पोद्यान का नाम है। यह गौमुख के आगे तपोवन पार करते ही मिलता है, शिव लिंग पर्वत के समीप ही यह क्षेत्र बिखरा पड़ा है। यहाँ वर्षा के उपरान्त बसन्त आता है। और सारा क्षेत्र फूलों के गलीचे की तरह नयनाभिराम बन जाता है।

ऐसा ही एक उद्यान यातायात की दृष्टि से सुगम भी मिलता है। यह फूलों की घाटी के नाम से प्रसिद्ध है। समुद्र तल से 13200 फीट की ऊंचाई पर अवस्थित यह क्षेत्र विश्व विख्यात है। इस 10-15 मील के क्षेत्र में प्राकृत रूप से उगने वाले हजारों प्रकार के चित्र विचित्र पुष्प अनायास हो उगते हैं। संसार में ऐसा सुन्दर और अद्भुत क्षेत्र अन्यत्र कही नहीं है। इसे देखने के लिए हजारों देशी विदेशी पर्यटक हर साल पहुंचते है। प्रकृति की अनुपम छटा देख कर धन्य बनते हैं। विशेषज्ञों का अनुमान है कि यह उत्पादन प्रकृति का नहीं वरन् विचार शील व्यक्तियों का अतीत काल में किया गया शुभारम्भ है। यह पौधे सुनियोजित ढंग से विकसित किये गये हैं सम्भव है, यहां कोई राजोद्यान अथवा किसी महर्षि का तपोवन आश्रम रहा होगा। पुष्प ही नहीं इस क्षेत्र में बहुमूल्य वनौषधियाँ भी मिलती है। इस क्षेत्र में समय समय पर यज्ञों के उपकरण, बहुमूल्य धातु पात्र, आभूषण, अस्त्र आदि भी मिलते रहे हैं। जिनसे प्रतीत होता है। कि यह क्षेत्र जनशून्य नहीं रहा। यहाँ कोई सुविकसित लोग रहते रहे हैं।

इंग्लैंड की श्रीमती जान लेग इस क्षेत्र के पुष्पानुसंधान में वर्षों लगी रही, उन के 500 से भी अधिक प्रकार के पुष्प बीज संग्रह करके अपने देश भेजे थे। वैसे लगभग 3000 किस्म के ऐसे फूल इस क्षेत्र में पाये जाते हैं, जो प्रयत्न पूर्वक उगाये गये , गुलाब आदि का शिर नीचा कर देते हैं। यहाँ उगने वाला ब्रह्म कमल ही वह पुष्प है जिसके लिए द्रौपदी ने अर्जुन से याचना की थी।

जोशी मठ तक पक्की सड़क है। जोशी मठ से बद्रीनाथ जाने वाली सड़क पर मध्य में गोविन्द घाट मोटर से उतरना पड़ता है। वहाँ से 7 मील पैदल चलकर बाबरिया तक पहुंचना पड़ता है। यहाँ से मुख्य घाटी तक पहुँचने में एक घण्टा लगता है। कामेट झरना उस क्षेत्र का बहुत ही सुहावना निर्झर है क्यूड गांव से ही , पुष्प घाटी आरम्भ हो जाती है। यह 10-15 मील के घेरे में फैली हुई है।

घाटी के दाहिने पक्ष में कुबेर भण्डार पर्वत है, किंवदंती है कि यही कही देवलोक के कोषाध्यक्ष कुबेर की बहुमूल्य सम्पदा अभी भी दबी पड़ी है।

गंगा ग्लेशियर से आगे गहन हिमधारा व वरुण वन क्षेत्र है कहते हैं कि यह इलाका वरुण देवता का कार्य क्षेत्र रहा है यहाँ से सुमेरु पर्वत भली प्रकार दिखाई देता है। यहाँ प्रात सायं के सूर्योदय एवं सूर्यास्त काल में सुनहरा दिखाई पड़ता है। सुनहरी सूर्य किरणें बर्फ से ढकी चोटियों पर प्रतिबिंबित होती है। और यह पर्वत ऐसा लगता है मानों वह सोने का बना हो। पुराणों में सुमेरु पर्वत देवताओं का निवास और स्वर्ण का बना बताया गया है। यह उपमा प्रातः और सायं कालीन सुमेरु के स्वर्ण की तो नहीं, पर स्वर्णवत आभावान देखते हुए अभी भी चरितार्थ होती है। स्वर्ग में सुमेरु होने के कथन से इस क्षेत्र को स्वर्ग कहा जा सकता है।

