• News
  • Blogs
  • Gurukulam
English हिंदी
×

My Notes


  • TOC
    • सूक्ष्म की महान सामर्थ्य
    • सूक्ष्मीकरण से सम्भावित परिणतियाँ
    • प्राण ऊर्जा का वाष्पीकरण-सूक्ष्मीकरण
    • तृतीय विश्वयुद्ध एवं उसके निरस्त होने की सम्भावनाएं
    • Quotation
    • परिवर्तन एक समय साध्य प्रक्रिया
    • इस नक्शे में आमूल चूल परिवर्तन होगा
    • Quotation
    • नैपोलियन बोनापार्ट (kahani)
    • राजतन्त्र और अर्थतन्त्र में परिवर्तन
    • Quotation
    • मनीषा को झकझोरने की चेष्टा
    • मनीषी एवं ऋषि के रूप में हमारी परोक्ष भूमिका
    • चीन के धर्मोपदेशक (kahani)
    • मात्र सुधार ही नहीं, निर्माण भी अपरिहार्य
    • समर्थ अग्रदूतों को हमारे वर्चस का बल मिलेगा
    • कैसा होगा प्रज्ञायुग का समाज?
    • आत्मसत्ता में निहित विभूतियों का रहस्योद्घाटन
    • विराट से संबंध सूत्र जोड़ने का प्रयास पुरुषार्थ
    • Quotation
    • भूत एक भ्रम भी- एक वास्तविकता भी
    • राहगीर को काशी जाना था (kahani)
    • परोक्ष जगत की विधि व्यवस्था एवं तथ्य भरे आधार
    • पारस पत्थर था (kahani)
    • साधना एवं यज्ञ का सूक्ष्मीकरण
    • आत्मबल स्थायी भी फलदायी भी
    • तीन महत्वपूर्ण मोर्चे, जिन पर हमें कार्य करना है।
    • अरब लोगों का एक काफिला (kahani)
    • Quotation
    • प्रस्तुत विषमताओं के निवारण हेतु राष्ट्र व्यापी यज्ञायोजन
    • VigyapanSuchana
    • परिजनों के लिए विशेष साधना उपक्रम
    • गायत्री नगर में बसने हेतु भाव भरा आह्वान। - सतयुग के स्वप्न को हमीं साकार करें
    • सुसंस्कारिता संवर्धन हेतु स्वावलम्बन प्रधान शिक्षण
    • नवयुग का उद्यान लहराने वाली शिक्षा पद्धति
    • गायत्री नगर की सर्वतोमुखी शिक्षा प्रणाली
    • प्रतिभावानों का प्रथम आमन्त्रण
    • VigyapanSuchana
  • My Note
  • Books
    • SPIRITUALITY
    • Meditation
    • EMOTIONS
    • AMRITVANI
    • PERSONAL TRANSFORMATION
    • SOCIAL IMPROVEMENT
    • SELF HELP
    • INDIAN CULTURE
    • SCIENCE AND SPIRITUALITY
    • GAYATRI
    • LIFE MANAGEMENT
    • PERSONALITY REFINEMENT
    • UPASANA SADHANA
    • CONSTRUCTING ERA
    • STRESS MANAGEMENT
    • HEALTH AND FITNESS
    • FAMILY RELATIONSHIPS
    • TEEN AND STUDENTS
    • ART OF LIVING
    • INDIAN CULTURE PHILOSOPHY
    • THOUGHT REVOLUTION
    • TRANSFORMING ERA
    • PEACE AND HAPPINESS
    • INNER POTENTIALS
    • STUDENT LIFE
    • SCIENTIFIC SPIRITUALITY
    • HUMAN DIGNITY
    • WILL POWER MIND POWER
    • SCIENCE AND RELIGION
    • WOMEN EMPOWERMENT
  • Akhandjyoti
  • Login





