विचारशक्ति की अनन्त सामर्थ्य
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समुन्नत जीवन की व्यापक विस्तृत सम्भावनाओं का आधार सद्विचार ही है। विचारों की तरंगें प्रकाश, ताप, ध्वनि एवं विद्युत की अपेक्षा ही शक्तिशाली है, कम नहीं।
शिकागो वासी टेड सीरियस द्वारा कल्पनाओं के फोटो खींच सकने की बात अब विश्व विदित है। टेड की इस शक्ति से विचार तरंगों की शक्ति व गति का ही संकेत मिलता है।
विचार है क्या? प्राण शक्ति (वाइटल फोर्स)की स्फुरणा (डिस्चार्ज) ही विचार है। फोटोन कण प्रकाशवेग से चलते हैं, इसलिए वे अनन्त यात्रा कर सकते हैं। समय फोटोन के लिए गतिशून्य हो जाता है। विचार शक्ति भी कालातीत हैं, क्योंकि उसकी गति प्रकाशवेग से भी अधिक है। सेकेंड के करोड़वें हिस्से से भी कम समय में हम विश्व के किसी भी बिन्दु पर विचार शक्ति द्वारा पहुँचकर वापस आ सकते हैं।
सामान्यतः। मनुष्य अपनी विचार शक्ति का उपयोग नहीं करता। विचार शक्ति में प्राण शक्ति के स्फुरण वेग के अनुसार ही शक्ति होती है। उसकी तीव्रता (इन्टेन्सिटी) के आधार पर उसे मन्द, मध्यम और गहन प्रचण्ड इन तीनों वर्गों में बाँट सकते हैं। अनियमित टूटे फूटे विचारों में बल व वेग मन्द होता है। उनका सम्प्रेषण थोड़ी ही दूर तक किया जा सकता है और उनमें प्रभावित कर सकने की सामर्थ्य भी अत्यल्प होती है। अविकसित व्यक्तियों की विचार शक्ति मन्द ही होती है।
सामान्य औसत व्यक्तियों की विचार शक्ति मध्यम होती है। शिक्षा व सम्पत्ति के अर्जन में यही यथेष्ट सहायिका होती है। मध्यम विचार शक्ति वाले लोगों की बुद्धि पल्लव ग्राही होती है, मूल ग्राही नहीं। बन्दर इस डाल से उस डाल पर पत्तियों को छूता, पकड़ता, खाता, कूदता रहता है। यही पल्लव ग्राहिता है। सामान्य व्यक्ति विविध जीवन क्षेत्रों की सतही जानकारी रखते हैं तथा उसके सहारे व्यवहार कौशल का कार्य सम्पादित करते हैं।
किसी विषय में गहरे पैठने की प्रवृत्ति को मूल ग्राही प्रवृत्ति कहते हैं। गहनता से विचार करने हेतु अपनी सम्पूर्ण ध्यान शक्ति नियोजित करनी होती है। इससे प्राण शक्ति का विशेष स्फुरण होता है। देर तक एक ही विषय से संबद्ध विचार मस्तिष्क में बना रहने पर उसमें संवेग (मूमेन्टम) बढ़ता रहता है। विकसित इच्छा शक्ति से जुड़े विचारों में मस्तिष्क एवं हृदय, दोनों का बल काम करता है। इससे उनकी गति तीव्र ओर प्रभाव गहन हो जाता है वे अत्यधिक शक्तिशाली हो जाते हैं और उनका परिणाम भी शीघ्र ही प्राप्त होता है। प्रचण्ड, प्रभावशाली और साकार विचारधारा में प्राण शक्ति का ही प्रभाव होता है। जब मन को अन्य सभी दिशाओं से हटाकर किसी विशेष बिन्दु पर, किसी आदर्श विशेष में या विषय विशेष में केन्द्रीकृत किया जाता है , तो चिन्तन और आकाँक्षाओँ का बिन्दु वही एक हो जाता है। मनुष्य उसी उधेड़बुन में लगा रहता है। उसी प्रयोजन के लिए प्रतिफल, सक्रिय, जागरुक एवं गतिशील रहता है। आस्था उसी आदर्श में दृढ़ होती है। विचारो का केन्द्र वही होता है और गतिविधियों का प्रेरणा सूत्र भी वही होता है॥ आस्था, चिन्तन और कर्म की त्रिवेणी प्रचण्ड मस्तिष्कीय ऊर्जा के रूप में प्रवाहित होती है। वह सृजनात्मक गतिविधियों और अनुभूतियों का आधार बनती है। प्रबल अवरोधों से टकराकर भी टिके रहने और प्रवाहित रहने की शक्ति उसमें आ जाती है। यह त्रिवेणी व्यक्तित्व को दिव्य पवित्र बनाती है। वस्तुतः श्रेष्ठ व्यक्तित्व उस स्थिति का ही नाम है, जहाँ मध्य में होती है, प्रखर उत्कृष्ट विचार शक्ति और उसमें भावना निष्ठा आस्था की हृदय शक्ति तथा तद्नुरूप आचरण व्यवहार की क्रियाशील का समन्वय होता है।