हिम प्रदेश में इन्द्र धनुषों की बाढ़ रहती है। झरनों में, उड़ती फुहारों में, बादलों में घाटियों में नमी के कारण उन पर प्रतिबिंबित होने वाली सूर्य किरणें चित्र विचित्र प्रकार के इन्द्र धनुष बनाती है। लगता है देवताओँ के यह सप्त वर्ण आयुध इस क्षेत्र में अपना और अपने अधिपति देव सत्ताओं का अस्तित्व इस क्षेत्र में होने का प्रमाण करते हैं।

हिमालय भारत का सुरक्षा प्रहरी है। तीन सीमाएं समुद्र घेरे हुए है। उत्तर दिशा में गवोनत मस्तक किये हिमालय खड़ा है। यों मध्य एशिया में हमले होते तो रहे हैं, पर इस दुस्साहस में आक्रमणकारियों को लोहे के चने चबाने पड़े है। चीन ने अपनी सुरक्षा के लिए कभी मोटी दीवार खड़ी की थी, भारत की सुरक्षा के लिए वह उत्तरदायित्व हिमालय ने अनादि काल से ही अपने कन्धों पर उठा रखा है।

हिमालय प्रकृति शोभा, वन सम्पदा , बलिष्ठ जलवायु, एवं आध्यात्मिक वातावरण का धनी ही नहीं रहा है। वह प्राचीनकाल में विकसित राज सत्ताओं का भी केन्द्र रहा है। पुरातन युग में इस क्षेत्र के राजा इन्द्र पदवी धारण करते थे। मध्यकाल में भी महाभारत के अनुसार द्विगर्त, त्रिगर्त, माद्रा राज्य हिमालय क्षेत्र में रहे हैं। काश्मीर, नेपाल, गढ़वाल जैसे प्रान्त एवं देश अभी भी हैं। हिमालय एक काश्मीर हिमालय की ही सीमा के अंतर्गत हैं। क्षेत्र फल की दृष्टि से यह भूमि, समूचे भारत का एक चौथाई भाग कही जा सकती है। पंजाब एवं उत्तर प्रदेश के एक बड़े भाग को हिमालय की छाया प्राप्त करने का सौभाग्य उपलब्ध है।

मेघदूत, हर्षचरित, कुमारसंभव, कथा सरित्सागर जैसे संस्कृत काव्यों में तथा प्रायः सभी पुराणों में हिमालय की भाव भरी गरिमा तथा उस क्षेत्र में घटित हुई घटनाओं की गौरव गाथा भरी पड़ी है। आर्ष साहित्य में एक प्रकार से हिमालय की ही आत्मा बोलती है

उत्तरी पूर्वी तथा पश्चिमी भारत को सींचने का श्रेय हिमालय से निकलने वाली नदियों को ही है। पंजाब, सिंध के लिए पंच नद। आसाम से लेकर बर्मा तक के लिए ब्रह्म पुत्र। उत्तर प्रदेश , बिहार, बंगाल के लिए गंगा, यमुना, सरयू आदि यह सभी हिमालय की देन है। बादल बरसते हैं यह ठीक है, पर वस्तुतः निरन्तर हिमालय ही बरसता है। उसके भौतिक एवं आध्यात्मिक दोनों ही महत्व है। भौतिक में वन सम्पदा, वनस्पति औषधि , जल, पत्थर तथा खनिज। आध्यात्मिक वातावरण जिसके कारण उस क्षेत्र के कुली, मजूर जैसे दरिद्र वर्ग के लोग भी ईमानदार तथा सदाचारी पाये जाते हैं। तपोभूमि तो वह है ही। देवताओं, ऋषियों , तपस्वियों का यह क्रीडा प्राँगण है। इसी से भगवान ने गीता में हिमालय को अपना प्रतीक बताया है- स्थावरणाँ हिमालय!

अर्थात् स्थाविरों में हिमालय में ही हूँ।

हिमालय देखने भर में निर्जीव पाषाण खण्ड प्रतीत होता है, तात्विक दृष्टि से पर्यवेक्षण करने पर वह एक प्रत्यक्ष देव है। जीवन उसके कण कण में है। हिम की शीतलता अपने दिव्य प्रभाव से उस क्षेत्र में जा पहुंचने वाले प्राणियों के अंतरंग में प्रवेश करके शान्ति ही प्रदान करती है। आत्म साधना की दृष्टि से इस क्षेत्र का सर्वोपरि महत्व प्राचीन कालं की तरह अभी भी बना हुआ है। और सम्भवत सदा ही बना रहेगा। ब्रह्मवर्चस आरण्यक की स्थापना हिमालय की छाया में उपयुक्त वातावरण को ध्यान में रख कर ही की गई है।

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