Magazine - Year 1984 - Version 2

Media: TEXT
Language: HINDI
SCAN TEXT


मनीषी एवं ऋषि के रूप में हमारी परोक्ष भूमिका

Listen online

View page note

Please go to your device settings and ensure that the Text-to-Speech engine is configured properly. Download the language data for Hindi or any other languages you prefer for the best experience.
×

Add Note


First 12 14 Last
मनुष्य अपनी अन्तःशक्ति के सहारे प्रसुप्त के प्रकटीकरण द्वारा ऊंचा उठता है, यह जितना सही है, उतना ही यह भी मिथ्या नहीं कि तप-तितिक्षा से प्रखर बनाया गया वातावरण, शिक्षा, सान्निध्य-सत्संग, परामर्श-अनुकरण भी अपनी उतनी ही सशक्त भूमिका निभाता है। देखा जाता है कि किसी समुदाय में नितान्त साधारण श्रेणी के सीमित सामर्थ्य सम्पन्न व्यक्ति एक प्रचण्ड प्रवाह के सहारे असम्भव पुरुषार्थ भी सम्भव कर दिखाते हैं। प्राचीन काल में मनीषी-मुनिगण यही भूमिका निभाते थे। वे युग साधना में निरत रहकर लेखनी वाणी के सशक्त तन्त्र के माध्यम से जन-मानस के चिन्तन को उभारते थे। ऐसी साधना अनेकों उच्चस्तरीय व्यक्तियों को जन्म देती थी- उनकी प्रसुप्त सामर्थ्य को उजागर कर उन्हें सही दिशा देकर समाज में वाँछित परिवर्तन लाती थी। शरीर की दृष्टि से सामान्य दृष्टिगोचर होने वाले व्यक्ति भी प्रतिभा-कुशलता-चिन्तन की श्रेष्ठता से अभिपूरित देखे जाते थे।

सर्वविदित है कि मुनि एवं ऋषि ये दो श्रेणियाँ अध्यात्म क्षेत्र की प्रतिभाओं में गिनी जाती रही हैं। ऋषि वह जो तपश्चर्या द्वारा काया का चेतनात्मक अनुसन्धान कर उन निष्कर्षों से जन-समुदाय को लाभ पहुँचाएं तथा मुनिगण वे कहलाते हैं, जो चिन्तन-मनन स्वाध्याय द्वारा जन-मानस के परिष्कार की अहम् भूमिका निभाते हैं। एक पवित्रता का प्रतीक है तो दूसरा प्रखरता का। दोनों को ही तप साधना में निरत हो सूक्ष्मतम बनना पड़ता है ताकि अपना स्वरूप और विराट् व्यापक बनाकर स्वयं को आत्मबल सम्पन्न कर वे युग चिन्तन के प्रवाह को मरोड़-बदल सकें। मुनि जहाँ प्रत्यक्ष साधनों का प्रयोग करने की स्वतंत्रता रखते हैं, वहाँ ऋषियों के लिए यह अनिवार्य नहीं। वे अपने सूक्ष्म रूप में भी वातावरण को आन्दोलित करते- सुसंस्कारित बनाये रख सकते हैं।

लोक व्यवहार में मनीषी शब्द का प्रायः अर्थ उस महाप्राज्ञ से लिया जाता है जिसका मन उसके वश में हो। जो मन से नहीं संचालित होता अपितु अपने विचारों द्वारा मन को चलाता है, उसे मनीषी एवं ऐसी प्रज्ञा को मनीषा कहा जाता है। शास्त्रकार का कथन है- “मनोषा अस्ति येषाँ ते मनीषी नः।” लेकिन साथ ही यह भी कहा है- ‘‘मनीषी नस्तु भवन्ति, पावनानि न भवन्ति”- अर्थात्- मनीषी तो कई होते हैं, बड़े-बड़े बुद्धिमान होते हैं परन्तु वे पावन हों- पवित्र हों, यह अनिवार्य नहीं”। प्रतिभाशाली-बुद्धिमान होना अलग बात है एवं पवित्र-शुद्ध अन्तःकरण रखते हुए बुद्धिमान होना दूसरी। यह कथन आज की परिस्थितियों में नितांत सही है। आज सम्पादक, बुद्धिजीवी, लेखक, अन्वेषक, प्रतिभाशाली वैज्ञानिक तो अनेकानेक हैं, देश देशान्तरों में फैले पड़े हैं लेकिन वे मनीषी नहीं हैं। क्यों? क्योंकि तप शक्ति द्वारा अन्तःशोधन द्वारा उन्होंने पवित्रता नहीं अर्जित की।