प्राण शक्ति का चुम्बकीय विद्युत प्रवाह ही विचारों को प्रचण्ड बनाता है। प्राण को मानवी व्यक्तित्व के आधार पर ढली हुई विशिष्ट ऊर्जा कह सकते हैं। इस ऊर्जा को जब निर्धारित लक्ष्य की एक ही दिशा में नियोजित किया जाता है, तब उसका विशिष्ट प्रभाव स्वाभाविक ही है। प्राण की विद्युत के अनुपात से विचार तरंगों में प्रखरता आती है। एंप्लिफायर के माध्यम से हल्की सी आवाज को इतना शक्तिशाली बना दिया जाता है कि उसे सैकड़ों हजारों मील दूर दूर तक बैठे लाखों व्यक्ति सुन सकते हैं। परिष्कृत सघन प्राण शक्ति की सूक्ष्मता का सदुपयोग विचारो को भी ऐसी ही प्रभावोत्पादकता से संपन्न बनाता है।
इससे स्पष्ट है कि विचार शक्ति के घटने बढ़ने का सम्बन्ध प्राण शक्ति की विशिष्ट ऊर्जा से है। अन्यमनस्कता, आलस्य, अस्तव्यस्तता, अवसाद, उपेक्षा और उत्साह हीनता की मनोभूमि में शिथिल, शक्तिहीन विचार ही उत्पन्न होते हैं और मुरझा जाते हैं। स्वयं के जीवन में ही उनका कोई प्रभावशाली परिणाम नहीं परिलखित होता, फिर दूसरों को प्रेरणा दे पाना उनसे कहाँ तक सम्भव हो सकेगा? सामान्य भाषणकर्ताओं, प्रवचनकारों, कथाकारों, वेत्ताओं की मनोभूमि ऐसी ही होती है। थोड़ी सी रटी हुई बाते घुमा फिराकर दुहराई जाती रहती है। मस्तिष्क के उथले स्तर से ही ये निकलते हैं। कण्ठ को और जिह्वा के अग्रभाग को साध लेने पर ऐसे भाषण आदि सुनने में सुहावने लग सकते हैं। समझते समय भी वे आकर्षक प्रतीत हो सकते हैं। इससे आगे उनकी प्रभाव गति नहीं होती। प्राण शक्ति की न्यूनता उनको प्रभाव परिपुष्ट नहीं बना पाती। दूसरी ओर उत्कृष्ट, प्रखर प्राण शक्ति से निकले शब्दों पर भले ही लच्छेदार प्रभाव न हो, पर आस्था, अनुभूति और आचरण का आधार उन्हें मर्मस्पर्शी और स्थायी प्रभाव पैदा कर सकने योग्य बना देता है। महामानवों की वाणी में लोक मानस की जकड़न को समाप्त कर उसका दिशा निर्देश कर सकने की क्षमता इसी आधार के कारण होती है।
एकाग्रतापूर्वक तीव्र इच्छा शक्ति के साथ किये गये विचारो की शक्ति आचरण से जुड़ जाने पर प्रभावपूर्ण हो ही जाती है। यह सम्मिलित शक्ति सद्भाव प्रेरित हुई तो सत्प्रवृत्तियों को प्रदीप्त करती है। दुर्भावनाओं से जुड़ी हुई तो वहाँ पतन के लिए आकर्षित करने वाला प्रभाव पैदा करती है॥ श्मशान में चिता न जल रही हो, तो भी वातावरण की वीभत्सता की अनुभूति वहाँ पहुँचने पर होती ही है। कसाईखाना साफ सुथरा पड़ा हो, तो भी उसमें घुसते ही आतंककारी का प्रभाव मन पर पड़े बिना नहीं रहता। सामूहिक रूप से जहाँ भी अवांछनीय दुष्प्रवृत्तियों की परिस्थितियाँ पाली पोसी जाती हे, वहाँ पतन की सम्मोहन शक्ति प्रचंड हो उठती है।
सत्प्रवृत्तियों के लिए इसी सम्मिलित शक्ति का उपयोग उत्कर्ष की प्रेरणा उत्पन्न करता है। सामूहिक सत सम्मेलनों और धर्मानुष्ठानों के पीछे एक बड़ा प्रयोजन ऐसी प्रेरणा उत्पन्न करना भी होता है। साधु संस्थाओं का जन्म इसी सदुद्देश्य के लिए हुआ। एकत्र रहकर वे प्रखर प्रेरणा का प्रभावी वातावरण विनिर्मित करते थे। सत्कर्मों के सामूहिक आयोजनों की यही महत्वपूर्ण भूमिका होती है। तीर्थों, सत्संग भवनों की महिमा इसी प्रयोजन को पूरा कर सकने के कारण है। देवालयों की प्रभाव शक्ति का यही रहस्य है। मनस्वी महामानवों के निवास स्थान इसी दृष्टि से महत्वपूर्ण होते है, उनको दिव्य स्मारकों के रूप में सुरक्षित रखने का प्रयोजन वे लक्ष्य प्रेरणाएं प्राप्त कर सकना ही होता है, जो वहाँ बिखरी होती है।
एकाग्रता और मनोयोग तभी सम्भव है, जब अपनी आन्तरिक अभिरुचि उससे जुड़ जाए। दार्शनिक और वैज्ञानिक अपने एक ही विषय बिन्दु पर देर तक गहराई से विचार कर सकने की प्रवृत्ति और सामर्थ्य के कारण ही समुद्र में गहरे उतरने वाले गोताखोरों की तरह मणि मुक्ता ढूंढ़ लाते हैं। इसलिए महत्वपूर्ण है उत्कृष्ट लक्ष्यों के प्रति आन्तरिक अभिरुचि का उत्पन्न होना। वैसी रुचि जाग गई, तो फिर विचार शक्ति की अनन्त सामर्थ्य अपना चमत्कारी परिणाम दिखाती ही है।

