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Reading: भर गया उस दिन भिक्षा पात्र · Page 15

भर गया उस दिन भिक्षा पात्र

भगवान बुद्ध वेलुवन पधारने वाले हैं। धर्मदीक्षा का विशाल आयोजन कुशी संघाराम में रखा गया है। बौद्ध बिहार की इस सामयिक व्यवस्था के लिए कौशल, कौशाम्बी, मगध, पंचनद, जेतवन विहारों के परिव्राजकों को समय से पूर्व पहुँच जाने का निर्देश हुआ। इन परिव्राजकों में संथाली भी हैं। संथाली एक समय इसी नगर में निवास किया करते। उनके पिता यहाँ के प्रधान श्रेणिक थे। उनके विशाल भवन को देख कर राज प्रासाद होने का भ्रम होता था। ऐसा कोई वैभव शायद ही रहा होगा जो इसमें विद्यमान न रहा हो, पर आज तो वह सर्वथा वीरान दिखाई देता है।

संघाराम की मर्यादा के अनुसार संथाली और परिव्राजक वलैशी को भिक्षा के लिए भेजा गया। शेष भिक्षुओं को दूसरे कार्य सौंपे गये हैं। दिन भर की परिव्रज्या से थके संथाली जिस क्षण इस विशाल भवन के मुख्य द्वार पर पहुँचे जो कभी उनके सांसारिक सुखों के रंगीन स्वप्नों में खोया हुआ रहता था उनके हृदय की गति में ज्वार उमड़ पड़ा, सांसें तेज हो उठीं, गला रुँध गया। अतीत के सैकड़ों दृश्य, सहस्रों स्मृतियाँ उनके मानस पटल पर एक साथ घूम गईं। “भवति भिक्षा देहि जननी” के चार शब्द उनके मुख से इस पीड़ा के साथ निकले जैसे कोई पंख काटा पक्षी किसी दृश्य भय से कातर होकर अपने घोंसले से भागता है। द्वार पर कौन आता है जलती हुई जिज्ञासा से उनके नेत्र वह देखने के लिए मुख्य द्वार में अपलक टिक गये।

“भवति भिक्षां देहि” का यह स्वर अन्य दिनों के स्वर से भिन्न था उसके प्रस्फुटित होते ही तन्द्रित प्राचीरों में विद्युत दौड़ गई। जिस किसी के कान में स्वर पड़ा- उसके मुख से पहला स्वर यही फूटा संथाली। संथाली आया है, संथाली आये हैं, माँ तात संथाली पधारे हैं, सहोदर संथाली पिता-माता, पत्नी शिशु, भाई सब के मुँह से एक ही शब्द। सभी द्वार की ओर भागे अपने उस संथाली को देखने के लिए जिसने पाँच वर्ष पूर्व ही सांसारिक वैभव को त्याग कर बुद्ध धर्म की शरण ली थी अपने देश की आध्यात्मिक धार्मिक चेतना में नये प्राण फूँकने के लिए जातीय जीवन को दुःख सामाजिक परम्पराओं की निराशा से उबारने के लिए व्यक्ति के चरित्र को अधःपतन के प्रवाह से बचाकर ऊर्ध्वगति प्रदान करने के लिए। इस अवधि में ही संथाली के त्याग, तप, सेवा, साधना की कहानियाँ घर-घर पहुँच चुकी हैं। यह स्वाभाविक ही था कि अपने प्रिय सपूत को देखने के लिए नगर का, घर-परिवार का हर परिजन पुलकित हो उठता। बाहर आते प्रत्येक परिजन की गति इस तथ्य का स्पष्ट साक्ष्य थी।

गैरिक चीवर और उत्तरीय, पाहन विहीन पद, मुंडित केश हाथ में भिक्षापात्र, तपश्चर्या की साक्षात् प्रतिकृति को सम्मुख खड़ा देख कर जननी जनक दोनों की आँखों से अश्रुधारा फूटी तो फिर फूट ही पड़ी अविराम बहती ही चली गई।

तात! करुणामय वातावरण की निस्तब्धता भंग करते हुए संथाली ने पूछा- आपके दुःखी होने का अर्थ तो यही हो सकता है। आर्य-मेरी साधना अभी तक अधूरी है अन्यथा आपको हर्षित होना चाहिए था।

अवुस ऐसा न कहो। तुम इस देश के आदर्श हो तुम्हारा इतिहास कोटि-कोटि प्राणों को तप, त्याग और सेवा की प्रेरणा देगा। ये आँसू तो पश्चाताप के आँसू हैं वत्स! सोचते हैं यदि हम मोह में न फँसे होते, माया से ग्रस्त न हुए होते तो आज यह स्थिति क्यों होती। जो कार्य हमें करना चाहिए था, वह तुम्हें करना पड़ रहा है।

संथाली की आत्म-ग्लानि धुल गई। उसने वलैशी की ओर दृष्ट डाली, भिक्षा ग्रहण की और बिहार की ओर चल पड़े। और दिन की अपेक्षा आज उनका भिक्षा पात्र कहीं अधिक भरा हुआ था।

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