साहित्य की आज कहीं कमी है? जितनी पत्र-पत्रिकाएं आज प्रकाशित होती हैं, जितना साहित्य नित्य विश्व भर में छपता है उस पहाड़ के समान सामग्री को देखते हुए लगता है, वास्तव में मनीषी बढ़े हैं, पढ़ने वाले भी बढ़े हैं। लेकिन इन सबका प्रभाव क्यों नहीं पड़ता? क्यों एक लेखक की कलम कुत्सा भड़काने में ही निरत रहती है एवं क्यों उस साहित्य को पढ़कर तुष्टि पाने वालों की संख्या बढ़ती चली जाती है, इसके कारण ढूंढ़े जायें तो वहीं आना होगा, जहाँ कहा गया था- “पावनानि न भवन्ति”। यदि इतनी मात्रा में उच्चस्तरीय, चिन्तन को उत्कृष्ट बनाने वाला साहित्य रचा गया होता एवं उसकी भूख बढ़ाने का माद्दा जन-समुदाय के मन में पैदा किया गया होता तो क्या ये विकृतियाँ नजर आतीं जो आज समाज में विद्यमान है। दैनन्दिन जीवन की समस्याओं का समाधान यदि सम्भव हो सकता है तो वह युग-मनीषा के हाथों ही होगा।

जैसा कि हम पूर्व में भी कह चूके हैं कि नवयुग यदि आएगा तो विचार शोधन द्वारा ही, क्रान्ति होगी तो वह लहू और लोहे से नहीं विचारों की काट द्वारा होगी, समाज का नव-निर्माण होगा तो वह सद्-विचारों की प्रतिष्ठापना द्वारा ही सम्भव होगा। अभी तक जितनी मलिनता समाज में प्रविष्ट हुई है, वह बुद्धिमानों के माध्यम से ही हुई है। द्वेष-कलह, नस्लवाद-जातिवाद, व्यापक नर-संहार जैसे कार्यों में बुद्धिमानों ने ही अग्रणी भूमिका निभाई है। यदि वे सन्मार्गगामी होते, उनके अन्तःकरण पवित्र होते, तप, ऊर्जा का सम्बल उन्हें मिला होता तो उन्होंने विधेयात्मक चिन्तन प्रवाह को जन्म दिया होता, सत्साहित्य रचा होता, ऐसे आन्दोलन चलाए होते। हिटलर ने जब नीत्से के सुपरमैन रूपी अधिनायक को अपने में साकार करने की इच्छा की तो सर्वप्रथम सारे राष्ट्र के विचार प्रवाह को उस दिशा में मोड़ा। अध्यापक-वैज्ञानिक वर्ग नाजीवाद का कट्टर समर्थक बना तो उसकी उस निषेधात्मक विचार साधना द्वारा जो उसने “मीन केम्फ” के रूप में आरोपित की। बाद में सारे राष्ट्र के पाठ्यक्रम, अखबारों की धारा का मोड़ उसने उस दिशा में मोड़ दिया जैसा कि वह चाहता था। जर्मन राष्ट्र नस्लवाद के अहं में सर्वश्रेष्ठ जाति का प्रतीक कोने के गर्वोन्माद में उन्मत्त हो व्यापक नर संहार कर स्वयं ध्वस्त हो गया। यह भी मनीषा के के एक मोड़ का परिणति है, ऐसे मोड़ की जो सही दिशा में होता तो ऐसे समर्थ सम्पन्न राष्ट्र को कहाँ से कहाँ ले जाता।

कार्लमार्क्स ने सारे अभावों में जीवन जीते हुए अर्थशास्त्र रूपी ऐसे दर्शन को जन्म दिया जिसने समाज में क्रान्ति ला दी। पूँजीवादी किले ढहते चले गये एवं साम्राज्यवाद दो तिहाई धरती से समाप्त हो गया। “डास कैपीटेल” रूपी इस रचना ने एक नवयुग का शुभारम्भ किया जिसमें श्रमिकों को अपने अधिकार मिले एवं पूँजी के समान वितरण का वह अध्याय खुला जिससे करोड़ों व्यक्तियों को सुख-चैन की, स्वावलम्बन प्रधान जिन्दगी जी सकने की स्वतंत्रता मिली। रूसो ने जिस प्रजातन्त्र की नींव डाली थी, उपनिवेशवाद एवं साम्राज्यवाद के पक्षधर शोषकों की रीति-नीति ही उसकी प्रेरणा स्रोत होगी। मताधिकार की स्वतंत्रता, बहुमत के आधार पर प्रतिनिधित्व का दर्शन विकसित न हुआ होता, यदि रूसो की विचारधारा ने व्यापक प्रभाव जन समुदाय पर न डाला होता। “जिसकी लाठी- उसकी भैंस”की नीति ही सब जगह चलती, कोई विरोध तक न कर पाता। जागीरदारों एवं उत्तराधिकार के आधार पर राजा बनने वाले अनगढ़ों का ही वर्चस्व होता। इसे एक प्रकार की मनीषा प्रेरित क्रान्ति कहना चाहिए कि देखते-देखते उपनिवेश समाप्त हो गए, शोषक वर्ग का सफाया हो गया। इसी संदर्भ में हम कितनी ही बार लिंकन एवं लूथर किंग के साथ-साथ उस महिला हैरिएट स्टो का उल्लेख करते रहे हैं जिसकी कलम ने कालों को गुलामी के चंगुल से मुक्त कराया। प्रत्यक्षतः यह युग मनीषा की भूमिका है।

बुद्ध की विवेक एवं नीतिमत्ता पर आधारित विचार क्राँति एवं गांधी-पटेल-नेहरू द्वारा पैदा की गयी स्वातंत्र्य आन्दोलन की आँधी उस परोक्ष मनीषा की प्रतीक है जिसने अपने समय में ऐसा प्रचण्ड प्रवाह उत्पन्न किया कि युग बदलता चला गया। उन्होंने कोई विचारोत्तेजक साहित्य रचा हो अथवा विशेष वक्तृता की हो, यह भी नहीं। फिर यह सब कैसे सम्भव हुआ। यह तभी हो पाया जब उन्होंने मुनि स्तर की भूमिका निभायी, स्वयं को तपाया, विचारों में शक्ति पैदा की एवं उससे वातावरण को प्रभावित किया।

परिस्थितियाँ आज भी विषम हैं। वैभव और विनाश के झूले में झूल रही मानव जाति को उबारने के लिये आस्थाओं के मर्मस्थल तक पहुँचना होगा और मानवी गरिमा को उभारने, दूरदर्शी विवेकशीलता को जगाने वाला प्रचण्ड पुरुषार्थ करना होगा। साधन इस कार्य में कोई योगदान दे सकते हैं, यह सोचना भ्रांतिपूर्ण है। दुर्बल आस्था अन्तराल को तत्त्वदर्शन और साधना प्रयोग के उर्वरक की आवश्यकता है। अध्यात्म वेत्ता इस मरुस्थल की देखभाल करने की जिम्मेदारी अपने ऊपर लेते व समय-समय पर संव्याप्त भ्रान्तियों से मानवता को उबारते हैं। अध्यात्म की शक्ति विज्ञान से भी बड़ी है।

अध्यात्म ही व्यक्ति के अन्तराल में विकृतियों के माहौल से लड़ सकने- निरस्त कर पाने में सक्षम तत्वों की प्रतिष्ठापना कर पाता है। हमने व्यक्तियों में पवित्रता व प्रखरता का समावेश करने के लिए मनीषा को ही अपना माध्यम बनाया एवं उज्ज्वल भविष्य का सपना देखा है।

हमने अपने भावी जीवनक्रम के लिए जो महत्वपूर्ण निर्धारण किए हैं, उनमें सर्वोपरि है लोक चिन्तन को सही दिशा देने हेतु एक ऐसा विचार प्रवाह खड़ा करना जो किसी भी स्थिति में अवांछनीयताओं को टिकने ही न दे। आज जन समुदाय के मन-मस्तिष्क में जो दुर्मति घुस पड़ी है, उसी की परिणति ऐसी परिस्थितियों के रूप में नजर आती है जिन्हें जटिल, भयावह समझा जा रहा है। ऐसे वातावरण को बदलने के लिए व्यास की तरह, बुद्ध, गाँधी, कार्लमार्क्स की तरह, मार्टिन लूथर, अरविन्द, महर्षि रमण की तरह भूमिका निभाने वाले मुनि व ऋषि के युग्म की आवश्यकता है, जो प्रत्यक्ष एवं परोक्ष प्रयासों द्वारा विचार क्रान्ति का प्रयोजन पूरा कर सके। यह पुरुषार्थ अन्तःक्षेत्र की प्रचण्ड तप साधना द्वारा ही सम्भव हो सकता है। इसका प्रत्यक्ष रूप युग मनीषा का हो सकता है जो अपनी लेखनी शक्ति द्वारा उस उत्कृष्ट स्तर का साहित्य रच सके जिसे युगान्तरकारी कहा जा सकता है। अखण्ड-ज्योति के माध्यम से जो संकल्प हमने आज से सैंतालीस वर्ष पूर्व लिया था, उसे अनवरत निभाते रहने का हमारा नैतिक दायित्व है।

युग ऋषि की भूमिका अपने परोक्ष रूप में निभाते हुए उन अनुसंधानों की पृष्ठभूमि बनाने का हमारा मन था जो वैज्ञानिक अध्यात्मवाद का प्रत्यक्ष रूप इस तर्क, तथ्य, प्रमाणों को आधार मानने वाले समुदाय के समक्ष रख सकें। आज चल रहे वैज्ञानिक अनुसंधान यदि उनसे कुछ दिशा लेकर सही मार्ग पर चल सके तो हमारा प्रयास सफल माना जाएगा। आत्मानुसंधान के लिये अन्वेषण कार्य किस प्रकार चलना चाहिए, साधना-उपासना का वैज्ञानिक आधार क्या है? मनःशक्तियों के विकास में साधना उपचार किस प्रकार सहायक सिद्ध होते हैं? ऋषिकालीन आयुर्विज्ञान का पुनर्जीवन कर शारीरिक एवं मानसिक स्वास्थ्य को कैसे अक्षुण्ण बनाया जा सकता है, गायत्री की शब्द शक्ति एवं यज्ञाग्नि की ऊर्जा कैसे व्यक्तित्व को सामर्थ्यवान एवं पवित्र तथा काया को जीवनी शक्ति सम्पन्न बनाकर प्रतिकूलताओं से जूझने में समर्थ बना सकती है, ज्योतिर्विज्ञान के चिर पुरातन प्रयोगों के माध्यम से आज के परिप्रेक्ष्य में मानव समुदाय को कैसे लाभान्वित किया जा सकता है, ऐसे अनेकानेक पक्षों को हमने अथर्ववेदीय ऋषि परम्परा के अंतर्गत अपने शोध प्रयासों में अभिनव रूप में प्रस्तुत कर दिये हैं। हमने उनका शुभारम्भ कर बुद्धिजीवी समुदाय को एक दिशा दी है, आधार खड़ा किया है। परोक्ष रूप में हम उसे सतत् पोषण देते रहेंगे। सारे वैज्ञानिक समुदाय का चिन्तन इस दिशा में चल पड़े, आत्मिकी के अनुसंधान में अपनी प्रज्ञा नियोजित कर वे स्वयं को धन्य बना सकें, ऐसा हमारा प्रयास रहेगा। सारी मानव जाति को अपनी मनीषा के द्वारा एवं शोध अनुसंधान के निष्कर्षों के माध्यम से लाभान्वित करने का हमारा संकल्प सूक्ष्मीकरण तपश्चर्या की स्थिति में और भी प्रखर रूप लेगा इसे आने वाला समय बताएगा।

First 12 14 Last


Other Version of this book



Version 1
Type: SCAN
Language: HINDI
...

Version 2
Type: TEXT
Language: HINDI
...


Releted Books


Articles of Books

  • सूक्ष्म की महान सामर्थ्य
  • सूक्ष्मीकरण से सम्भावित परिणतियाँ
  • प्राण ऊर्जा का वाष्पीकरण-सूक्ष्मीकरण
  • तृतीय विश्वयुद्ध एवं उसके निरस्त होने की सम्भावनाएं
  • Quotation
  • परिवर्तन एक समय साध्य प्रक्रिया
  • इस नक्शे में आमूल चूल परिवर्तन होगा
  • Quotation
  • नैपोलियन बोनापार्ट (kahani)
  • राजतन्त्र और अर्थतन्त्र में परिवर्तन
  • Quotation
  • मनीषा को झकझोरने की चेष्टा
  • मनीषी एवं ऋषि के रूप में हमारी परोक्ष भूमिका
  • चीन के धर्मोपदेशक (kahani)
  • मात्र सुधार ही नहीं, निर्माण भी अपरिहार्य
  • समर्थ अग्रदूतों को हमारे वर्चस का बल मिलेगा
  • कैसा होगा प्रज्ञायुग का समाज?
  • आत्मसत्ता में निहित विभूतियों का रहस्योद्घाटन
  • विराट से संबंध सूत्र जोड़ने का प्रयास पुरुषार्थ
  • Quotation
  • भूत एक भ्रम भी- एक वास्तविकता भी
  • राहगीर को काशी जाना था (kahani)
  • परोक्ष जगत की विधि व्यवस्था एवं तथ्य भरे आधार
  • पारस पत्थर था (kahani)
  • साधना एवं यज्ञ का सूक्ष्मीकरण
  • आत्मबल स्थायी भी फलदायी भी
  • तीन महत्वपूर्ण मोर्चे, जिन पर हमें कार्य करना है।
  • अरब लोगों का एक काफिला (kahani)
  • Quotation
  • प्रस्तुत विषमताओं के निवारण हेतु राष्ट्र व्यापी यज्ञायोजन
  • VigyapanSuchana
  • परिजनों के लिए विशेष साधना उपक्रम
  • गायत्री नगर में बसने हेतु भाव भरा आह्वान। - सतयुग के स्वप्न को हमीं साकार करें
  • सुसंस्कारिता संवर्धन हेतु स्वावलम्बन प्रधान शिक्षण
  • नवयुग का उद्यान लहराने वाली शिक्षा पद्धति
  • गायत्री नगर की सर्वतोमुखी शिक्षा प्रणाली
  • प्रतिभावानों का प्रथम आमन्त्रण
  • VigyapanSuchana
About Shantikunj

Shantikunj has emerged over the years as a unique center and fountain-head of a global movement of Yug Nirman Yojna (Movement for the Reconstruction of the Era) for moral-spiritual regeneration in the light of hoary Indian heritage.

Navigation Links
  • Home
  • Literature
  • News and Activities
  • Quotes and Thoughts
  • Videos and more
  • Audio
  • Join Us
  • Contact
Write to us

Click below and write to us your commenct and input.

Go

Copyright © SRI VEDMATA GAYATRI TRUST (TMD). All rights reserved. | Design by IT Cell Shantikunj